शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

त्याग पत्र -- 26

पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, "राघोपुर की रामदुलारी का परिवार के विरोध के बावजूद बाबा की आज्ञा से पटना विश्वविद्यालय आना ! रुचिरा-समीर और प्रकाश की दोस्ती ! फिर पटना की उभरती हुई साहित्यिक सख्सियत ! गाँव में रामदुलारी के खुले विचारों की कटु-चर्चा ! शिवरात्रि में रामदुलारी गाँव आना और घरवालों द्वरा शादी की बात अनसुनी करते हुए शहर को लौट जाना ! फिर शादी की सहमति ! माधोपुर से बारात चल पड़ीं है ! अब पढ़िए आगे !! -- करण समस्तीपुरी

ठाकुर जी की हवेली से लेकर शिवाला तक चंदोवा लगा था। रंगीन प्रकाशों की लडियां डूबते हुए सूरज को मुँह चिढाने लगी थी। जलवासे का प्रबंध मिडिल स्कूल पर किया गया था। शिवाला से जलवासे तक सड़क के दोनों ओर बांस के छोटे-छोटे खम्भों के सहारे लम्बे-लम्बे सफ़ेद बल्ब लगाए गए थे। राघोपुर में प्रकाश की ऐसी छटा पहले लोगों ने कभी नहीं देखी थी। भोले-भाले ग्रामीण को यह बिन-बादल इन्द्रधनुष सा लग रहा था।


ओह... ! मिडिल स्कूल पर सो गहमा-गहमी थी कि पूछिये मत। मुरली बाबू मोटर-साइकिल से गए हैं... बराती को लाने। दूर से किसी ट्रक्टर की रौशनी देख कर भी जलवासे पर व्यवस्था में लगे लोग 'हँ.... आ गयी बारात....!' कह चहल-कदमी शुरू कर देते हैं। ग्ररोर्रोर्रो.....पेपे...प.... ! अरे मुरली बाबू फटफटिया हराहराए चले आ रहे हैं। अह्हा..........! अब सच में बारात आ गयी। मिडिल स्कूल के फिल्ड में फटफटिया रुकते ही लोग चारो ओर से दौर पड़े। मुरली बाबू बुज़ुर्ग लोगों से हौले-हौले कुछ बात करते हैं। फिर सब को नाम ले के पुकारते हैं, "भोला... उत्तम...... चंदू...... हरिया.... भकतु....! अरे सब तैयार है न... ? ये देखो बारात आ गयी। ऐ लक्खन ! अरे झार-बत्ती उठाने वाला लड़का सब है न तैयार जी... !! सब तरफ से हाँ-हाँ...हाँ-हाँ की आवाज़ आती है।


फर्र...गर...गर....गर.... ! एक गाड़ी। गोएँ..........गुरर्र.... एक और गाड़ी... !! हुर्राआएं..... ये बड़ा बस... ! अरे उधर देखो... ! उधर देखो.... !! पीछे... पीछे...। जीप के पीछे..। ओह तेरे कि... ये गाड़ी तो फूलों से सजी है...। हाँ-हाँ... ! दुल्हे राजा इसी में होंगे। छोटे-बच्चे उचक-उचक कर देखने की कोशिश करते हैं। उत्सुकता तो बड़े-बुजुर्गों में भी है।


पचकोरी महतो और दोरिक चापा-कल से पानी भर-भर कर ड्राम में डाल रहा है। रुदल, अटेरन, मंगला, तपेसर और जगदीश स्टील के बड़े-बड़े जग से प्लास्टिक के ग्लास में पानी डाल कर बारातियों को पिला रहा है। एंह तोरी के.... ! ठाकुर टोल के लड़के भी लग गए हैं बारात की अगवानी में। धनेसर के हाथ में बड़का ट्रे है। ट्रे में प्लास्टिक के सफ़ेद ग्लास में लाल-पीला शरबत है। स्वरुप चौधरी के छोटे सुपुत्र खुद अपने हाथ से ग्लास उठा-उठा कर बारातियों को दे रहे हैं। कागज़ के डिजाइनदार थाली में चिनिया केला, दाल-मोंट, गुलाब-जामुन, काजू-कतरी, चन्द्रकला, बरफी, बालूशाही, रसगुल्ला, सिंघारा, अंगूर भर-भर के बारातियों को परोस रहे हैं। बारह साल का लक्ष्मण भी लगा हुआ लेकिन उसे थोड़ा आश्चर्य भी है। बराती भर पेट यहीं खा लेंगे तो घर पर बन रहे छप्पन भोग का क्या होगा ?

मिथिलांचल में कहावत है, 'विवाह से विध भारी.... !" थोड़ा सब्र कीजिये और लीजिये मिथिला की परिणय समारोह का आनंद इसी ब्लॉग पर अगले हफ्ते !!

9 टिप्‍पणियां:

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  2. विवाह की बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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  3. अच्छी कडी. देखना है खाना खाने के बाद क्या होता है.

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  4. Karan Ji is bar ka episode thik thak he raha....bas ap akle kadi me Ramdulari ko vida kar he dejiyega...

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