सोमवार, 1 मार्च 2010

पूर्वजों की रीत हूँ मैं....

होली की शुभ-कामनाएं और ईद-मिलाद-उल-नवी का मुबारकबाद ! कल सायं से ही मुझे अपनी एक कविता की अन्त्य-पंक्तियाँ "भूल बैठे सब जिसे वह पूर्वजों की रीत हूँ मैं....." याद आ रही है। कविता मैं इस ब्लॉग पर प्रकाशित कर चुका हूँ।
क्रूर काल का ग्रास हूँ !
किन्तु अमित प्रयास हूँ !!
स्वर्ण पत्रों पर लिखित,
स्वर्णिम अमर इतिहास हूँ !
भूल बैठे सब जिसे,
वह पूर्वजों की रीत हूँ मैं !
किस अधर का गीत हूँ मैं !!
सबब कुछ नहीं..... बस फागुन की बिदाई पर शहर के उपल-हृदय की उदासीनता साल रही थी। एक तो मौसम का गदराया यौवन उस पर ऋतुराज की विदाई-बेला............. तुर्रा दो दिन पहले ईद-मिलाद-उल-नवी का त्यौहार..... लेकिन न कोई उमंग, न कोई तरंग..... शहरी जीवन तो जैसे कटी पतंग। वो तो भला हो एसएमएस संस्कृति का कि होली के चंद सन्देश मिले तब हमारे अन्दर भी कुछ बसंती अहसास जागे। फिर भी कुछ सूनापन था..... नेपथ्य से कोई आवाज़ बार-बार दिल पर दस्तक दे रही थी......... भूल बैठे सब जिसे वह पूर्वजों की रीत हूँ मैं।
सब भूल बैठे लेकिन मर्मज्ञ नहीं। मेरा मतलब बेंगलूर के प्रसिद्द कवि ज्ञानचंद मर्मज्ञ से है। कल बोले तो २८ फरबरी को 'भाई-चारे' के इस अनुपम अवसर पर 'कविगोष्ठी एवं मुशायरा' का आयोजन करवा ही दिया महानुभाव ने। अचम्भा तो ये कि कुछ शायर ये नहीं जानते कि होली दरअसल कब है और कुछ कवि गण इस बात से नावाकिफ थे कि मिलाद कब है ? अलबत्ता कुछेक तो दोनों के ही बारे में कुछ भी पता नहीं था। श्रोताओं के बारे में तो पता नहीं............. !!!
लेकिन सांस्कृतिक सन्ध्या के से ही हमलोग अवसर की महत्ता जान चुके थे। अल्ला खैर मर्मज्ञ जी ने का और भगवान भला करे तम्मना साहब का। सरस संचालन कर रहे थे मर्मज्ञ जी। मंच पर आने वाली पहली कवयित्री थी मंजू बेंकट। लेकिन इस बार उन्होंने ने कोई कविता नहीं पढी। मूलतः मराठीभाषी मंजू बेंकट आज-कल हिंदी और उर्दू के साहित्यकारों और उनकी कीर्तियों का गहन अध्ययन कर रहे हैं। सभा का आग़ाज़ उन्होंने किया उर्दू अदब में 'तंजो-मिजहा' के अजीम शायर 'अकबर इलाहाबादी' के संक्षिप्त जीवन परिचय से। गागर में सागर भर लाई थी श्रीमती बेंकट। इलाहाबादी साहब पर तर्जुमान के दौरान उनकी एक शायरी का जिक्र किया ,
"हरीफों ने रपट लिखबाई है जाके थाने में !
कि अकबर नाम लेता है खुदा का इस जमाने में !!"
पहली बार लायंस क्लब का सभा-भवन तालियों की गरगराहट से गूंज उठा था।
एक से एक अशआर, ग़ज़ल, नज़्म, कविता और गीतों की पैमाइश पर श्रोता-वृन्द मंत्रमुग्ध थे। बात और है कि श्रोता थे ही कितने.... और जो थे पता नहीं मंत्रमुग्ध होना उनकी मजबूरी थी या कुछ और...!
भारतीय सेना में विंग कमांडर रहे श्री नारायण सिंघ समीर की न सिर्फ बन्दूक तेज है बल्कि कलम भी। क्या ग़ज़ब का कलाम सुनाया। पाकिस्तान के खिलाफ १९७१ की लड़ाई में लाहोर के समीपस्थ बोर्डर पर अपने कैम्प के दिनों का इतना रुचिर संस्मरण उन्होंने पेश किया कि हम बस एक-एक शब्द कानों के रास्ते पीते रहे। दरअसल सभा को होली के रंग में ढालने वाले फनकार कमांडर साहब ही थे। उन्ही दिनों का एक बकाया सुनाया उन्होंने। जंग ख़त्म हो गया था लेकिन सीमा पर तनाव व्याप्त था। पाकिस्तानी फौज ने बोर्डर पर बार के उपर से परदे डाल दिया था। बीच-बीच में कुछ सुराख थे जिससे सीमापार से भारतीय सेना की गतिविधियों पर खुफिया नजर रखी जा रही थी। उन्ही दिनों भारतीय शिविर में श्री सिंघ जी के नेतृत्व में एक मुशायरे का आयोजन हुआ। एक फौजी शायर ने मिसरा फेंका,
कभी चिलमन से ये झांके, कभी चिलमन से वो झांके !
कभी चिलमन से ये झांके, कभी चिलमन से वो झांके !
अर्ज़ किया है,
कभी चिलमन से ये झांके, कभी चिलमन से वो झांके !
जनाब आगे बढ़ ही नहीं रहे थे। इतने मे एक फौजी भाई ने आगे जोड़ दिया.....
'कभी चिलमन से ये झांके, कभी चिलमन से वो झांके !
लगा दो आग चिलमन में, ना ये झांके न वो झांके !!
फिर मजाहिया शायर 'उछार-पछार' ने हास्य की फुहार और व्यंग्य की धार से ठहाकों के एटम बोम्ब गिरवा दिए। क्या शुरुआत किया। दरअसल दौर-ए-हाज़िर पर जबर्दश्त व्यंग्य।
'जम्बूरी हूँ, कोई काम सरकारी नहीं करता !
मिले तो मुफ्त की खाता, खरीदारी नहीं करता !!
वफादारी दिखाओ तो सभी कुत्ता समझते हैं,
इसी से मैं किसी से अब वफादारी नहीं करता !!
मुझे भी 'स्वागत बसंत' कविता पढने का अवसर मिला। बुजुर्गों ने दाद से नवाज़ा। दुआएं दी। बहुत अच्छा लगा। फिर मेरे दिल में जो चुभ रहा था आखिर मैं ने पढ़ ही दिया..... 'भूल बैठे सब जिसे वह पूर्वजों की रीत हूँ मैं! उपस्थित समुदाय एक घड़ी के लिए सोचने तो लगे.... लेकिन ख़त्म होने पर खूब तालियाँ बजाई। शायद कह रहे हों, 'बहोत झेल लिया अब निजात मिली.... खुल के बजाओ ताली !!
ताली तो रमेश जोशी के व्यंग्य गीत पर भी खूब बजी थी।
"सोलह से पच्चीस वर्ष तक जब एक ब्रह्मचारी को कठोर तपस्या का फल मिला,
तब जा कर भगवान का सिंघासन हिला !
भगवान प्रकटे !
बोले,
भक्त भोले !
जो भी चाहो वर लेले।
भक्त बोला,
भगवान कुछ काम की चीज तो देके जाइए !
अजी मुझे वर नहीं वधु चाहिए......... !!"
सिलसिला तो घंटो तक जारी रहा। होली के रंग साहित्यकारों के संग खूब लूटे हमने। में तो सभा समाप्त होने से पहले ही वापस चल पड़ा। पूर्वजों की रीत शायाद सब भूल चुके हों लेकिन कुछ प्रथाएं तो अभी तक जीवित हैं हमारे घरों में। अगजा बोले तो होलिका-दहन था। होलिका जले या ना जले..... कचरी-बरी-बचका-बचका-तिलौरी-फुलौरी तो घर में बनेगा ही। आखिर 'सर्व नाशं समुत्पन्ने अर्धं त्यजति पंडितः !' चलो आधी प्रथा तो बची है। मानाकि काव्यानंद परमानद है लेकिन भोजनानंद तो जय-जय हो ! मैं चट-पटे स्वाद का लोभ संबरण नहीं कर पाया। लौट के आ गया घर और खूब छक कर पकवान तोड़े। आखिरखाना-पीना भी तो पूर्वजों की रीत है ! मैं भला इसे कैसे भूल सकता हूँ ???

10 टिप्‍पणियां:

  1. होली पर आपकी बेहतर रचना और होली, दोनों को हार्दिक शुभकामनाएं........www.sansadji.com

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  2. होली की हार्दिक शुभकामनाए इस आशा के साथ की ये होली सभी के जीवन में
    ख़ुशियों के ढेर सरे रंग भर दे ....!!

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  3. वाह जी...आपका आभार हमें बताने का...


    ये रंग भरा त्यौहार, चलो हम होली खेलें
    प्रीत की बहे बयार, चलो हम होली खेलें.
    पाले जितने द्वेष, चलो उनको बिसरा दें,
    खुशी की हो बौछार,चलो हम होली खेलें.


    आप एवं आपके परिवार को होली मुबारक.

    -समीर लाल ’समीर’

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  4. पढ़ कर कवि गोष्ठी का आनंद लिया....शुक्रिया

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  5. आपकी यह रचना अच्छी लगी,शुभकामनाएं.

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