-- मनोज कुमार
हुआ असह्य अब एकाकी
यांत्रिक जीवन, आपाधापी !
मिले जो कुछ मनभावन को,
मन तरसे इक आंगन को !
ओसारे पर की बैठक,
बहुओं की चुहलबाजियां !
ननदों की शरारतें
देवरों की मस्तियां !!
सासों के ताने,
ससुर का खांसना !
बधुओं का घुंघट से,
शर्माकर झांकना !!
देना इशारे छुप-छुप कर,
सजनी का साजन को !
मन तरसे इक आंगन को !!
शहर के फ्लैटों में,
अपना सा आंगन नहीं !
बालकनी से झांकते,
अपरिचित से चेहरे कहीं-कहीं !!
कॉरीडोर की खुसर-पुसर,
लिफ्ट का एकाकीपन !
कंक्रीट के इस शहर में,
ढ़ूंढ़ता बेवश मन !!
सर्द, शोख, चंचल, हवाएं,
छूकर जाए दामन को !
मन तरसे इक आंगन को !!
अपने-अपने मन का संत्रास,
दिल की व्यथाएं !
ड्राइंग रूम की साजिशों में,
दबती चौपाल की कथाएं !!
आंगन का तुलसी चौरा,
सिमटकर गमले में बंद !
सुमनों की सुरभि की जगह,
इत्र की शीशी का मकरंद !!
आग उगलती धरती,
क्या हो गया, सावन को?
मन तरसे इक आंगन को !!
वहां,
छप्परों पर फैली कद्दुओं की लत्तियां !
यहां,
दो-चार मणीप्लांट की हरी-हरी पत्तियां !!
वहां,
होली में गांव भर की भौजाइयों का,
आकर रंगों से सराबोर कर जाना !!
यहां,
पड़ोस के शर्माजी का, माथे पर,
गुलाल का छोटा-सा टीका लगाना !
औपचारिकता के बीच खोजे,
मानवता के आनन को !!
मन तरसे इक आंगन को !!
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