शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

त्याग पत्र : भाग 15

पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, "राघोपुर की रामदुलारी का परिवार के विरोध के बावजूद बाबा की आज्ञा से पटना विश्वविद्यालय आना! फिर रुचिरा-समीर और प्रकाश की दोस्ती ! गाँव की गोरी रामदुलारी अब पटना की उभरती हुई साहित्यिक सख्सियत है ! किन्तु गाँव में रामदुलारी के खुले विचारों की कटु-चर्चा होती है ! रामदुलारी से प्रकाश की और रुचिरा से समीर की मित्रता प्रगाढ़ होती जाती है ! अब पढ़िए आगे !
- करण समस्तीपुरी

साल के इस भाग में प्रजापति बाबू की हवेली और गुलजार हो जाती है। हवेली के सामने ही तालाब के उस छोर पर शिवाला है। बसंत पंचमी के बाद से ही यहाँ 'महाशिवरात्री मेले' की तैय्यारी जोर पकड़ लेती है। शिवरात्रि का आयोजन यहाँ होता भी है बहुत वृहत स्तर पर। इस बार सारी तैय्यारियों का नेतृत्व गोवर्धन बाबू खुद कर रहे थे। यूँ तो गाँव का परिवेश हमेशा ही मद मस्त रहता है लेकिन फागुन आते ही और अल्हड़ हो जाता है। मंजरी अमराई में कोयल की कूक रमणियों के दिल में हूक उठा देती है। कान में बरबस विद्यापति के गीत गूंज जाते हैं, 'सरस बसंत समय भेली सजनी गे............ !' फाल्गुनी बयार बहते ही राघोपुर गाँव अलस बसंत के आगे घुटने टेक देता है। आह..... अल्हड़ झोंके ने बाँध किनारे पसरे अरहर के पौधों का अंग-भंग कर छोड़ा है। निगोरी हवा को सरसों के गदराये यौवन पर भी तरस नहीं आयी। उसकी भी पीली चुनरिया मटिया-मेट हो गयी बसंत समीरन में। राघोपुर में अबर ऋतुराज के सामने अगर कोई सर उठा के खड़ा है तो वो है, अलसी के छोटे-छोटे पौधे। मंद थापेरों पर मदिर नृत्य किया पर बसंत-बाण के सामने हथियार नहीं डाले।

शिवाला सज-धज कर तैयार है। लाल-पीले-हरे-नीले कागज़ के पताकों से पाट दिया गया है। परसों से ही बच्चे पाट की पतली सुतली में गेहूं के आंते की लोई लपेस कर पताका चिपकाने में लगे हैं। कागज़ का डिजाइन निकालने में गिरधारी बाबू का कोई जोर नहीं है। रंग-बिरंग का फूल काढ़े हैं इस बार। प्रजापति बाबू का हुक्म है कि इस बार मंदिर को बंदनवार से सजाया जाए। बाबू-टोल के बच्चे सुबह से ही घूम-घूम कर फूल इकठ्ठा कर रहे हैं। अह्हा.... गेंदा के छोटे-बड़े फूलों की क्या सुन्दर लडियां बनी हैं... ! मंदिर के गुम्बद से चारों ओर लटक कर अमरावती सी आभा दे रही हैं। कीर्तन रात से ही शुरू है। 'हो शिव मठ पर हो.... शिव मठ पर हो......... शिव मठ पर... ! शिव मठ पर शोभे लाल धुजा........ शिव मठ पर.... !!' आठ गाँव की मंडलियों द्वारा बारी-बारी से छेड़े जा रहे फगुआ के तान पर सारा राघोपुर झूम रहा है। बीच-बीच में 'जोगीरा सा..रा...रा...रा...रा...रा......' भी गूंज उठाता है।

रात का आधा पहर बीत गया है लेकिन रामदुलारी अभी तक अपने कमरे में माँ के साथ बैठी है। वह कल ही छोटका चाचा के साथ पटना से आयी है। सोचा तो था कि इस बार थीसिस ख़तम कर के ही आराम से गृष्मावकाश मे घर जायेगी। लेकिन दो दिन पहले ही छोटका चाचा पटना पहुंचे। यूँ तो छोटका चाचा का आना कोई नई बात नहीं थी। हर महीने ही रामदुलारी के खाने-पीने का सामान और पैसे देने वही आते थे। लेकिन इस बार छोटका चाचा रामदुलारी को लेने आये हैं। रामदुलारी ने थीसिस का हवाला दिया जरूर था परन्तु बाबा के भेजे सन्देश के आगे उसकी एक ना चली। छोटका चाचा ने बताया कि इस बार के शिवाला में शिवरात का सारा आयोजन बाबा ही कर रहे हैं। उन्होंने रामदुलारी को ख़ास कर बुलाया है मेला देखने। असमंजस में पड़ीं रामदुलारी एक क्षण भी नहीं गंवाई और घर जाने के लिए अपना आवश्यक सामान तैयार चल पड़ीं थी।

पटना से चल कर भी रामदुलारी रास्ते भर पटना को छोड़ नहीं पायी थी। प्रकाश.... कितना अच्छा है प्रकाश... ! कल से वह उसे लायब्रेरी में मिस करेगा.... रामदुलारी भी...? रुचिरा के साथ भी तो थीसिस डिस्कस करनी थी। समीर का बर्थडे भी तो इसी बीच पड़ रहा है। सहसा उसके दिल में एक बार आया, काश ! ये रास्ता पटना को वापस हो जाए... ! लेकिन गंडक ढाला से जैसे ही बुद्दर दास का टम-टम जहाँ-जहाँ-झुन-झुन करता हुआ बढ़ा.... कोई शक्ति रामदुलारी को आगे ही आगे खींचने लगी। सड़क के किनारे झरबेरी के जो पौधे अमरबेल के साए से बच गए थे उनके बेर भी पीले हो गए थे । महुआ की मादक गंध उसकी अगवानी कर रही है तो चिरपरिचित आगंतुक को आते देख पपीहे का करुण स्वर उठाता है.... 'पिऊ कहाँ ? पिऊ कहाँ ?? फिर से रामदुलारी सौ मील पीछे पहुँच जाती है।

रानीपोखर पार हो गया। अब मृदंग की थाप और झाँझो की झंकार साफ़-साफ़ सुनाई दे रही थी। 'हो........हो.......लाल धुजा....... हो....हो.....लाल धुजा..... ! दूर से छन-छन के आवाज आ रही थी। लाउड-स्पीकर का चार-चार चोंगा मंदिर के गुम्बद में चारों तरफ से बंधा था। छोटका चाचा ने बताया कल दिन में 'प्यारेदास किर्तनिया 'शिव विवाह प्रसंग' कहेगा। आँखों के ऊपर हाथ रख कर सामने दूर तक देखने की कोशिश कर रही रामदुलारी की आकुलता बुद्दर भांप गया था। तभी तो उसने ठप-ठप-ठप-ठप दौड़ रहे घोड़े को चाबुक लगाते हुए बोला था, 'अगत ठाम पे...जा बेट्टा....उड़ा....के.... !' फिर हौले से गुनगुनाने लगा था, 'शिवमठ पर हो...... शिवमठ पर हो..... !'

गाँव की परिधि में दाखिल होते ही रामदुलारी स्मृति की रेखाओं से बाहर आ गयी थी। झन-झन...टक-टक...झुन-झुन... ! हवेली के आगे जैसे ही तांगा रुका लक्ष्मण लपक कार आ गया, 'दीदी आयी..दीदी आयी....!' 'कितना बड़ा हो गया है मेरा लच्छो...' कहती हुई रामदुलारी उसे गोद में उठाने की कोशिश करने लगी। छोटका चाचा ने कहा था. 'मत उठाओ ! अब भारी हो गया है!' रामदुलारी ने उसके हाथों में रास्ते में खरीदे 'हाजीपुर के केले' रख दिए। 'दीदी आयी...केला लायी... दीदी आयी.... केला लायी....!' किलकारी भड़ता हुआ वह चारों तरफ कुलान्छे मारने लगा।

रामदुलारी ने सबसे पहले बाबा के पैर छुए। फिर मैय्या। मझले चाचा और चाची। बाबू अभी घर पर नहीं थे। मंदिर में ड्यूटी दे रहे हैं। लेकिन ये क्या... हवेली में सिर्फ लक्ष्मण ही चहक रहा है। सभी सदस्यों के चेहरे पर एक अपूर्व गंभीरता है। बाबा ने इस बार उसे अपने पास बैठने के लिए नहीं कहा था। इस से पहले भी वह पटना से घर आयी थी। पिछले छठ में ही तो.... कितनी चहल-पहल थी ! तो क्या अभी कुछ गड़बड़ चल रहा है घर में.... ! छोटकी चची को हाल-चाल का जवाब देती हुई रामदुलारी भी अपनी कोठारी की ओर बध गयी।

रात के खाने पर बाबू ने भी सिर्फ हाल-चाल ही पूछा था। भोजन के बाद मैय्या उसके साथ ही कमरे में आ गयी थी। थोड़ी देर इधर-उधर की बातों के बाद जैसे ही मैय्या अपने लक्ष्य पर आने को होती है कि मदिर में ढोल की थाप तेज हो जाती है। 'ढम-ढमा-ढम-ढम.........ढम-ढमा-ढम-ढम....... बम भोला बाबा कहमा रंगवाला पागारिया.... पागारिया हो...हो पागारिया ....!!' रामदुलारी खिलखिला कर बोली, 'खेलावन मल्लिक गा रहे हैं न...!' इस गीत वह पर बचपन से ही खिलखिला कर हंस पड़ती है। आज अँधेरे कमरे में भी उसके बतीसी की बिजली चमक उठी थी। मैय्या भी हमेशा की तरह अपना कथ्य भूल कर बिटिया को अरसे बाद अपने अंक मे समेट लिया।

(क्या कहना चाहती है मैय्या...? रामदुलारी के लिए क्या संदेसा लायी है इस बार की शिवरात्री ? पढ़िए अगले हफ्ते इसी ब्लॉग पर !!)

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त्याग पत्र के पड़ाव

भाग ॥१॥, ॥२॥. ॥३॥, ॥४॥, ॥५॥, ॥६॥, ॥७॥, ॥८॥, ॥९॥, ॥१०॥, ॥११॥, ॥१२॥,॥१३॥, ॥१४॥, ॥१५॥, ॥१६॥, ॥१७॥, ॥१८॥, ॥१९॥, ॥२०॥, ॥२१॥, ॥२२॥, ॥२३॥, ॥२४॥, ॥२५॥, ॥२६॥, ॥२७॥, ॥२८॥, ॥२९॥, ॥३०॥, ॥३१॥, ॥३२॥, ॥३३॥, ॥३४॥, ॥३५॥, ||36||, ||37||, ॥ 38॥

10 टिप्‍पणियां:

  1. मेले के लिए हो रही तैयारियों का सजीव चित्रण किया है। आगे की रचना का इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

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  2. यह अंक अच्छा लगा, देखना है आगे क्या होता है।

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  3. बढ़िया रचना ..पर इन्तजार लम्बा है.

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  4. वाह मनोज जी
    पिछले एपिसोड्स बांचने का मार्ग दिखाया
    शुक्रिया

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  5. kahani to lambi rahi magar hum padhte kyonki ye alag dhang lagi aur parmparao ka bhi jikr raha .sundar ati sundar hai .

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