मंगलवार, 9 मार्च 2010

मन तरसे इक आंगन को

-- मनोज कुमार

हुआ असह्य अब एकाकी

यांत्रिक जीवन, आपाधापी !

मिले जो कुछ मनभावन को,

मन तरसे इक आंगन को !


ओसारे पर की बैठक,

बहुओं की चुहलबाजियां !

ननदों की शरारतें

देवरों की मस्तियां !!

सासों के ताने,

ससुर का खांसना !

बधुओं का घुंघट से,

शर्माकर झांकना !!

देना इशारे छुप-छुप कर,

सजनी का साजन को !

मन तरसे इक आंगन को !!


शहर के फ्लैटों में,

अपना सा आंगन नहीं !

बालकनी से झांकते,

अपरिचित से चेहरे कहीं-कहीं !!

कॉरीडोर की खुसर-पुसर,

लिफ्ट का एकाकीपन !

कंक्रीट के इस शहर में,

ढ़ूंढ़ता बेवश मन !!

सर्द, शोख, चंचल, हवाएं,

छूकर जाए दामन को !

मन तरसे इक आंगन को !!


अपने-अपने मन का संत्रास,

दिल की व्यथाएं !

ड्राइंग रूम की साजिशों में,

दबती चौपाल की कथाएं !!

आंगन का तुलसी चौरा,

सिमटकर गमले में बंद !

सुमनों की सुरभि की जगह,

इत्र की शीशी का मकरंद !!

आग उगलती धरती,

क्या हो गया, सावन को?

मन तरसे इक आंगन को !!


वहां,

छप्परों पर फैली कद्दुओं की लत्तियां !

यहां,

दो-चार मणीप्लांट की हरी-हरी पत्तियां !!

वहां,

होली में गांव भर की भौजाइयों का,

आकर रंगों से सराबोर कर जाना !!

यहां,

पड़ोस के शर्माजी का, माथे पर,

गुलाल का छोटा-सा टीका लगाना !

औपचारिकता के बीच खोजे,

मानवता के आनन को !!

मन तरसे इक आंगन को !!

*** *** ***

17 टिप्‍पणियां:

  1. कमाल की कविता. गांव और आंगन का चित्र सामने उभरकर प्रस्तुत हो गया है.

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  2. छप्परों पर फैली कद्दुओं की लत्तियां !
    यहां,
    दो-चार मणीप्लांट की हरी-हरी पत्तियां !!
    वहां,

    औपचारिकता के बीच खोजे,
    मानवता के आनन को !!
    मन तरसे इक आंगन को !!
    Bahut achha lagi rachna.Wastav mein ek aisa aagan har koi chahta hai jahan औपचारिकता nahi apnapan ho...... aur jise sachha apnapan milta rahe wah khushnaseev hai ...
    Bahut badhai.....

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  3. !कंक्रीट के इस शहर में,ढ़ूंढ़ता बेवश मन
    वहां,छप्परों पर फैली कद्दुओं की लत्तियां !यहां,दो-चार मणीप्लांट की हरी-हरी पत्तियां !!

    मानवता के आनन को !!
    मन तरसे इक आंगन को !!

    vo apanapan bhee shahro me kanha...........
    bahut sunder bhav aur gaon shahar ke jeevan par roshanee daalatee sunder abhivykti .

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  4. सरल एवं देशज शब्दों से सजी सुन्दर कविता. धन्यवाद एवं आभार.

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  5. सर , कविता में आंचलिकता का स्‍वाद है । आज के इस भौतिकतावादी एवं भागदौड़ के जीवन में यह कविता ठंडे हवा के झोके समान है ...............

    बहुत सुन्‍दर ।

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  6. बहुत सुंदर चित्र्ण किया आप ने, शहर ओर ओर देहात मै फ़र्क भी खुब बताया.
    धन्यवाद इस सुंदर रचना के लिये

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  7. आपने शहरों के व्यवहार को बखूबी लिखा है....यहाँ तो पड़ोस में जाना भी नहीं हो पाता.. सब खुद में ही व्यस्त रहते हैं....अच्छी अभिव्यक्ति

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  8. बहुत ही सुन्दर रचना । वाकई में, गाँव की मस्ती और वातावरण शहर की हवाओं मे कहाँ ।

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  9. आग्रहों से दूर वास्तविक जमीन और अंतर्विरोधों के कई नमूने प्रस्तुत करता है।

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  10. अपने भावो को कविता के माध्यम से प्रस्तुत करने मे सफ़ल रहे है आप.

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  11. अपने-अपने मन का संत्रास,

    दिल की व्यथाएं !

    ड्राइंग रूम की साजिशों में,

    दबती चौपाल की कथाएं !!

    आंगन का तुलसी चौरा,

    सिमटकर गमले में बंद !

    सुमनों की सुरभि की जगह,

    इत्र की शीशी का मकरंद !!

    आग उगलती धरती,

    क्या हो गया, सावन को?

    मन तरसे इक आंगन को !!
    बदलते हुये परिवेश मे बहुत ही अच्छी कविता है। अब वो पुरानी मस्ती और खुशियाँ आज के भौतकवादी युग मे खो सी गयी हैं। धन्यवाद इस सुन्दर कविता के लिये।

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  12. बहुत ही सुन्दरता से आपने गाँव और शहर में रहने का जीवन बखूबी प्रस्तुत किया है! बहुत ही अच्छे भाव के साथ इस उम्दा रचना के लिए बधाई!

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  13. Bahot he achi kavita likha hai apne Manoj Ji..Gaon ki tulna to hum shahar se kar he ni sakte..Gaon me rahne ka jo anand hai wo sahar me kahan...

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  14. औपचारिकता के बीच खोजे,
    मानवता के आनन को !!
    मन तरसे इक आंगन को !!
    kitna sach hai

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  15. शिल्प में कहीं कहीं सघनता का अभाव है, परन्तु भाव इतने गहरे हैं कि नश्तर की भांति सीधा हृदय में चुभ जाते हैं ! धन्यवाद !!

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  16. बहुत अच्छी प्रस्तुति! राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  17. जीवन की छोटी छोटी, हल्की फुल्की चुटकियों को रचना में ढाल कर बहुत सुंदर लिखा है ....... बधाई ...

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