बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

देसिल बयना भाग 16 : तेल जले तेली का आँख फटे मशालची का

-- करण समस्तीपुरी
जय हो ! जय हो.... !! आप सोच रहे होंगे हम इत्ता फुदक काहे रहे हैं.... ? वजह वाजीब है। खरमास गया। अरे बाप रे बाप... ! ई बार जो शीतलहरी पड़ा है, पूछिये मत। एक पन्द्रहिया तो पते नहीं लगा कि दिन है कि रात। गोसाइयों बाबा दुपहर में एक घड़ी के लिए उगते थे और धूप-अगरबत्ती दिखा के ले लुत्ती। आदमी तो आदमी गोर-पखेरू सब का प्राण अवग्रह में था। बियर में रहने वाला सांप सब जहां-तहां उनट गया। कित्ता बूढ-बिरिध लटक गए... मगर ससुरा ई हार कंपा के खून जमा देने वाला शीतलहरी में सतगामा खाने का हिम्मत नहीं हुआ।

तिल-संक्रांति का चूरा-दही खा के भी शीतलहरी नहीं गया। खोखाई ओझा पतरा देख के कहिन फगुनहटो में उग्रास नहीं होगा। शनिचरा बाम और मंगल दहिन हैं। बिना हनुमान जी के अठिजाम किये कौनो उपाय नहीं है। 'मृखा न होहि देव रिसी बानी'। खोखाईयो ओझा कौनो कम पहुंचल महतमा नहीं हैं। उनका ब्रह्म-बाक कभी झूठ नहीं हो सकता। ऐसन काल के पहरा से मुक्ति के लिए नवाहो करना पड़े फिर भी कम्मे है।

गाँव के मानजन सब पीपर तर बैठे। धनेसर चौधरी कहिन कि पर-परसादी, मंडली के पान-बीड़ी का खर्चा हम गछे। भगलू दास मूलगैन मंडली को बोलाने का ठेका लिया। बचनुआ हजाम हवन के जोगार पर चला। खुरचन मांझी तिरपाल टांगने लगा। बड़का कोल्हू वाला भोजू फ्री में तेल देने के लिए तैयार हो गया। खोखाई झा फिर से पतरा में शुभ मुहुर्त देख के खद्दर वाला चद्दर ओढ़ के संकल्प कराने बैठ गए। बाल-ब्रहमचारी मौजे पहलवान अपने संकल्प लिया।

आठे घंटा अठिजाम चला कि रात का सब कुहेसा गायब। भूरुकबा तारा खल-खल करने लगा। ऊ आम के चैला वाला हवन के धुनी से जो गर्मी आया कि शीतलहरी का बापो माथा पर पैर रख के भगा। खोखाई झा खिखिया-खिखिया कर कहे लगे, 'देखा भगवान के नाम का परभाव।' "भूत-पिशाच निकट नहीं आबे। महावीर जब नाम सुनाबे॥" हनुमान जी का नाम सुन कर ई शीत-पिचास भी भाग गया। बात होइए रहा था कि घुप्प... ले मंडप के चारो कोना वाला बड़का चौमुख दीप बारी-बारी से लुक-झुक-लुक-झुक करके बुझने लगा।

भोजू सेठ का मनेजर बुझावन महतो मशालची बना था। वही कंजुसहा दीप सब में बुँदे-बुँदे तेल गिरा रहा था। सुखाई बाबा कित्ता बार कहे कि अरे चौमुख भर न दो.... लेकिन नहीं.... कहता था भरे से तुरत धधक के ख़तम हो जाएगा। ले.... सब दिया बुझ गया। सिरिफ मंडप के आगे वाला दिया टिमटिमा रहा था
अठिजाम का दिया बुझा देख लगे रामजी बाबा दहारे, "कहाँ गया ई बुझावना ? चोट्टा, जैसा नाम वैसा काम ! सारा दिया बुझा दिया।" बुझावन महतो दिया के बदले कान मे तेल डाले गप-गप सुन रहा था। इतने में खखनु गोप तेल का कनस्तर उठा के जैसे ही दिए में डालना चाहा कि बुझावन मशालची 'हा ! हा !! ज्यादा नहीं ! बर्बाद हो जाएगा...!!!' चिल्लाए लगा। खखनु से कनस्तर झपटते हुए, 'बोला अभी तो पहर रात बांकी है। इत्ता-इत्ता तेल डाले तो एक्कहि घंटा में ख़तम हो जाएगा.... फिर ??'

उधर से बटेसर झा घुडके, "हूँ ! तेल जले तेली के। आँख फटे मशालची के॥ भोजू सेठ ने कहा जितना भी तेल लगे देगा....... ई बुझावन मशालची को एक्के कनस्तर में आँख फट रहा है। मक्खी के ...... से घी निकाल के दाल में डालने वाला।"

हा...हा...हा............ ! क्या कहे झा जी.......... तेल जले..........हे.....हे.......... हो......... हा.............. मक्खी के.......... से घी......... खी......खी..........खी......... हु...हु....हु....हु.... !!! बटेसर झा जो लय में आगे पीछे अलंकार लगा के ई कहावत पढ़े कि वहाँ बैठा सारा बूढ, जुआन, बच्चा सब ठठा कर हंस पड़ा। बुझावन बेचारा झेंप कर कहा, 'क्या सब कहते हैं पंडी जी !!"

बटेसर झा बोले, 'सहिये तो कहते हैं। भोजू दिल खोल कर कहा कि जितना तेल लगे सो लगे। अठिजाम का चारो चौमुख से रौशनी होना चाहिए। और तुम्हारा जैसन मशालची.... बुँदे-बुँदे टपका कर ओस चटा कर प्यास मार रहा है। तेल जल रहा है, भोजू का और आँख फट रहा है बुझावन मशालची का।' बच्चा सब फिर से एक बार ताली दे के खिखिया दिया। बुझावन मशालची भनभना कर रह गए। और हम आप लोगों को सुनाने के लिए, एगो कहावत सीख गए। "तेल जले तेली का। आँख फटे मशालची का॥" अर्थात किसी कार्य में धन कोई व्यय कर रहा है और कंजूसी में हाय-तौबा कोई और मचा रहा है। ऐसा नहीं करना चाहिए। जब कोई ख़ुशी से अपना धन खर्च रहा है तो उ में दूसरा काहे ना-नुकुर करे ? है कि नहीं ?? तो इसी बात पर बोल दीजिये, "पवनसुत हनुमान की जय !!"

8 टिप्‍पणियां:

  1. विचार के क्षण ही नहीं मनोरंजन और फुलझड़ियों का ज़ायका भी मिला।

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  2. अब का कहें? मनोरंजन के साथ ज्ञानवर्द्धन भी! आपका प्रयास स्तुत्य है!

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  3. bolchal ki sthaniya bhasha ka bakhubhi prayog kar aapna lekh bahut achha laga.
    Badhai

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