हाइकू
-- हरीश प्रकाश गुप्त
भरा उदधि
हुआ मधु विस्फोट
फूटी कविता ।
उतर गई
अन्तस में, नैनन
पढ़ कविता ।
मेरी कविता
मेरे मन का गीत
सुर संगीत
रात निठल्ली
सोई, दिन ने थक
बेबस ढोई ।
अचल बिंदु
के इर्द-गिर्द घूम
रहा बेसूध ।
गली-गली में
घूमा, ठहरा, सोचा
लेकिन कहॉं?
कुत्ता ले भागा
रोटी, नुक्कड़ वाले
भिखमंगे की ।
दरक गया
शीशे-सा जब देखा-
सच, सपना।
शीशे में देखा
चेहरा, अपना या
कुछ उनका ।
गली में शाम
नुक्कड़ में रोशनी
मीना बाजार ।
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