मंगलवार, 16 मार्च 2010

हरीश प्रकाश गुप्त के हाइकू

हाइकू

-- हरीश प्रकाश गुप्त


भरा उदधि

हुआ मधु विस्‍फोट

फूटी कविता ।


उतर गई

अन्‍तस में, नैनन

पढ़ कविता ।


मेरी कविता

मेरे मन का गीत

सुर संगीत


रात निठल्‍ली

सोई, दिन ने थक

बेबस ढोई ।


अचल बिंदु

के इर्द-गिर्द घूम

रहा बेसूध ।


गली-गली में

घूमा, ठहरा, सोचा

लेकिन कहॉं?


कुत्ता ले भागा

रोटी, नुक्‍कड़ वाले

भिखमंगे की ।


दरक गया

शीशे-सा जब देखा-

सच, सपना


शीशे में देखा

चेहरा, अपना या

कुछ उनका ।


गली में शाम

नुक्‍कड़ में रोशनी

मीना बाजार ।

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर हाईकु । हरीश प्रकाश जी को बधाई\ आपका भी धन्यवाद ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेहतरीन अभिव्यक्ति! नवरात्रि की आप को बहुत बहुत शुभकामनाएं.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया रहे हाइकू!
    भारतीय नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ!

    उत्तर देंहटाएं
  4. हाइकू बहुत अच्छा लगा, शुभकामनाएं.

    उत्तर देंहटाएं
  5. हरीश जी की "हाइकू" कविता बहुत ही अच्छी लगी.मेरी ओर से हरीश जी को बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  6. बढ़िया हाईकू ...तीन पंक्तियों के बाद थोड़ी जगह छुटी होती तो ज्यादा पढ़ने में आसानी होती ....

    हरीश प्रकाश जी को बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  7. aadarniy sir pahale main haiku se parichit nahi thi par ab samajhane lagi hun to bahut achcha lagane laga hai thodha thoda seekh bhi rahi hun bahut hi badhiya likha hai aapane.
    poonam

    उत्तर देंहटाएं
  8. अति सहारनीय प्रयास....... लिखिए और निखरते जायेंगे.

    उत्तर देंहटाएं

आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।