गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

कथा जनस्याभिनवा वधूरिव

आँच

-- आचार्य परशुराम राय

कथा जनस्याभिनवा वधूरिव

रचनाकार के अन्दर धधकती संवेदना को पाठक के पास और पाठक की अनुभूति की गरमी को रचनाकार के पास पहुँचाना आँच का उद्धेश्य है।आँच के दूसरे अंक के इस भाग में श्री हरीश प्रकाश गुप्त की लघुकथा रो मत, मिक्की समीक्षा के लिए लेते हैं।

इस लघुकथा में इतना वैचित्र्य है कि इस पर बहुत कुछ लिखने की इच्छा कर रही है, लेकिन आगे बढ़ने के पहले मैं महाकवि बाणभट्ट को याद करना चाहता हूँ, जिनकी महिमा में कहा गया है- वाणी बाणो बभूव अर्थात् वाणी (माँ सरस्वती) स्वयं बाण के रूप में अवरित हुईं। महाकवि बाण ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास कादम्बरी में अपनी कथा के स्वभाव का बड़ा ही मनोरम चित्र प्रस्तुत किया है-

रसेन शय्यां स्वयमभ्युपागता कथा जनस्याभिनवा वधूरिव।

अर्थात् संयोग (शृंगार) के उल्लास रस से भरपूर, जैसे लज्जा से संकुचित नवविवाहिता वधू स्वयं शय्या पर पति के पास प्रणय निमंत्रण लेकर जाती है, वैसे ही कथा (शब्दों और अर्थ के संकोच में लिपटी) लोगों (अपने पाठकों) को रसपान के लिए आंमत्रित करती है।

इस उपमा से कहानी के जिस स्वभाव को महाकवि बाण ने व्याख्यायित किया है, इससे अच्छा आदर्श स्वरूप मुझे अन्यत्र देखने को नहीं मिला। पाठकों और लेखकों, दोनों से इसका परिचय कराने की इच्छा हुई, सो कर दिया। मैं कोई समीक्षक नहीं हूँ, लेकिन किसी भी व्यक्ति, वस्तु, विचार आदि का मूल्यांकन करना मानव स्वभाव है, उसकी प्रकृति है और मैं इससे अलग नहीं हूँ। मैं यह भी दावा नहीं करता कि मैं दृष्टि दोष से मुक्त हूँ। इसलिए इस समीक्षा पथ पर आगे बढ़ने से पहले मैं अपने पाठकों और लेखकों से भी अपने दृष्टिदोष के लिए क्षमा याचना करता हूँ।

हर सृजन में गुण और दोष दोनों होते हैं। यह सृजन प्रक्रिया की आवश्यकता भी है। क्योंकि सृष्टि के लिए गुणत्रयी (सत, रज, तम) का संयोग आवश्यक है; और जहाँ गुण है वहाँ अवगुण की उपस्थिति भी अपरिहार्य है। सुधीजन निर्णय करते हैं कि गुण की बहुलता है या अवगुण की और उक्त दोनों वर्ग (पाठक और लेखक) उस निर्णय का हृदय से, रोचक न होते हुए भी, स्वागत करते हैं। इस लघुकथा का मैं आभारी हूँ कि इसने इन सब बातों को व्यक्त करने के लिए प्रेरित किया। यह भाग शुरू करने के पहले मैंने इस कथा को कुछ सुधीजनों को पढ़ने के लिए दी और उनकी प्रतिक्रियाएँ जाननी चाहीं। ब्लाग पर इस कथा को पढ़कर लगा कि यह कथा कुछ रिक्त स्थानों की पूर्ति चाहती है। किसी भी रचना के हर भाव और संभावना को पाठक अनावृत कर सके, यह सम्भव नहीं है। क्योंकि कवि की वाणी नियतिकृतनियमों से रहित है। देखते हैं आज की विवेच्च लघुकथा रो मत, मिक्की अपनी कसौटी पर कितनी खरी उतरती है।

प्रस्तुत लघुकथा का परिवेश पारिवारिक है। समय गरमी की छुट्टियों का है। समय को देखते हुए घर के परिवेश का लेखक ने अत्यन्त स्वाभाविक चित्रण किया है। लघुकथा की दृष्टि से पात्रों की संख्या कुछ अधिक लगती है, लेकिन इसे पढ़ने पर कोई भी पात्र अनावश्यक नहीं लगता। पात्रों का स्थान लेखक ने बड़ी ही कुशलता पूर्वक नियत किया है, इसमें दो राय नहीं। कहानी की रोचकता आद्योपान्त बनी हुई है।

कहानी का प्रारंभ गरमी की छुट्टियों में जब परिवार के सभी सदस्य एक साथ मिलते हैं और आनन्द मना रहे हैं, ऐसे वक्त में सुमि की ससुराल से कुरियर से एक चिट्ठी मिलने से होता है। भाई कुरियर वाले से पत्र लेता है। पत्र मिलने के पूर्व सुमि, जो अपनी ससुराल से आयी है, अब तक अपने घर-परिवार, श्वसुर की प्रशंसा में रत थी। अचानक चिट्ठी आने से बच्चों को छोड़कर परिवार के सभी लोग सकते में आ जाते हैं कि अभी सरल यहाँ से वापस गया है। सबका हाल चाल ठीक था, अचानक क्या हो गया। सुमि को आशंका होने लगी कि कहीं श्वसुर या सास की तबीयत तो खराब नहीं हो गयी या अन्य किसी की। छोटी बहन अनु भईया से पत्र पढ़कर सुनाने का आग्रह करती है। इसी बिन्दु को कथा का विकास मानना चाहिए। दूसरी ओर सोनल और मिक्की इन सब घटनाओं से अनजान अपने खेल में मस्त हैं। पत्र की विषय-वस्तु परिवार के सदस्यों के लिए पीड़ा जनक है और बच्चों को छोड़कर सभी के मन में खटास पैदा कर देती है। पत्र के अनुसार सरल को दिए गए भेंट स्वरूप रुपये वापस कर दिए गए हैं और कपड़े आदि उपहार बाद में किसी के हाथ भेज दिए जाएंगे, क्योंकि वह आदर्शवादी परिवार है और भेंट, लेन-देन में विश्वास नहीं करता। जबकि पहले (शायद सुमि की शादी के समय) स्टेटस के नाम पर.........(सम्भवतः काफी दहेज ले चुके हैं)। कुल मिलाकर खोखला और दिखावे का आदर्श, अर्थात् एकदम सूखे खड़े पेड़ की तरह। शायद उपहार उनके स्टेटस के अनुरूप न रहा होगा।

पत्र में लिखी उक्त सभी बातें सुनकर सुमि के पिताजी अनुमान कर लेते हैं बात केवल इतनी भर नहीं है और ससुराल में सुमि को दिन-प्रतिदिन कितना सहन करना पड़ रहा होगा। वह यह कहते हुए बाहर से उनके कमरे में आते हैं कि सुमि ने यह कभी नहीं बताया (इस आदर्श मानसिक पीड़ा-प्रताड़ना की बात) और कि वह कितनी साहसी है। यह सुनते ही सुमि अपनी दीदी के आँचल में अपना चेहरा (मिथ्या आवरण (सबकी अपेक्षाएं) में ढका सच उद्घाटित होने पर झेंप) छुपा लेती है। अचानक मिक्की, जो अब तक खेल में सोनल की इच्छानुसार जीतता रहा, इस बार उससे हार गया और रोने लगा। उसके रोने की आवाज से ध्यान उसकी ओर खिंच गया और भाभी का तकिया-कलाम उनकी मुँह से निकल पड़ा सोनल, मिक्की के साथ मिलकर खेलो, उसे रुलाओ मत। (लघु कथा के हिसाब से इसका यहीं चरमोत्कर्ष समझना चाहिए) सोनल बताती है कि उसने कुछ नहीं किया, वह उसे खुश रखने के लिए ही जानबूझ कर उससे हारती रही और वह खुश भी था, किन्तु एक बार हार गया और रोने लगा। यहीं लघुकथा के संदेश के साथ कथा का अन्त होता है।

लघुकथा में लेखक संदेश देना चाहता है कि मिक्की की शिशुजनित अपेक्षाएँ दस वर्षीय सोनल की उम्र से भी बड़ी हैं। हम भारतीय परिवार में आरंभ से ही स्त्री जाति का पालन-पोषण एक विशेष अपेक्षा से जुड़ा होता है। सोनल भी अभी बच्ची है और उसकी भी हमसे अपेक्षाएँ हैं। जिस पर किसी का ध्यान नहीं है।

लेकिन, मेरे मत के अनुसार इस कथा का चरमोत्कर्ष बाबू जी द्वारा उनके कमरे में आकर पत्र पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने के स्थान पर ही हो जाता है और सुमि द्वारा दीदी के आँचल में मुँह छुपाने से भाभी द्वारा सोनल को समझाने तक अन्त होता है। एक ओर दस वर्ष की सोनल लोगों की अपेक्षाओं से छोटी है, तो दूसरी ओर सुमि सामाजिक और पारिवारिक अपेक्षाओं से बडी। ये दोनों लघुकथा में दिए गए एक ही संदेश के दो छोर हैं, अर्थात नारी जाति से अपेक्षाएँ कि वह कैसे बोले, कैसे उठे, कैसे बैठे, क्या करे, क्या न करें आदि-आदि। वैसे तो हम सबका जीवन अपेक्षाओं का ही शिकार है, लेकिन नारी जीवन अतिरिक्त सामाजिक अपेक्षाओं का भी शिकार है।

इस लघुकथा का यह अद्भुत संदेश मुझे चमत्कृत कर गया और इसने समीक्षा लिखने के लिए मुझे बाध्य किया। इसी कारण से प्रारम्भ में मैंने इसके लिए वैचित्र्य शब्द का प्रयोग किया है।

कथा-शिल्प की दृष्टि से देखा जाए तो चिट्ठी आने की घटना भइया द्वारा चिट्ठी पढ़ना शुरु करने के ठीक पहले होनी चाहिए थी, तब यह इसके विकास का कारक बनती तथा पाठक को विकास की कमी न खटकती और कथा सुबोध हो जाती। इसके अतिरिक्त नौवें अनुच्छेद में शब्द संयम इतना अधिक हो गया है कि सामान्य पाठक के लिए भाव दुर्बोध हो गया है । कुछ शब्दों की कमी खटकती है। भाव को समझने के लिए काफी मानसिक कसरत की अपेक्षा महसूस होती है और लेखक के शैलीगत प्रयोग से कथा दुरूह बन गई है। इस प्रकार कथारूपी अभिनव वधू लज्जा के कारण इतनी संकुचित हो गयी है कि इसका रसभरा प्रणय निमंत्रण समझने में असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई है और बाणभट्ट द्वारा वर्णित स्वभाव के अनुरूप नहीं बन सकी है।

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14 टिप्‍पणियां:

  1. सही मायने मे इसे कहते हैं समीक्षा। आनन्द आ गया । ये प्रयास बहुत सराहणीय है एक समीक्षा सेाम लेखकों को बहुत कुछ सीखने को मिलता है। इसकी आँच जरूर पठकों तक पहुँची है धन्यवाद इस प्रयास को जारी रखें। शुभकामनायें । इस मे हिन्दी के कुछ शब्द मुझे सीखने को मिले। आभार्

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  2. अच्छी जानकारी के साथ साथ बहुत अच्छी समीक्षा।
    सादर
    http://kavyamanjusha.blogspot.com/

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  3. आपने कथा की मूलभूत अंतर्वस्तु को उसकी समूची विलक्षणता के साथ बोधगम्य बना दिया है अन्यथा कथा समझने मुझे ही नहीं कई पाठक को कठिनाई हुई थी। निर्मला दीदी की बातों से एकमत हूँ कि । इसकी आँच जरूर पठकों तक पहुँची है धन्यवाद इस प्रयास को जारी रखें।

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  4. यह समीक्षा लिखकर आपने समीक्षा के संबंध में एक नया मोड़ उपस्थित किया

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  5. वैसे समीक्षा पर टिप्‍पणी करना साहित्‍य की मर्यादा नहीं है क्‍योंकि समीक्षा अपने-आप में एक स्‍वतंत्र विधा और कार्य है. अत: इसे भी एक और समीक्षा के रूप में ही लें न कि टिप्‍पणी के रूप में.

    एक सीरीयल टी वी पर बहुत पहले आया करता था 'खरी-खरी'. आपकी यह समीक्षा एकदम इसी टाइटल की हकदार है. सच कहूँ तो आपकी समीक्षा, समीक्षा होने के साथ-साथ इस लघु कथा की गाइड भी है. संभवत: इस गाइड के बिना इसे समझना कठिन जान पड़ता है क्‍योंकि मुझे भी स्‍टोरी दो बार पढने पर समझ में आयी. दूसरी बार में प्‍लाट समझ आया. कहानी में विचार और भाव-क्रम, कथा प्रवाह और शब्‍द संयोजन व कथात्‍मकता का कुछ अभाव सा लगा. लेखक से यह शेयर करना चाहूँगा कि कोई भी रचना जब पाठक द्वारा पढ़ी जाती है तो वह चित्रात्‍मक और जीवंत होनी चाहिए. यदि रचना स्‍वयं रचनाकार प्रत्‍यक्षत: सुनाये तो उसके अपने पढ़ने के अंदाज से सजीवता और गैप्‍स फिल हो जाते हैं. अन्‍यथा कोई भी रचना इसके अभाव में अर्थपूर्ण होते हुए भी दुरूह बन जाती है. राय साहब ने 'स्‍वभाव' कहकर इस ओर संकेत भी किया है. इसीसे जुड़ी बात मैंने भी दो बार अपनी टिप्‍पणियों में लिखी है कि जब रचना, रचनाकार और पाठक एक दूसरे में समाहित हो जाते हैं, उन्‍हें अलग करना मुश्‍किल हो जाता है तो उसकी समीक्षा चाहे जो करे समवेत प्रतीती और विचार होंगे. दूसरा, रचना पढ़ने पर जैसी प्रतीती पाठक को होती है, यदि वैसी ही प्रतीती समीक्षक को भी होती है तो समीक्षा सही और मौलिक हो जाती है.

    वैसे राय साहब ने इसे अपने अंदाज से बोधगम्‍य और सरस बना दिया है. बाणभट्ट को इस सेन्‍स में याद करना अच्‍छा लगा पर रचना के परिवेश को देखते हुए संगतना नहीं लगी. किक्रेट की भाषा में कहूँ तो 'ढीली गेंदबाजी के आगे क्‍लासिक बैटिंग का मुजायरा'.

    प्रयास के लिए बधाई और आगे के लिए शुभकामनाऍं.

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  6. यह समीक्षा ...लम्बी होने के बाद भी .... बाँध कर रखती है.... और शैली तो लाजवाब है.... इस सुंदर समीक्षा के लिए आपको नमन...

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  7. राय साहब !
    धन्यवाद !!!
    आपकी समीक्षाएं और आलेख मेरे लिए व्यक्तिगत लाभ हैं. मैं यह नहीं कहूँगा कि 'मत रो मिक्की...' मुझे समझ नहीं आयी. लेकिन इतना अवश्य कहूँगा कि उपर्युक्त लघुकथा पर आपकी समीक्षा ने कथा के प्रति मेरे दृष्टिकोण में विकास अवश्य किया है. आभार !!!

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  8. इस सुंदर समीक्षा के लिए आपको नमन..

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  9. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 20.02.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

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  10. ek utkrisht avm bahut hi santulit samiksha, bhav aur arth ko anavritt karti hui.

    rai ji ko aabhar.

    aanch se samiksha ko naya aayam mil raha hai. iske liye manoj ji aap badhai ke patr hai. prayas jari rakhen.

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  11. ek utkrisht avm bahut hi santulit samiksha, bhav aur arth ko anavritt karti hui.

    rai ji ko aabhar.

    aanch se samiksha ko naya aayam mil raha hai. iske liye manoj ji aap badhai ke patr hai. prayas jari rakhen.

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