बुधवार, 14 जुलाई 2010

देसिल बयना - 38 : बैठे बैठे पेट पर हाथ...... !

देसिल बयना-38 : बैठे बैठे पेट पर हाथ… !


imageकरण समस्तीपुरी

मार बढ़नी.... पता नहीं कौन दुश्मन खाते वक़्त याद किया.... इतना जोर से सरके कि आँख लोरा (आंसू आ जाना) गया। सच्चे कहता हैं.... मजाक नहीं !अरे महराज, आज दुपहर में गए कलेऊ (दोपहर का भोजन) खाए तो पैंतीस रुपैय्या में भरपेट्टा थाली औडर किये। इहाँ दक्खिन में खाना में दही-भातजरूर देगा। थाली में उज्जर दक-दक चमकते दही-भार के ऊपर हरियर-पियर अंचार और लाल-लाल अनार के दाना देख के जी ऐसा सिहाया (ललचाया)कि हुलस के भर बेलचा (बड़ा चम्मच) मुँह में कोंच लिए। इस से पहिले कि दही-भात हल्लक से ससरे एगो ऐसन न किस्सा याद आ गया कि रोकते-रोकतेभी फरफरा कर हंसी निकल गया।  खी...खी....खी.... खी.... सामने बैठे दोस्त का लाल-लाल कपड़ा पर उज्जर-उज्जर छीट तो बनाइये दिए सरकेऐसन कि पूछिये मत।

हमरे घर के पजरिये (बगल) में चुल्हामन बाबू का ड्योढी था। सुनते हैं कि जमींदारी टाइम में तो बहुते चलती था उनका मगर धीरे-धीरे कम होता गया। उन्ही के लड़का थे, सड़कचंद सिंघ।  जैसा नाम-वैसा काम। भर जिनगी सड़के नापते रहे। ठकुरई के धाख पर लुगाई बसा लिए मगर तीन पुश्त से बिका रहा पुश्तैनी जमीन का कितना भरोसा....? ऊपर से सड़कचंद सिंघ न खेतिहरे ना कचहरिये.... कैसे काम चले।

धीरे-धीरे अनाज का बखारी ढहा.... फिर खुट्टा पर मवेशी घटा.... बैठक के छप्पर का बांस-बत्ती भी हाथी के दांत के तरह निकल गया था मगर सिंघ जी काहे देह हिलाएंगे ? थोड़ा बहुत चास बचा था उ भी बटीदार के जिम्मे। बाँट के जो मिले उ छः महीना में जय-जय सीता राम.... फिर घर ठाकुराइन भरोसे। बेचारी खरीफ में रवी के भरोसे और रवी में गरमा के भरोसे उधार-पैंच कर के चलाती थी।

Clouds उ साल इन्दर महराज ऐसन बरसे कि बागमती का बाण शिवजी के धनुष जैसा तीन खंडी टूट गया। समझिये कि आस-पास के पचासनो गाँव मे परलय का दिरिस छा गया। गरमा धान और भदैय्या मकई घोघा गया था... मगर बाग़मति का पानी ई पेप छोड़ के बहे कि सब वरुण देवता के पेट में चला गया। गाछ-विरिछ गाय-गोरु तक दहा गया। लोग-बाग कोठा-पक्का पर चढ़ के जान बचाया।  पानी उतरा तो पिराया खेत देख कर किसान का कलेजा टूट गया। बड़े-बड़े गिरहत (गृहस्थ) मुँह चियार दिए। मझोलबा किसान सब तो दिल्ली-पंजाब का रास्ता पकर लिया।

Vista04 सड़कचंद सिंघ का रईसी न बाढ़ में बहने वाला है न रौदी में सुखाने वाला। जमीन न बिका गया है, जी थोड़े बंधक रख आये है। सुसरी है तो जमीन्दारिये जमाने की बहकी। जब तक खटरस ना मिले हरताले पर बैठ जाती है। खुट्टा पर की गाय को बाढ़ बहा ले गया और गाभिन भैंस ने दूध देना छोड़ दिया। खरची घटता है तो बढ़िया-बढ़िया को तरेगन (तारा) सूझने लगता है। बेचारी ठकुराइन समझा-समझा के थक गयी कि नहीं कुछ तो कहाचारिये जाइए...गवाही-दलाली में भी चार पैसा हाथ लग जाएगा... ! मगर नवाबी भी कौनो चीज है न...! सड़कचंद सिंघ घर छोड़ के कभी खेत देखने गए नहीं... और उ कहचरी जाते हैं.... ?  फिर तो घर में होने लगा तिरकाल संध्या। कौनो ऐसा दिन नहीं होगा जो जलखई, कलेऊ और रात्रिभोज के वक्खत दुन्नु परानी में रमण-चमन न हो।

घर में एकाध सेर और मकई आँगन में लौंगिया मिरचाई के अलावे कुच्छो नहीं बचा था। पहर गया तो बेचारी ठकुराइन मकई भूंज के नमक-हरी मिर्च के साथ बाल-बच्चा को भी परोस दी और एगो फुलही थाली सड़कचंद जी को भी दे आई। आहि बला के.... सिंघ जी इतना जोर से घुरके कि का बताएं....हमलोग अपने घर से निकल आये। हमरी नयकी भौजियो खिड़की से झाँकने लगी थी।

सिंघ जी घुरकबो किये ऊपर से नखरो बतिया रहे थे। बेचारी ठकुराइन दुलार-पुचकार रही थी। मगर मसनद पर पीठ अड़ाए सड़कचंद जी टस से मस नहीं हुए। गंजी ऊपर ससार कर पेट पर हाथ फेरते हुए बोले, "हमरा पेट में लहर मार रहा है.... ई का और आग लगाने वाला चीज लाई हो... तु को कहा थान कुछ 'नरम दाना गोरस' के साथ लाना.... !", कह के सिंघ जी थाली को दे मारे नचा के।

फिर तो शुरू होय गया ठकुराइन का सोहर। हमरी माताराम से रहा नहीं गया। उ चली गयी दुन्नु परानि को समझाए। हमहू साथ हो लिए। उधर से भगौनावाली काकी और महोखिया बुआ भी निकल आयी थी।  जिलेबिया, जमुना, भंडोलब और झुरुखाना भी जुट गया। श्रोताओं को देख के ठकुराइन का सुर और तेज हो गया। कभी आंसू पोछे, कभी नाक सिकोड़े, कभी साड़ी का अंचरा उठा-उठा के देवता-पित्तर को परचारे... फिर हमरी माताराम को पंजिया के फूट पड़ीं, "दीदी ! कहियो ऐसन दुःख नहीं देखे.... जौन इ के साथ भोगना पड़ा। सुने रहे कि बड़े जमींदार हैं... ! मगर इहाँ का है, उ कौन नहीं जानता... ! खेती-पथारी, गाय-गोरु कुछ रहा नहीं।  बड़े-बड़े नवाब गए ढाका-मुल्तान कमाने.... और ई को इहें पलंग तोड़ते सरंग चाहिए।"

ठकुराइन का परवचन सो रसदार था कि हम तो ताली पीट-पीट के लोट-पोट हो गए। उ कारिख बाबा के भगत के तरह हाथ भांज-भांज के कह रही थी, "हम औरत जात कहाँ जायेंगे दीदी ! तेरहो जतन कर के किसी तरह सब को जियाये हैं...! ई मरद हो के मुआ देह नहीं हिलाएगा....  ! कुछ करेगा नहीं....खाली 'बैठे-बैठे पेट पर हाथ ! और पेट मांगे दही भात !!" बोल के जौन ताल के साथ सिर लंका के तरह समुन्द्दर में धसल अपने पेट पर हाथ मारी थी कि बेचारे गोसाए सिंघ जी की भी हंसी फूट पड़ीं।

अब उहाँ इकठ्ठा सब धिया-पुता सब लगा अपना-अपना पेट पीट के ठकुराइन का स्वांग उतारे, "बैठे-बैठे पेट पर हाथ ! पेट मांगे दही भात !!" हमरी माताराम सब को डांट के भगाई, "भाग छुतहर सब कहीं के ! तु लोगों को मजा लगता है.... ठीके तो कहती है बेचारी ! तु लोग भी ऐसे ही निकम्मा हो के बैठे रहना फिर तोहरी लुगाई भी ऐसे ही आरती उतारेगी।" माताराम के धाख से लड़का सब भगा उहाँ से। फिर महिला लोग दुन्नु परानी में समझौता कराए खातिर बैठ गयी।

इधर हमरा हंसी रुकिए नहीं रहा था। अंगना आ के भौजी को सुनाये तो उहो हँसे लगी।  सांझ में बाबूजी को भी सुनाये। पहिले तो उहो हंस पड़े मगर फिर हमें समझाए, "देखो ! तुम लोग तो खाली ठिठिया दिए न... मगर ई में बहुत बड़ा रहस्स (रहस्य) है। "बैठे-बैठे पेट पर हाथ ! पेट मांगे दही-भात !!" हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे... तो उस से का भूख नहीं लगेगी का? अरे कौनो काम में बीजी रहेंगे तो थोड़ा देर के लिए भूखो-प्यास भूल सकते हैं... मगर कौनो काम नहीं है तो रह-रह के भूख-प्यास.... यही सब इन्द्रीय आवश्यकता पर ध्यान जाएगा न... ! और औकात भले ही घटती जाती है लेकिन शौक और जरुरत तो बढ़ती ही जाती है। मतलब अकर्मण्यता किसी समस्या का हल नहीं है।  नहीं तो निकम्मा हो के पेट पर हाथ फेरते रहो तो पेट उस से थोड़े नमान जाएगा.... ! उ तो दही भात मांगाबे करेगा.... है कि नहीं... ? तो कैसे मांगेगा... बाबूजी भी पेट पर हाथ फेर कर बोलने लगे, "बैठे-बैठे पेट पर हाथ ! पेटमांगे दही-भात !!"

तो यही था आज का देसिल बयना। यही दही-भात याद कर के हम दिन में सरक गए थे। अब आप लोग मत याद की जियेगा वरना रातो में सरकेंगे.... हाँ याद आये तो टिपिया जरूर दीजियेगा !! जय राम जी की !!!

37 टिप्‍पणियां:

  1. इस देसिल बयना का अलग महत्व है। अकर्मण्य लोगों को सद्बुद्धि आए। इतना ही कहना है कि जो भविष्‍य था वह अब हो रहा है, जो अब हो रहा है वह अतीत बनता जा रहा है तो चिन्‍ता किसलिए की जाए।

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  2. ई देसिल बयना का दोसरा पछ भी हमको देखाई दिया... खाली अकर्मण्यता नहीं, ऊ कामचोरी के पीछे लुकाया हुआ बेदना भी देखाई दिया... बाबू साहब कोनो जमाना में अमीरी देखे थे, जब पसीना भी गोलाब होता था… तब काम करने का जरूरत नहीं हुआ, अब जरूरत होने से भी काम करने का अभ्यासे बिला गया है... चाहियो के काम नहीं कर सकते हैं... लेकिन का करें, मरद मानुस हैं, कमजोरी गछियो नहीं सकते हैं...अपना निकम्मापन को छिपाने के लिए ठकुराईन पर गोस्साते हैं... एगो बात बताते हैं आपको, अबरी गाँव जाइएगा त लुका कर उनको देखिएगा, जब सँउसे गाँव सो जाता होगा त उनका हाथ पेट पर नहीं, आँख पर अऊर कपार पर होता होगा... लोर पोंछने अऊर करम कूटने के लिए... हम देखे हैं अईसने एगो बाबू साहब, एही से जानते हैं… अमीरी का कबर पर जलमने वाला घास बहुत्ते जहरीला होता है...
    करन बाबू चित्रगुप्त महाराज का किरपा बना रहे आपका ऊपर, एही प्रार्थना है!!

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  3. aaapka yah deshil bayana lekh padh kar banut hi achcha laga.bhash ko bhi samajhne me koi kathinaai nahi hui.
    kyon ki ham is boli se pari chit hain.
    poonam

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  4. perfect desil bayana.

    computer se hindi font delete ho gaya hai isliye angreji me likhana pad raha.

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  5. बड़ा ज़ोरदार कहानी और लाजवाब देसिल बयना।

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  6. @ मनोज कुमार,
    एक बार फिर कहता हूँ कि यह सब आपकी प्रेरणा का ही प्रतिफल है........ धन्यवाद !

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  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  8. @ चला बिहारी.....

    सलिल जी,

    मुझे इतना विश्वास तो था कि आप आयेंगे जरूर.... ! आप न केवल आये, बल्कि पढ़े और कथा की आत्मा का उदघाटन कर दिया..... ! आपकी टिपण्णी के बिना यह प्रस्तुति पूर्ण नहीं मानी जा सकती !! लेकिन कुछ हो जाए..... अब तो धन्यवाद नहीं कहूँगा !!!

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  9. @ झरोखा
    पूनम जी,

    आपका पुनरागमन हृदय को आह्लादित कर रहा है... आप रूठी हुई थी या व्यस्त ! और यह जान कर प्रसन्नता और बढ़ गयी कि आप उस अंचल की बोली से परिचित हैं !!! बहुत-बहुत धन्यवाद !!!!

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  10. @ अजय कुमार,
    अजय जी,
    हमें तो अब आपकी टिपण्णी की आदत सी हो गयी है ! इतने समय से टिप्पणियों का अबाध सिलसिला बनाए रखने के लिए धन्यवाद !!!!

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  11. @ संगीता स्वरुप,

    आपकी प्रतिक्रिया के बिना इस ब्लॉग का कोई भी पोस्ट अधूरा है....... !!! धन्यवाद स्वीकारें !!!!

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  12. @ हरीश जी,
    भाव अनूठो चाहिए, भाषा कोऊ होए ! और आप ने तो सिर्फ लिपि ली है अंग्रेजी की....... ! मगर मैं 'देसिल बयना' पर आप से विस्तृत मार्ग-दर्शन चाहता हूँ !!! धन्यवाद !!!!!

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  13. देसिल बयना के बहाने इतनी रोचक पोस्ट पढने को मिली, शुक्रिया।
    आपकी लेखनी यूँ ही रस बरसाती रहे।
    --------
    पॉल बाबा की जादुई शक्ति के राज़।
    सावधान, आपकी प्रोफाइल आपके कमेंट्स खा रही है।

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  14. @ जाकिर अली रजनीश,
    शुक्रिया जाकिर भाई !

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  15. E desil bayna to hasaya b aur sikhaya b.....desil bayna to kuch khas he hai..kahawat ke sath sath inni achi sikh jo mil rai hai...
    Karan Ji ego bat janna chahenge e ap logon ka nam kaha se dhund late hai?? sacho ka nam hota hai ya kalpnik hai..jo b hai humko nam b bahute pasand aata hai..aur is bar to tasvir jo apne lagai hai wo b bahute achi lagi khaskar chikhti chilati yuvti ki pic :)
    Dahi Bhat ke sath desil bayna bahute majedar aur sandar raha...
    Bhore Bhor apka desil bayna padh man prasan ho gaya...Dhanyawad..

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  16. @ रचना,

    शुक्रिया रचना जी ! अब तो आप पर्व-त्यौहार के तरह छट्ठे-छमासे ही ब्लॉग पर आती हैं ! बांकिये आपका प्रोत्साहन से तो ऐसा लगता है कि हम एगो 'नाम-करण कार्यालय' ही खोल लें.... !

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  17. @ रचना,

    शुक्रिया रचना जी ! अब तो आप पर्व-त्यौहार के तरह छट्ठे-छमासे ही ब्लॉग पर आती हैं ! बांकिये आपका प्रोत्साहन से तो ऐसा लगता है कि हम एगो 'नाम-करण कार्यालय' ही खोल लें.... !

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  18. @ करण जी,
    देसिल बयना की कल्पना, कथा सृजन और प्रस्तुति दर्शाती है कि आप स्वयं एक समर्थ हस्ताक्षर हैं। पाठकों की टिप्पणियाँ इसका प्रमाण हैं। पूर्व में देसिल बयना के एक अंक को आँच पर लिया गया था। उठाए गए विन्दुओं पर आपने ध्यान दिया और बाद के अंको में सुधार देखने को मिल रहा है। आपने सुझावों का मान रखा, यह मेरे लिए बहुत खुशी की बात है। आपकी लेखनी उत्कर्ष की दिशा में है। मेरी शुभकामनाएं सदा आपके साथ हैं।

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  19. यह देसिल बयना बहुत अच्छा लगा। लोकोक्ति को बहुत सुन्दर कथा में पिरोया है।

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  20. लाजवाब देसिल बयना।

    यह देसिल बयना बहुत अच्छा लगा। इसे बहुत सुन्दर कथा में पिरोया है।

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  21. राम राम, पड़ते पड़ते दही भात मंगवा लिए हैं .... टेबुल पर रखा है पर हाथ है की पेट से हटता ही नहीं.........

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  22. देसिल बयना के बहाने इतनी रोचक कहानी पढने को मिली, शुक्रिया।

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  23. बहुत बढ़िया रहा यह देसिल बयना का अंक। कहनी सरस और रोचक है।

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  24. देसिल बयना की कल्पना, कथा सृजन और प्रस्तुति दर्शाती है कि आप स्वयं एक समर्थ हस्ताक्षर हैं।

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  25. शानदार पोस्ट!
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार में अपका योगदान सराहनीय है।

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  26. @ दीपक बाबा,
    का बात है बाबा जी, जब दही भात नहीं आया... आप हमरो ब्लॉग पर भी नहीं आये थे ! खैर आ गए तो हम आपका स्वागत दही-भात से करते हैं. और अआगे भी आते रहिएगा, इहो निवेदन करते हैं. धन्यवाद !!

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  27. @ जुगल किशोर जी,
    आपने 'देसिल बयना' को सराहा .... हमारा सौभाग्य ! आपका आभारी हूँ !!

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  28. @ राजभाषा हिंदी,
    बस महारानी ! जैसे भी हो आपकी सेवा में कलम घिस देते हैं !! धन्यवाद !!!!

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  29. अंत मे आगत-अनागत सभी पाठकों को हृदय से धन्यवाद !!!

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  30. कहानी की नीति शिक्षा सब एक तरफ, आपकी प्रस्‍तुति लाजवाब है. बार-बार पढ़ कर भी फिर से पढ़ने की जी चाहता है.

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आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।