शनिवार, 31 जुलाई 2010

प्रेमचन्द - एक युग-प्रणेता

प्रेमचन्द - एक युग-प्रणेता


आचार्य परशुराम राय

प्रेमचन्द भारतीय समाज के कुशल चितेरे और मनोवैज्ञानिक हैं। इनकी रचनाओं के पात्र स्वतंत्रता के तिरसठ वर्ष बाद भी उसी संख्या में मिलते हैं। जब हम उनको पढ़ते हैं तो लगता है कि ग्रामीण भारत को समग्रता में देख रहे हैं।

आज प्रेमचन्द की एक सौ तीसवीं वर्षगाँठ है। मनोज कुमार जी की इच्छा थी कि उनके जन्म दिवस पर प्रेमचन्द के विषय में ब्लाग पर लिखा जाये। वैसे मेरी हिन्दी की शिक्षा मात्र बारहवीं कक्षा तक ही रही। किन्तु मेरे मित्र मेरे ऊपर जरूरत से कहीं ज्यादा विश्वास करते हैं। अतएव उनके विश्वास को ठेस पहुँचाना मेरे बस की बात नहीं। पर यह भी उतना ही सत्य है कि हिन्दी उपन्यास और कहानी के एक युग प्रणेता के विषय में एक अनाड़ी का विचार व्यक्त करना हास्यास्पद होने के अलावा कुछ नहीं है।

प्रेमचन्द को बहुत पढ़ा तो नहीं, किन्तु जितना पढ़ा और गुना है उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि इतना सजग समाज चेता उपन्यासकार और कहानीकार हिन्दी में खोज पाना कठिन ही नहीं असम्भव सा है। यही कारण है कि हिन्दी उपन्यास और कहानी साहित्य के इतिहास में इनके काल को 'प्रेमचन्द युग' की संज्ञा दी गयी है। उपन्यास और कहानियों के अलावा पत्रकारिता के क्षेत्र में भी इन्होंने कार्य किया।

इस महान कथाकार के पूर्व साहित्य की ये विधाएँ मात्र मनोरंजन के लिए थीं। प्रेमचन्द ने इन्हें सामाजिक जीवन धारा से सम्पृक्त किया और 'सेवासदन' इनकी वह प्रौढ़ कृति है जहाँ कथा साहित्य में एक नए युग का श्रीगणेश देखा जाता है। इनके उपन्यास और कहानियों में समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व है, चाहे अभिजात वर्ग हो या उच्च वर्ग हो, चाहे मध्यम वर्ग और दलित वर्ग हो। रूढ़ियों की छाया में उनके मानसिक विकारों और धार्मिक भावनाओं के शरणागत शोषण के विकृत व्यवहारों आदि का सजीव चित्रण देखने को मिलता है। एक ओर उन्हें होरी आदि के शोषण की चिन्ता है, तो दूसरी ओर रायसाहब के शोषण की भी। हर वर्ग अपने ऊपर वाले वर्ग से शोषण का शिकार है। यदि एक वर्ग अपने को दुखी और शोषित समझता है, तो शोषक वर्ग उससे परे नहीं है। हर वर्ग के अपने-अपने आदर्श के बहाने हैं। उनकी अलग-अलग कुण्ठाएँ हैं। प्रेमचन्द उन सबके प्रति सजग हैं। समग्र भारतीय समाज उनका पात्र है। उनके मनोवैज्ञानिक चित्रण पाठक को झकझोरते हैं।

अपने जीवन काल में वे विभिन्न सुधारवादी और पराधीनता की स्थितिजन्य नव जागरण प्रवृत्तियों से प्रभावित रहे हैं, यथा - आर्यसमाज, गाँधीवाद, वामपंथी विचारधारा आदि। लेकिन समाज की यथार्थगत भूमि पर उसकी सहज प्रवृत्ति में ये प्रवृत्तियाँ जितनी समा सकती है, उतनी ही मिलाते हैं, ठूस कर नहीं भरते। इसीलिए चित्रण में जितनी स्वाभाविकता प्रेमचन्द में देखने को मिलती है, अन्यत्र दुर्लभ है। 'गोदान' में तो यह अपनी पराकष्ठा पर पहुँच गई है। यदि प्रेमचन्द युग का आरम्भ 'सेवासदन' में है, तो उसका उत्कर्ष 'गोदान' में। आदर्शों और विचारधाराओं को वे अपने पात्रों पर थोपते नहीं हैं, बल्कि अन्तर्मन या अन्तरात्मा की आवाज की तरह स्वाभाविक रूप से प्रस्फुटित होने देते हैं। 'सेवासदन' और 'कायाकल्प' में जहाँ साम्प्रदायिक समस्या उठाई गई है, वहीं 'सेवासदन', 'रंगभूमि', 'कर्मभूमि' और 'गोदान' में अन्तर्जातीय विवाह की। समाज में नारी की स्थिति और अपने अधिकारों के प्रति उनकी जागरूकता इनके लगभग सभी उपन्यासों में देखने को मिलती है। 'गबन' और 'निर्मला' में मध्यम वर्ग की कुण्ठाओं का बड़ा ही स्वाभाविक और सजीव चित्रण किया गया है। हरिजनों की स्थिति और उनकी समस्याओं को 'कर्मभूमि' में सर्वोत्तम रूप से उजागर किया गया है।

अपनी कहानियों में प्रेमचन्द ने अपनी स्वाभाविक भूमि की विरासत को वैसे ही सुरक्षित रखा जैसे अपने उपन्यासों में। उनके सजग द्रष्टापन की उपस्थिति वहाँ भी है। वे 'कफन' के घीसू और माधव हों या 'ईदगाह' का हामिद हो या 'बूढ़ी काकी', उनकी यथार्थ मानसिकता के प्रति प्रेमचन्द जी पूरी तरह सजग हैं। चाहे हामिद ने भले ही अपनी तार्किक प्रतिभा से अपने चिमटे को अन्य बच्चों के खिलौनों से श्रेष्ठ सिद्ध् कर दिया हो, लेकिन उन खिलौनों के प्रति उसकी ललक प्रेमचन्द से छुपी नहीं है। घटनाक्रम की स्वाभाविकता का कोई जवाब नहीं।

अपने जीवन काल में वे विभिन्न सुधारवादी और पराधीनता की स्थितिजन्य नव जागरण प्रवृत्तियों से प्रभावित रहे हैं, यथा - आर्यसमाज, गाँधीवाद, वामपंथी विचारधारा आदि। लेकिन समाज की यथार्थगत भूमि पर उसकी सहज प्रवृत्ति में ये प्रवृत्तियाँ जितनी समा सकती है, उतनी ही मिलाते हैं, ठूस कर नहीं भरते।

अपनी कुण्ठाओं को सुरक्षित रखने के लिए तर्क और आदर्श के बहाने ढूंढ लेने में वे उसी तरह समर्थ हैं, जैसे भ्रष्टाचारी अपने आचरण के लिए 'सेवा' शब्द का प्रयोग करते हैं। घीसू और माधव के पास अपने निठल्लेपन को सुरक्षा प्रदान करने के लिए एक सुदृढ़ तर्क है कि दिन-रात मेहनत करने वाले किसानों की दशा भी उनसे अच्छी नहीं है। उसके लिए वे मारे जाएँ या गाली खाएँ, उनको कोई अन्तर नहीं पड़ता। उसे वे अपने पुराने जन्मों के कर्मों के खाते में डालकर अपनी सुरक्षा कवच में निरापद सन्तोष की आभा से दीप्त रहते हैं।

प्रेमचन्द की भाषा पात्रों के अनुकूल सहज और सरल है। या यों कहना चाहिए कि कथा साहित्य के लिए इन्होंने हिन्दी भाषा को तराशा है। हाँ, अरबी, फारसी और देशज शब्द कहीं-कहीं पाठकों को उलझन में जरूर डाल देते हैं।

प्रेमचन्द भारतीय समाज के कुशल चितेरे और मनोवैज्ञानिक हैं। इनकी रचनाओं के पात्र स्वतंत्रता के तिरसठ वर्ष बाद भी उसी संख्या में मिलते हैं। जब हम उनको पढ़ते हैं तो लगता है कि ग्रामीण भारत को समग्रता में देख रहे हैं। हाँ, एक बात है कि नागरिक जीवनचर्या के चित्रण का इनकी रचनाओं में अभाव सा है। कहीं-कहीं यह स्वाभाविक रूप से आ भी गया है, तो वह नही के बराबर है।

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अगली प्रस्तुति रात आठ बजे करण समस्तीपुरी द्वारा

 

11 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेमचन्द भारतीय समाज के कुशल चितेरे और मनोवैज्ञानिक हैं।
    isme koi sandeh nahi hai.

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  2. हिन्दी उपन्यास और कहानी साहित्य के इतिहास में इनके काल को 'प्रेमचन्द युग' की संज्ञा दी गयी है।
    ... Premchand ka sahitya aaj bhi utna hi maulik aur prasangik hai jitna ki unke samay mein...
    esmen koi sandeh nahi ki we ek yug sarjak the..
    Prastuti ke liye Haardik shubhkamnayne

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  3. प्रेमचंद की उत्कृष्ट रचनाओं पर आपकी लेखनी को नमन ....हर उपन्यास और कहानी को बहुत सुन्दर तरीके से विश्लेषित किया है

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  4. Harish ji, Kavita Ravat ji, Rashmi Prabha ji evam Sangita Swarup ji,

    Protsahan ke liye sadhuvad.

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  5. मुंशी प्रेम चंद जी मेरे प्रिये लेखक रहे हैं और उन पर आपने इतना कुछ और इतना अच्छा लिखा आभारी हूँ.

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  6. सरल तरीके से अपनी बात कहने में माहिर थे प्रेमचंद जी ।

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  7. अपने जीवन काल में वे विभिन्न सुधारवादी और पराधीनता की स्थितिजन्य नव जागरण प्रवृत्तियों से प्रभावित रहे हैं, यथा - आर्यसमाज, गाँधीवाद, वामपंथी विचारधारा आदि। लेकिन समाज की यथार्थगत भूमि पर उसकी सहज प्रवृत्ति में ये प्रवृत्तियाँ जितनी समा सकती है, उतनी ही मिलाते हैं, ठूस कर नहीं भरते।
    युग प्रणेता को नमन!

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  8. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 01.08.10 की चर्चा मंच में शामिल किया गया है।
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  9. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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