आँच-6
‘रो मत, मिक्की’ पर.......
-मल्लिका द्विवेदी
रचनाकार के अन्दर धधकती संवेदना को पाठक के पास और पाठक की अनुभूति की गरमी को रचनाकार के पास पहुँचाना आँच का उद्धेश्य है। हमें ख़ुशी है कि हम अपने उद्देश्य के रास्ते आप तक पहुँच रहे हैं। इसी ब्लॉग पर प्रकाशित श्री हरीश प्रकाश गुप्त की लघुकथा 'रो मत मिक्की' को पहले समीक्षा की आंच पर चढ़ाया आचार्य परशुराम राय ने। अब आंच पहुँच चुकी है, श्रीमती मल्लीका द्विवेदी तक। देखिये, श्रीमती द्विवेदी की आंच कैसे सहती है 'रो मत मिक्की' !
लघुकथा ‘रो मत, मिक्की’ पर श्री राय जी की समीक्षा पढ़कर सन्तोष हुआ। अब, कथा अपने विस्तृत अर्थ के साथ पाठकों के समक्ष आई, गुण-दोष के साथ। सुखद अनुभूति हुई कि राय जी ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि के साथ अर्थ के हर कोने में प्रवेश किया, उसे आयाम दिया और कथा में आवृत्त भाव व सन्देश पर से आवरण हटा दिया। होमनिधि जी ने सही कहा है कि राय जी की समीक्षा कहानी की गाइड है। इसके बिना सामान्य जन को थोड़ी कठिनाई हो सकती है।
12-13 वर्ष पहले, जब यह लघुकथा लिखी गई तब, से यह बहुत से पाठकों की दृष्टि से गुजरी। मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। ईमानदार प्रतिक्रियाओं ने इसे बार-बार पढ़ने के लिए प्रेरित किया। हर बार एक नया आयाम सामने आया। राय जी की टिप्पणी से पूरी तरह सहमत हूँ कि शब्द संयम अधिक बरते जाने के कारण कथा उतनी सुबोध नहीं रही जितनी कि हम सबकी अपेक्षाएं हैं। लेकिन इससे उसका कहानीपन मर गया हो- ऐसा नहीं लगता। शब्द-शब्द अपना अर्थ संप्रेषित करने में सक्षम है, यहाँ तक कि वह अर्थ का भण्डार लिए हुए है, बशर्ते कि वहाँ तक पँहुच बने।
वास्तव में, इस कथा का फलक व्यापक है जिसे लघुकथा के सांचे में ढालना, संशलिष्ठ रूप में पिरोना और विस्तृत अर्थ भरना आसान न रहा होगा। सो, शब्द संयम अधिक है, कथा कसी हुई है। सुबोधगम्यता के लिये कुछ अतिरिक्त शब्दों की जरूरत महसूस होती है, लेकिन अर्थ संकोच नहीं है। लघुकथा का सन्देश, राय जी द्वारा यथा परिभाषित - ‘एक ही सन्देश के दो छोर’- समाज की नारीगत अपेक्षाओं पर खरी उतरने के लिए तैयार हो चुकी एक पीढ़ी तथा परम्परागत तरीके से इसी पथ पर सहज अग्रसर दूसरी पीढ़ी - प्रस्फुटित होने में सफल है। कथा को विस्तार देकर चार छः पृष्ट का भी किया जा सकता था लेकिन तब यह शायद लघुकथा की मर्यादा में न रहती।
यह सच है कि किसी भी रचना में रचनाकार, रचना और पाठक की प्रतीति एक बिन्दु पर होने पर ही अभीष्ट आनन्द की स्थिति हो सकती है और यह तीनों के गुण-दोष पर निर्भर करता है। अतः सम-स्पंदन (resonsnce) की स्थिति (आदर्श स्थिति) हमेशा सम्भव हो सके यह आवश्यक नहीं। कभी-कभी पाठक की प्रतीति रचनाकार से भी आगे हो सकती है और कभी कम भी।
साहित्य के दृष्टिकोण से लघुकथा लेखन अभी परिपक्व नहीं हुआ है, शैशवकाल में है। इधर लेखन तेज हुआ है, लघुकथा का विकास हो रहा है प्रयोग हो रहे हैं- कथावस्तु के स्तर पर भी और शिल्प के स्तर पर भी। मानकीकरण अभी बाकी है। तथापि, इस सदर्भ में देखने वाली बात यह है कि उसकी अपनी विशिष्टि के अन्तर्गत कथा के मूलभूत अंगों - कथानक, भाव, भाषाविधान, शिल्प, व्यंजना और संस्कारों का निर्वाह कहाँ तक हुआ है।
आजकल बहुत सी लघुकथाएं विभिन्न पत्र, पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही हैं। कुछ बहुत उत्तम हैं तो कुछ साधारण वर्णनात्मक शैली में सपाट बयानी। संकर्षित शब्द सांचे में कुशलता से ढ़ाली गई व्यापक सन्देश वाली इस कथा का दुर्भाग्य है कि इसके साथ कोई बड़ा नाम नहीं जुड़ा है। गूढ़ निहितार्थ के कारण साहित्य के पुरोधा रचनाकारों की बहुत सी रचनाएं हम एक बार में नहीं समझ पाते तो इससे रचना का स्तर कम नहीं हो जाता। बल्कि समझ में आने पर उनकी प्रशंसा करते हम नहीं थकते। ऐसी लघुकथाएँ कम ही देखने को मिलती हैं। हो सकता है, एक नारी होने के कारण यह कथा मुझे अधिक गहरे तक स्पर्श कर गई हो। लेकिन रचना निसंदेह उत्कृष्ट है और इसके लिए हरीश जी बधाई के पात्र हैं।
अपनी मुक्त टिप्पणी में मेरा आग्रह किसी व्यक्ति विशेष के प्रति नहीं है। हाँ, लगा कि इस कथा पर कुछ करना चाहिए अन्यथा एक उत्कृष्ट कथा के प्रति न्याय न होगा अतः लिख दिया। पुनःश्च, जब राय जी जैसे विज्ञ निरपेक्षता से किसी विषय पर अपनी दृष्टि डालते हैं तो उसके अपने अर्थ भी होते हैं, दर्पण की भाँति।
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