शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

त्यागपत्र (समापन किस्त) - ३८

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IMG_0128 मनोज कुमार

दोस्तों कथानक को समाप्त करते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि आपने इतने लंबे समय तक हमारा साथ दिया। आपम प्रोत्साहन और मार्गदर्शन ही हमारा प्रेरणा स्रोत रहा। हमने एक प्रयोग के तहत, नारी, खास कर बिहार जैसे सामंतवादी परिवेश में पलने वाली, समस्या को केन्द्र बिन्दू रख कर इस कथा का चित्रण शुरु किया था। मैं करण समस्तीपुरी का दिल से आभारी हूं जिसने इस यात्रा में हमारा बखूबी साथा निभाया। दो रचनाकारों का एक साथ मिलकर लिखा गया उपन्यास पढा था। मन्नू भंडारी और राजेन्द्र यादव द्वारा रचित। तब से ही मन में था कि इसी तरह का प्रयोग करूं। और जब करण के समक्ष यह प्रस्ताव रखा तो वह सहर्ष तैयार हो गया। इस तरह हमारा कारवां चल पड़ा।

इस के विभिन्न पड़ावों पर हमें ढेर सारे साथी मिले जिन्होंने हमारा पथ-प्रदर्शन कर साहस बढाया। हम इनके आभारी हैं।

अब आज का समापन किस्त

image विवाह के बीतते बरसों के साथ बांके के स्वभाव में परिवर्तन आने लगा था। वैवाहिक जीवन के कुछ ही वर्षों में इतना बदलाव आ जाएगा, रामदुलारी ने सोचा न था। पर अपने स्वाभिमान को दांव पर लगाने वाली रामदुलारी ने भी ठान लिया था, अब और नहीं। समझौते का कोई बिन्दु तो हो जहां सब एक मत होते। मन का गुबार उसे चैन से जीने नहीं दे रहा था। बाबा की दी हुई शिक्षा उसे बार-बार याद आ रही थी कि लोगों में परस्पर प्रेम तो होना ही चाहिए।

बांके का उपेक्षा भरा व्यवहार उसे एहसास कराता कि वह निम्न कोटि की है। उसे लगता सभी पुरुष सामंतवादी प्रकृति के ही होते हैं। जब वह चुप रहती तो बांके के अहं को तुष्टि मिलती। अगर प्रतिक्रिया में कुछ कह देती तो वह तीखी जुबान वाली बन जाती। उस पर चीखने चिल्लाने का आरोप लगता। उपेक्षित जीवन जीते-जीते वह तंग आ गई थी। बांके को अपने विचार, अपने मन की बातें समझाना बहुत ही मुश्किल था। उसने कई बार कोशिश की तो वह उसकी बातों को अनसुना कर घर से बाहर निकल जाता। कभी ताना दे देता। जब कभी तर्क के साथ अपनी बात रखती तो बांके बोलता, “क्या बकवास लगा रखी हो।” और अगर जोर से बोल देती तो, “क्या बात है आजकल तुम जरा सी बात पर बिफर पड़ती हो।” जैसे शब्द सुनने पड़ते। अब जो बात रामदुलाती के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती, बांके को वह जरा सी बात लगती।

मन में कई कथानक आकार लेते पर उसे कलमबद्ध करने के लिए घर-बाहर की जिम्मेदारी से मुक्त, जिस निर्विघ्न समय और मानसिक शांति की जरूरत थी, वह सब अनीसाबाद के घर में मिल पाना संभव ही नहीं था । कभी–कभी मन में आता राधोपुर ही चली जाए कुछ शांति में लिख तो पाएगी। उसने अपना यह निर्णय घर के लोगों के सामने रखा। राधोपुर जाने का निर्णय तो रामदुलारी ने ले लिया पर रात भर उसे न जाने कितने अगर-मगर मथते रहे। अगर बांके नाराज हो गया तो. .., अगर सास आहत हुई तो ….. अगर श्वसुर दुखी हुए तो….!!!

अपने शोधग्रंथ को लिखने के संकल्प के साथ रामदुलारी ने अपने को कमरे के एकांत में कैद कर लिया। एक बार जब लेखन शुरू हुआ तो बिना किसी अवरोध के चलता रहा।

बाहर के संकट और व्यवधान का समाधान तो राधोपुर प्रवास के रूप में वह ढूंढ चुकी थी पर आंतरिक संकट का क्या हल ढूंढ पाई थी।

राधोपुर में भी जब वह मैय्या, चाची, अड़ोस पड़ोस की स्त्रियों को देखती हो उसे यह लगता कि स्त्री का न तो कई स्वतंत्र व्यक्तिव है… न ही कोई स्वतंत्र पहचान वह या तो मात्र रिश्तों से पहचानी जाती है जैसे फलां की बेटी, बहन, पत्नी मां, चाची, बुआ, भाभी या फिर नैहर स्थान से कोवला वाली, फुलगछियावाली। इससे परे कोई स्वतंत्रत व्यक्तित्व भी हो उनका … उनका अपना कोई नाम, इस बात का उसे बोध आज तक नहीं हुआ। जबसे उसे अक्ल हुई तब से आज तक वह कोनेलावाली द्वारा लाया पानी पीती रही पर उसका क्या नाम है उसे आज भी मालूम नहीं।

उसका अपना क्या अस्तित्व है। शिक्षा, जागरूकता, आर्थिक स्वतंत्रता और बाहरी दुनिया से रिश्ता इन सबकी प्राप्ति होने के बाद भी क्या उसकी अपनी अस्मिता है। क्या वह एक स्वतंत्र जीवन्त ईकाई है। उसे भी तो रिश्तों के टक्कर लेने पड़ रहे हैं। पति के वर्चस्व को यदि चुनौती दे तो परमेश्वर के अहं को ठेस लगती है और दरार संबंध में पड़ने लगती है। पर ये रिश्ते टूटते हैं तो क्या रामदुलारी नहीं टूटी । वह भी तो टूटन झेलती है कई स्तरों पर …. लेकिन बर्दाश्त करने की भी एक हद होती है।

लेकिन अब तो स्थिति असह्य हो गई है… !!

संबंध विच्छेद के बारे में तो रामदुलारी सोच ही नहीं सकती। मैय्या बाबू पर क्या गुजरेगी? और स्वयं उसका जीवन क्या कम त्रासदायक होगा। जब शादी नहीं हुई थी तो अपने मन पसंद जीवन साथी के साथ एक सुनहरे भविष्य की कल्पना जो उसने देखी थी वह पूरा नहीं हो पाया। संबंध विच्छेद के बाद के अकेलेपन के सन्नाटे को क्या वह झेल पाएगी। और उसका बेटा क्या पता उसके हिस्से आए या नहीं। यदि नहीं आ पाया तो मातृत्व के स्नेह से वंचित रह जाएगा। उसके व्यक्तित्व के विकास में क्या बाधा नहीं डालेगा?

तो रामदुलारी क्या करे? वह कहां जाए? ये परिवार, ये बच्चा। क्या इन सबों को छोड़ पाएगी वह? जिसे वह पाना चाहती है वह मुक्ति संभव नहीं है। इनकी बात मानने के अलावा चारा ही क्या है? ….. गृहस्थी ने तो पैरों में बेड़िया डाल दी है। आठ से पांच की नौकरी करते, गृहस्थी, सास-ससूर, पति-देवर, बाल बच्चों के दायित्वों को निबाहते हुए, बच्चों का लालन-पालन -, पति को प्यार-मनुहार करते हुए , पति, सास, ससुर के आदेश मानते हुए, जीवन के सभी दुःख सुख के बीच इसी तरह जीवन जब गुजारना ही है तो ……संघर्ष क्यों?

मन अनेक प्रश्नों से पीड़ित था और उत्तर पाने को आतुर भी। उसे लगा कोई नहीं है मेरा मेरे अतिरिक्त। तो उत्तर भी तो मुझे ही ढूंढना होगा। उसे प्रतीत हुआ बाल्य काल से जो आकांक्षाएं वह पाल रही है वह तो सपने की तरह है। क्या हुआ यदि स्वप्न सत्य नहीं हुए तो? जो प्रश्न उसके समक्ष हैं वही तो सत्य हैं। और जब सच सामने हो तो उससे कहां भागा जा सकता है? ….. और फिर स्वयं से कौन भाग पाया है? ये जो पीड़ाएँ हैं, उसे तो हमने ही निर्मित किए हैं। उसके चित्त पर प्रश्नों का जो अंधेरा था वह धीरे-धीरे दूर होता गया। वह शांत थी। जैसे उसे हर ऊहापोह का उत्तर मिल गया। तैयार होकर घर से निकली। एक बार पुनः त्याग वाली बात उसके मन में चल रही थी और उसके हाथ में त्याग पत्र था। …………

***

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राम दुलारी के हाथ में त्याग पत्र है। उसने दिया नहीं है। यह निर्णय हम पाठकों के ऊपर छोड़ते हैं कि उनके भी आस-पास कोई-न-कोई राम्दुलारी होगी ही, … क्या उसे त्यागपत्र दे देना चाहिए घर परिवार, सास-ससूर, बाल-बच्चों के लिए, या फिर से जीवन की डगमाती नैया को पटरी पर लाने के लिए संघर्ष करना चाहिए?

हम भले ही इक्कीसवीं सदी में जी रहे हों लेकिन इस सच्चाई से इंकार नहीं कर सकते कि हमारे देश-समाज के कई हिस्से में आज भी स्त्रियों की स्थिति दोयम दर्ज़े की है। जीवन के आरंभ से ही उसे क़दम-क़दम पर यह अहसास करवाया जाता है कि तुम लड़की हो। आज भी समाज और संस्कृति की रक्षा के नाम पर भ्रूण हत्या से लेकर उनकी हत्या तक की जाती है। उनकी अपनी ज़िन्दगी को अपने ढंग से जीने की कोशिश बेमानी सी लगती है।

हारे हुए लोगों की तरह, दोष हो-न-हो, अपने किए, पर पश्चाताप करना और बिगड़ी हुई स्थितियों को संभालने की कोशिश करना इन स्त्रियों का नैसर्गिक गुण होता है। वे समझौता और समर्पण की हद तक जाती हैं। कई बार ख़ुद को ठगा-सा भी पाती हैं।

इस वर्ग की, जिसका प्रतिनिधित्व रामदुलारी कर रही है, बहुत कम स्त्रियां टूटती नहीं, सीधे संघर्ष की मुद्रा में खड़ी हो आगे बढने का रास्ता अख़्तियार करती हैं। अधिकांश या तो किसी निश्चय तक पहुंच नहीं पाती, या पहुंचते-पहुंचते देर हो जाती है। इसके बावज़ूद ये स्त्रियां फिर भी उठती हैं, आने वाली किसी अजानी सुबह की उम्मीद में, यह उनकी जिजीविषा है।

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१. JHAROKHA जी इस कथा की पहली टिप्पकार थीं। और ३ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२. Udan Tashtari जी ११ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३. Ranish जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४. Savita / हास्यफुहार जी १७ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५. Ashish जी ८ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६. हर्षिता जी १६ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

७. Manish जी ४ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

८. महफूज़ अली जी ६ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

९. शरद कोकास जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

१०. sweeti जी ५ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

११. Kislay जी ५ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

१२. amit जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

१३. Prashuram Rai जी ६ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

१४. Harkirat Haqeer जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

१५. Rachna जी १५ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

१६. Sunita Sharma जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

१७. करण समस्तीपुरी जी ११ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

१८. Babli जी ८ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

१९. अजय कुमार जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२०. शमीम जी २३ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२१. रश्मि प्रभा जी ३ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२२. ज्योति सिंह जी ७ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२३. राज भाटिय़ा जी १२ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२४. रंजना जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२५. SANDEEP KUMAR जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२६. मोहसिन जी १२ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२७. बुझो तो जाने जी २६ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२८. Abhishek जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

२९. कादम्बिनी क्लब २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३०. सम्पादक: कतेक रास बात २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३१. हरिओम दास अरुण ब्लॉग १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३२. Science Bloggers Association १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३३. दीपिका जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३४. shama जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३५. kshama जी ४ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३६. महेन्द्र मिश्र २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३७. creativekona जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३८. प्रेम सरोवर जी ६ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

३९. निर्मला कपिला जी ७ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४०. Sanjeet Tripathi ३ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४१. ज्ञानदत्त G.D. Pandey जी ३ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४२. डॉ. मनोज मिश्र जी ३ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४३. Apanatva जी १५ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४४. dipayan जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४५. psingh जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४६. पी.सी.गोदियाल जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४७. Ashish (Ashu) जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४८. गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

४९. रचना दीक्षित जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५०. manav vikash vigan aur adhatam १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५१. हरीश प्रकाश गुप्त जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५२. KAVITA RAWAT जी ५ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५३. दीपक 'मशाल' जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५४. Amit Kumar जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५५. कृष्ण मुरारी प्रसाद जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५६. sangeeta swarup जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५७. भूतनाथ जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५८. जुगल किशोर जी ४ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

५९. Jandunia जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६०. Suman जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६१. Vijay Kumar Sappatti जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६२. SAMVEDANA KE SWAR जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६३. zeal जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६४. श्यामल सुमन जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६५. संजय भास्कर जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६६. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी ७ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६७. राजभाषा हिंदी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६८. रीता जी ४ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

६९. ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ जी २ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

७०. अनामिका की सदाये. जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

७१. KK Yadava जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

७२. कुमार राधारमण जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

७३. honesty project democracy १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

७४. संगीता पुरी जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

७५. hem pandey जी १ बार इस यात्रा के पड़ाव पर पधारे।

त्याग पत्र के पड़ाव

भाग ॥१॥, ॥२॥. ॥३॥, ॥४॥, ॥५॥, ॥६॥, ॥७॥, ॥८॥, ॥९॥, ॥१०॥, ॥११॥, ॥१२॥,॥१३॥, ॥१४॥, ॥१५॥, ॥१६॥, ॥१७॥, ॥१८॥, ॥१९॥, ॥२०॥, ॥२१॥, ॥२२॥, ॥२३॥, ॥२४॥, ॥२५॥, ॥२६॥, ॥२७॥, ॥२८॥, ॥२९॥, ॥३०॥, ॥३१॥, ॥३२॥, ॥३३॥, ॥३४॥, ॥३५॥, ||36||, ||37||, ॥ 38॥

36 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ दकियानूसी बेरियाँ आज भी हैं........ पता नहीं हम इन्हें संस्कारों के नाम पर कब तक ढोते रहेंगे..... या तोड़ फेंकेंगे.......... ! हम सामूहिक दृष्टिकोण का आदर करते हैं..... इसलिए यह पाठकों पर छोड़ते हैं कि वह रामदुलारी जैसी प्रतिभावान साहित्यकार की सेवा स्वीकार करते हैं या त्यागपत्र.... ! यह एक लम्बा लेकिन शानदार सफ़र रहा....... आप सुहृद पाठकों ने अभूतपूर्व धैर्य के साथ इस श्रृंखला की एक-एक कड़ी पर हमारा प्रोत्साहन करते रहे... हम सच में आपके आभारी हैं. अब हर शुक्रवार की शाम आपको इस ब्लॉग पर 'त्यागपत्र' नहीं मिलेगा.... हम कोशिश करेंगे कि इसका स्थानाप्पन भी आपके लिए कुछ उपयोगी हो ! अंत में कथानक के सभी पत्र, घटनाक्रम, कड़ियाँ और लेखक के तरफ से मैं आप सबों को धन्यवाद देता हूँ !!! याद रहे 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः' !

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  2. माफ़ी चाहूंगी की क्रम से त्याग पत्र की कडिया नहीं पड़ पाई लेकिन अब इस एक पोस्ट में सब कुछ समां गया तो अच्छा लगा पढना और त्यागपत्र को समझना.

    अब आते है पोस्ट पर जो आप ने सवाल उठाया की क्या राम दुलारी के हाथ में त्याग पत्र है। उसने दिया नहीं है। यह निर्णय हम पाठकों के ऊपर छोड़ते हैं कि उनके भी आस-पास कोई-न-कोई राम्दुलारी होगी ही, … क्या उसे त्यागपत्र दे देना चाहिए घर परिवार, सास-ससूर, बाल-बच्चों के लिए, या फिर से जीवन की डगमाती नैया को पटरी पर लाने के लिए संघर्ष करना चाहिए?

    सच कहा हमारे बीच कितनी ही राम दुलारियां हैं जो ऐसा जीवन व्यतीत कर रही हैं. लेकिन मैं एक बात कहती हूँ नारी कितनी भी आधुनिक और शिक्षिता बन जाये कितने ही ऊँचे पदों पर आसीन हो जाये लेकिन उसकी इज्जत उसके विनम्र स्वाभाव, उसकी क्षमा प्रवर्ती, उसके नैसर्गिक गुण, उसकी समझौता और समर्पण का व्यावहार और सबसे बड़ा गुण जो भगवान ने उसे बख्शा है वो माँ बन्ने की ताकत ....ये सब उसकी इज्जत बढ़ाते हैं उसकी सूरत को ख़ूबसूरती प्रदान करते हैं...सोचो ये सब गुण ना हो तो क्या ऊँचे पद आसीन, महा शिक्षित नारी उतना सम्मान पा सकेगी जितना पाती है..तो बताइए त्याग पत्र दे कर कौन सी नारी चाहेगी की अपनी इस सम्मान जनक सत्ता को खो दे .....???

    और अगर खुद के लिए राम दुलारी जैसी स्त्रियों को नए आयाम कायम करने हैं...अपने पति के मन में इज्जत बनानी है तो इन गुणों के साथ साथ उच्च शिक्षित हो समाज में अपना वजूद कायम कर के भी पा सकती है. और आधुनिक और आदर्श वादी जिन्दगी जी सकती है . अंत-तह गृहस्थ निभाना तो सबसे बड़ा कर्तव्य और पूजा है . इसके बिना नारी का क्या मान और क्या सम्मान?

    और संघर्ष कहाँ नहीं है ? हर जगह है...तो क्यों न वो संघर्ष अपने अपनों के लिए अपने घर के सुख के लिए किया जाये ? क्यों ना अपने सफल प्रयत्नों से एक सफल जीवन बनाया जाये ...सब कुछ अपने हाथ में हैं...इंसान जैसा चाहे अपनी जिंदगी को जी सकता है बशर्ते की उसमे हालातो के रुख बदल देने की ताकत और समझ हो.

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  3. अपनी तकनीकी अज्ञानता के कारण मैंने आपका यह ब्लॉग बहुत मिस किया है शुरू शुरू में... बाद में तो लत सी बन गई है...आप ने देखा होगा कि आपके लगतार हमारे ब्लॉग पर आने के बावजूद भी,हम लोग कभी यहाँ नहीं आ पाए... और इसी क्रम में हमने आपकी यह श्रृंखला मिस की... ख़ैर, अब तो सरे लिंक उपलब्ध हैं, इसलिए पूरा पढ़ने के बाद अलग से टिप्पणी दूंगा, यह वादा रहा..अभी तो बस हमारी बधाई स्वीकारिए, मनोज जी एवम् करन जी, एक धारावहिक की सफल समाप्ति की... और शुभकामनाएँ... एक नए धारावहिक के लिए!!!

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  4. @ अनामिका जी,
    हमें सुधि पाठकों से ऐसी ही सार्थक टिपण्णी की अपेक्षा थी.... ! अनामिका जी आपका बहुत-बहुत आभार !! अनामिक जी, हम आपके उदगार का सम्मान करते हैं ! आपकी प्रतिक्रया एक नारी के लिए आदर्श हैं. लेकिन एक प्रश्न जो यह कथा छोड़ रही है वह यह कि 'त्याग' सिर्फ नारियों के लिए ही रूढ़ क्यूँ ? उस परिवार, घर संसार के लिए क्या अर्थोपार्जन मात्र ही 'बांके' की जिम्मेदारी थी... ? अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए भी क्या अपनी प्रतिभा का समुचित उपयोग और स्वावलंबन स्त्रियों की गरिमा के विपरीत है.... ? यहाँ मैं राष्ट्र-कवि मैथिलीशरण गुप्त का एक पद्यांश उधृत करना चाहूँगा,

    "शिक्षा हमारी काम में तब तक न कुछ भी आयेगी !
    अर्धांगिनियों को भी सुशिक्षा दी न जब तक जायेगी !!
    सर्वांग के बदले हुई गर व्याधि पक्षाघात की,
    तो भी क्या व्याकुल तथा व्यथित रहेगा वातकी !!!

    पुनश्च.... कथा को निर्णयात्मक मोड़ न देकर एक समस्या पर हम ने इसी लिए छोड़ा कि आप सुधि जनों का दृष्टिकोण पा सकें ! बहुत-बहुत धन्यवाद !!!

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  5. कुछ व्‍यस्‍तता के कारण मैं नियमित नहीं रह पायी .. आप दोनो को बहुत बहुत बधाई !!

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  6. @ संवेदना के स्वर,

    आपके आने से इस घर में कितनी रौनक है.... ! आपको देखें कभी अपने घर को देखे हम.... !!! बहुत-बहुत धन्यवाद !!! इस श्रृंखला पर आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी !!!!

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  7. @ संगीता पूरी,

    बहुत-बहुत धन्यवाद, संगीता जी !!

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  8. @करण जी,
    अब इतने भी बुरे नहीं हैं हम कि कभी आप हमें देखें (कि जाने कहाँ कहाँ से आ जाते हैं) और कभी अपने घर को (अब कहाँ बिठाएँ इनको)... ख़ैर मज़ाक था यह..सोचा लगे हाथ ये भी सही..!!

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  9. आपका यह उपन्यास बहुत ही अच्छा लगा. बहुत बहुत बधाई.
    मनोज जी और करण जी आप दोनों को बधाई .
    मुझे तो "रामदुलारी" पात्र हमेशा याद रहेगी.
    इसी तरह के रचना का इन्तजार रहेगा.
    धन्यवाद.

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  10. सबसे पहले क्षमा प्रार्थी हूँ...इस नायब उपन्यास की नियमित पाठिका ना होने के लिए...क्यों कि बहुत सारी कड़ियाँ निकल चुकी थीं इसी लिए शायद नियमित पढ़ना नहीं हो पाया....अंतिम कड़ी में आपने उपन्यास का सारांश समेटा है...पढ़ कर अच्छा लगा...
    आपने अंत पाठकों के हाथ सौंपा है...क्या त्यागपत्र देना चाहिए?
    आज के सन्दर्भ में भी यदि देखें तो आज भी कम से कम भारत में नारी की स्थिति दोयम दर्जे की ही है...चाहे वो कितना ही पढ़ लिख गयी हो ..या बहुत उच्च पद पर आसीन हो...विवाहित नारी पहले घर की जिम्मेदारियों पर ध्यान देती है...यदि विवाह नहीं किया है तो बात अलग रूप में सोची जा सकती थी...लेकिन नारी अपने आस्तित्व को रखते हुए भी काम कर सकती है...लेकिन यह बात दूसरा नहीं समझ पाता..इसी लिए ऐसी समस्या आ जाती है..हांलांकि अब कुछ बदलाव हुआ है पर वो नहीं के बराबर...इस कथानक में लगता है कि बांके के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं है...घर गृहस्थी में सहिष्णुता ज़रूरी है..लेकिन यदि यह हमेशा एक तरफ़ा है तो इस कथानक का अंत अलगाव ही हो सकता है...फिर भी रामदुलारी हरसंभव यही प्रयास करेगी कि घर उसका बचा रहे....आज भी समाज में तलाक या अविवाहित स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता.....अपने अस्तित्व की लड़ाई में बहुत कुछ खोना भी पड़ता है...पाठकों को बहुत कठिन निर्णय की स्थिति में छोड़ दिया है ...बहुत अच्छा कथानक रहा..

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  11. बहुत बहुत धन्यवाद और आभार.

    मैंने भी व्यस्तता के कारण पिछ्ले कुछ अन्क नही पढे हैं. आशा है अब पूरा कर लूंगा.

    चाहुंगा की आप ऐसी ही कथा आगे भी प्रस्तुत करते रहें . बहुत बहुत शुभकामनायें.

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  12. रामदुलारी का पात्र ...एक बार पुनः पूरा उपन्यास इत्मिनान से पढ़ने का मन हो आया है...लौटते हैं फिर से. बधाई आपको और करण जी को.

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  13. हमारे बीच कितनी ही राम दुलारियां हैं जो ऐसा जीवन व्यतीत कर रही हैं!
    मनोज जी और करण जी आप दोनों को बधाई |

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  14. बहुत बहुत बधाई.मनोज सर और करण जी को मेरी ओर से धन्यवाद.आरंभ में यह कथा अच्छी लगी. मैने हर अंक पढा. कुछ अंक छूट गये . वह मै नही पढ पाया. अब समय है , पढूंगा.

    पुन बहुत बहुत बधाई .

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  15. आपकी पोस्ट आज चर्चा मंच पर भी है...

    http://charchamanch.blogspot.com/2010/07/217_17.html

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  16. karan aur manoj jee bahut bahut badhai....ha ye kashmkash kee stitee aapne aasaanee se pathako ke kandho par daal mukti paa lee...........jokes apart safar acchaa rahaa........maine apane aapko juda mahsoos kiya tha shuru se hee.........
    shubhkamnae.....aglee shrunkhalaa ke liye..........

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  17. @ मोहसिन,
    धन्यवाद....... आप शुरू से हमारे साथ रहे... अंत में भी आए.... हाँ, बीच में आपकी कमी जरूर खली !!

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  18. @ संगीता स्वरुप जी,
    यदि हमने कथा को निर्णायक मोड़ पर नहीं समाप्त किया होता तो आप के द्वारा दी गयी अमूल्य प्रतिक्रिया से वंचित रह जाते.... ! लेकिन एक बात है संगीता जी, कहीं से न कहीं से शुरुआत तो करनी पड़ेगी ! हम स्त्रियों के घर-परिवार विषयक कर्तव्यों के विरुद्ध नहीं हैं किन्तु क्या यह न्यायोचित है कि एक प्रतिभा संस्कार और जिम्मेदारियों की चारदीवारी में घुट कर सिर्फ इसलिए दम तोड़ दे कि वह एक स्त्री है..... ? हमें आपके विचार बहुत अच्छे लगे और ऐसा लग रहा है कि हम अपने उद्देश्य में सफल रहे. इस अनुग्रह के लिए धन्यवाद !!

    उत्तर देंहटाएं
  19. @ शमीम जी,

    सफ़र आपके साथ शुरू किया था.... ख़त्म भी आपके साथ ! बेशक यह आप जैसे साथियों की हौसलाफजाई ही है कि यह श्रृंखला इतने दिनों चल कर मुकाम पायी !!!

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  20. @ उड़न-तश्तरी जी,
    हमे गर्व है कि हमारी इस श्रृंखला के सर्वाधिक नियमित पाठक आप रहे..... ! आप हमेशा नए ब्लोगेर्स का प्रोत्साहन करते हैं.... हमारा भी किया.... त्यागपत्र का सफल समापन आपके हौसलाफजाई के बिना कठिन था. ख़ास बात यह कि व्यावसायिक, पारिवारिक, सामजिक, सामुदायिक और अंतर्जालिये व्यस्तता के बावजूद ब्लॉग की इस भीड़ में आपने 'रामदुलारी' को याद रखा.... हम आपके हृदय से आभारी हैं !!! धन्यवाद !!!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  21. @ जुगल किशोर जी,
    इसीलिए तो यह निर्णय पाठकों पर छोड़ा गया है कि वे अपने आस-पास की रामदुलारियों का त्यागपत्र चाहते हैं या...... उसकी प्रतिभा से लाभ !!

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  22. @ बूझो तो जाने,
    हो महराज ! नहीं बुझे.... अब आप ही बता दीजिये कि शुरू से त्यागपत्र पढ़ते-पढ़ते बीच में कहाँ गायब हो गए थे .... ? लगता है खतमे होने का इन्तिज़ार कर रहे थे.... ! खैर अंत तक आपका साथ रहा... हम शुक्रगुज़ार हैं आपके !!!

    उत्तर देंहटाएं
  23. @ बूझो तो जाने,
    हो महराज ! नहीं बुझे.... अब आप ही बता दीजिये कि शुरू से त्यागपत्र पढ़ते-पढ़ते बीच में कहाँ गायब हो गए थे .... ? लगता है खतमे होने का इन्तिज़ार कर रहे थे.... ! खैर अंत तक आपका साथ रहा... हम शुक्रगुज़ार हैं आपके !!!

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  24. @ बूझो तो जाने,
    हो महराज ! नहीं बुझे.... अब आप ही बता दीजिये कि शुरू से त्यागपत्र पढ़ते-पढ़ते बीच में कहाँ गायब हो गए थे .... ? लगता है खतमे होने का इन्तिज़ार कर रहे थे.... ! खैर अंत तक आपका साथ रहा... हम शुक्रगुज़ार हैं आपके !!!

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  25. @ जाकिर अली 'रजनीश',

    जाकिर भई, यह पाठकों की हौसलाफजाई का नतीजा ही तो है कि हम इतनी लम्बी श्रृंखला लिखने की हिमाकत कर सके.... लेखा-जोखा तो रखना पड़ेगा !! त्यागपत्र की समाप्ति पर मैं यह ख़ुशी और इसकी कामयाबी का श्रेय आप से बांटते हुए आपको शुक्रिया कहता हूँ !!!

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  26. @ संगीता स्वरुप जी,
    चर्चा-मंच मे इसे शामिल करने के लिए शुक्रिया !

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  27. @ अपनत्व

    इस लम्बे सफ़र के लगभग हर पड़ाव पर आपका 'अपनत्व' मिला... हम आपके आभारी हैं.... यह कहना आपके 'अपनत्व' के लिए काफी नहीं होगा ! हम भविष्य में भी आपसे इसी अपनत्व की उम्मीद रखते हैं !!

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  28. @ सर्प-संसार,

    जय हो नाग-देवता ! अंत में आप भी आ ही गए... !! धन्यवाद !!!

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  29. रामदुलारी के किरदार से बहुत ही जुड़ी रही। उसका एक ऐसे मोड़पर जाना हमें अच्छा नहीं लगा। लगा कुछ और कहानी आगे बढती।
    आप लेखक द्वय से अनुरोध है कि एक बार फिर इन पात्रों के साथ आप आएं और कहानी को आगे बढाएं।
    मनोज जी एवम् करन जी, बधाई एक धारावहिक की सफल समाप्ति की... और शुभकामनाएँ!!

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  30. बहुत अच्छी श्रृंखला रही, जिसमें विभिन्न समस्याओं पर प्रकाश डाला गया। मनोज जी एवम् करन जी, एक धारावहिक की सफल समाप्ति की... और शुभकामनाएँ!

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  31. यह एक लम्बा लेकिन शानदार सफ़र रहा!
    त्याग पत्र की कडिया नहीं पड़ पाई!
    इस एक पोस्ट में सब कुछ समां गया तो अच्छा लगा पढना और त्यागपत्र को समझना!

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  32. कि 'त्याग' सिर्फ नारियों के लिए ही रूढ़ क्यूँ ? उस परिवार, घर संसार के लिए क्या अर्थोपार्जन मात्र ही 'बांके' की जिम्मेदारी थी... ? अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए भी क्या अपनी प्रतिभा का समुचित उपयोग और स्वावलंबन स्त्रियों की गरिमा के विपरीत है.... ?

    करन जी आभारी हू आपकी टिपण्णी ने मुझे दुबारा आने के लिए प्रोत्साहित किया.

    अब फिर से आते हैं आपकी बात पर..

    मैंने जो पहले टिपण्णी दी वो एक आदर्श नारी के रूप में टिपण्णी थी. जिस आदर्श को बनाये रखने की आज के आधुनिकता की अंधाधुन्द दौड में शामिल समाज को और स्त्रियों को बहुत जरुरत है..लेकिन ये सीता जैसे आदर्श वादिता भी वहीँ तक टिकी रह सकती हैं जहाँ राम जैसे संस्कारी, संवेदनशील, समझदार, नारी को सम्मान देने वाले पुरुष होंगे.

    जब बांके जैसे पुरुष सिर्फ धन कमाना ही अपनी पहली और आखरी जिम्मेदारी समझ लेंगे और घर में आपस में समझदारी नहीं होगी तो कैसे और कब तक संभव है की एक स्त्री ही सरे कर्ताव्व्यो का निर्वाह करती रहे. कितनी भी समझदार, शिक्षित, सम्मानजनक क्यों न हो जाये नारी अंत तह उसे समझने वाला भी तो होना चाहिए. इसीलिए तो कहा है गृहस्थ की गाड़ी दो पहियों से चलती है एक भी गड-बड़ा जाये तो गाड़ी का चलना मुश्किल है.

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