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शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

त्यागपत्र (समापन किस्त) - ३८

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IMG_0128 मनोज कुमार

दोस्तों कथानक को समाप्त करते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि आपने इतने लंबे समय तक हमारा साथ दिया। आपम प्रोत्साहन और मार्गदर्शन ही हमारा प्रेरणा स्रोत रहा। हमने एक प्रयोग के तहत, नारी, खास कर बिहार जैसे सामंतवादी परिवेश में पलने वाली, समस्या को केन्द्र बिन्दू रख कर इस कथा का चित्रण शुरु किया था। मैं करण समस्तीपुरी का दिल से आभारी हूं जिसने इस यात्रा में हमारा बखूबी साथा निभाया। दो रचनाकारों का एक साथ मिलकर लिखा गया उपन्यास पढा था। मन्नू भंडारी और राजेन्द्र यादव द्वारा रचित। तब से ही मन में था कि इसी तरह का प्रयोग करूं। और जब करण के समक्ष यह प्रस्ताव रखा तो वह सहर्ष तैयार हो गया। इस तरह हमारा कारवां चल पड़ा।

इस के विभिन्न पड़ावों पर हमें ढेर सारे साथी मिले जिन्होंने हमारा पथ-प्रदर्शन कर साहस बढाया। हम इनके आभारी हैं।

अब आज का समापन किस्त

image विवाह के बीतते बरसों के साथ बांके के स्वभाव में परिवर्तन आने लगा था। वैवाहिक जीवन के कुछ ही वर्षों में इतना बदलाव आ जाएगा, रामदुलारी ने सोचा न था। पर अपने स्वाभिमान को दांव पर लगाने वाली रामदुलारी ने भी ठान लिया था, अब और नहीं। समझौते का कोई बिन्दु तो हो जहां सब एक मत होते। मन का गुबार उसे चैन से जीने नहीं दे रहा था। बाबा की दी हुई शिक्षा उसे बार-बार याद आ रही थी कि लोगों में परस्पर प्रेम तो होना ही चाहिए।

बांके का उपेक्षा भरा व्यवहार उसे एहसास कराता कि वह निम्न कोटि की है। उसे लगता सभी पुरुष सामंतवादी प्रकृति के ही होते हैं। जब वह चुप रहती तो बांके के अहं को तुष्टि मिलती। अगर प्रतिक्रिया में कुछ कह देती तो वह तीखी जुबान वाली बन जाती। उस पर चीखने चिल्लाने का आरोप लगता। उपेक्षित जीवन जीते-जीते वह तंग आ गई थी। बांके को अपने विचार, अपने मन की बातें समझाना बहुत ही मुश्किल था। उसने कई बार कोशिश की तो वह उसकी बातों को अनसुना कर घर से बाहर निकल जाता। कभी ताना दे देता। जब कभी तर्क के साथ अपनी बात रखती तो बांके बोलता, “क्या बकवास लगा रखी हो।” और अगर जोर से बोल देती तो, “क्या बात है आजकल तुम जरा सी बात पर बिफर पड़ती हो।” जैसे शब्द सुनने पड़ते। अब जो बात रामदुलाती के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती, बांके को वह जरा सी बात लगती।

मन में कई कथानक आकार लेते पर उसे कलमबद्ध करने के लिए घर-बाहर की जिम्मेदारी से मुक्त, जिस निर्विघ्न समय और मानसिक शांति की जरूरत थी, वह सब अनीसाबाद के घर में मिल पाना संभव ही नहीं था । कभी–कभी मन में आता राधोपुर ही चली जाए कुछ शांति में लिख तो पाएगी। उसने अपना यह निर्णय घर के लोगों के सामने रखा। राधोपुर जाने का निर्णय तो रामदुलारी ने ले लिया पर रात भर उसे न जाने कितने अगर-मगर मथते रहे। अगर बांके नाराज हो गया तो. .., अगर सास आहत हुई तो ….. अगर श्वसुर दुखी हुए तो….!!!

अपने शोधग्रंथ को लिखने के संकल्प के साथ रामदुलारी ने अपने को कमरे के एकांत में कैद कर लिया। एक बार जब लेखन शुरू हुआ तो बिना किसी अवरोध के चलता रहा।

बाहर के संकट और व्यवधान का समाधान तो राधोपुर प्रवास के रूप में वह ढूंढ चुकी थी पर आंतरिक संकट का क्या हल ढूंढ पाई थी।

राधोपुर में भी जब वह मैय्या, चाची, अड़ोस पड़ोस की स्त्रियों को देखती हो उसे यह लगता कि स्त्री का न तो कई स्वतंत्र व्यक्तिव है… न ही कोई स्वतंत्र पहचान वह या तो मात्र रिश्तों से पहचानी जाती है जैसे फलां की बेटी, बहन, पत्नी मां, चाची, बुआ, भाभी या फिर नैहर स्थान से कोवला वाली, फुलगछियावाली। इससे परे कोई स्वतंत्रत व्यक्तित्व भी हो उनका … उनका अपना कोई नाम, इस बात का उसे बोध आज तक नहीं हुआ। जबसे उसे अक्ल हुई तब से आज तक वह कोनेलावाली द्वारा लाया पानी पीती रही पर उसका क्या नाम है उसे आज भी मालूम नहीं।

उसका अपना क्या अस्तित्व है। शिक्षा, जागरूकता, आर्थिक स्वतंत्रता और बाहरी दुनिया से रिश्ता इन सबकी प्राप्ति होने के बाद भी क्या उसकी अपनी अस्मिता है। क्या वह एक स्वतंत्र जीवन्त ईकाई है। उसे भी तो रिश्तों के टक्कर लेने पड़ रहे हैं। पति के वर्चस्व को यदि चुनौती दे तो परमेश्वर के अहं को ठेस लगती है और दरार संबंध में पड़ने लगती है। पर ये रिश्ते टूटते हैं तो क्या रामदुलारी नहीं टूटी । वह भी तो टूटन झेलती है कई स्तरों पर …. लेकिन बर्दाश्त करने की भी एक हद होती है।

लेकिन अब तो स्थिति असह्य हो गई है… !!

संबंध विच्छेद के बारे में तो रामदुलारी सोच ही नहीं सकती। मैय्या बाबू पर क्या गुजरेगी? और स्वयं उसका जीवन क्या कम त्रासदायक होगा। जब शादी नहीं हुई थी तो अपने मन पसंद जीवन साथी के साथ एक सुनहरे भविष्य की कल्पना जो उसने देखी थी वह पूरा नहीं हो पाया। संबंध विच्छेद के बाद के अकेलेपन के सन्नाटे को क्या वह झेल पाएगी। और उसका बेटा क्या पता उसके हिस्से आए या नहीं। यदि नहीं आ पाया तो मातृत्व के स्नेह से वंचित रह जाएगा। उसके व्यक्तित्व के विकास में क्या बाधा नहीं डालेगा?

तो रामदुलारी क्या करे? वह कहां जाए? ये परिवार, ये बच्चा। क्या इन सबों को छोड़ पाएगी वह? जिसे वह पाना चाहती है वह मुक्ति संभव नहीं है। इनकी बात मानने के अलावा चारा ही क्या है? ….. गृहस्थी ने तो पैरों में बेड़िया डाल दी है। आठ से पांच की नौकरी करते, गृहस्थी, सास-ससूर, पति-देवर, बाल बच्चों के दायित्वों को निबाहते हुए, बच्चों का लालन-पालन -, पति को प्यार-मनुहार करते हुए , पति, सास, ससुर के आदेश मानते हुए, जीवन के सभी दुःख सुख के बीच इसी तरह जीवन जब गुजारना ही है तो ……संघर्ष क्यों?

मन अनेक प्रश्नों से पीड़ित था और उत्तर पाने को आतुर भी। उसे लगा कोई नहीं है मेरा मेरे अतिरिक्त। तो उत्तर भी तो मुझे ही ढूंढना होगा। उसे प्रतीत हुआ बाल्य काल से जो आकांक्षाएं वह पाल रही है वह तो सपने की तरह है। क्या हुआ यदि स्वप्न सत्य नहीं हुए तो? जो प्रश्न उसके समक्ष हैं वही तो सत्य हैं। और जब सच सामने हो तो उससे कहां भागा जा सकता है? ….. और फिर स्वयं से कौन भाग पाया है? ये जो पीड़ाएँ हैं, उसे तो हमने ही निर्मित किए हैं। उसके चित्त पर प्रश्नों का जो अंधेरा था वह धीरे-धीरे दूर होता गया। वह शांत थी। जैसे उसे हर ऊहापोह का उत्तर मिल गया। तैयार होकर घर से निकली। एक बार पुनः त्याग वाली बात उसके मन में चल रही थी और उसके हाथ में त्याग पत्र था। …………

***

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राम दुलारी के हाथ में त्याग पत्र है। उसने दिया नहीं है। यह निर्णय हम पाठकों के ऊपर छोड़ते हैं कि उनके भी आस-पास कोई-न-कोई राम्दुलारी होगी ही, … क्या उसे त्यागपत्र दे देना चाहिए घर परिवार, सास-ससूर, बाल-बच्चों के लिए, या फिर से जीवन की डगमाती नैया को पटरी पर लाने के लिए संघर्ष करना चाहिए?

हम भले ही इक्कीसवीं सदी में जी रहे हों लेकिन इस सच्चाई से इंकार नहीं कर सकते कि हमारे देश-समाज के कई हिस्से में आज भी स्त्रियों की स्थिति दोयम दर्ज़े की है। जीवन के आरंभ से ही उसे क़दम-क़दम पर यह अहसास करवाया जाता है कि तुम लड़की हो। आज भी समाज और संस्कृति की रक्षा के नाम पर भ्रूण हत्या से लेकर उनकी हत्या तक की जाती है। उनकी अपनी ज़िन्दगी को अपने ढंग से जीने की कोशिश बेमानी सी लगती है।

हारे हुए लोगों की तरह, दोष हो-न-हो, अपने किए, पर पश्चाताप करना और बिगड़ी हुई स्थितियों को संभालने की कोशिश करना इन स्त्रियों का नैसर्गिक गुण होता है। वे समझौता और समर्पण की हद तक जाती हैं। कई बार ख़ुद को ठगा-सा भी पाती हैं।

इस वर्ग की, जिसका प्रतिनिधित्व रामदुलारी कर रही है, बहुत कम स्त्रियां टूटती नहीं, सीधे संघर्ष की मुद्रा में खड़ी हो आगे बढने का रास्ता अख़्तियार करती हैं। अधिकांश या तो किसी निश्चय तक पहुंच नहीं पाती, या पहुंचते-पहुंचते देर हो जाती है। इसके बावज़ूद ये स्त्रियां फिर भी उठती हैं, आने वाली किसी अजानी सुबह की उम्मीद में, यह उनकी जिजीविषा है।

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१. JHAROKHA जी इस कथा की पहली टिप्पकार थीं। और ३ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२. Udan Tashtari जी ११ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३. Ranish जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४. Savita / हास्यफुहार जी १७ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५. Ashish जी ८ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६. हर्षिता जी १६ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

७. Manish जी ४ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

८. महफूज़ अली जी ६ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

९. शरद कोकास जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

१०. sweeti जी ५ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

११. Kislay जी ५ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

१२. amit जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

१३. Prashuram Rai जी ६ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

१४. Harkirat Haqeer जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

१५. Rachna जी १५ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

१६. Sunita Sharma जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

१७. करण समस्तीपुरी जी ११ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

१८. Babli जी ८ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

१९. अजय कुमार जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२०. शमीम जी २३ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२१. रश्मि प्रभा जी ३ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२२. ज्योति सिंह जी ७ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२३. राज भाटिय़ा जी १२ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२४. रंजना जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२५. SANDEEP KUMAR जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२६. मोहसिन जी १२ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२७. बुझो तो जाने जी २६ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२८. Abhishek जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२९. कादम्बिनी क्लब २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३०. सम्पादक: कतेक रास बात २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३१. हरिओम दास अरुण ब्लॉग १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३२. Science Bloggers Association १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३३. दीपिका जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३४. shama जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३५. kshama जी ४ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३६. महेन्द्र मिश्र २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३७. creativekona जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३८. प्रेम सरोवर जी ६ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३९. निर्मला कपिला जी ७ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४०. Sanjeet Tripathi ३ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४१. ज्ञानदत्त G.D. Pandey जी ३ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४२. डॉ. मनोज मिश्र जी ३ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४३. Apanatva जी १५ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४४. dipayan जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४५. psingh जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४६. पी.सी.गोदियाल जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४७. Ashish (Ashu) जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४८. गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४९. रचना दीक्षित जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५०. manav vikash vigan aur adhatam १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५१. हरीश प्रकाश गुप्त जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५२. KAVITA RAWAT जी ५ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५३. दीपक 'मशाल' जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५४. Amit Kumar जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५५. कृष्ण मुरारी प्रसाद जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५६. sangeeta swarup जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५७. भूतनाथ जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५८. जुगल किशोर जी ४ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५९. Jandunia जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६०. Suman जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६१. Vijay Kumar Sappatti जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६२. SAMVEDANA KE SWAR जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६३. zeal जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६४. श्यामल सुमन जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६५. संजय भास्कर जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६६. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी ७ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६७. राजभाषा हिंदी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६८. रीता जी ४ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६९. ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

७०. अनामिका की सदाये. जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

७१. KK Yadava जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

७२. कुमार राधारमण जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

७३. honesty project democracy १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

७४. संगीता पुरी जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

७५. hem pandey जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

त्याग पत्र के पड़ाव

भाग ॥१॥, ॥२॥. ॥३॥, ॥४॥, ॥५॥, ॥६॥, ॥७॥, ॥८॥, ॥९॥, ॥१०॥, ॥११॥, ॥१२॥,॥१३॥, ॥१४॥, ॥१५॥, ॥१६॥, ॥१७॥, ॥१८॥, ॥१९॥, ॥२०॥, ॥२१॥, ॥२२॥, ॥२३॥, ॥२४॥, ॥२५॥, ॥२६॥, ॥२७॥, ॥२८॥, ॥२९॥, ॥३०॥, ॥३१॥, ॥३२॥, ॥३३॥, ॥३४॥, ॥३५॥, ||36||, ||37||, ॥ 38॥

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

त्यागपत्र - 37

clip_image002पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, 'कैसे रामदुलारी तमाम विरोध और विषमताओंकेबावजूद पटना आकर स्नातकोत्तर तक पढाई करती है। बिहार के साहित्यिक गलियारे मेंउसका दखल शुरू ही होता है कि वह गाँव लौट जाती है। फिर सी.पी.डब्ल्यू.डी. केअभियंताबांके बिहारी से परिणयसूत्र में बंध पुनः पटना आ जाती है। अब पढ़िएआगे॥ -- करण समस्तीपुरी

आज सेठ दीन दयाल जी अपने दफ्तर नहीं गए थे। समीर ने भी जैसे 'नवज्योति' कार्यालय से छुट्टी ले रखा था। घर में सन्नाटा था। दोपहर के बारह बज चुके थे। दिन का काम कर के रामू काका गराज में आराम फरमा रहे थे। आधुनिक साज-ओ-सज्जा से लैस बड़े से ड्राईंग रूम में अकेले बैठे सेठ जी 'नवज्योति' के पन्ने पलट रहे थे। सहसा एक शीर्षक पर उनकी नजर अटक गयी, "आज की नारी... फिर भी बेचारी" – डॉ. रुचिरा पाण्डेय। 'ओह... तो ये है इस आस्तीन के सांप का काला जादू।' उनके भींचे हुए होंठो से घुटी हुई तड़प से निकली थी।

समीर के कमरे का दरवाजा आधा खुला। वह निकला और सीधा स्नान घर में गया। उसका उतारा हुआ चेहरा देख कर दीन दयाल जी का कलेजा मुँह को आ गया। कितनी सूजी हुई थी उसकी आँखें। शायद रात भर रोता रहा होगा। गायत्री देवी के जाने के बाद सेठ जी ने अपने एकलौते बेटे के लिए पुनर्विवाह नहीं किया। उसे दुनियां की हर खुशी देने की कोशिश की। समीर के सभी सपने दीन दयाल जी के अपने थे....उन्होंने आज तक समीर को इतना उदास नहीं देखा था। उन्होंने उस से बात करने का निर्णय लिया।

समीर स्नान कर के अपने कमरे में जाने लगा तो दीन-दयाल जी ने कहा, "समीर मैं तुम से ही बात करने के लिए घर पर रुका हूँ !" "जी ! एकमिनट, मैं कपड़े बदल कर आ रहा हूँ।" समीर ने अपने पिता के तरफ देखे बिना कहा था। दीन दयाल जी का हृदय एक बार फिर कचोटने लगा।

दीन दयाल जी ने 'नवज्योति' के पन्नो से नज़ारे उठाई। पता नहीं, समीर कब से तैयार होकर सामने खड़ा था। बात शुरू करने की गरज से सेठजी ने कहा, "खाना बन गया है खा लो।" समीर ने कहा, "जी ! अभी भूख नहीं है। बाहर ही खा लूँगा या बाद में आ कर खा लूँगा।"

"मैं ने भीनहीं खाया है। तुम्हारा ही इंतिजार कर रहा था।" समीर के मुँह से सिर्फ "जी" शब्द निकला था। फिर डायनिंग टेबल पर रखे खाने को सेठ जी खुद ही दो थालियों में लगाने लगे। समीर भी पिता जी का हाथ बंटाने से खुद को नहीं रोक पाया।

clip_image003खाना समाप्ति पर आया तो दीनदयाल जी ने विषय पर आने की कोशिश की। "समीर ! मैं जानता हूँ तुम बहुत भावुक हो। पर भावनाओं के आवेग में लिए गए फैसले से दुनिया नहीं चलती। तुम जरा सोचो... तुम सिर्फ 'नवज्योति' के सम्पादक ही नहीं, इस घर के वारिश हो...बिहार-उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े कंस्ट्रक्शन कंपनी दयाल इंटरप्राइजेस के अगले मालिक भी हो। 'आदर्श महिला महाविद्यालय' जैसे बीसियों स्कूल-कॉलेज हमारी खैरात पर चलते हैं। तुम्हे पता है तुम्हारे लिए सांसदों और मंत्रियों के घर से रिश्ते आ रहे हैं। मेरी बात मानो बेटे ! तुम बहुत खुश रहोगे। मैं उसे किसी दूसरे शहर में नौकरी लगवा देता हूँ। कुछ ही दिनों में तुम उस दो टके की मास्टरनी को भूल जाओगे।"

"पिता जी ! पिता जी ! आप में सामर्थ्य है। आप उसे इस शहर से क्या इस दुनिया से भी दूर भेज सकते हैं। पर मेरे दिल से नहीं। ", बहुत देर से थमा हुआ समीर का तूफ़ान भी फूटा लेकिन संयत स्वर में। "पिता जी ! रुचिरा सिर्फ दो टके की मास्टरनी नहीं है। उसने मुझे जिन्दगी दी है। उसने मुझे मकसद दिया है। उसने मुझे अपनी राह बनाना सिखाया है।"

याद है पिता जी, "माँ के जाने के बाद कुछ दिनों तक आपने अपना सारा प्यार मुझ पर न्योछावर कर दिया था। और उसके बाद अपने व्यवसाय में ऐसे लगे कि सिर्फ पर्व-त्यौहार या पैसों की जरूरत होने पर ही आप से बात हो पाती थी। अपने बेटे को देने के लिए आपके पास सब कुछ था... लेकिन वक़्त का एक कतरा भी नहीं।"

मैं कितना अकेला था पिता जी ! मुझे लगने लगा था मैं इस दुनिया का एक बेकार हिस्सा हूँ। किसी को न मेरी क़द्र है न मेरी जरूरत। आत्मविश्वास नाम की कोई चीज ही नहीं विकसित हो पायी मुझ में। पढाई में पीछे होने लगा। आपका ऐश्वर्य मेरे लिए कालेज तो बनवा सकता था मगर मुझे हुनरमंद नहीं। मेरी ट्यूशन पर खर्च किया गया भारी-भरकम बजट मुझे मुश्किल से इंटरमीडिएयेट पास करवा पाया... !आपका ऊंचा रसूख मुश्किल से स्नातक में दाखिला दिलवा पाया.... लेकिन आज आपका बेटा जिस मुकाम पर है उसे वहाँ रुचिरा ने पहुँचायाहै !"

clip_image004समीर शायद सारा गुबार उगल देना चाहता था। वह बोलता ही जा रहा था, "पिता जी ! आज अगर सेठ दीन दयाल का बेटा सभ्य समाज मेंसर उठा कर चलता है, बुद्धिजीवी वर्ग में उसके विचारों को तरजीह दी जाती है, प्रतीष्ठित सभाओं में उसे आमंत्रण मिलता है तो इसमें रुचिरा का सबसे बड़ा योगदान है। जब मुझे एक दोस्त की जरूरत थी, उसने मुझ में आत्म विश्वास भरा। जब मुझे एक मार्गदर्शक की जरूरत थी, उसने मुझे सही राह दिखाई। जब मैं अकेलेपन में घुटा जा रहा था तो रोने के लिए उसने अपना कन्धा दिया।"

दीन दयाल जी का रुष्ट स्वर उभरा था, "उसके हर योगदान के लिए उसे पूरी कीमत मिली है। वरना उसके जैसे अनगिनत एम ए पास लोंग सडकों पर धुल फांकते हैं। पटना के कालेज में हेड ऑफ़ द डिपार्टमेंट की कुर्सी नहीं तोड़ते।"

आप सही कह रहे हैं पिता जी। लेकिन यह कीमत उसकी काबिलियत की है। उसकी भावनाओं की कीमत.... !"

"वाह समीर ! तुम्हे उस मास्टरनी की भावनाओं की कीमत की दरकार तो है पर अपने पिता की भावनाओं की कोई क़द्र नहीं।", दीन दयाल जी ने जज्बाती पाशा फेंकाथा।

"ऐसा नहीं है पिता जी !" समीर के मुँह का वाक्य ख़त्म होने से पहले ही फिर दीन दयाल जी बोल पड़े थे, "अगर ऐसा नहीं है तो क्यूँ मेरी भावनाओं को तुम नहीं समझ रहे ? तुम्हारी छोटी से छोटी इच्छाओं को पूरा करने के लिए मैं ने एड़ी-चोटी एक कर दिया। पूरी जवानी बैराग्यमें बिताया... अपना सब कुछ तुम पर न्योछाबर कर दिया.... तुम ने जो भी माँगा वो दिया... पर तुम मेरी एक बात तक नहीं मान सकते... ?"

"पिता जी ! आप भूल रहे हैं !" समीर भी भावुक हो गया था, "मैं ने आज तक कुछ नहीं माँगा.... ! माँ के जाने के बाद आप ने मुझे पुष्प बुआ के भरोसे छोड़ दिया। मुझे तो आपका स्नेहिल अंक चाहिए था लेकिन आप मेरे लिए बंगला, कार और ए सी के जुगार में लगे रहे... ! आप भौतिक सम्पन्नता जुटाने में लगे रहे, जो न मैं ने कभी चाहा, न कभी माँगा.... ! आप अपनी कमी ऐशो-आराम से पूरी करने की कोशिश करते रहे.... ! आपको जो जरूरी लगा आपने किया.... लेकिन मैं ने कभी माँगा नहीं था। पिता जी ! मैं भी आपके सामने पहली बार ही अपना मुँह खोल रहाहूँ ! अपना हाथ फैला रहा हूँ... ! पिता जी.... !!" कह के समीर रो पड़ा था।

clip_image005लेकिन सेठ जी ने भी बहुत दुनिया देखी है। आखिर बिना दाव-पेच के इतना बड़ा साम्राज्य नहीं खड़ा किया है। जज़्बात से बात नहीं बनी तो संस्कार को बीच में ले आये, "समीर ! मैं ने तो तुम्हारे लिए अपना सारा शौक-मौज मिटा दिया। दिन रात इसी फिक्र में रहा कि तुम्हे कभी कोई तकलीफ नहीं हो। मैं तुम्हे दुखी नहीं देख सकता। मैं ने हमेशा चाहा है कि मेरा बेटा जो चाहे वो उसे मिले। मैं समझ गया रुचिरा तुम्हारे लिए कितनी महत्वपूर्ण है। तुम्हारे चरित्र निर्माण में उसका हाथ है, लेकिन बेटा ! तुम 'गुरु-शिष्य' के पवित्र रिश्ते को 'पति-पत्नी' के रिश्ते मेंबदलना चाहते हो... ? वह उम्र में भी तुम से बड़ी है।"

लेकिन समीर के पास इसका भी काट था। जितनी सहजता से दीन दयाल जी ने चाल चली थी उस से कहीं अधिक सहजता से समीर ने भी उसका काट पेश किया, "पिता जी ! एक भार्या "कार्येषु दासी होती है तो कर्मेषु मंत्री" भी तो होती है। आपको खुशी होनी चाहिए थी कि जिस ने अभी तक हमारा मार्गदर्शन किया है अब वह जीवनमार्ग पर हमेशा मेरे साथ होगी। रही बात उम्र की... तो स्वतंत्र भारत का संविधान सिर्फ यही कहता है कि विवाह के वक़्त 'पुरुष की आयु 21 वर्ष और स्त्री की 18 वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए।"

सेठ दीन दयाल जी की आँखें चौरी हो गयी थी। साम-दाम और दंड का प्रहार चूक जाने पर सेठ जी ने 'भेद' का सहारा लिया, "बेटा ! रुचिरा तुम से अधिक पढी-लिखी है। तुम जिस बुद्धिजीवी समाज की बात करते हो उसमे उसका कद तुम से कहीं बड़ा है.... तुम अपनी पत्नी की छाँव में अपने व्यक्तित्व का विकास कर पाओगे ?"

"रुचिरा मुझ से अधिक पढी-लिखी है... यह उसकी योग्यता है या अयोग्यता ?", समीर ने पूरी बात-चीत में पहली बार अपना सर उठाया था। फिर चारों आँखें डायनिंग टेबल पर ही झुक गयी थी। आंसुओं के सैलाब में वक़्त का दरिया बहा जा रहा था। दोनों जोड़ी लाल-लाल आँखें एक-आध बार आमने-सामने हुई थी फिर झुक गयी। अपराह्न ढल चुका था। रामू चाय के लिए पूछने आया। और आदेश की प्रतीक्षा में वहीं खड़ा हो गया। दीन दयाल जी ने समीर से पूछा था, "चाय पिओगे.... ?"

"जी! अभी मन नहीं कर रहा.... ।", समीर ने दबी जुबाँ में कहा था।

"अरे पी ले यार... माथा हल्का हो जाएगा और दिल भी... !" कह कर दीन दयाल जी ठठा कर हंस पड़े थे।

समीर को पिता जी का यह बे तकल्लुफ व्यवहार न जाने क्यूँ लेकिन बहुत भाया था। वह रामू के तरफ सिर कर के बोला, रामू काका ! दोनों चाय शक्कर वाली ही बनाइएगा !" चाय की चुस्कियों के बीच दीन दयाल जी ने सवाल दागा, "तो क्या यह तुम्हारा अंतिम फैसला है ?"

समीर ने सर झुकाए हुए ही कहा था, "जी"। सेठ जी ने एक लंबा सा हूँ कहा। फिर चाय का प्याला मेज पर रख कर बोले, "तो तुम भी मेरा अंतिम फैसला सुन लो.... !" समीर का दिल धड़क गया था.... कानों में सनसनी सी दौड़ गयी थी और आँखे फैल कर अपने पिता के मुख-मुद्रा को पढने की कोशिश में लग गयी। ललाट के बाईं ओर की नसें जोर-जोर से फरक रही थी। तभी दीन दयाल जी ने कुर्सी से उठ कर घोषणा की, "मेरी बहू नौकरी नहीं करेगी.... यह मेरा अंतिम फैसला है !"

सहसा समीर की आँखों मे बिजली सी चमक आ गयी। आज उसने सारे संकोच को तोड़ कर पहली बार होश-ओ-हवाश अपने बाप के गले से जा लगा। काँधे पर बेटे के आंसुओं की उष्णता महसूस कर दीन दयाल जी ने बेटे को बाहों से पकड़ कर आँखों के अआगे किया और बोले, "बोलो ! तुम्हे मेरा फैसला मंजूर है या नहीं... ?"

clip_image006समीर जानता था कि रुचिरा को नौकरी से मन करना सहज नहीं है। लेकिन उसने पूरे उत्साह और आत्मविश्वास के साथ कहा, "मंजूर है पिता जी ! मुझे पूरा भरोसा है कि रुचिरा भी आपके निर्णय का सम्मान करेगी।"

"क्या प्रगतिशील विचारों वाली रुचिरा मानेगी यह दकियानूसी फैसला ? नारी आन्दोलन की अगुआ कैद हो जायेगी चहारदीवारी में या असमान पृष्ठभूमि का प्रेम बीच में ही तोड़ देगा दम.... ? पढ़िए, अगले हफ्ते ! इसी ब्लॉग पर !!

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

त्यागपत्र : 36


मन में कई कथानक आकार लेते पर उसे कलमबद्ध करने के लिए घर बाहर की जिम्मेदारी से मुक्त, जिस निर्विधा समय और मानसिक शांति की जरूरत थी, वह सब अनीसाबाद के घर में मिल पाना संभव ही नहीं था । कभी –कभी मन में आता राधोपुर ही चली जाए कुछ शांति में लिख तो पाएगी ।


बाहर के संकट और व्यवधान का समाधान तो राधोपुर प्रवास के रूप में वह ढूंढ चुकी थी पर आंतरिक संकट का क्या हल ढुंढ पाई थी ।

राधोपुर जाने का निर्णय तो रामदुलारी ने ले लिया पर रात भर उसे न जाने कितने अगर मगर मथते रहे । अगर बांके नाराज हो गया तो अगर सास आहत हुई तो ….. अगर श्वसुर दुखी हुए तो….!

पर राधोपुर में भी जब वह मैय्या, चाची, अड़ोस पड़ोस की स्त्रियों को देखती हो उसे यह लगता की स्त्री का न तो कई स्वतंत्र व्यक्तिव है… न ही कोई स्वतंत्र पहचान वह या तो मात्र रिश्तों से पहचानी जाती है जैसे फलां की बेटी, बहन, पत्नी मां, चाची, बुआ, भाभियाँ फिर नैहा स्थान में कोवला वाली, फुलगछियावाली । इससे परे कोई स्वतंत्रत व्यक्तित्व भी हो उनका … उनका अपना कोई नाम, इस बात का उसे बोध आजतक नहीं हुआ । जबसे उसे अक्ल हुई तब से आज तक वह कोनेलावाली द्वारा लाया पानी पीति रही पर उसका क्या नाम है उसे आज भी मालूम नहीं ।

उसका अपना क्या अस्तित्व है । शिक्षा, जागरूकता, आर्थिक स्वतंत्रता और बाहरी दुनिया से रिश्ता इन सबकी प्राप्ति होने के बाद भी क्या उसकी अपनी अस्मिता है । क्या वह एक स्वतंत्र जीवन्त ईकाई है । उसे भी तो रिश्तों के टक्कर लेने पड़ रहे हैं । पति के वर्चस्व को यदि चुनौती दे तो परमेश्वर अहं को ठेस लगती है और दरार संबंध में पड़ने लगती है पर ये रिश्ते टूटते हैं तो क्या रामदुलारी नहीं टूटी । वह भी तो टूटन झेलती है कर्म स्तरों पर …. लेकिन बर्दाश्त करने की भी एक हद होती है । लेकिन अब तो स्थिति असह्य हो गई है ।

संबंध विच्छेद के बारे में तो रामदुलारी सोच ही नहीं सकती । मैय्या बाबू पर क्या गजरेगी ? और स्वयं उसका जीवन क्या कम त्रासदायक होगा । जब शादी नहीं हुई थी तो अपने मन पसंद जीवन साथी के साथ एक सुनहरे भविष्य की कल्पना जो उसने देखी थी वह पूरा नहीं हो पाया । संबंध विच्छेद के बाद के अकेलेपन के सन्नाटे को क्या वह झेल पाएगी । और उसका बेटा...

क्या पता उसके हिस्से आए या नहीं । यदि नहीं आ पाया तो मातृत्व के स्नेह से वंचित रह जाएगा । उसके व्यक्तित्व के विकास में क्या बाधा नहीं डालेगा ?

एक लेखक की और उसके लेख्न की असलजी कसौटी है उसकी संवेदना, उसके सामाजिक सरोकार और उसका अभिव्यक्ति कौशल इस पर यह रचना खरी उतरती है। अपने शोधग्रंथ बचे हुए अंश लिखने के संकल्प के साथ रामदुलारी ने अपने को कमरे के एकांत में कैद कर लिया ।


पढ़िए रामदुलारी की जिन्दगी का अगला अध्याय। अगले हफ्ते॥ इसी ब्लॉग पर !!!

त्याग पत्र के पड़ाव

भाग ॥१॥, ॥२॥. ॥३॥, ॥४॥, ॥५॥, ॥६॥, ॥७॥, ॥८॥, ॥९॥, ॥१०॥, ॥११॥, ॥१२॥,॥१३॥, ॥१४॥, ॥१५॥, ॥१६॥, ॥१७॥, ॥१८॥, ॥१९॥, ॥२०॥, ॥२१॥, ॥२२॥, ॥२३॥, ॥२४॥, ॥२५॥, ॥२६॥, ॥२७॥, ॥२८॥, ॥२९॥, ॥३०॥, ॥३१॥, ॥३२॥, ॥३३॥, ॥३४॥, ॥३५॥, ||36||, ||37||, ॥ 38॥

शुक्रवार, 25 जून 2010

त्याग पत्र -35

त्याग पत्र -35



धीरे-धीरे इसी तरह समय बीतता गया। रामदुलारी अपनी पढ़ाई की भूख मिटाती रही। कुछ और महीनों के बाद एक पुत्र की मां भी बन गई। बांके के न चाहने के बावजूद भी उसने शिक्षिका की नौकरी स्थानीय स्कूल में हासिल कर लिया था। उसकी जीवन चर्या बदल चुकी थी। उसका बच्चा प्रायः राधोपुर बाबू-मैय्या के पास ही रहता था। स्कूल और पढाई की जिम्मेदारियों के निर्वाह में बच्चे को उचित समय न दे पाती थी, इस लिए दिल पर पत्थर रखकर उसने यह निर्णय लिया था।

अभियंताओं की जिंदगी भी इधर-उधर भटकन भरी होती है। खास कर जब किसी विशेष परियोजना पर काम चल रहा हो तो। बांके को महीने-दो-महीने के लिए शहर से बाहर रहना होता था। इन दिनों रामदुलारी उसकी प्रतीक्षा में घुलती रहती थी। उसका मन मुरझाया रहता था। लेकिन बांके के आते ही उसके स्नेहहीन व्यवहार से मन के प्रसून सूख ही जाते थे। उसे लगता बांके उसके जीवन सरिता की अबाध गति से बहती स्वच्छंद धारा को कुण्ठित कर अंध-कूप बना देना चाहता था। दो मीठे बोल की प्यासी रामदुलारी के वियोग की तड़प और बढ़ जाती थी।

“महीने बाद आए हो, दो मीठे बोल नहीं बोल सकते।

“तुम्हें ही मेरा आना नहीं सुहाता। साइट पर शरीर-तोड़ परिश्रम के बाद घर में शांति की शीतल छाया चाहता हूँ, तुम्हारी शिकायतों का पुलंदा नहीं चाहिए मुझे

“मैं अकेली यहां तरह-तरह के दुःख-तकलीफ झेलती हूँ। तुम्हें नहीं कहूँगी, तो किसे कहूँगी………?

रामदुलारी फूट-फूट कर रो पड़ती। “जब देखो तब रो-रो कर मेरा सर खाने लगती हो तुम। यदि यहां का अकेला प्रवास तुम्हें भारी पड़ता हो तो चलो मेरे साथ वहीं साइट पर ही रहना।

“तुम जानते हो मैं यहां अपना काम छोड़कर नहीं जा सकती। स्कूल खुले हैं।

“तुम्हें काम करने को कौन कहता है? छोड़ दो नौकरी।

“तुम चाहते ही हो को मैं तुम्हारी इच्छानुसार ही चलूँ। मेरा अपना अस्तित्व है। मेरे अपने विचार भी हैं।

विचारों की टकराहट, अंतरबो का संघर्ष चलता ही रहा। इस टकराहट को विराम देने के लिए बांके ने निर्णयात्मक स्वर दिया, “जानती हो तुम किससे बात कर रही हो? मैं तुम्हारा पति हूँ। मेरी इच्छा के बाहर तुम्हारा कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।

“तुमने मेरी सांसो पर भी पहरा बिठा रखा है। ऐसा करो, वैसा मत करो। मानों मैं तुम्हारी अर्द्धांगिनी नहीं, यंत्र-चलित मशीन हूँ, जिसका रिमोट तुम्हारे हाथ में हो।

रामदुलारी आस लगाए रहती कि कभी तो बांके में परिवर्तन आएगा। सारी तकरार के बाद वह चुप हो जाती। मन के गहनतम अंधेरे में क्षीण-सी ज्योति की किरण बची रहती। शायद बांके के हृदय में कभी पश्चाताप की आभा फूटे। पर वह प्रभात कभी नहीं आया। क्या वह स्वयं में परिवर्तन करे? क्या उन सिद्धांतों की तिलांजलि दे जो नारी स्वातंत्र्य के नाम पर उसने बुन रखें हैं? क्या वो एक जाल नहीं बुनचुकी है अपने ईर्द-गिर्द? मकड़ी की तरह। अब उससे निकलना संभव नहीं है उसके लिए।

रामदुलारी सोचती नारियों का जीवन कैसा होता है? सदैव किसी आश्रय पर निर्भर। एक आंगन में पलती है, बढ़ती है। वह नन्हा पौधा जब बड़ा होता है, अपनी जड़े जमाना आरंभ करता कि जड़ सहित उखाड़कर दूसरे स्थान पर उसका वृक्षारोपण कर दिया जाता है। लेकिन कोई भी वृक्ष दूसरे स्थान पर लगाए जाने पर वहां पहले स्थान की तरह फल-फूल नहीं दे पाता। उसी तरह तो नारी जीवन भी है। जीवन तो कटता रहता है, परंतु मन न जाने कहीं और भटकता रहता है। किसी और तलाश में। किसी और दुनियां में।

एक बार तो बांके ने टोक भी दिया था, “ये तुम कहां खोई रहती हो? क्या सोचती रहती हो?

“यह तुम्हारी समझ में नहीं आएगा ।रामदुलारी जवाब दिया था।

“अपनी बात तो केवल तुम्ही समझती हो। मुझे क्यों समझने दोगी?…..बांके का स्वर रूखा हो गया,….. जो स्वयं उचित समझो करो। मुझे क्या लेना-देना?” बांके चला गया।

पर रामदुलारी क्या करे? वह कहां जाए? ये परिवार, ये बच्च। क्या इन सबों को छोड़ पाएगी वह? जिसे वह पाना चाहती है वह मुक्ति संभव नहीं है। इनकी बात माने के अलावा चारा ही क्या है? ….. गृहस्थी ने तो पैरों में बेड़िया डाल दी है। आठ से पांच की नौकरी करते, गृहस्थी, सास-ससूर, पति-देवर, बाल बच्चों के दायित्वों को निबाहते हुए, बच्चों का लालन-पालन, पति को प्यार-मनुहार करते हुए, पति, सास, ससुर के आदेश मानते हुए, जीवन के सभी दुःख सुख के बीच इसी तरह जीवन जब गुजारना ही है तो ……संघर्ष क्यों?


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