गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

आंच पहुंची आँगन तक

आँच-10

हरीश प्रकाश गुप्त

ब्लाग पर इस माह आई एक काव्य रचना ने लोगों को बरबस आकर्षित ही नहीं किया बल्कि उनके अंतर्मन को भी स्पर्श किया। पाठकों की प्रतिक्रियाएँ इसका प्रमाण हैं। आज की आँच में मनोज कुमार की इस कविता - ‘मन तरसे एक आँगन को’ पर चर्चा की जा रही है।

मन तरसे इक आंगन को

  • मनोज कुमार


हुआ असह्य अब एकाकी

यांत्रिक जीवन, आपाधापी !

मिले जो कुछ मनभावन को,

मन तरसे इक आं को !

ओसारे पर की बैठक,

बहुओं की चुहलबाजियां !

ननदों की शरारतें

देवरों की मस्तियां !!

सासों के ताने,

ससुर का खांसना !

बधुओं का घुंघट से,

शर्माकर झांकना !!

देना इशारे छुप-छुप कर,

सजनी का साजन को !

मन तरसे इक आंगन को !!

शहर के फ्लैटों में,

अपना सा आंगन नहीं !

बालकनी से झांकते,

अपरिचित से चेहरे कहीं-कहीं !!

कॉरीडोर की खुसर-पुसर,

लिफ्ट का एकाकीपन !

कंक्रीट के इस शहर में,

ढ़ूंढ़ता बेवश मन !!

सर्द, शोख, चंचल, हवाएं,

छूकर जाए दामन को !

मन तरसे इक आंगन को !!

अपने-अपने मन का संत्रास,

दिल की व्यथाएं !

ड्राइंग रूम की साजिशों में,

दबती चौपाल की कथाएं !!

आंगन का तुलसी चौरा,

सिमटकर गमले में बंद !

सुमनों की सुरभि की जगह,

इत्र की शीशी का मकरंद !!

आग उगलती धरती,

क्या हो गया, सावन को?

मन तरसे इक आंगन को !!

वहां,

छप्परों पर फैली कद्दुओं की लत्तियां !

यहां,

दो-चार मणीप्लांट की हरी-हरी पत्तियां !!

वहां,

होली में गांव भर की भौजाइयों का,

आकर रंगों से सराबोर कर जाना !!

यहां,

पड़ोस के शर्माजी का, माथे पर,

गुलाल का छोटा-सा टीका लगाना !

औपचारिकता के बीच खोजे,

मानवता के आनन को !!

मन तरसे इक आंगन को !!

प्रस्तुत गीत में एक ओर ग्राम्य जीवन की रसपूर्ण आत्मीयता, विनोद, लज्जा, रिश्तों की मर्यादा, प्रेम, दिनानुदिन की निश्छल- निष्कपट तकरार और परिहास तथा उससे उपजे संतोष का सजीव चित्रण है जो धनीभूत है, परिव्याप्त है तथा मनुष्य की स्वाभाविक प्रकृति के अनुरुप हैं। दूसरी ओर आधुनिक शहरी जीवन का सच है जो प्रगति की राह चलते मशीनी (यांत्रिक) हो गया है। होड़ की इस आपाधापी मे जो पीछे छूट रहा है वह है भावनात्मक संवेगों से उपजा राग-विराग। उसके महत्व का भान हमें तब होता है जब हम उसे खोते हैं। सुख के लिए एकत्रित की गईं बेजान सुविधाओं के बीच एकाकी मन ‘मन तरसे इक आँगन को’ में अभिव्यक्त आँगन जो मनभावन रस के रूप में अभिव्यंजित है, की खोज में भटकता है। यहाँ ‘आँगन’ की व्यंजना बहुत व्यापक हैं। दूसरे पद में रस-रंगहीन शहरी जीवन से उद्भूत – अनात्मीयता, पड़ोसी तक से अपरिचित सा रिश्ता और खाली-खाली सा नितांत एकाकी जीवन, आपसी खीचंतान, आत्मतोष के लिए साजिश षडयंत्र के स्तर तक जाकर एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति और दिखावा व अप्राकृतिक (बनावटी) चरित्र, जिसे कवि ने ‘इत्र की शीशी का मकरंद’ के रुप में बहुत सुन्दर उपमा से अभिव्यक्त किया है, आदि के माध्यम से कवि ने पीड़ा के नाद का वास्तविक-सा चित्रण किया है। तीसरे बंध में कवि ने दोनों जीवन का तुलनात्मक स्वरुप प्रदर्शित किया है। इस बंध में ‘दो चार मणीप्लान्ट की हरी-हरी पत्तियाँ’ तथा ‘पड़ोस के शर्माजी का माथे पर गुलाल का छोटा सा टीका लगाना’ पक्तियों में विस्तृत अर्थ समाया हुआ है, गुलाल का छोटा सा टीका आपसी संबंधों के बीच दूरी को व्यक्त करता सुंदर-सा बिम्ब है । यद्यपि ‘दो चार मणीप्लान्ट’ में अनुक्रम दोष विद्यमान है तथापि ये पक्तियों में व्यंजना का उत्कर्ष हैं। शब्द योजना बहुत ही सहज और सरल है। प्रयुक्त आँचलिक शब्दावली से रचना की आभा में श्रीवृद्धि हुई है। शायद यही कारण है कि इस रचना ने अधिकांश पाठकों की भावनाओं को गहरे तक स्पर्श किया है या इसमें उन्हे अपनी स्वयं की अनछुई अभिव्यक्ति दिख पड़ी है।

काव्यतत्वों की दृष्टि से देखें तो रचना में कहीं गीतात्मकता दिखती है तो कहीं यह नई कविता की राह पर चल पड़ती है। जहाँ रचना में अभिव्यक्त भावनात्मक संवेग, मूल्यों के टूटने की पीड़ा और व्यथा इसे गीत की ओर ले जाते हैं। वहीं असन्तोष की ध्वनि इसे नई कविता की ओर ले जाती है। रचना में संवेदनशीलता और रसात्मकता के रुप में काव्यत्व देखते बनता है लेकिन कुछ स्थानों पर मितकथन का अभाव और वर्णनात्मकता उत्कर्ष में बाधक हैं। यह रचना का निर्बल पक्ष है कि रचनाकार यह तय नहीं कर सका है कि उसे किस विधा की ओर जाना है। काव्य रचना चाहे गीत रुप में हो अथवा नई कविता के रुप में, प्रांजलता और सहज प्रवाह उसके अपरिहार्य अंग हैं। दूसरे पद में ‘ओसारे की बैठक, बहुओं की चुहलबाजियाँ, ननदों की शरारतें, देवरों की मस्तयाँ।’ में अर्थवत्ता तो है लेकिन प्रवाह बाधित है। इसी प्रकार अन्तिम बंध में यहाँ और वहाँ का बार-बार प्रयोग करके तुलनात्मक स्वरुप प्रस्तुत करना काव्य के दृष्टिकोण से उपयुक्त नहीं लगता। यद्यपि व्यंजनात्मक अर्थ व्यापक है लेकिन इन पंक्तियों को पढ़ते समय ऐसा लगता है, जैसे हम काव्य नहीं बल्कि निबंध पढ़ रहे हों। इस प्रकार इस पद में उत्कृष्ट व्यंजना के बावजूद काव्यत्व का न्यूनाधिक ह्रास हुआ है। समग्र रुप में, संरचनात्मक त्रुटियों के होते हुए भी रचना में भाव वैभव की स्पष्ट अनुगूंज है।

15 टिप्‍पणियां:

  1. ise bhav pradhan kavita ka mulyankan sambhav nahee....
    seedhe dil me utarne walee kavita hai ha ye baat alag hai ki aaj kee peedee ne grameen jeevan kee jhalak hee nahee dekhee parda pratha shahro wale kalpana hee nahee kar sakte............manoj jee ne dadee nanee ka samay yad dila yade taza kar dee hai.
    Aabhar....

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  2. बहुत अच्छा । बहुत सुंदर प्रयास है। जारी रखिये ।

    आपका लेख अच्छा लगा।


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  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति। सादर अभिवादन।

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. ...बहुत सुन्दर... बेहद प्रसंशनीय रचना, बहुत बहुत बधाई!!!

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  6. समीक्षा सुरुचिपूर्ण और ज्ञानवर्द्धक है...

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  7. अच्छी कविता हैं...शायद हर शहरी के दिल में बसती हैं पंक्तिया..आपने कविता का रूप दिया...

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  8. अच्छी रचना ... अच्छी प्रस्तुति और उतनी ही अच्छी समीक्षा ....

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  9. बहुत अच्छी प्रस्तुति। सादर अभिवादन।

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  10. बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  11. प्रस्तुति का प्रवाह और गाँव की सौम्यता । वाह ।

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