शनिवार, 27 मार्च 2010

बड़ सुख सार पाओल......... गंगा की गोद में !


बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे !

हम भी कुंभ नहा आए! हरिद्वार के हर की पौड़ी में डुबकी लगाना जीवन का सबसे अहम अनुभव था। आप इसे मेरी धर्मांधता कहें या अस्था का पगलपन - पर हरिद्वार में गंगा तट पर उमड़ी लाखों की भीड़ आपके सभी तर्कों को खोखला साबित कर देगी।
जब मैं गंगा के निर्मल जल में डुबकी लगा रहा था तो मेरे मन में मैथिल कवि विद्यापति की पन्क्तियां अनवरत गूंज रही थी ...

बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे !
छारैते निकट नयनन बह नीरे !!

एक अपराध छेमब मोर जानी !
परसल माय पाय तुअ पानी !!

कि करब जप-तप-जोग-ध्याने !
जनम कृतारथ एकही स्नाने !!

कर जोरि विनमओ विमल तरंगे !
पुनि दर्शन कब पुनमति गंगे !!

बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे !
छारैते निकट नयनन बह नीरे !!


हमारे प्राचीन ग्रंथों में कुंभ स्नान का महत्व का विस्तार से वर्णन किया गया है। भागवत के अनुसार अमृत दुर्वासा मुनि के शाप के कारण समुद्र के बीच मे घड़े मे़ सुरक्षित रह्ते हुए समा गया था। स्कंद पुराण के अनुसार एक बार रक्षसों और देवताओं में युद्ध छिड़ा। इस युद्ध में असुर पक्ष की विजय हुई। सारे देवता गण भगवान विष्णु के पास पहुंचे। उन्होंने भगवान विष्णु से अपने छीने हुए राज्य के वापसी की प्रर्थना की। विष्णु भगवान ने देवताओं को समुद्र मंथन की सलाह दी। उनकी सलाह पर अमल हुआ। समुन्द्र मंथन हुआ। इस मंथन में मंदराचल पर्वत मथानी के रूप में तथा नागराजा वासुकि रस्सी के रूप में प्रयुक्त किए गए। उसी घड़े को हाथ मे़ लिए समुद्र मंथन के समय धन्वन्तरि (विष्णु) प्रकट हुए थे।

मंथन से अमृत कलश निकला। उस अमृत कलश को पाने के लिए छीना-झपटी शुरु हुई। इन्द्र के पुत्र जयंत इस अमृत कुंभ को लेकर भागे। भागते वक़्त उनके कलश से अमृत चार स्थानों पर छलक कर गिरा। ये स्थान हैं हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और प्रयाग। इसी कारण से कुंभ पर्व मनाया जाता है।

कुंभ के अवसर पर हरिद्वार शहर आध्यात्मिक गुरुओं, साधु-संतों की भीड़, होर्डिंग्स, पोस्टर, बैनर आदि से अटा पड़ा है। प्रवचन, व्याख्यान की होड़ है। और हो भी क्यों नहीं! वर्षों से ली रही इस परंपरा (कुंभ) में मान्यता है कि तैंतिस करोड़ देवी-देवता और अट्ठासी लाख ऋषि मुनि उपस्थित होते हैं। पुण्य नक्षत्र की घड़ी में वे पावन गंगा में डुबकी लगाते हैं। अब ऐसे माहौल में कोई डुबकी लगाए तो उसके पापों का क्षय भी तो होगा ही।
हरिद्वार में गंगा की कलकल ध्वनि के साथ जुटी भीड़ के कोलाह से अद्भुत समां बंधता है। कुछ लोग पर्यावरण और प्रदूषण को लेकर चिंतित नज़र आते हैं। कुंभ सेवा समिति भी है। इस बात की उद्घोषणा निरंतर होती रहती है कि आप प्लस्टिक के सामान लेकर गंगा तट पर जाएं। साबुन-तेल आदि से स्नान करें।

और
वह भी उपाय भी है जिसके बारे में कुछ दिनों पुर्व ज्ञान जी के एक पोस्ट में देखा था। उसकी तस्वीर भी उठा लाया।

गंगा के तट पर शाम को होने वाली आरती अद्भुत और रोमांचक है। एक साथ बजते घंटे और घड़ियाल और मनोरम दृश्य देख-सुन कर हम तो धन्य हो गए।
गंगा के तट पर पूजा-पाठ, हवन, पिंडदान, दीपदान, आदि हमारे आस्था और परंपरा के प्रतीक हैं। इन्हें कर्मकांड कहकर हम अपनी आधुनिकता की विद्वता का परिचय तो दे सकते हैं पर क्या आपको लगता नहीं कि हम पश्चिम के अंधानुकरण में बहुत कुछ खोते जा रहे हैं --और इसके एवज़ में पाया क्या है?

12 टिप्‍पणियां:

  1. हर मैथिल को गंगा की गोद में विद्यापति सहज ही याद आते हैं। गंगा की महिमा ही कुछ ऐसी है कि बिस्मिल्लाह खान ने अमरीका में बसने के प्रस्ताव पर पूछा थाः वहां गंगा कहां से लाओगे?

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  2. पोस्ट पढ़ कर कुम्भ स्नान का मानसिक आनंद तो उठाया ! चित्रों ने कुछ वर्ष पूर्व हरिद्वार में बिताये अनमोल क्षणों की स्मृति ताजा कर दी !!!

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  3. सुन्दर चित्रों और वर्णन से सजी पवित्र पोस्ट के लिए आभार.. लेकिन धन्वन्तरी, विष्णु तो नहीं थे शायद.. थे क्या?

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  4. कुम्भ स्नान की बधाई हो। जानकारी भरपूर लेख।

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  5. बहुत सुन्दर वर्णन और चित्र...जय गंगा मैया की ..

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  6. कुम्भ स्नान की आपको बधाई तथा जानकारी देने के लिए भी बधाई।

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  7. सुन्दर चित्रों के साथ सुसज्जित करके आपने विस्तारित रूप से वर्णन किया है जो बहुत बढ़िया लगा ! ज्ञानवर्धक आलेख! बहुत बहुत बधाई कुम्भ स्नान करने की!

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  8. आपके कैमरे की नज़र से हमने भी हरिद्वार के दर्शन किये और मैथिल कोकिल विद्यापति की भूली बिसरी रचना से साक्षात्कार करवाकर आपने बचपन की याद दिला दी...हमारे कुम्भ स्नान का पुण्य भी आपके नाम रहा मनोज जी..

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  9. गंगा दर्शन करवाने के लिए धन्यवाद !

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  10. मनोज जी
    आप हरिद्वार आये आपने खबर नही दी खैर आपने गंगा स्नान का पुण्य उठा लिया । आपने बहुत अच्छा लिखा है। मेरी एक अपील है व कुछ विचार मै ब्लागर्स के जानना वाहती हूं इसके लिए कृपया गंगा के करीब ब्लाग पर विजिट करे तो मै आप सभी की आभारी रहुगी।
    Ganga Ke Kareeb http://sunitakhatri.blogspot.com

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  11. गंगा मैया! आस्था आ विश्वास केर जिबैत धारा - करोडों लोक आइयो एक स्नान सँ अपना केँ कृतार्थ मानैत छथि सेहो मानव अत्याचार के शिकार बनैत छथि। पता नहि हमर देश विकास कय रहल अछि आ कि बर्बादी के हँसैत गला लागि रहल अछि? कोनो जमानामें महाकवि-कोकिल अपन सुन्दर रचना सँ गंगा प्रति असीम भावना प्रकट करैत अपन पैरो के प्रवेश लेल माय सँ माफी मँगैत छथि.... लेकिन आइ तऽ सरकारी व्यवस्था सँ लैत निजी संस्थान सभ पर्यन्त गंगाके प्रदूषित करबामें कोनो कसर नहि छोडने अछि। तऽ कि जतेक तरहक उपद्रव छैक तेकरा शान्त करबा लेल सेहो गंगा मात्र उपाय छथि? वैकल्पिक व्यवस्था किछु नहि? आब दशकों बितय लागल अछि, अनशनकारी कतेको भूखहि छटपटाइत मरि गेलाह, कतेको आइयो अपन सत्याग्रह ठननहिये छथि.... लेकिन गंगा समान स्वच्छ अमृतधारा के विषधारामें हम सभ किऐक परिणत करयपर उतारू छी? एकर सुनबाई कहिया? के सुनत?

    हरि: हर:!

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