होली का रंग
-- परशुराम राय
होली के रंग कैसे सजन
मस्त हमारा इतना तन-मन
साँस-साँस में झूमे फागुन
मदभरे नयन के कोर-कोर।
सर-सर पवन चले घर-बाहर
गाएँ भौंरे फूल-फूल पर
देती कोयल कूक ताल पर
चूम के डाली की हर पोर।
तरु-तरु की गदराई डालें
रंग-बिरंगी चूनर डाले
उषा सबेरे कलि गागर ले
भर गयी दिशा की छोर-छोर।
रंग भरे अपनी झोली में
भरता मद लोगों के मन में
देता वसंत आवाज हमें
धरा की थामे चूनर छोर।
लगता है पूरी जगती पर
डाल गया कोई मद पागल
जर्रा-जर्रा मदिरा पी कर
कर रहा बहुत सब ओर शोर ।
-- परशुराम राय
होली के रंग कैसे सजन
मस्त हमारा इतना तन-मन
साँस-साँस में झूमे फागुन
मदभरे नयन के कोर-कोर।
सर-सर पवन चले घर-बाहर
गाएँ भौंरे फूल-फूल पर
देती कोयल कूक ताल पर
चूम के डाली की हर पोर।
तरु-तरु की गदराई डालें
रंग-बिरंगी चूनर डाले
उषा सबेरे कलि गागर ले
भर गयी दिशा की छोर-छोर।
रंग भरे अपनी झोली में
भरता मद लोगों के मन में
देता वसंत आवाज हमें
धरा की थामे चूनर छोर।
लगता है पूरी जगती पर
डाल गया कोई मद पागल
जर्रा-जर्रा मदिरा पी कर
कर रहा बहुत सब ओर शोर ।
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