| आँच-5 |
-- हरीश प्रकाश गुप्त
रचनाकार के अन्दर धधकती संवेदना को पाठक के पास और पाठक की अनुभूति की गरमी को रचनाकार के पास पहुँचाना आँच का उद्धेश्य है। सृजन का मूल संवेदना है। इसी संवेदना से बीज ग्रहण कर रचनाकार अपने सृजन में जीवन का सत्य और यथार्थ मात्र ही प्रस्तुत नहीं करता वरन् उसमें समाज के संस्कार और आदर्श के रंग भी भरता है, अपनी कलम-तूलिका से सजा-संवारकर उसमें नयापन पैदा करता है और आकर्षक रुप प्रदान कर समाज के समक्ष प्रस्तुत करता है। उसके सृजन का उद्देश्य मात्र वाणी-विलास अथवा मनोरंजन ही नहीं होता वल्कि वह अपने समाज के संस्कारों व मूल्यों की रक्षा हेतु भी प्रवृत्त होता है। सामाजिक सरोकारों के प्रति रचनाकार की इसी निष्ठा का परिचायक है ‘देसिल बयना’। इस ब्लाग पर प्रति सप्ताह प्रकाशित होने वाले स्थाई कालम ‘देसिल बयना’ में रचनाकार ने स्थानिक लोक व्यवहार में सामान्यतः प्रचलित उक्तियों को विषय रूप में चुना है और अपनी सृजन प्रतिभा से उसके व्यापक अर्थ को कथारुप में पिरोकर प्रस्तुत किया है। उसका प्रयास कहाँ तक सफल है, इसकी पड़ताल के लिए आँच के इस अंक में करन समस्तीपुरी द्वारा लिखित ‘देसिल बयना’ के चौदहवें अंक ‘भला नाम ठिठपाल’ और पन्द्रहवें अंक ‘छोरा मालिक बूढ़ा दीवान........’ को लिया गया है।
लोकोक्तियों का संसार इस देश के जन-मानस में रचा-बसा है। ग्राम्य जीवन मे लोकोक्तियों की जड़ें बहुत गहरी है। यही कारण है कि भौगोलिक सीमाओं के भीतर इनका प्रयोग बहुत ही सहज है। अंचल का भोला मानुष इनके अर्थ को अपनी वाणी से विस्तार देने में भले ही समर्थ न हो, लेकिन अपनी सामान्य दिनचर्या की भाषा को इनसे समृद्ध बनाए हुए है।
सामान्य जन की तुलना में रचनाकार का दृष्टिकोण व्यापक होता है। क्योंकि वह अपनी संवेदनशीलता के जरिये जन-मन की उस भावभूमि को स्पर्श कर लेता है, जिसे आम जन भोगते तो हैं लेकिन जीते नहीं। संवेदना एक अनुभूति है जिसमें कुछ भी प्रक्षेपण सम्भव नहीं है। उसे सीमाबद्ध भी नहीं किया जा सकता। लेकिन जब किसी रचनाकार के सामने सीमारेखा खींच दी जाती है या उद्धेश्य विशेष के लिए वह स्वयं सीमाएं तय कर लेता है तो उसके लेखन की राह कठिन हो जाती है। इस दृष्टिकोण से हम देंखे तो देसिल बयना में लेखक की सीमाएं सुनिश्चित हैं- लोकोक्ति के विस्तार तक। तथापि रचनाकार ने कठिन राह पर चलते हुए लोकोक्तियों को अपनी कल्पनाशक्ति से कथारुप में संवारकर प्रस्तुत करने का यथासम्भव प्रयास किया है।
‘भलानाम ठिठपाल....’ का सारांश है कि बड़ा नाम या अच्छा नाम होने से ही कुछ नहीं होता। यदि उसका कुछ प्रभाव व्यक्तित्व पर हो तो ही सार्थक है, अन्यथा बड़े नाम का बोझ ढोने से क्या भला। इससे तो वह नाम फिर भी ठीक है जो स्वभाव के अनुरूप है, भले ही वह असुन्दर क्यों न हो। इसमें आवृत्त जीवन दर्शन की भी झलक मिलती है कि जो यथार्थ है उससे असंतोष रखने के बजाय उसी में जीवन का रस खोज लिया जाए।
जबकि ‘छोरा मालिक बूढ़ा दीवान........’ पूर्णतः व्यावहारिक जीवन में नेतृत्व की सफलता का मंत्र है। छोरा मालिक, अर्थात् नेतृत्व जो नियामक है, सत्ता है, वह युवा है और परिपक्व नहीं है। उसमें जो अनुभव होना चाहिए वह नहीं है और दीवान जो कार्यकारी है उसे ऊर्जावान होना चाहिए, वह बुर्जुवा है, ऊर्जाविहीन है। मतलब सब उलटा-पलटा। तो ‘मामला बिगड़े सांझ विहान’ अर्थात् कुछ भी सही होने वाला नहीं है, सिवाय बिगड़ने के।
दोनों रचनाओं में कथानक की रचना यथार्थपूर्ण है। कहानी शुरुआत से ही ग्राम्य जीवन का वास्तविक परिवेश निर्मित करती चलती है। लोकिक्तियाँ आचंलिक-मैथिली में है सो भाषा और शब्दावली पर लेखक ने विशेष सजगता बरती है। लेकिन भाषा का यही आत्यंतिक रूप अन्य भाषी समुदाय के लिए दुरूह है और इसके व्यापक प्रसार में बाधक है। स्थानिक प्रयोग में भाषा में लिंग त्रुटि बहुतायत देखी जाती हैं, लेखक ने यहाँ पर भी त्रुटिपूर्ण लिंग प्रयोग करते हुए पात्रों की भाषा में यथार्थ प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। बीच-बीच मे, कुछ जगह, सपाट वाक्य विन्यास भी हैं। ‘किरिन डूबते-डूबते......’ ‘चढ़ते अगहन कट्ठे मन फसिल.....’ ‘गये हथिया में जड़े से उलट गया......’ ‘जो रैय्यत हमरे बाबा पुरखा का पैर पूजता था......’ आदि में व्यंजना आकर्षक है जिसका लेखक ने कुशलता से प्रयोग किया है। पात्र, परिवेश और संवाद एक दूसरे के अनुकूल हैं तथा ये पाठक को अर्थ से जोड़ते हुए कथा को सजीव बना रहे हैं।
अभिव्यक्ति से रचनाकार की ग्राम्य जीवन के प्रति अच्छी समझ प्रकट होती है। वह दैनिक चर्या के सामान्य क्रिया-कलापों को स्वाभाविक रूप से चित्रित करता है, तो वहीं मिट्टी से उपजे संस्कारों की खुशबू भी सर्वत्र महकती दिखाई पड़ती है और गंवई रंग हर जगह बिखरा नजर आता है। दोनों रचनाओं का शिल्प समान है। ऐसा प्रतीत होता है कि एक प्रसंग समाप्त होते ही दूसरा प्रसंग शुरू हो गया हैं। कथा का साधारणीकरण बहुत सहजता से हुआ है। भाषा में प्रवाह तो है लेकिन रचनाकार कहीं कहीं पर वर्णनात्मकता के मोह का संवरण भी नहीं कर सका है। रचना में कुछ प्रसंगों ने विस्तार अधिक ले लिया हैं विशेष रूप से ‘भला नाम...’ के पूर्वार्ध में दूसरे और तीसरे पैराग्राफ में और ‘छोरा मालिक बूढ़ा दीवान.....’ के मध्य भाग में। हालाँकि रचनाओं में बिखराव तो नहीं है लेकिन कतिपय स्थानों पर कसाव की कमी भी दिखती है। तथापि रचनाएं अपना अर्थ सम्र्पेषित करने में सफल हैं और यदि सम्भावनाओं की सीमा में बंधे रचनाकार की कठिनाइयों को ध्यान में रखा जाए तो ये रचनाएं रचनाकार की क्षमता को प्रमाणित करती दृष्टिगत होती हैं।
इस के माध्यम से लेखक से अवश्य अनुरोध करूँगा कि यदि वह आंचलिक शब्दों को कोष्ठक में हिन्दी के मानक शब्दों से उन्हें इंगित कर दे, तो अन्य लोगों को, जो उस आँचलिक शैली से परिचित नहीं हैं, समझने में सुविधा होगी और रचना की दुरूहता का निराकरण हो सकेगा।
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