उर्दू अदब में तंजो-मिजाह की एक कद्दाबर शख्शियत अकबर इलाहाबादी का मुख़्तसर परिचय और उनकी शायरी के चंद नमूने आपकी नजर कर रही हैं मंजू वेंकट !मूलतः मराठी मातृभाषी मंजू वेंकट अभियंत्रण-स्नातक हैं! सुसंस्कृत तमिल परिवार की गृहस्थी एवं मातृत्वोपरांत अभियंत्रण के पेशे को अलविदा कह वर्तमान में हिंदी और उर्दू अदब का सक्रीय अध्ययन कर रही हैं. विभिन्न साहित्यिक एवं भाषाई गतिविधियों को ऊर्जा देने के साथ साथ उन्होंने बेंगलूर के निजी विद्यालयों के लिए वर्ग एक से नवम तक हिंदी का एक समानांतर पाठ्यक्रम विकसित किया है. कई विद्यालयों ने उनके द्वारा तैयार पाठ्यक्रम को अपनाया भी है और अधिकाँश विद्यालय भी इस पाठ्यक्रम की ओर उत्सुकता दिखा रहे हैं. मंजू जी का ये सत्प्रयास विल्कुल निःस्वार्थ है गोया इन साहित्यिक क्रियाकलापों के लिए संसाधन की आपुर्ती उन्हें अपनी गृहस्थी से बचे हुए कोष से ही करना पड़ रहा है........ तथापि वे 'चरै: वेति' के सिद्धांत पर अडिग हैं. उम्मीद है उनके अध्ययन से निकले मोती आपको पसंद आयेंगे !! -- करण समस्तीपुरी
अकबर इलाहाबादी के पास दूर तक देखने की दृष्टि थी और उसे शब्दों में पिरोने का अनोखा अंदाज़ था। जबान की पकड़ और विभिन्न सामाजिक पहलुओं की परख, व्यंग्य के माध्यम से इन दोनों का जो संतुलन अकबर की शायरी में सामने आती है, वो अपने आप में ही एक पूरी तालीम है। अकबर कहते हैं,
ताकीद-ए-इबादत पे ये सब, कहते हैं लड़के !
पीरी में भी अकबर की जराफत नहीं जाती !!
हरीफों ने रपट लिखबाई है, जाके थाने में !
के अकबर नाम लेता है, खुदा का इस जमाने में !!
अकबर की शायरी में अंग्रेज़ी के शब्दों का बड़ा ही असरदार इस्तेमाल हुआ है।
क्या कहूँ मैं इसको बदबख्ति-ए-नेशन के सिवा !
इसको आता नहीं कुछ अब इमिटेशन के सिवा !!
निगाह गरम क्रिसमस में भी रही हम पर !
हमारे हक में दिसम्बर भी माह-ए-जून हुआ !!
अकबर गांधी से मुतासिर थे। उन्होंने गांधीनामा लिखा जो अपने जमाने में काफी मकबूल रहा था। वे कहते हैं,
इंक़लाब आया, नयी दुनिया, नया हंगामा है !
शाहनामा हो चुका, अब दौर-ए-गान्धीनामा है !!
इससे क़ब्ल उन्होंने दो अलग अशआर में गांधी के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की थी।
मुब्तिला गवर्नमेंट में अकबर अगर न होता !
उसको भी आप पाते गांधी की टोपियों में !!
बुद्धू मियाँ भी हज़रत गाँधी के साथ हैं !
गो ख़ाक-ए-राह में आंधी के साथ हैं !!
अकबर इलाहाबादी को वीभत्स बाजारवाद की आहट एक सदी पूर्व ही लग गयी थी। देखिये गंभी मुद्दों पर अकबर के व्यंग्य की तलबार किस तरह चलती है,
मुमकिन नहीं लगा सकें वो तोप हर जगह !
देखो मगर पियर्स का है सोप हर जगह !!
तहमद में बटन जब लगने लगे, जब धोती से पतलून लगा !
हर पेड़ पे एक पहरा बैठा, हर खेत पे एक क़ानून लगा !!
अकबर की नज्म 'मुस्तकबिल' के चंद अशआर,
ये मौजूदा तारीक-ए-अदम होंगे !
नयी तहजीब होगी, औ नए सामां बाहम होंगे !!
नए उन्वान से जीनत दिखायेगी हसीन अपनी !
न ऐसा पेच जुल्फों में, न गेसू मे ये ख़म होंगे !!
खबर देती है तहरीक-ए-हवा तब्दील-ए-मौसम की !
खिलेंगे और हीन गुल, जमजमे बुलबुल के कम होंगे !!
और आखिर में एक मजाहिया शे'र जिसे लोग आज भी अपने खतो-किताबत में इस्तेमाल करते हैं,
नामाह कोई ना यार का पैगाम भेजिए,
इस फसल में जो भेजिए बस आम भेजिए !
ऐसे जरूर हों के उन्हें रख के खा सकूँ,
पुख्ता अगर हों बीस तो दस खाम भेजिए !!
मालुम ही है आपको बेटे का एड्रेस,
सीधे इलाहाबाद मेरे नाम भेजिए !
ऐसा न हो के आप कहें जवाब में,
तामिल होगी पहले मगर दाम भेजिए !!
शुक्रिया ! आपकी प्रतिक्रिया का इन्तिज़ार है !
-- मंजू वेंकट
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