शुक्रवार, 5 मार्च 2010

त्याग पत्र : भाग 19

पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, "राघोपुर की रामदुलारी का परिवार के विरोध के बावजूद बाबा की आज्ञा से पटना विश्वविद्यालय आना ! फिर रुचिरा-समीर और प्रकाश की दोस्ती ! रामदुलारी अब पटना की उभरती हुई साहित्यिक सख्सियत है ! गाँव में रामदुलारी के खुले विचारों की कटु-चर्चा होती है ! रामदुलारी से प्रकाश की और रुचिरा से समीर की मित्रता प्रगाढ़ होती जाती है ! शिवरात्रि में रामदुलारी गाँव आना और घरवालों द्वरा शादी की बात अनसुनी करते हुए शहर को लौट जाना ! फिर वापस आना !अब पढ़िए आगे !!

-- मनोज कुमार

रामदुलारी गांव में ही रुक गई थी। अपने भावी जीवन की कल्पना और विगत जीवन की विवेचना में उसका मन डूबा रहता। मन के किसी कोने से गायक बाहर निकल पड़ता। कुछ खास पलों की रेतों को बिखरा कर ... उसे निहारता प्रतीत होता। अनायास ही उसकी मनोगत तुलना बांके बिहारी से होने लगती। इन सब विचारों के मध्य कभी-कभी मन के किसी परत में यह विचार भी आता कि उसने निर्णय ग़लत तो नहीं ले लिया। कई घटनाएँ उसकी इच्छाओं के विपरीत घटती गई। फिर वह अतीत में डूब जाती। ....

आज रामदुलारी के जीवन में एक और परिवर्तन आने वाला है। हरेक कन्या को इस दिन की लालसा होती है, जब माता-पिता उसके हाथ पीले करते हैं। आज रामदुलारी को देखने लड़के वाले आने वाले हैं। मैय्या उसे सुबह से ही संजाने संवारने में लगी थी। घर भर में सबसे अधिक प्रसन्नता उसे ही तो थी। जब-जब उसने शादी की बात आरंभ की थी तो रामदुलारी ने शादी के लिए मना ही कर दिया था। पता नहीं कौन देब इस बार माथा पर सवार थे जो मान गई।


मैय्या को जो भी आनंद आ रहा हो लेकिन रामदुलारी भी कोई आनंद कर रही हो, ऐसा वह स्वयं भी निश्चित नहीं कर पा रही थी । परन्तु निर्णय स्वयं उसका ही था। उसने मैय्या को वचन दे रखा था। उस वचन का पालन वह कर रही थी। पुत्री-धर्म निभा रही थी। बीच-बीच में छोटकी चाची की चुटकियों पर मुस्कराना भी शायद इसी धर्म का हिसा था

सूट-टाई में अपने परिजनों के साथ बांके सोफे पर बैठा था। उसके सामने शुभ्र-वर्ण की तन्वंगी थी। सुराहीदार गर्दन पर आभायुक्त मुखमंड़ल, पतले ओठ, सुतवां नाक और ठोढ़ी नुकीली। आंखों में सुबह की किरणों-सी चमक। जब उसने नाम-काम पूछा तो मिठास-युक्त स्वर से और भी चमत्कृत हो गया।

रामदुलारी ने भी उचटती दृष्टि से अपने भावी पति को देखा। बांके में हर वह गुण था जो एक कन्या अपने पति में देखना चाहती है। पर रामदुलारी का मन कहीं रिक्तता का अनुभव कर रहा था। उसके मन के किसी कोने में उस मनोहारी व्यक्ति की छवि छुपी थी जिसने प्रथम बार उसके हृदय तंतुओं में आह्लादकारी स्पंदन अत्पन्न किये थे।

रामदुलारी बैठक से जा चुकी थी। लड़के वालों के हाव-भाव से स्वीकार्यता की झलक आ रही थी। इशारों में ही बात शायद लेन-देन की हो रही थी। यूँ तो ठाकुर जी के घर कलियुग में भी कुबेर का खज़ाना खुला था फिर भी दहेज़ से किसका मन भरा है.... थोड़ा और हो जाता तो अच्छा था ! प्रजापति बाबू ने किसी को बोलने का मौका ही नहीं दिया। अपने बटुए से कुछ निकाल कर बांके बिहारी के हाथों पर रख दिया। तब तक मुरली बाबू भी पंडित जी को बुला कर आ गए थे। सुदिन सुमंगल शोध कर लगन निकला गया। अगले ही महीने विवाह की तिथि तय हो गयी।


छूट न जाए यह मंगल घड़ी ! रामदुलारी के पावन परिणय में आप सादर आमंत्रित हैं !! इसी ब्लॉग पर अगले हफ्ते !!! और हां यह मिथिलांचल की शादी है, सारे दृश्य प्रस्तुत किय जायेंगे!!!

पड़ाव

भाग ॥१॥, ॥२॥. ॥३॥, ॥४॥, ॥५॥, ॥६॥, ॥७॥, ॥८॥, ॥९॥, ॥१०॥, ॥११॥, ॥१२॥,॥१३॥, ॥१४॥, ॥१५॥, ॥१६॥, ॥१७॥, ॥१८॥, ॥१९॥, ॥२०॥, ॥२१॥, ॥२२॥, ॥२३॥, ॥२४॥, ॥२५॥, ॥२६॥, ॥२७॥, ॥२८॥, ॥२९॥, ॥३०॥, ॥३१॥, ॥३२॥, ॥३३॥, ॥३४॥, ॥३५॥, ||36||, ||37||

6 टिप्‍पणियां:

  1. ये अंक बहुत रोचक लगा और अगली कडी का इन्तज़ार है। धन्यवाद्

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  2. यह अंक अच्छा लगा.अब अगली कड़ी का इंतजार रहेगा.

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  3. अच्छा लगा.देखना है शादी वाले भाग मे क्या होता है.

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  4. बहुत अच्छा लगा! अब तो अगली कड़ी का बेसब्री से इंतज़ार है!

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