मनोज कुमार
दोस्तों कथानक को समाप्त करते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि आपने इतने लंबे समय तक हमारा साथ दिया। आपम प्रोत्साहन और मार्गदर्शन ही हमारा प्रेरणा स्रोत रहा। हमने एक प्रयोग के तहत, नारी, खास कर बिहार जैसे सामंतवादी परिवेश में पलने वाली, समस्या को केन्द्र बिन्दू रख कर इस कथा का चित्रण शुरु किया था। मैं करण समस्तीपुरी का दिल से आभारी हूं जिसने इस यात्रा में हमारा बखूबी साथा निभाया। दो रचनाकारों का एक साथ मिलकर लिखा गया उपन्यास पढा था। मन्नू भंडारी और राजेन्द्र यादव द्वारा रचित। तब से ही मन में था कि इसी तरह का प्रयोग करूं। और जब करण के समक्ष यह प्रस्ताव रखा तो वह सहर्ष तैयार हो गया। इस तरह हमारा कारवां चल पड़ा।
इस के विभिन्न पड़ावों पर हमें ढेर सारे साथी मिले जिन्होंने हमारा पथ-प्रदर्शन कर साहस बढाया। हम इनके आभारी हैं।
अब आज का समापन किस्त
विवाह के बीतते बरसों के साथ बांके के स्वभाव में परिवर्तन आने लगा था। वैवाहिक जीवन के कुछ ही वर्षों में इतना बदलाव आ जाएगा, रामदुलारी ने सोचा न था। पर अपने स्वाभिमान को दांव पर लगाने वाली रामदुलारी ने भी ठान लिया था, अब और नहीं। समझौते का कोई बिन्दु तो हो जहां सब एक मत होते। मन का गुबार उसे चैन से जीने नहीं दे रहा था। बाबा की दी हुई शिक्षा उसे बार-बार याद आ रही थी कि लोगों में परस्पर प्रेम तो होना ही चाहिए।
बांके का उपेक्षा भरा व्यवहार उसे एहसास कराता कि वह निम्न कोटि की है। उसे लगता सभी पुरुष सामंतवादी प्रकृति के ही होते हैं। जब वह चुप रहती तो बांके के अहं को तुष्टि मिलती। अगर प्रतिक्रिया में कुछ कह देती तो वह तीखी जुबान वाली बन जाती। उस पर चीखने चिल्लाने का आरोप लगता। उपेक्षित जीवन जीते-जीते वह तंग आ गई थी। बांके को अपने विचार, अपने मन की बातें समझाना बहुत ही मुश्किल था। उसने कई बार कोशिश की तो वह उसकी बातों को अनसुना कर घर से बाहर निकल जाता। कभी ताना दे देता। जब कभी तर्क के साथ अपनी बात रखती तो बांके बोलता, “क्या बकवास लगा रखी हो।” और अगर जोर से बोल देती तो, “क्या बात है आजकल तुम जरा सी बात पर बिफर पड़ती हो।” जैसे शब्द सुनने पड़ते। अब जो बात रामदुलाती के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती, बांके को वह जरा सी बात लगती।
मन में कई कथानक आकार लेते पर उसे कलमबद्ध करने के लिए घर-बाहर की जिम्मेदारी से मुक्त, जिस निर्विघ्न समय और मानसिक शांति की जरूरत थी, वह सब अनीसाबाद के घर में मिल पाना संभव ही नहीं था । कभी–कभी मन में आता राधोपुर ही चली जाए कुछ शांति में लिख तो पाएगी। उसने अपना यह निर्णय घर के लोगों के सामने रखा। राधोपुर जाने का निर्णय तो रामदुलारी ने ले लिया पर रात भर उसे न जाने कितने अगर-मगर मथते रहे। अगर बांके नाराज हो गया तो. .., अगर सास आहत हुई तो ….. अगर श्वसुर दुखी हुए तो….!!!
अपने शोधग्रंथ को लिखने के संकल्प के साथ रामदुलारी ने अपने को कमरे के एकांत में कैद कर लिया। एक बार जब लेखन शुरू हुआ तो बिना किसी अवरोध के चलता रहा।
बाहर के संकट और व्यवधान का समाधान तो राधोपुर प्रवास के रूप में वह ढूंढ चुकी थी पर आंतरिक संकट का क्या हल ढूंढ पाई थी।
राधोपुर में भी जब वह मैय्या, चाची, अड़ोस पड़ोस की स्त्रियों को देखती हो उसे यह लगता कि स्त्री का न तो कई स्वतंत्र व्यक्तिव है… न ही कोई स्वतंत्र पहचान वह या तो मात्र रिश्तों से पहचानी जाती है जैसे फलां की बेटी, बहन, पत्नी मां, चाची, बुआ, भाभी या फिर नैहर स्थान से कोवला वाली, फुलगछियावाली। इससे परे कोई स्वतंत्रत व्यक्तित्व भी हो उनका … उनका अपना कोई नाम, इस बात का उसे बोध आज तक नहीं हुआ। जबसे उसे अक्ल हुई तब से आज तक वह कोनेलावाली द्वारा लाया पानी पीती रही पर उसका क्या नाम है उसे आज भी मालूम नहीं।
उसका अपना क्या अस्तित्व है। शिक्षा, जागरूकता, आर्थिक स्वतंत्रता और बाहरी दुनिया से रिश्ता इन सबकी प्राप्ति होने के बाद भी क्या उसकी अपनी अस्मिता है। क्या वह एक स्वतंत्र जीवन्त ईकाई है। उसे भी तो रिश्तों के टक्कर लेने पड़ रहे हैं। पति के वर्चस्व को यदि चुनौती दे तो परमेश्वर के अहं को ठेस लगती है और दरार संबंध में पड़ने लगती है। पर ये रिश्ते टूटते हैं तो क्या रामदुलारी नहीं टूटी । वह भी तो टूटन झेलती है कई स्तरों पर …. लेकिन बर्दाश्त करने की भी एक हद होती है।
लेकिन अब तो स्थिति असह्य हो गई है… !!
संबंध विच्छेद के बारे में तो रामदुलारी सोच ही नहीं सकती। मैय्या बाबू पर क्या गुजरेगी? और स्वयं उसका जीवन क्या कम त्रासदायक होगा। जब शादी नहीं हुई थी तो अपने मन पसंद जीवन साथी के साथ एक सुनहरे भविष्य की कल्पना जो उसने देखी थी वह पूरा नहीं हो पाया। संबंध विच्छेद के बाद के अकेलेपन के सन्नाटे को क्या वह झेल पाएगी। और उसका बेटा क्या पता उसके हिस्से आए या नहीं। यदि नहीं आ पाया तो मातृत्व के स्नेह से वंचित रह जाएगा। उसके व्यक्तित्व के विकास में क्या बाधा नहीं डालेगा?
तो रामदुलारी क्या करे? वह कहां जाए? ये परिवार, ये बच्चा। क्या इन सबों को छोड़ पाएगी वह? जिसे वह पाना चाहती है वह मुक्ति संभव नहीं है। इनकी बात मानने के अलावा चारा ही क्या है? ….. गृहस्थी ने तो पैरों में बेड़िया डाल दी है। आठ से पांच की नौकरी करते, गृहस्थी, सास-ससूर, पति-देवर, बाल बच्चों के दायित्वों को निबाहते हुए, बच्चों का लालन-पालन -, पति को प्यार-मनुहार करते हुए , पति, सास, ससुर के आदेश मानते हुए, जीवन के सभी दुःख सुख के बीच इसी तरह जीवन जब गुजारना ही है तो ……संघर्ष क्यों?
मन अनेक प्रश्नों से पीड़ित था और उत्तर पाने को आतुर भी। उसे लगा कोई नहीं है मेरा मेरे अतिरिक्त। तो उत्तर भी तो मुझे ही ढूंढना होगा। उसे प्रतीत हुआ बाल्य काल से जो आकांक्षाएं वह पाल रही है वह तो सपने की तरह है। क्या हुआ यदि स्वप्न सत्य नहीं हुए तो? जो प्रश्न उसके समक्ष हैं वही तो सत्य हैं। और जब सच सामने हो तो उससे कहां भागा जा सकता है? ….. और फिर स्वयं से कौन भाग पाया है? ये जो पीड़ाएँ हैं, उसे तो हमने ही निर्मित किए हैं। उसके चित्त पर प्रश्नों का जो अंधेरा था वह धीरे-धीरे दूर होता गया। वह शांत थी। जैसे उसे हर ऊहापोह का उत्तर मिल गया। तैयार होकर घर से निकली। एक बार पुनः त्याग वाली बात उसके मन में चल रही थी और उसके हाथ में त्याग पत्र था। …………
***
राम दुलारी के हाथ में त्याग पत्र है। उसने दिया नहीं है। यह निर्णय हम पाठकों के ऊपर छोड़ते हैं कि उनके भी आस-पास कोई-न-कोई राम्दुलारी होगी ही, … क्या उसे त्यागपत्र दे देना चाहिए घर परिवार, सास-ससूर, बाल-बच्चों के लिए, या फिर से जीवन की डगमाती नैया को पटरी पर लाने के लिए संघर्ष करना चाहिए?
हम भले ही इक्कीसवीं सदी में जी रहे हों लेकिन इस सच्चाई से इंकार नहीं कर सकते कि हमारे देश-समाज के कई हिस्से में आज भी स्त्रियों की स्थिति दोयम दर्ज़े की है। जीवन के आरंभ से ही उसे क़दम-क़दम पर यह अहसास करवाया जाता है कि तुम लड़की हो। आज भी समाज और संस्कृति की रक्षा के नाम पर भ्रूण हत्या से लेकर उनकी हत्या तक की जाती है। उनकी अपनी ज़िन्दगी को अपने ढंग से जीने की कोशिश बेमानी सी लगती है।
हारे हुए लोगों की तरह, दोष हो-न-हो, अपने किए, पर पश्चाताप करना और बिगड़ी हुई स्थितियों को संभालने की कोशिश करना इन स्त्रियों का नैसर्गिक गुण होता है। वे समझौता और समर्पण की हद तक जाती हैं। कई बार ख़ुद को ठगा-सा भी पाती हैं।
इस वर्ग की, जिसका प्रतिनिधित्व रामदुलारी कर रही है, बहुत कम स्त्रियां टूटती नहीं, सीधे संघर्ष की मुद्रा में खड़ी हो आगे बढने का रास्ता अख़्तियार करती हैं। अधिकांश या तो किसी निश्चय तक पहुंच नहीं पाती, या पहुंचते-पहुंचते देर हो जाती है। इसके बावज़ूद ये स्त्रियां फिर भी उठती हैं, आने वाली किसी अजानी सुबह की उम्मीद में, यह उनकी जिजीविषा है।
१. JHAROKHA जी इस कथा की पहली टिप्पकार थीं। और ३ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
२. Udan Tashtari जी ११ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
३. Ranish जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
४. Savita / हास्यफुहार जी १७ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
५. Ashish जी ८ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
६. हर्षिता जी १६ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
७. Manish जी ४ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
८. महफूज़ अली जी ६ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
९. शरद कोकास जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
१०. sweeti जी ५ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
११. Kislay जी ५ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
१२. amit जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
१३. Prashuram Rai जी ६ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
१४. Harkirat Haqeer जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
१५. Rachna जी १५ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
१६. Sunita Sharma जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
१७. करण समस्तीपुरी जी ११ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
१८. Babli जी ८ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
१९. अजय कुमार जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
२०. शमीम जी २३ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
२१. रश्मि प्रभा जी ३ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
२२. ज्योति सिंह जी ७ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
२३. राज भाटिय़ा जी १२ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
२४. रंजना जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
२५. SANDEEP KUMAR जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
२६. मोहसिन जी १२ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
२७. बुझो तो जाने जी २६ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
२८. Abhishek जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
२९. कादम्बिनी क्लब २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
३०. सम्पादक: कतेक रास बात २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
३१. हरिओम दास अरुण ब्लॉग १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
३२. Science Bloggers Association १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
३३. दीपिका जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
३४. shama जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
३५. kshama जी ४ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
३६. महेन्द्र मिश्र २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
३७. creativekona जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
३८. प्रेम सरोवर जी ६ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
३९. निर्मला कपिला जी ७ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
४०. Sanjeet Tripathi ३ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
४१. ज्ञानदत्त G.D. Pandey जी ३ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
४२. डॉ. मनोज मिश्र जी ३ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
४३. Apanatva जी १५ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
४४. dipayan जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
४५. psingh जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
४६. पी.सी.गोदियाल जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
४७. Ashish (Ashu) जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
४८. गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
४९. रचना दीक्षित जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
५०. manav vikash vigan aur adhatam १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
५१. हरीश प्रकाश गुप्त जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
५२. KAVITA RAWAT जी ५ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
५३. दीपक 'मशाल' जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
५४. Amit Kumar जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
५५. कृष्ण मुरारी प्रसाद जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
५६. sangeeta swarup जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
५७. भूतनाथ जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
५८. जुगल किशोर जी ४ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
५९. Jandunia जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
६०. Suman जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
६१. Vijay Kumar Sappatti जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
६२. SAMVEDANA KE SWAR जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
६३. zeal जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
६४. श्यामल सुमन जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
६५. संजय भास्कर जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
६६. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी ७ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
६७. राजभाषा हिंदी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
६८. रीता जी ४ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
६९. ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
७०. अनामिका की सदाये. जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
७१. KK Yadava जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
७२. कुमार राधारमण जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
७३. honesty project democracy १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
७४. संगीता पुरी जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
७५. hem pandey जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।
त्याग पत्र के पड़ाव
भाग ॥१॥, ॥२॥. ॥३॥, ॥४॥, ॥५॥, ॥६॥, ॥७॥, ॥८॥, ॥९॥, ॥१०॥, ॥११॥, ॥१२॥,॥१३॥, ॥१४॥, ॥१५॥, ॥१६॥, ॥१७॥, ॥१८॥, ॥१९॥, ॥२०॥, ॥२१॥, ॥२२॥, ॥२३॥, ॥२४॥, ॥२५॥, ॥२६॥, ॥२७॥, ॥२८॥, ॥२९॥, ॥३०॥, ॥३१॥, ॥३२॥, ॥३३॥, ॥३४॥, ॥३५॥, ||36||, ||37||, ॥ 38॥
त्याग पत्र के पड़ाव
भाग ॥१॥, ॥२॥. ॥३॥, ॥४॥, ॥५॥, ॥६॥, ॥७॥, ॥८॥, ॥९॥, ॥१०॥, ॥११॥, ॥१२॥,॥१३॥, ॥१४॥, ॥१५॥, ॥१६॥, ॥१७॥, ॥१८॥, ॥१९॥, ॥२०॥, ॥२१॥, ॥२२॥, ॥२३॥, ॥२४॥, ॥२५॥, ॥२६॥, ॥२७॥, ॥२८॥, ॥२९॥, ॥३०॥, ॥३१॥, ॥३२॥, ॥३३॥, ॥३४॥, ॥३५॥, ||36||, ||37||, ॥ 38॥