गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

चौपाल : आंच पर ब्लेसिंग

-परशुराम राय

रचनाकार के अन्दर धधकती संवेदना को पाठक के पास और पाठक की अनुभूति की गरमी को रचनाकार के पास पहुँचाना आँच का उद्धेश्य है। आँच के इस अंक में लघुकथा विधा पर विचार किया गया है। आँच के इस अंक के लिए लिया गया है- मनोज कुमार की लघुकथा ब्लेसिंग

लघुकथा कथा-साहित्य की अर्वाचीनतम विधा है। लघुकथा का साहित्यशास्त्रीय विवेचन कम ही देखने को मिलता है। कहानी विधा के अंगों की तरह इसके भी अंग समान है, यथा कथावस्तु, पात्र, संवाद, संदेश आदि। इसकी कथावस्तु की भी चार अवस्थाएँ होती हैं- प्रारम्भ, विकास, चरमोत्कर्ष और अन्त। सीमित पात्रों की उपस्थिति, उनके चरित्र का मूल्यांकन या चरित्र-चित्रण कहानी की भाँति ही है। संवाद का पैनापन और संदेश की मुखरता आदि बिल्कुल कहानी-साहित्य की तरह ही हैं। तो अब विचारणीय प्रश्न यह है कि कहानी से लघुकथा को अलग कैसे किया जाय अथवा आधुनिकता के नाम का टीका लगाकर इति श्री कर दी जाय।

जहाँ तक साहित्यविदों से बातचीत हुई है और मैंने समझा है, उसके अनुसार कहानी और लघुकथा में केवल अन्तर काल का है, अर्थात् जो अन्तर कहानी और उपन्यास में है, वही अन्तर लघुकथा और कहानी में है। कहानी की अपेक्षा उपन्यास में घटनाओं की बहुलता होती है, और यह मुख्य पात्र के जीवन के आदि से अन्त तक की प्रमुख घटनाओं के तान-बाने से बना होता है। जब कि कहानी में जीवन की एक घटना और उससे जुड़े तारों को उपन्यास की अपेक्षाकृत कम पात्रों के माध्यम से अभीप्सित संदेश दिया जाता है। वैसे ही, लघुकथा में एक क्षणिक घटना के द्वारा कहानी की अपेक्षा काफी कम समय की घटना को पैने और पात्रानुकूल संवाद द्वारा सीमित और उचित पात्रों के माध्यम से संदेश सम्प्रेषित करना होता है।

आँच के इस भाग में इस ब्लाग पर प्रकाशित ‘ब्लेसिंग’ नामक लघुकथा पर समीक्षात्मक चर्चा की गयी है। यदि उपर्युक्त दूसरे अनुच्छेद में वर्णित को लघुकथा के लिए यार्ड स्टिक मान लें तो ‘ब्लेसिंग’ एक आदर्श लघुकथा है। जो कार्यालय में अधिकारी और उसी कार्यालय के मातहत कर्मचारी के बीच 15 मिनट से आधे घंटे के बीच हुई बातचीत के दौरान समाप्त हो जाती है।

ब्लेसिंग की भाषा बड़ी ही स्वाभाविक और पात्रों के अनुकूल है। हिन्दी और मिश्रित भाषा के संवाद है जैसे कि आजकल कार्यालयों में सुनने को मिलते हैं।

लघुकथा के लिया चुना गया परिवेश कोई बहुत खास नहीं है, बहुत सामान्य है। अधिकारी अपने कार्यलय में बैठे हुए फाइलों को निपटा रहा है। इसी बीच उसका एक अधीनस्थ कर्मचारी उसके कार्यलय में प्रवेश करता है, जिसे देखते ही अधिकारी बोल पड़ता है- क्या बात है? आपके ट्रांसफर के बारे में मुझे कुछ नहीं सुनना है। यहीं से कथानक का प्रारंभ होता है। इतना सुनते ही कर्मचारी बताता है कि वह ट्रांसफर के बारे मे बात करने नहीं, बल्कि उनकी कार (खटारा) बीस हजार रूपये में खरीद कर, उसमें अपने पिता को कोलकाता शहर घुमाने के लिए उनकी ब्लेसिंग लेने आया है। यहीं से कथानक विकास की ओर अग्रसर होता है। थोड़ी बातचीत गाड़ी की कंडीशन के बारे में होती है और अन्त में बात पट जाती है। अधिकारी भी समझता है कि कबाड़ी के यहाँ किलो के भाव बिकने वाली केवल शो पीस बनी खटारा गाड़ी के बीस हजार रूपये मिल रहे हैं, बहुत हैं। कर्मचारी वस्तुपरक है। पांच हजार की भी न बिकने वाली गाड़ी की कीमत बीस हजार उसने यों ही नही लगाई है। अन्ततः वह अपने मन्तव्य में सफल होता है, वांछित ब्लेसिंग पाकर। बॉस खुश होकर उससे कहता है कि जाते समय ट्रांसफर वाली फाइल भिजवा दे। यहीं कथानक चरमोत्कर्ष पर भी पहुँचता है और पाठक को चमकृत करता हुआ यहीं अन्त भी हो जाता है।

इसे पढ़कर लगा है कि किसी बड़े ही मजे हुए लघुकथाकार के द्वारा लिखी गयी लघुकथा है। खटारा गाड़ी खरीदकर ट्रांसफर की ब्लेसिंग लेना और गाड़ी बेचकर ट्रांसफर की ब्लेसिंग देना व्यंजित करती ब्लेसिंग्स लघुकथा शब्द-संयम, समय-संयम, घटना-संयम, संवाद-संयम और पात्र-संयम समेटे पाठक को चमत्कृत करने का शॉक देकर आनन्दित करती है। ब्लेसिंग वास्तव में पाठक के लिए भी ब्लेसिंग है।

इस लघुकथा में कथानक का उत्कर्ष और अन्त अंतिम एक वाक्य में होने से एक प्रेरणा मिली, लघुकथा को पुनः परिभाषित करने की और कहानी से अलग करने की कि कथानक के उत्कर्ष और अन्त का एक बिन्दु होना लघुकथा के आवश्यक अंग के रूप में लिया जाय।

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12 टिप्‍पणियां:

  1. ‘ब्लेसिंग’
    laghukatha bahut achhi lagi.
    Aas-paas ki vastvik ghatnaon ko bakhubi anjaam diya aapne.
    Bahut badhai

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  2. आलोचनात्मक ब्याख्यान अच्छा लगा।

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  3. ब्लेसिंग की समीक्षा अच्छी लगी.

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  4. आपका समीक्षा करने का अंदाज़ बहुत ही लाजवाब है ... अच्छी व्याख्या .....
    आपको महा-शिवरात्रि पर्व की बहुत बहुत बधाई .......

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  5. महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें !
    बहुत ही ख़ूबसूरत समीक्षा ! बधाई!

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  6. परशुराम राय जी मूलत: अध्‍यापक का स्‍वभाव रखते हैं और गाहे-बगाहे उन्‍हें यह कार्य करते हुए भी देखा है. आयु और अनुभव के मामले में भी वे मनोज जी और हमसे बड़े और अनुभवी हैं. चर्चा और बातचीत करते हुए किसी भी विषय के हमेशा मूल में जाना और वहॉं से आगे बढ़ना उनका एक स्‍वाभाविक गुण है. इसी कारण वे एक सुलझे हुए होमियोपैथ चिकित्‍सक भी हैं जो उन्‍होंने अपने स्‍वाध्‍याय से सीखकर आर्डिनेन्‍स फैक्‍ट्री, मेदक, आन्‍ध्र-प्रदेश में लगभग 20 वर्षों तक मुफ्त चिकित्‍सा सेवा की. सामान्‍यत: हम किसी डॉक्‍टर, वकील आदि पेशेवर व्‍यक्‍ितयों के पास जाते हैं तो पहले यह पता कर लेते हैं कि क्‍या वह अपने काम आयेगा अथवा नहीं. लघुकथा पर की गयी टिप्‍पणी पर अपनी बात करने से पहले मुझे यह आवश्‍यक लगा कि समीक्षक को थोड़ा जान-पहचान लें तो उनके द्वारा की गई समीक्षा की मौलिकता, मान्‍यता और प्रामाणिकता का महत्‍व ज्‍यादा सहजता से स्‍वीकार्य और ग्राह्य हो पायेगा.
    मैंने मूल कथा और समीक्षा दोनों ही पढ़ीं. मेरे विचार से किसी भी रचना की अच्‍छी समीक्षा वही हो सकती है जिसमें पाठक और समीक्षक को लगभग एक समान प्रतीती होती है. ऐसा ही कुछ राय साहब की समीक्षा पढ़कर लगा. बिल्‍कुल एक चिकित्‍सक की भॉंती या डाक्‍टरी ज़बान में कहूँ तो बड़ी क्‍लिनिकल एनालिसिस इस लघुकथा की राय साहब ने की है. इस टिप्‍पणी के माध्‍यम से मनोज कुमार जी को एक कथाकार के रूप में और राय साहब को एक समीक्षक के रूप में उभर कर आने के लिए बधाई प्रेषित करता हूँ. आए दिन कुछ-न-कुछ पढ़ना होता ही रहता है लेकिन जो ईमानदार प्रयास गंभीरतापूर्वक इस माध्‍यम से किया जा रहा है वह तहेदिल से बधाई का हक़दार है.
    जहॉं तक लघुकथा को परिभाषित करने का प्रश्‍न है यह 'लघुकथा' नामकरण से ही जाहीर हो जाता है जैसे फिल्‍म और लघुफिल्‍म. याने कथा मगर छोटी. सामान्‍यत: कथा नाम से रामायण जैसी लंबी कथा का आभास होता है. अत: कहानी के अंग धारण कर संक्षेप में कथा कहना लघुकथा कहा जा सकता है.

    मेरी दृष्‍िट में कहानी शब्‍द 'कहना' से बना है जबकि कथ से कथित और कथन. अत: दोनों की आब्‍जेक्‍टिविटी में अंतर ज्ञात पड़ता है. कथन में कोई पहले से कही हुई बात कथा के ज़रिये संदेश के रूप में साबित होती हुई नज़र आती है तो कहानी में घटनाएं विषयानुसार या कथानक अनुसार एक क्रमागत रूप में कही जाती हैं, और इनके बहाने कोई सीख सामने आती है. समीक्षित लघुकथा में भी 'ब्‍लेसिंग' शीर्षक से ही बिना पूरी कथा पढ़े यह बात समझ में आ जाती है कि कहानी का अंत इसी के असर को साबित करेगा कि 'ब्‍लेसिंग' ही इस कथा के मूल केन्‍द्र में है जो अंत में सिद्ध होता है.

    कुल मिलाकर मेरी ऐसी प्रतीती है.

    पुन: एक बार इस ब्‍लाग के प्रत्‍येक सदस्‍य को बधाई और शुभकामनाएं.


    होमनिधि शर्मा

    उत्तर देंहटाएं
  7. परशुराम राय जी मूलत: अध्‍यापक का स्‍वभाव रखते हैं और गाहे-बगाहे उन्‍हें यह कार्य करते हुए भी देखा है. आयु और अनुभव के मामले में भी वे मनोज जी और हमसे बड़े और अनुभवी हैं. चर्चा और बातचीत करते हुए किसी भी विषय के हमेशा मूल में जाना और वहॉं से आगे बढ़ना उनका एक स्‍वाभाविक गुण है. इसी कारण वे एक सुलझे हुए होमियोपैथ चिकित्‍सक भी हैं जो उन्‍होंने अपने स्‍वाध्‍याय से सीखकर आर्डिनेन्‍स फैक्‍ट्री, मेदक, आन्‍ध्र-प्रदेश में लगभग 20 वर्षों तक मुफ्त चिकित्‍सा सेवा की. सामान्‍यत: हम किसी डॉक्‍टर, वकील आदि पेशेवर व्‍यक्‍ितयों के पास जाते हैं तो पहले यह पता कर लेते हैं कि क्‍या वह अपने काम आयेगा अथवा नहीं. लघुकथा पर की गयी टिप्‍पणी पर भी अपनी बात करने से पहले मुझे यह आवश्‍यक लगा कि समीक्षक को थोड़ा जान-पहचान लें तो उनके द्वारा की गई समीक्षा की मौलिकता, मान्‍यता और प्रामाणिकता का महत्‍व ज्‍यादा सहजता से स्‍वीकार्य और ग्राह्य हो पायेगा.
    मैंने मूल कथा और समीक्षा दोनों ही पढ़ीं. मेरे विचार से किसी भी रचना की अच्‍छी समीक्षा वही हो सकती है जिसमें पाठक और समीक्षक को लगभग एक समान प्रतीती होती है. ऐसा ही कुछ राय साहब की समीक्षा पढ़कर लगा. बिल्‍कुल एक चिकित्‍सक की भॉंती या डाक्‍टरी ज़बान में कहूँ तो बड़ी क्‍लिनिकल एनालिसिस इस लघुकथा की राय साहब ने की है. इस टिप्‍पणी के माध्‍यम से मनोज कुमार जी को एक कथाकार के रूप में और राय साहब को एक समीक्षक के रूप में उभर कर आने के लिए बधाई प्रेषित करता हूँ. आए दिन कुछ-न-कुछ पढ़ना होता ही रहता है लेकिन जो ईमानदार प्रयास गंभीरतापूर्वक इस माध्‍यम से किया जा रहा है वह तहेदिल से बधाई का हक़दार है.
    जहॉं तक लघुकथा को परिभाषित करने का प्रश्‍न है यह 'लघुकथा' नामकरण से ही जाहीर हो जाता है जैसे फिल्‍म और लघुफिल्‍म. याने कथा मगर छोटी. सामान्‍यत: कथा नाम से रामायण जैसी लंबी कथा का आभास होता है. अत: कहानी के अंग धारण कर संक्षेप में कथा कहना लघुकथा कहा जा सकता है.

    मेरी दृष्‍िट में कहानी शब्‍द 'कहना' से बना है जबकि कथ से कथित और कथन तथा कथा. अत: दोनों की आब्‍जेक्‍टिविटी में अंतर ज्ञात पड़ता है. कथन में कोई पहले से कही हुई बात कथा के ज़रिये संदेश के रूप में साबित होती हुई नज़र आती है तो कहानी में घटनाएं विषयानुसार या कथानक अनुसार एक क्रमागत रूप में कही जाती हैं, और इनके बहाने कोई सीख सामने आती है. समीक्षित लघुकथा में भी 'ब्‍लेसिंग' शीर्षक से ही बिना पूरी कथा पढ़े यह बात समझ में आ जाती है कि कहानी का अंत इसी के असर को साबित करेगा कि 'ब्‍लेसिंग' ही इस कथा के मूल केन्‍द्र में है जो अंत में सिद्ध होता है.

    कुल मिलाकर मेरी ऐसी प्रतीती है.

    पुन: एक बार इस ब्‍लाग के प्रत्‍येक सदस्‍य को बधाई और शुभकामनाएं.

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