शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

त्याग पत्र : भाग 8

पिछले हफ्ते आप ने पढ़ा, विश्वविद्यालय की पढाई के लिए राघोपुर गाँव से पटना आयी रामदुलारी शहर के आलस्य और बेगानेपन से परेशान रहती है। समीर और रुचिरा से बातें कर के उसे संबल मिलता है। अब पढ़िए उस से आगे!!


जीवन में आए प्रथम पुरूष का उसका अनुभव बड़ा ही रोचक था। रविवार का दिन था। कुछ नोट्स बनाने थे। वह पुस्तकालय गई थी। काफी देर से वह अपने अध्ययन और नोट्स बनाने में व्यस्त थी। बीच में थकान मिटान के लिए शरीर को व्यवस्थित करना आरंभ किया ही था कि उस कक्ष में चिरध्यानमग्न अध्ययनरत पुरुष की ओर सहसा गई दृष्टि से वह उसे अपलक निहारती रही। छोटी सी दाढ़ी, नोकीली नाक, आकर्षक पुतलियां और लहराते बाल। उसके मुखमंडल पर ऐसी चमक थी कि पूरे पुस्तकालय में उसके समान इतना तेजवान रूप से किसी का न दिखाई दिया। एक अलग, विशिष्ट व्यक्तित्व का स्वामी वह लग रहा था। उसके बाद भी कई बार वह उसे दिखा। उसी पुस्तकालय में , उसी जगह पर।

उस नवयुवक से उसके मिलन का क्रम पुस्तकालय के अलावा अन्यत्र नहीं बढ़ पाया था। परंतु रामदुलारी की आंखें, उसे उस प्यासे चातक की तरह जो स्वाति की बूंद के लिए विकल हो, खोजती रहती थी। मिलन का अवसर भी उसे मिला। और वह संयोग भी बड़ा विचित्र था।

विश्वविद्यालय का वार्षिक महोत्सव। अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया था। छात्र वर्ग में एक विशेष आनंद की लहर दौड़ रही थी। रामदुलारी भी दर्शक-दीर्घा में थी। सदा की तरह गंभीर। ऑडिटोरियम में अत्यंत भीड़ थी। एक के बाद एक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जा रहे थे। बीच में रामदुलारी किसी कार्य से बाहर निकली।देखा रंगमंच के पीछे भीड़ है। निदेशक बड़ी अजीब स्थिति में थे वे अपने आवेश पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे थे। बीतते समय के साथ उनकी व्याकुलता बढ़ती ही जा रही थी। उपस्थित लोगों की बातचीत से पता चला कि अगले कार्यक्रम की गायिका नहीं आ सकी। गायक तो पहुँच गया है। निर्देशक रामदुलारी के पूर्वपरिचित शिक्षक थे। रामदुलारी ने उनकी विपदा हरने का मन बनाया और उनके सामने स्वयं के गाने का प्रस्ताव रख दिया। निर्देशक के प्राण वापस आए।

रामदुलारी मंच पर पहुँची। मंच पर अंधेरा था। मंच की दूसरी ओर एक छाया माइक के सम्मुख खड़ा था। रामदुलारी इस छोर पर खड़ी थी। यवनिका उठी। प्रकाशपुंज से रामदुलारी की आंखे चुंधिया गई। जब तक वह व्यवस्थित होती गायक अपना राग अलाप रहा था। फिर उसने गाना प्रारंभ कर दिया। उसका स्वर मीठा था। तड़प भरा। उसकी कला निपुण थी। मनमोहक भी। थोड़ी ही देर में उसने वातावरण में जादू बिखेर दिया। लोग रागरंजित हो गए। दर्शकदृघा में बैठी अनेक युवतियों की आंखें उसके उज्जवल आभायुक्त मुखमंडल पर चिपक गए। उसके कण्ठ से निकले सुरीले स्वर हृदय की गहराइयों को छूने लगा। युवतियों की रसमग्न आंखों में गायक का रूप और कानों में आवाज की मिठास घुल रही थी। रामदुलारी भी कहां अछुती थी इससे। पर अब उसे अपना हिस्सा गाना था। गायक के स्वर ने उसके हृदय के तारों को भी झंकृत कर दिया था। उसके रोम-रोम तरंगित हो उठे। गायक के स्वर में रामदुलारी का स्वर भी मिलकर बहने लगा। सरस्वती उसकी जिह्वा पर आ बैठी। गायनशैली में गायक का प्रभाव तो था ही, उसकी आवाज की मधुरता ने कहीं और अधिक आकर्षण उत्पन्न किया। सुनने वाले संगीत की मधुर-मंदाकिनी में डूब-डूब कर आनंद ले रहे थे। अब सब लोग मंत्र-मुग्ध होकर इस गायिका को देख-सुन रहे थे। गायक भी चकित होकर रसवर्षाती युवती को निहार रहा था। स्वर में एक ताजगी थी। उसकी कला के इस अद्भुत नमूने की समाप्ति पर जोरदार तालियां बजी। सभी तऱफ से वह-वाही मिलने लगी। सर्वप्रथम निर्देशक महोदय ने आकर कहा, कहां से आ गई तू मुझे बचाने। अनचाही चाह बनकर आई, पर मेरा कार्यक्रम सफल हो गया।" उनकी आंखों से विनय के आंसू बह चले। बाहर सब दृष्टियां रामदुलारी की ओर थी। पर रामदुलारी का मन गायक से प्रशंसा के दो शब्द सुनने को आकुल था। काया पर प्रसन्नता और विनय की मुद्रा लिए वह आगे बढ़ चली। बहार कॉरीडोर में आकर एकपल रूकी। देखा गायक उसे अपलक दृष्टि से देख रहा है। वह दृष्टि जो अक्सर उसने पुस्तकालय कक्ष में देखा था। यह भांपते उसे देर न लगी कि उसकी आंखों में रामदुलारी के लिए प्रशंसा का भाव चमक रहा है। किंतु रामदुलारी के मन में गायक के मुख से प्रशंससा के दो शब्द सुनने की चाह थी। तभी भीड़ के एक झोंके में से कुछ युवतियों ने गायक को घेर लिया। रामदुलारी आगे बढ़ गई आकर अपनी सीट पर बैठ गई। कार्यक्रम के शेष हिस्से पर उसका मन विशेष न रम सका। समाप्ति पर ऑडिटोरियम से निकलकर बाहर जाने लगी। अन्य छात्रगण भी उस हॉल से बाहर आकर सामने लॉन में खड़े थे। वह आगे बढ़ी तो द्वार के चौखट के पास ठिठक गई। किवाड़ से टिका हुआ गायक खड़ा था। पास पहुँचने पर रामदुलारी ने अभिवादन किया। उसने प्रसन्नता से अभिवादन का उत्तर दिया। रामदुलारी का मन हिलोरें लेने लगा।

आप बहुत अच्छा गाती हैं। किससे सीखा ?”

आपसे।

झूठ। गायक ने शोखी से कहा। रामदुलारी के मन में कल्पना कुलांचे लेने लगी। उसे लगा हृदय की धड़कने बढ़ गई है। वह ठगी हुई सी गायक को देखती रही। उसके स्वरूप को मन-प्राणों में बसा लेना चाह रही थी। वह पीछे से आती भीड़ के कारण आगे बढ़ने को विवश हो गई। ज्यों ही बढ़ी तो गायक के हाथ का स्पर्श हुआ। सारे शरीर में एक विद्युत संचार सा प्रतीत हुआ। अपूर्व आनंद से मन विगलित हुआ। एकदम नया अनुभव था यह उसके लिए। पर मन चौकन्ना हुआ।

माफ़ कीजियेगा, क्या मैं आपका नाम... ?" सकुचाते हुए उसने पूछा था। "रामदुलारी! क्या आप अपना नाम नहीं बताएँगे ?" जवाब के साथ साथ सवाल भी दागा था रामदुलारी ने। "जी मेरा नाम प्रकाश है।" गायक की संजीदा आवाज़ ने रामदुलारे की मन में सतरंगी प्रकाश बिखेर दिए।

हॉस्टल आकर भी मन बार-बार उसी सलोने चहेरे के ईर्द-गिर्द था। अंदर ही अंदर मन में आनंद की हिलोरें उठती-गिरती रहती थी। वह चुम्बक सी आकर्षणयुक्त आंखे, घुंघराले लट, सांवला सा गेंहुआ रंग, ऊँचा कद, हंसमुख गोल चेहरा, मन में, रोम रोम में बस गया। अनायास ही वह गाने-गुनगुनाने लगती थी। गायक ने उसके जीवन में नयी आभा का संचार कर दिया था। उसकी इच्छा हो रही थी पैरों में घुंघरू बंध जाते तो उसका जीवन ही नृत्य बन जाता! अपने नर्तन की झंकार वह चांद-तारों तक पहुंचा देती....!


क्या हो रहा है रामदुलारी के मन में... ? कहीं ये 'वो' तो नहीं है... ?? क्या होगा इसका अंजाम??? पढ़िए अगले हफ्ते ! इसी ब्लॉग पर !!

त्याग पत्र के पड़ाव

भाग ॥१॥, ॥२॥. ॥३॥, ॥४॥, ॥५॥, ॥६॥, ॥७॥, ॥८॥, ॥९॥, ॥१०॥, ॥११॥, ॥१२॥,॥१३॥, ॥१४॥, ॥१५॥, ॥१६॥, ॥१७॥, ॥१८॥, ॥१९॥, ॥२०॥, ॥२१॥, ॥२२॥, ॥२३॥, ॥२४॥, ॥२५॥, ॥२६॥, ॥२७॥, ॥२८॥, ॥२९॥, ॥३०॥, ॥३१॥, ॥३२॥, ॥३३॥, ॥३४॥, ॥३५॥, ||36||, ||37||, ॥ 38॥



15 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया पोस्ट. आगे की प्रतीक्षा में .....

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  2. aapki kahani bahut rochak aur ras bhari rahti hai ,abhi bahut jaldi me padhi hoon ek baar phir padhne aaungi itminaan se .

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  3. PHIR KAHANI EK KADAM AGE BADI.MUJHE LAGA KI MAI KOI UPANYAS PAD RAHA HU.SHANDAR ANK.AAGE KI PRATIKSHA RAHEGI.

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  4. कहानी प्रवाह के साथ आगे बढ़ रही है ।देखते हैं आगे क्या होता है। प्रतीक्षा करुंगा ।

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  5. manoj ji aapke bare main aapke hi blog main padha.sarkari naukri main rahte hue bhi aap itne sare blog padhte hain, ye apne aap main ghazab hai.katerpilar kavita se lagta hai ki aap ka observaition barik hai.

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  6. अच्छी रचना। अगली कड़ी का इंतज़ार।

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  7. DHIRENDRA SHUKLA ji
    प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ...
    मनोज

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  8. Manoj ji,
    Achchhee chal rahee hai apakee kahanee.agalee post kee prateekshha rahegee.
    HemantKumar

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  9. बहुत बढ़िया पोस्ट. आगे की प्रतीक्षा में .....

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  10. कहानी अनुभव के दायरे में क्रमशः आगे बढ़ रही है।

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  11. बहुत अच्छी रचना प्रवाहमय अगली कडी का इन्तज़ार रहेगा धन्यवाद्

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  12. hmm, yaha tak padha liya is se pahle ki kisht kal padhunga....shandar lekhan

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