बुधवार, 7 अप्रैल 2010

विश्व स्वास्थ्य दिवस, 2010

विश्व स्वास्थ्य दिवस, 2010

-आचार्य परशुराम राय

आज 7वीं अप्रैल है। पूरा विश्व आज ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ मना रहा है। ‘विश्व स्वास्थ्य संस्था’ त्वरित गति से विकसित हो रही शहरीकरण सभ्यता से उत्पन्न स्वास्थ्य के लिए भयानक स्थितियों के प्रति लोगों को जागरुक करने तथा ऐसी भयावह स्थितियों की रोकथाम के लिए विश्व के विभिन्न नगरों में अनेक कार्यक्रमों को आयोजित करने की योजना बना चुकी है। इसे विश्व स्वास्थ्य संस्था (W.H.0.) की वेबसाइट पर देखा जा सकता है। अपने कार्यक्रमों से यह संस्था अपने उद्देश्यों में कितना सफल होती है, इसका निर्धारण एकत्र किए गये डाटा करेंगे या धरातल पर आये परिवर्तन की दिशा।

उक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि वर्ष 2010 के स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर बनायी गयी वर्ष भर चलने वाली योजनाएँ नगरों तक सीमित रखी गयी हैं। योजनाओं में राष्ट्रीय स्तर, स्थानीय, नगर स्तर के अनेक सरकारी, गैर सरकारी संगठनों, धार्मिक संगठनों, अन्य सामाजिक संगठनों को उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु आहूत किया गया है। मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि वे आयोजकों को उद्देश्यों की प्राप्ति में सफल करें। लेकिन भारतीय पर्यावरण से जितना हम परिचित हैं, लगता है वे अन्य देशी योजनाओं की तरह मात्र कागज की स्याही बनकर रह जाएँगी।

इस अवसर पर इस रचना के माध्यम से ब्लाग के पाठकों का ध्यान एक पुस्तक की ओर आकर्षित करना चाहूँगा और वह है- A Practical Guide to Holistic Health इसके लेखक हैं विश्व के महान योगियों में से एक स्वामी राम। मैं पाठकों से एक बार इस पुस्तक को पढ़ने का आग्रह जरूर करूँगा। ऐसा नहीं है कि सर्वांगीण स्वास्थ्य पर चर्चा केवल इसी एक पुस्तक में हुई है। खण्डों में इस विषय पर चर्चा अनेक ग्रंथों में मिल सकती है। लेकिन उन सारे तथ्यों को अपने गुरुजनों के सान्निध्य में उपलब्ध अनुभव से अनुप्राणित कर स्वामी जी ने व्यावहारिक तकनीकों को बड़े ही क्रमिक ढंग से प्रस्तुत किया है। यह 100 पृष्ठों की छोटी सी पुस्तक है, लेकिन बहुमूल्य है।

सर्वांगीण स्वास्थ्य की चर्चा आयुर्वेद और चीनी चिकित्सा विज्ञान में खुलकर हुई है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान विभिन्न बीमारियों से सम्बन्धित तथ्यों की खोज व उनकी चिकित्सा तक सीमित हैं। चीनी टीका (Vaccination) के सिद्धांतों से डॉ एडवर्ड जेनर की खोज से शताब्दियों पहले से परिचित थे। भारत में भी इस प्रकार का प्रयोग देखने को मिलता हैं- विषम् विषस्यौषधम्, अर्थात विष (Poison) विष की औषधि है। यह सिद्धांत टीका (Vaccination) के सिद्धांत के अनुरुप ही है।

जब हम स्वास्थ्य की बात करते हैं तो उसमें जीव विज्ञान, शरीर विज्ञान, मनोविज्ञान और दर्शन संबंधी धारणाओं को लेते हैं। लेकिन सर्वांगीण स्वास्थ्य इन सभी का समन्वय है, अर्थात् शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य और इन सबका उत्स आध्यात्मिक स्वास्थ्य और यह तभी सम्भव है जब बाह्य प्रकृति और अंतः प्रकृति का समन्वय हो, उनमें सन्तुलन हो। इसके लिए पहली आवश्यकता है शरीर को संचालित करने वाले नियमों की जानकारी करना और उन पर धीर-धीरे नियंत्रण पाना।

प्राचीन ग्रंथों में हमारे शरीर में स्थित दो तंत्रों की चर्चा की गयी है- एक तो शरीर की शुद्धि या उत्सर्जन और दूसरा इसका पोषण। यो दोनों तंत्र एक दूसरे के साथ समरस होकर काम करते हैं। इनकी समरसता भंग न हो, इसके लिए हमें जागरुक और प्रयत्नशील रहना चाहिए। क्योंकि यदि शुद्धिकरण तंत्र ढ़ंग से काम नहीं करेगा तो पोषण तंत्र भी प्रभावित होगा और हमारे शरीर में क्षीणता घर करने लगेगी। इनके कार्य में रुकावटें डालना या अनियमिताएँ बरतना इनके बीच में स्थित समरसता को भंग करता है और धीरे-धीरे शरीर व्याधि का मन्दिर बन जाता है।

पोषण के लिए संतुलित और पोषक आहार की जानकारी आवश्यक है। शरीर के उत्सर्जन तंत्र का उचित संचालन हमारे द्वारा लिये गये संतुलित और पोषक आहार, उसकी मात्रा और साथ में तरल पेय पर निर्भर करता है और ये प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकते हैं।

पोषण और उत्सर्जन तंत्र को समुचित ढंग से काम करने के लिए, शरीर को तनाव से मुक्त रखने और शरीर को स्फूर्ति से युक्त रखने के लिए नियमित रूप से कसरत करना अत्यन्त आवश्यक है। तभी हम अपने शरीर, मन, संकल्प और मनोभावों (Emotions) को नियंत्रित करने में सफल होंगे। यहीं से हमारे आध्यात्मिक विकास का श्रीगणेश होता है। कसरत अपनी क्षमता के अनुसार चुनना चाहिए या इस क्षेत्र के दक्ष लोगों से परामर्श लेकर कर सकते हैं। उदाहरण के लिए कुछ योगासन, दुलकी चाल आदि का अभ्यास उपयोगी हैं।

स्वामी राम लिखते हैं कि योगासन के बाद दुलकी चाल (Jogging) चलना हमें शिथिल और उद्दीप्त करता है, जबकि दुलकी चाल के बाद योगासन करने पर हम दिनभर शांत और संतुलित बने रहते हैं।

करसत और भोजन के विषय में स्पष्ट निर्देश हैं कि जितनी कसरत हम कर सकते हैं उतनी या उससे थोड़ा सा अधिक करनी चाहिए, जबकि भोजन जितना कर सकते हैं उससे थोड़ा कम करना चाहिए।

इसके बाद, हमारे सर्वांगीण स्वास्थ्य के प्रमुख अंग हमारे मनोभाव हैं, जैसे लज्जा, भय, घृणा, ओज आदि। इन्हीं को हम साहित्यशास्त्र में रसों के स्थायीभाव के रुप में जानते हैं। ये मनोभाव हमें प्रतीति के रुप में दिखाई देते हैं। इनका विश्लेषण कर यदि हम इनके प्रति जागरुक बन सकें तो मनोभावों में निहित रचनात्मकता को विकसित कर सकते हैं। हमारे मनोभाव ही हमारी सर्जनात्मक शक्ति हैं। किन्तु यदि हम इनके प्रति जागरुक नहीं होते हैं, तो ये हमारे लिए हानिकारक हो जाते हैं। उदाहरण के तौर पर देखें तो भय और लोभ आज भारत के लिए भ्रष्टाचार का अभिशाप बन चुके हैं। जबकि यदि इनका रचनात्मक प्रयोग किया जाय तो ये ही हमें प्रोत्साहित करते हैं।

भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता में सर्वांगीण स्वास्थ्य के इन तत्वों को एक श्लोक में व्यक्त किया है-


युक्ताहारबिहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।

अर्थात् जो उचित ढंग से भोजन करता है, तनाव मुक्त रहता है, कार्य करता है, सोता है और इनके प्रति जागरुक रहता है, उसके लिए योग सारे दुखों का अन्त कर देता है।

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5 टिप्‍पणियां:

  1. विश्व -स्वास्थ्य दिवस की याद दिलाने के लिए धन्यवाद !!!

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  2. बहुत अच्छी और उपयोगी जानकारी।
    करसत और भोजन के विषय में स्पष्ट निर्देश हैं कि जितनी कसरत हम कर सकते हैं उतनी या उससे थोड़ा सा अधिक करनी चाहिए, जबकि भोजन जितना कर सकते हैं उससे थोड़ा कम करना चाहिए।

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  3. चित ढंग से भोजन करता है, तनाव मुक्त रहता है, कार्य करता है, सोता है

    -ये सब करता हूँ. :)


    विश्व स्वास्थय दिवस की शुभकामनाएँ.

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  4. उपयोगी और आधुनिक जीवनशैली के लिए आवश्यक जानकारी।

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  5. बहुत सुन्दर जानकारी दी..इसका पालन करेंगे...


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    'पाखी की दुनिया' में जरुर देखें-'पाखी की हैवलॉक द्वीप यात्रा' और हाँ आपके कमेंट के बिना तो मेरी यात्रा अधूरी ही कही जाएगी !!

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