गुरुवार, 8 जुलाई 2010

आँच-25 :: गीत का कायिक विवेचन

आँच-25 :: गीत का कायिक विवेचन

मेरा फोटोआचार्य परशुराम राय

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आँच के अठारहवें अंक पर दिनांक 27-05-2010 की एक टिप्पणी इस अंक की पीठिका है। इसके पहले कि मैं आगे बढूँ, मैं यह बहुत दुःखी मन से कह रहा हूँ कि किसी व्यक्ति के विषय में इस प्रकार की टिप्पणी करना कि ‘आपकी समझ नहीं है’, अत्यन्त अशोभनीय है, वह भी उस व्यक्ति के बारे में जिससे आपका कोई परिचय न हो। दुःख इसलिए नहीं कि मेरे लिए उक्त टिप्पणी की गयी है, बल्कि इसलिए कि एक सभ्य, सुसंस्कृत और शिक्षित व्यक्ति की अपने समाज के प्रति यही सोच है, ऐसे शब्द हैं। किसी विषय पर हमारे मतभेद हो सकते हैं। लेकिन ऐसे मतभेद के चलते किसी के प्रति आप इस प्रकार की टिप्पणी करना कि ‘आपकी समझ नहीं है’ या किसी व्यक्ति के प्रति अमर्यादित अपशब्द का प्रयोग करना केवल अपने अहंकार को तुष्ट करने के लिए कहाँ तक उचित है, इसका निर्णय मैं पाठकों तथा लेखकों पर छोड़ता हूँ।

अब आते हैं अपने मुख्य विषय पर कि गीत के ‘मुखड़े’ को बन्द माना जाय या न माना जाय। इस मुद्दे पर कुछ प्रसिद्ध गीतकारों और साहित्यकारों से भी चर्चा की कि हमारी सोच उनसे मेल खाती है या नहीं। कुछ निरुत्तर होकर सहमत हो गये। तो कुछ न सहमत हुए और न ही असहमत। पर कुछ ने असहमति भी जताई। इस चर्चा के दौरान जो परिणाम आए हैं उनका विवरण संक्षेप में नीचे दिया जा रहा है-

1. इस बात पर वे सभी सहमत मिले कि हिन्दी साहित्य में गीतों की गणना कविताओं के अन्तर्गत की गयी है।

2. गीतों की कायिक-संरचना (Anotomy) पर कोई शास्त्रीय विवेचन नहीं हुआ है (हो सकता है हुआ हो लेकिन जिनसे चर्चा हुई उन्हें और मुझे पता नहीं है)।

3. गीतों को गाते समय मुखड़े की पुनरावृत्ति अवश्य होती है लेकिन उसके अर्थ की पुनरावृत्ति या अन्विति हर ‘बन्द’ के बाद नहीं होती।

4. गीतों के रचनागत अनुशासन के स्वरूप और उस पर शास्त्रीय विवेचन का अभाव है।

आगे विवेचन करने से पहले कुछ गीतों की पंक्तियाँ उद्धृत करते हैं:-

1. ‘घर से मेरी छुट्टी हो गयी,

घरवालों से कुट्टी हो गयी,

देहरी के भीतर का झगड़ा

पहुँच गया चौपाल में।

मेरे घर के सारे बच्चे

बोल रहे जनतंत्री भाषा।

सबको याद ‘डिमोक्रेसी’ की

लिंकन वाली वह परिभाषा।

राम राज्य को सबने जानी

वह थी कोई फिल्म पुरानी

मजा नहीं बढ़कर रिमिक्स से

बाबा के सुरताल में।

२. बदरौंही धूप झुलनी पर झूले।

ईंगुर की एँच-पेंच भौहो को छू ले।।

पिंडली भर काँदों में गोइँड़े की निंदाई।

घंटो तक एक टक, एक चित निहुराई।

माथे का आसमान अँचरा पर झूले।।

३. बालियाँ धान की।

गदराये यौवन की मार से झुकीं-झुकीं,

घूँघट में मुख डाले अवनत चुपचाप।

अपने ही चरणों पर निर्निमेष रुकीं-रुकीं।

मन ही मन करतीं नव सिरजन का जाप।

सहमीं हैं मेड़ पर सुनकर

पदचाप बूढ़े किसान की

बालियाँ धान की।।

तन पर है सूरज की किरणों का लेप,

पुरवा के छुवन से मन में अनुराग।

कोख में कपूर बनी चाँदनी की झेंप,

सिन्दूरी संध्या से चमक उठी माँग।

सुधियों में बीत रही रात जाग-जाग,

बिरही खलियान की।

बालियाँ धान की।।

(उपर्युक्त गीतों के अंश श्री शिव शरण दुबे के हैं जो ‘केन्द्र में नवगीत’ पुस्तक से साभार उद्दृत किए गए हैं।)

४. अगहन में।

चुटकी भर धूप की तमाखू,

बीड़े भर दुपहर का पान,

दोहरे भर तीसरा प्रहर,

दाँतों में दाबे दिनमान,

मुस्कानें अंकित करता है

फसलों की नई-नई उलहन में।

सरसों के छौंक की सुगन्ध,

मक्के में गुँथा हुआ स्वाद,

गुरसी में तपा हुआ गोरस,

चौके में तिरता आह्लाद,

टाठी तक आए पर किसी तरह

एक खौल आए तो अदहन में।

5. और बरसो मेघ।

फिर कगारों पर

नदी को टूटने दो

फूटने दो, गह्वरों पर

निर्झरों का वेग।

अभी खेतों के कलेजों में

धँसी है आग,

फाँस माटी में बचे न जेठ की,

फिर उछलने दो

हिलोरें मेड़ तक,

फिर कृषक की आँख फूले केतकी।

फिर टपकती ओरियों

के तले गोबर के कटोरे सजें

अंकुर बीज, पूजा नेग।

(उपर्युक्त दोनों गीतांश स्व. श्री श्याम नारायण मिश्र द्वारा विरचित एवं ‘केन्द्र में नवगीत’ पुस्तक में प्रकाशित गीतों से साभार उद्धृत किए गए हैं।)

उपर्युरक्त गीत-1 में मुखड़ा चार चरणों का है, लेकिन गाते समय केवल ‘बन्द’ के अन्त में अन्तिम दो चरणों की ही पुनरावृत्ति होगी। दूसरे गीत में मुखड़ा दो पंक्क्तियों का है। गाते समय पहले चरण की पुनरावृत्ति होगी। तीसरे और चौथे गीत में मुखड़े एक-एक चरण के हैं-‘बालियाँ धान की’ और ‘अगहन में’ जिनकी गायन में पुनरावृत्ति संभव है। पाँचवें गीत के मुखड़े में पाँच चरण हैं, जिनमें से गायन में अन्तिम दो चरणों की पुनरावृत्ति होगी।

गायनकला में जिस पंक्ति की हर अन्तर के बाद पुनरावृत्ति होती है उसे ‘टेक’ या ‘स्थायी पद’ के नाम से अभिहित किया गया है और ‘टेक’ के अलावा अन्य चरणों को अन्तरा के नाम से। यदि सूर, तुलसी, मीरा, कबीर आदि के पदों को लें तो वहाँ ‘बन्द’ आदि की अवधारणा फिट नहीं होती। ‘बन्द’ शब्द गजल आदि से आयातित है। यह फारसी का शब्द है। गजल में चार-छह शेरों के पद को बन्द कहा जाता है। शेर-ओ-शायरी में जो अन्य विधान हैं वह हैं मिसरा और मक़ता। मिसरा प्रथम शेर की पहली अर्धाली होता है जबकि मक़ता अन्तिम शेर को कहते हैं, जिसमें शायर का अपना नाम भी आता है। हिन्दी गीतों के शास्त्रीय विवेचन में ‘बन्द’ का कोई विधान देखने को नहीं मिलता। स्वातंत्र्योत्तर मंचीय काव्य पाठ के माध्यम से हो सकता है यह शब्द मुशायरे की परम्परा से गीतों के साथ जुडा हो। इसी प्रकार, मंचीय पाठ में प्रयुक्त ‘मुखड़ा’ की यही स्थिति है। यह शेर-ओ-शायरी की उपज नहीं है और गीतों के शास्त्रीय विवेचन में भी कोई स्थान नहीं रखता लेकिन इसका प्रयोग दोनों में बहुतायत हो रहा है। हालांकि इस शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द ‘मुख’ से हुई है।

आज के संदर्भ में, उपर्युक्त उदाहरणों और विवेचन से यह तो स्पष्ट है कि तथाकथित मुखड़े का गीतों में स्वतंत्र अस्तित्व है और उनका स्वतंत्र अर्थ है। अतएव उसे एक ‘बन्द’ मानना चाहिए। क्योंकि उसके अर्थ की हर एक ‘बन्द’ के बाद अन्विति नहीं होती। हाँ, चाहें तो उसे ‘मुखड़े का बन्द’ नाम दे सकते हैं, भले ही संगीत शास्त्र में उन्हें अलग-अलग नाम से जाना जाता हो।

इस अंक के माध्यम से गीतकारों से अनुरोध है कि विभिन्न गीतों को और इनमें अब तक हुए परिवर्तनों को दृष्टि में रखकर इनके अवयवात्मक चिन्तन का शास्त्रीय निरूपण करें, यदि अब तक न हुआ हो तो।

9 टिप्‍पणियां:

  1. विवेचन और विश्लेषण दोनों ही बहुत बढ़िया है!

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  2. आप की रचना 9 जुलाई के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपने सुझाव देकर हमें प्रोत्साहित करें.
    http://charchamanch.blogspot.com
    आभार
    अनामिका

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी प्रस्तावना से सहमत हूँ. ब्लॉग जगत में यह आम बात है. वास्तव में बिना शक्ल देखे, बिना सामने वाले व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से जाने हम उत्तेजित होकर प्रतिक्रिया देने लगते हैं. इस बात से तो आप भी सहमत होंगे कि बिना मुझसे मिले मेरे विषय में आपकी प्रतिक्रिया और मुझसे मिलकर मेरे विषय में आपकी अभिव्यक्ति अलग अलग होगी.
    ख़ैर आगे की बातें चुँकि ऐसे विषय से संबंधित है जिसकी मुझे जानकारी नहीं, अतः मेरी टिप्पणी उचित नहीं होगी.

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  4. बहुत अच्छी विवेचना। सार गर्भित!

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  5. बहुत अच्छा विश्लेषण...अच्छी विवेचना...नयी जानकारी मिली.

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  6. विवेचना तथ्यपरक है और विश्लेषण तार्किक है।

    कारण भले ही कुछ रहा हो, गीत, गजल और शेर-ओ-शायरी के बारे में उपयोगी जानकारी मिली।

    प्रायः हम सब, कभी-कभी, आधी-अधूरी जानकारी, जो प्रचलन में होती है, के आधार पर ही अपने आग्रह निर्मित कर लेते हैं।

    गीत, गजल और शेर-ओ-शायरी के उपयुक्त विवेचन के लिए आचार्य राय जी को आभार।

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  7. किसी व्यक्ति के प्रति अमर्यादित अपशब्द का प्रयोग करना केवल अपने अहंकार को तुष्ट करना ही है ....पर ऐसी क्या बात हो गयी मनोज जी ....??

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  8. गीत का एक कायिक विवेचन यह भी - गीत क्या होते हैं---

    गीत भला क्या होते हैं ,
    बस एक कहानी है ।
    मन के सुख -दुख ,
    अनुबन्धोंकी-
    कथा सुहानी है ।
    भीगे मन से
    सच्चे मन की,
    कथा सुनानी है।....गीत भला क्या...॥

    कहना चाहे
    कह न सके मन,
    सुख-दुख के पल न्यारे,
    बीते पल जब देते दस्तक,
    आकर मन के द्वारे।
    खुशियों की मुस्कान
    औ गम के,
    आंसू की गाथा के;
    कागज़ पर ,
    मन की स्याही से-
    बनी निशानी है ।---गीत भला.....॥

    कुछ बोलें या-
    चुप ही रहें;
    मन यह द्वन्द्व समाया ।
    अन्तर्द्वन्द्वों की अन्तस में
    बसी हुई जो छाया ।
    कागज़ -कलम
    जुगल बन्दी की
    भाषा होते हैं ।
    अन्तस की हां-ना, हां-ना की
    व्यथा सुहानी है । ---गीत भला....॥


    चित में जो
    गुमनाम खत लिखे,
    भेज नहीं पाये ।
    पाती भरी गागरी मन की,
    छ्लक छलक जाये ।

    उमडे भावों के निर्झर को
    रोक नहीं पाये :
    भाव बने
    शब्दों की माला,
    रची कहानी है ।

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