शुक्रवार, 12 मार्च 2010

त्यागपत्र : भाग - 20

पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, "राघोपुर की रामदुलारी का परिवार के विरोध के बावजूद बाबा की आज्ञा से पटना विश्वविद्यालय आना ! रुचिरा-समीर और प्रकाश की दोस्ती ! फिर पटना की उभरती हुई साहित्यिक सख्सियत ! गाँव में रामदुलारी के खुले विचारों की कटु-चर्चा होती है ! शिवरात्रि में रामदुलारी गाँव आना और घरवालों द्वरा शादी की बात अनसुनी करते हुए शहर को लौट जाना ! फिर शादी की सहमति ! रिश्ता और तारीख तय ! अब पढ़िए आगे !!

-- करण समस्तीपुरी

प्रजापति ठाकुर के घर का वातावरण हर्षोल्लास से भरा था। घर भर में प्रसन्नता की लहर दौड़ रही थी। सभी चेहरे गुलाब से खिले थे... सिर्फ एक को छोड़ कर। विवाह की तिथि तो पहले ही निश्चित हो चुकी थी। परसों गिरधारी बाबू भाई-बन्धु के साथ माधोपुर जाकर बांके को तिलक भी चढ़ा आये थे। लहरू झा पंडीजी और सोगरथा हजाम तो कल सुबहे से पूरा गाँव में गोबर्धन बाबू के समधियाना के ठाठ का नगरा पीट रहे हैं।

लहरू झा सुबह-सुबह महावीर थान से लौट रहे थे कि ठाकुर जी के परोसी स्वरुप चौधरी तम्बाकू खाने के लिए रोक लिए। चौधरी जी थे तो पुरुष लेकिन स्त्रैन स्वभाव के। आखिर जिज्ञासा नही ही दब पायी। माधोपुर के स्वागत से अभी तक अभिभूत लहरू झा एकदम भांट के तरह जयघोष करने लगे। बोले, "अह्हा ! बड़का बौआ तो गए ही थे.... ओह रे ओह ! राजा आदमी हैं, माधोपुर वाले। हमलोग लड़की वाले थे लेकिन जैसे ही दुआर पर पहुंचे..... पूछिये मत। जो खातिरदारी किहिन कि आते-आते राते धोतिए में मैदान हो गया। काजू-गुलाबजल और खस का शरवत जग के जग फ्री। नाश्ता जो कराये..... एक-एक मुट्ठी काजू, किशमिश, चिनिया बादाम, अरब देश का पिन-खजूर, भरा गुच्छा अंगूर, पूरा सेव, चिनिया केला, मुंगबा लड्डू, रसकदम, सन्देश, गुलाबजामुन और ऊपर से ढपसा सिंघारा (समोसा) और दालमोट.... महराज बूझिये कि भोजने हो गया।

लहरू झा का जयगान जारी ही था लेकिन चौधरी जे के मनोनुकूल नहीं। झटपट तम्बाकू पर ताली ठोंक हथेली बढ़ा दिए। पंडीजी मुँह के भीतर जीभ को नचा कर हो.....आआआक............. थू..... करते हुए निचले होंठ और दांतों के बीच पहले से कब्ज़ा जमा चुके बुद्धि-वर्धक चूर्ण को कोने में विसर्जित कर नया डोज चुटकी में भर कर यथास्थान पुनर्स्थापित कर दिया। "........ जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोपरानी !!" गीता के सिद्धांत को साक्षात् कर दिए पंडीजी। उधर चौधरी जी को भी अपना मुँह खोलने का मनोरथ पूरा होता दिखा। तम्बाकू जीभ से दबा कर हाथ झाड़ते हुए बोले, "धुर्र.... दबा के दूनम्बरी सरकारी पैसा कमाया हो तो आप लोगों को फोकस दिखा रहा था। संस्कारी घर का होता तो शहर बाज़ार में अकेली खेली लड़की को........ !" चौधरी जी आगे बोलेन इस से पहले ही लहरू झा फिर एसपीड पकड़ लिए, "आ....हा...हा.... ! सो नहीं कहिये..... !"

उधर पूरे गाँव में हकार बाँट कर सोगरथा हजाम दोपहर में ठाकुरजी के दालान पर हाज़िर हो गया। प्रजापति बाबू गाँव घर की प्रतिक्रिया पूछ ही रहे थे कि अन्दर से उर्मिला देवी की आवाज़ आयी, ' हे सोगारथ ! भीतरी आ के पहले कलेऊ खा ले !' सोगारथ बगल में लगे ढेर से केला-पत्ता का दो टुकड़ा उठाया और आंगन को चला गया।

आंगन में टेप-रिकार्डर पर शारदा सिन्हा का गाना बज रहा था, "आगे माई ! कौने बाबा हल्दी चढ़ाबे ला.... ना.... । झींगुर दास और परभू महतो पहले से ही जीम रहे थे। परभू के बगल में जमीन पर बैठते हुए सोगारथ सामने झींगुर दास पर टोन छोड़ा था, "झींगुर काका ! समधियाना का भोज बड़ा जल्दी पच गया.... !" झींगुर दास सस्नेह खिसिया के बोले थे, "मार चोट्टा कहीं का ! हम तुम्हारा तरह सिस्पेंज पर सिस्पेंज आ जिलेबी पर जिलेबी आ दही में बुनिया बाँध के थोड़े खाया था.... ! लेकिन कुछ कहो सोगारथ ! रामदुलारी बबुनी राज करेगी उ घर में !" अब तक चुपचाप खा रहा परभू महतो की दाल में बैगन-बड़ी के तरकारी मसलते हुए बोला, "एंह... हैये है कि ! हम तो कित्ते जगह गया मगर कौनो बरियातियो में एहन मान-दान नहीं देखा !!" सोगारथ हजाम पत्ता पर पानी छिड़कते हुए बोला, "कहते तो हैं परभू का ! हमरे साथे लालधारिया जो था... विदाई में उसको हाथ पर भी समधी साहेब एक सौ एकावन रुपैय्या दिए।' सोगारथ हजाम अपने ही धुन में बोले जा रहा था, "हे सोगारथ ! भात देख.....!' मझली दुल्हिन की आवाज़ सुन कर रुक गया। अरे ठकुराइन आज अपने हाथो से परोस रही हैं।

'सुर-नर-मुनि सब के यही रीती ! स्वारथ लागि करहि सब प्रिती !!" तीनो ठकुराइन को भी तो भावी समधियाना का हाल समाचार मालुम करना था। गिरिधारी और मुरली बाबू तो फूले नहीं समा रहे हैं। झींगुर दास और परभू महतो से तो बाहर का हाल-चाल ही पता चला। अन्दर का नमक-तेल तो सोगारथ ही बतायेगा। पत्ता पर भात, अरहर की दाल, बैगन-बड़ी का तरकारी, कद्दू का रायता और आलू का अंचार परोस कर ऊपर से चुल्लू भर घी टपकाते हुए, उर्मिला देवी पूछ ही बैठी, 'अहो सोगारथ ! घर-द्वार तो सुने हैं बड़ा बढ़िया है, लोग सब ठीक है ना... ? मिलनसार हैं कि नहीं ? घर में काम-धाम कौन करता है ? नौकर-चाकर कितने हैं ? रामदुलारी ठीक से रह पायेगी न ? बेचारा सोगारथ खाते-खाते मैय्या के सवालों का जवाब दे ही रहा था कि छोटकी चची छम से बीच में टपक पड़ीं, "वो सब तो ठीक है, लेकिन ई न बताइये कि समधिन कैसी है? दांत-वुत है कि नहीं बूढी के ?"

"आह्हा..... सो नहीं कहिये दुल्हिन जी !" सोगारथ मुँह का निवाला सरकने से संभालते हुए बोला, "समधिन तो अभी जवाने हैं। कमर तक जुट्टी लटकाए, मुँह में गम्कुआ जर्दा वाला सरिसा पान, होंठ लाले-लाल और डाँर में चाभी का गुच्छा लटका के जो छम-छम कर के घर-आँगन कर रही थी कि.... पूछिये मत ! ऊँह...ऊँह....गोबर्धन बाबू के तो दुन्नु हाथ में लड्डू है !!" सोगारथ हजाम का सरस वर्णन अभी चल ही रहा था कि बाहर से प्रजापति बाबू की बुढापे में भी रोबदार आवाज आई, "रे सोगरथा ! ससुरा ! खाने गया कि सो गया जा के.... !" सोगारथ हजाम धरफर पत्ता समेटते हुए बोला, "आया मालिक !"

दालान पर मुरली बाबू शहर से छपवा कर लाये शादी का कार्ड प्रजापति बाबू को दिखला रहे थे। गोबर्धन बाबू भी वहीं थे। गिरधारी कहीं गए हुए थे। 'काठ तो बड़ा लौलिनदार है, मालिक !' सोगारथ हजाम आते ही बोला था। "हूँ....! लौलिनदार है न... !" ठाकुरजी की भारी-भरकम आवाज़ उठी थी। "दूर-दराज के लिए मुरली ने बाज़ार से ही डाक भेज दिया है। अभी बांकी कार्ड पर नाम लिख के देगा, सबको पहुँचाना तुम्हारा काम रहा। कल्यानपुर और रानीगंज पहिले पहुँच जाना चाहिए।" सोगारथ के 'जी मालिक' कहते ही दालान पर की सभा विसर्जीत हो गयी। प्रजापति बाबू ने आदेश दिया, "मुरली जाओ ! काड अन्दर भी देखा दो !! गोबर्धन तुम जरा इधर ही बैठो !!!"

शादी की तैय्यारी तो हो रही है लेकिन कहाँ है रामदुलारी ? क्या वह भूल पायी है प्रकाश को ?? कैसे होगी यह शादी ?? मिथिलांचल की शादी है !! देखना न भूलिएगा !! अगले हफ्ते इसी ब्लॉग पर !!

पड़ाव

भाग ॥१॥, ॥२॥. ॥३॥, ॥४॥, ॥५॥, ॥६॥, ॥७॥, ॥८॥, ॥९॥, ॥१०॥, ॥११॥, ॥१२॥,॥१३॥, ॥१४॥, ॥१५॥, ॥१६॥, ॥१७॥, ॥१८॥, ॥१९॥, ॥२०॥, ॥२१॥, ॥२२॥, ॥२३॥, ॥२४॥, ॥२५॥, ॥२६॥, ॥२७॥, ॥२८॥, ॥२९॥, ॥३०॥, ॥३१॥, ॥३२॥, ॥३३॥, ॥३४॥, ॥३५॥, ||36||, ||37||

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत रोचक होती जा रही है कहानी और रामदुलारी के बारे मे उत्सुकता बढ गयी है मुझे नही लगता कि वो प्रकाश को भूल पायेगी। आगे देखें क्या होता है। धन्यवाद्

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  2. यह कडी अच्छी लगी. अब आगे की कथा का इन्तजार रहेगा.

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  3. यह कडी अच्छी लगी खास्कर भाषा . देखते है आगे क्या घटता है..

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  4. रोचकता बनी हुई है...आगे इन्तजार है.

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  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 13.03.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

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  6. सुन्दर प्रस्तुति....बधाई !!
    ______________
    सामुदायिक ब्लॉग "ताका-झांकी" (http://tak-jhank.blogspot.com)पर आपका स्वागत है. आप भी इस पर लिख सकते हैं.

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