खाना हो आम तो बोएं बबूल
-- परशुराम राय
आम के फलों से
ये लद गए बबूल अब
भ्रम में पड़ी कोयलें
निहारती आवास निज
कंटीले आम्रकुंज ।
सोचती-
“आम में ये काँटे बबूल के ?
या ईमान ही बदला धरा का
या बदला है स्वाद
जल का ही जलद से कुछ?
या बदला है तेवर ही
सूरज की दृष्टि का?
या प्रकृति ने ही बनाया है
परिवर्तन का मूड नया ?
बसन्त की बहारें भी
भूल गई रास्ता
या फिर मेरा भ्रम?”
आम के इन पेड़ों को
ऊपर से नीचे तक
टो-टो
बार बार रक्तरंजित चोचों से
देखती हैं कोयलें, उदास मन
डालती हैं एक दृष्टि
बबलू के भी बाग पर
खड़ी हैं बहारें जहाँ
धूप में
उदासी का पहने दुकूल
और उसके पार्श्व में ही
कला की नोक से
चटक-चटक रंग भरे
दिखता है बोर्ड एक
जिसपर लिखा है
टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में
‘खाना हो आम तो बोएं बबूल’
******
14 comments:
आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।