शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

स्वरोदय विज्ञान (अंक-1) आचार्य परशुराम राय

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श्री गुरवे नम:

स्वरोदय विज्ञान

मेरा फोटोआचार्य परशुराम राय

मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान की अनेक शाखाओं, प्रशाखाओं का जन्म हुआ एवं समय के प्रवाह ने उनके परिणामों के आधार पर उनमें अनेक संशोधन एवं परिवर्ध्दन को रूपायित किया। प्रकृति ने इस अखिल ब्रहमाण्ड में अनंत वैज्ञानिक प्रणालियाँ दे रखी हैं। हम एक वैज्ञानिक प्रणाली की खोज करते हैं तो उसके अन्दर अनेक वैज्ञानिक प्रणालियाँ कार्यरत दिखती हैं। यदि हम सहज चित्त से उन्हें देखते हैं तो वे हमें विस्मय और आनन्द से रोमांचित कर देती हैं और यहीं से योग की भूमि तैयार होती है। शिवसूत्र में भगवान शिव ने इसीलिए विस्मय को योग की भूमिका कहा है - 'विस्मयों योग भूमिका'। यहीं से सूक्ष्म-जगत से जुड़े प्रकृति प्रदत्त विज्ञान से मानव का परिचय होता है। इस क्षेत्र में भी अनन्त वैज्ञानिक प्रणालियाँ हैं और इन पर अनेक प्रामाणिक ग्रंथ उपलब्ध हैं। इन्हीं वैज्ञानिक प्रणालियों में एक स्वरोदय विज्ञान भी हैं।

जिस स्वरोदय विज्ञान की हम यहाँ चर्चा करने जा रहे हैं उसका सम्बन्ध मानव के श्वास-प्रश्वास से है। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि स्वरोदय विज्ञान और प्राणायाम दोनों एक नहीं हैं। स्वरोदय विज्ञान हमारे शरीर में निहित श्वास-प्रश्वास की व्याख्या करता है, जबकि प्राणायाम श्वास-प्रश्वास का व्यायाम है। हालाँकि दोनों का साधक उन सभी आध्यात्मिक विभूतियों का स्वामी बनता है जिनका उल्लेख ग्रंथों में मिलता है।

स्वरोदय विज्ञान एक अत्यन्त प्राचीन एवं गुहय विज्ञान है। तत्व-मीमांसा (Metaphysics) की अनेक शाखाओं-प्रशाखाओं की जितनी खुलकर चर्चा सामान्यतया हुई है, उतनी स्वरोदय की नहीं हुई है। जबकि इसका अभ्यास सामान्य व्यक्ति के लिए काफी लाभदायक है। एक ज्योतिषी के लिए तो इसका ज्ञान अत्यन्त आवश्यक माना गया है। शिव स्वरोदय तो यहाँ तक कहता है कि स्वरोदय विज्ञान से रहित ज्योतिषी की वही दशा होती है जैसे बिना स्वामी के घर, शास्त्र विहीन मुख और सिर के बिना शरीर की। शिव स्वरोदय इस विज्ञान को अत्यन्त गोपनीय बताता है :

गुह्याद्     गुह्यतरं     सारमुपकार-प्रकाशनम्।

इदं स्वरोदयं ज्ञानं ज्ञानानां मस्तके मणि॥

(अर्थात् यह स्वरोदय ज्ञान गोपनीय से भी गोपनीय है। इसके ज्ञाता को सभी लाभ मिलते हैं। यह विभिन्न विद्याओं (गुह्य) के मस्तक पर मणि के तुल्य है।)

शायद इसीलिए अन्य गुह्य विद्याओं की तरह यह विद्या जन-सामान्य में प्रचलित नहीं हुई, जबकि सामान्य व्यक्तियों के उपयोग में आने वाली अत्यन्त लाभदायक बातों की चर्चा भी इसके अन्तर्गत की गई है।

स्वरोदय विज्ञान पर अत्यन्त प्रसिध्द ग्रंथ शिव स्वरोदय है। इसके अतिरिक्त परिव्राजकाचार्य परमहंस स्वामी निगमानन्द सरस्वती जी ने अपने ग्रंथ 'योगी गुरु' में पवन विजय स्वरोदय नामक एक ग्रंथ का उल्लेख किया है। स्वामी राम ने अपनी पुस्तक Path of Fire and Light, vol.I में एक और ग्रंथ 'स्वर विवरण' की चर्चा की है। बिहार योग विद्यालय, मुंगेर के संस्थापक एवं प्रसिध्द स्वरोदय वैज्ञानिक (साधक) स्वामी सत्यानन्द सरस्वती ने अपने 'स्वर योग' नामक ग्रंथ में इस विषय पर अत्यन्त विशद चर्चा की है। साथ ही, उन्होंने अपने इस ग्रंथ में शिव स्वरोदय का मूल पाठ भी हिन्दी अनुवाद के साथ प्रकाशित किया है। स्वामी जी ने इस विज्ञान पर तमिल भाषा में लिखित स्वर चिन्तामणि नामक ग्रंथ का उल्लेख किया है।

स्वरोदय विज्ञान के अंतर्गत यहाँ मुख्य रूप से वायु, नाड़ी, तत्व, सूक्ष्म स्वर प्रणाली, इनके परस्पर सम्बन्ध, आवश्यकता के अनुसार स्वर बदलने की विधि तथा विभिन्न कार्यों के लिए स्वरों एवं तत्वों का चुनाव आदि की चर्चा की जाएगी। इसके अतिरिक्त, यहाँ स्वर के माध्यम से अपने स्वास्थ्य का ज्ञान प्राप्त करना एवं स्वर के माध्यम से विभिन्न रोगों के उपचार पर भी प्रकाश डाला जायेगा।

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6 टिप्‍पणियां:

  1. हम एक वैज्ञानिक प्रणाली की खोज करते हैं तो उसके अन्दर अनेक वैज्ञानिक प्रणालियाँ कार्यरत दिखती हैं।

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  2. इतनी ज्ञानवर्धक जानकारी के इस सिलसिले का बेसब्री से इंतज़ार है।

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  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  4. aadarniya rai ji ki kalam se blog par ek aur adbhut evam jnanvardhak lekin visara di gai vidhya shrinkhala ke roop me padhane ko milegi. iske liye mai aapka aapka bahut kritajna rahoonga.

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