रविवार, 7 फ़रवरी 2010

भारतीय काव्यशास्त्र पर चर्चा

काव्यशास्त्र पर चर्चा

-परशुराम राय

नियतिकृतनियमरहितां हलादैकमयीमनन्यपरतन्याम्।

नवरसरुचिरां निर्मितिमादधती भारती कवेर्जयति।।

काव्यप्रकाशकार आचार्य मम्मट ने इसी कारिका से अपने ग्रंथ काव्यप्रकाश का मंगलाचरण किया है। काव्यशास्त्रके तत्वों को पाठकों तक पहुँचाने के लिए इसी कारिका से कवियों की वाणी, जो प्रकृति की सृष्टि के नियमों से रहित है, केवल आह्लादकारक है, किसी पर आश्रित नहीं है और नवरस से युक्त होकर काव्य सृजन को मनोरम बनाती है, का स्मरण करता हूँ।

मित्रों के बीच साहित्यिक गपशप के दौरान प्रायः काव्यशास्त्र पर चर्चा होती रही। इस ब्लाग के शुरू होने के बाद मनोज कुमार जी ने कई बार कहा कि इस पर भी कुछ लिखा जाए। किन्तु आलस्य और हिन्दी में सन्दर्भ ग्रंथों का अभाव बहुत बड़ी बाधाएँ हैं। साथ ही समय का अभाव और रुचि का खो जाना आग में घी जैसे काम करने लगे। परन्तु मनोज कुमार जी की विषय के प्रति जिज्ञासा और उनका प्रोत्साहन इस विषय पर कुछ लिखने के लिए प्रेरित करते हैं। अतएव सोचा कि कम से कम भारतीय काव्य शास्त्र के ऐतिहासिक पटल, काव्य के विभिन्न अंग- रस, छंद, अलंकार, रीति, गुण, दोष आदि की परिचयात्मक भूमिका ब्लाग के पाठकों के लिए दी जाए। वैसे भी अब मूल ग्रंथ धीरे-धीरे लुप्त हो रहे हैं। क्योंकि छात्र प्रश्नोत्तरियों से ही काम चला ले रहे हैं। मूल ग्रथों का अध्ययन करने की न उनमें सामर्थ्य है, न साहस और न ही रुचि। अतएव इनका प्रकाशन धीरे-धीरे बन्द हो रहा है।

इस शृंखला को शुरू करने के पहले हिन्दी में जिन ग्रंथों की आवश्यकता महसूस हुई, उनका प्रकाशन बन्द हो चुका है। इसके बाद मन में आया कि क्यों न उपलब्ध संस्कृत काव्यशास्त्रों को ही आधार बनाकर अपनी बात कही जाए। वैसे भी भारतीय या पौर्वात्य काव्यशास्त्र का पूर्ण विकास संस्कृत में ही मिलता है। वर्तमान काल में समीक्षा की धारा पाश्चात्य पद्धति पर चल पड़ी है।

पता नहीं इस विषय का चुनाव ब्लाग के पाठकों को पसन्द आएगा या नहीं। पर, आशा है यह कुछ लोगों में जिज्ञासा उत्पन्न करने में सहायक होगा और जो जिज्ञासु हैं उनमें थोड़ा-बहुत आश्चर्य उत्पन्न करेगा।

आगे बढ़ने के पहले आचार्यों की सर्वसम्मत दृष्टि में काव्यशास्त्र की परिभाषा करना अच्छा रहेगा। साथ ही यह जानना कि इस शास्त्र को किस-किस नाम से जानते हैं।

काव्य के तत्वों की व्याख्या या काव्य के विज्ञान को स्पष्ट करने वाले शास्त्र को काव्यशास्त्र कहते हैं। या जिस शास्त्र से काव्य के सौंदर्य को समझा जा सके उसे काव्यशास्त्र कहते हैं, या काव्य के विभिन्न अंगों और आयामों को सम्यक रूप से प्रतिपादित करने वाले या इनकी विवेचना करने वाले शास्त्र को काव्यशास्त्र कहते हैं।

काव्यशास्त्र के लिये कई नाम मिलते हैं, यथा- काव्यालंकार, अलंकार शास्त्र, सौन्दर्यशास्त्र, काव्यसौन्दर्यशास्त्र, साहित्यशास्त्र और क्रियाकल्प। प्रत्येक नाम के पीछे आचार्यों ने अपनी-अपनी युक्तियाँ दी हैं। इन युक्तियों पर चर्चा करना यहाँ आवश्यक प्रतीत नहीं होता, अतएव इस विषय को यहीं छोड़ना ठीक रहेगा। भारतीय काव्यशास्त्र की लगभग दो हजार वर्षों की एक लम्बी ऐतिहासिक यात्रा है। इसमें कई वादों (Isms) की आधारशिलाएँ देखने को मिलती हैं। ऐतिहासिक चर्चा के दौरान इस पर आगे प्रकाश डाला जाएगा।

हमारे यहाँ भारतीय परम्परा या सोच है कि सभी विद्याओं, कलाओं और शास्त्रों का उद्गम वेदों से हुआ है और काव्यशास्त्र के साथ भी ऐसा ही है। वैसे छः वेदांग माने गए हैं- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष। इसमें साहित्य या साहित्यशास्त्र का नाम नहीं है। लेकिन यह सत्य है कि साहित्यशास्त्र जिन काव्यांगों की विवेचना करता है, यथा गुण, रीति, अलंकार आदि ये सभी वेदों में उपलब्ध हैं।

लेकिन निरुक्तकार महर्षि यास्क ने निरुक्त के तीसरे अध्याय के तीसरे पाद में अपने पूर्ववर्ती आचार्य गार्ग्य के मत का उल्लेख करते हुए उपमा अलंकार की निम्नलिखित परिभाषा की हैः

1. ‘‘यद् अतत् तत्सदृशं तदासां कर्म इति गार्ग्यः

2. “ज्यायसा वा गुणेन प्रख्याततमेन वा,

कनीयांसं वा अप्रख्यातं वा उपमिमीते’’

3. ‘‘अथापि कनीयसा ज्यायांसम्’’

अर्थात्

1. जो ऊपर से भिन्न दिखने पर (भी) उसके सदृश हो वह इनका (उपमा का) कर्म (विषय) होता है, ऐसा गार्ग्य का मत है।

2. अधिक गुण वाले अथवा प्रख्याततम (उपमान) के साथ कम गुणवाले अथवा अप्रख्यात (उपमेय) का सादृश्य उपमा में दिखाया जाता है।

3. न्यून गुणवाले (उपमान) के साथ अधिक गुणवाले (उपमेय) की समानता की भी उपमा होती है।

अर्वाचीन काव्यशास्त्री भी उपमा की उक्त परिभाषा स्वीकार करते हैं, लेकिन तीसरी स्थिति को दोष की दृष्टि से देखते हैं और इसे हीनोपमा मानते है, जबकि निरुक्तकार इसे भी निर्दोष उपमा ही मानते हैं। इसके उदाहरण में उन्होंने ऋग्वेद का निम्नलिखित मंत्र दिया हैः

तनुत्यजेव तस्करा वनर्गू रशनाभिर्दशभिरभ्यधीताम्

इयन्ते अग्ने नव्यसी मनीषा युक्ष्वा रथं शुचयद्भिरङ्गः।।

यहाँ पर इन्द्रियों के संयम के लिए तस्करों की दृढ़ता को उपमान बताया है। अतएव निरुक्तकार इस हीनोपमा को दोषपरक नहीं मानते।

यही नहीं निरुक्त की भाँति ही व्याकरण-शास्त्र में भी उपमा अलंकार एवं उसके भेदों का निरूपण किया गया है। अष्टाध्यायी में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है-

तुल्यार्थैरतुलोपमाभ्यां तृतीयान्यतरस्याम्’ (अष्टा.2-3-72)

उपमानानि सामान्य वचनैः’ (अष्टा.2-1-55)

उपमितं व्याप्प्रादिभिः सामान्यप्रयोगे’ (अष्टा.2-1-56)

अपने ग्रंथ काव्यमीमांसा में राजशेखर ने पौराणिक शैली में एक कथा के माध्यम से काव्यशास्त्र के उद्गम का विवरण देते हुए एक कथानक का उल्लेख किया है।

कथानक के अनुसार भगवान श्रीकण्ठ ने परमेष्ठी, वैकुण्ठ, स्वयम्भू आदि चौंसठ शिष्यों को इस विद्या (काव्यशास्त्र) का उपदेश दिया । उनमें से प्रथम शिष्य भगवान स्वयम्भू ने अपनी इच्छा से उत्पन्न शिष्यों को इस विद्या का उपदेश दिया। इनमें एक सरस्वती पुत्र काव्यपुरुष थे। भगवान स्वयम्भू ने दिव्यदृष्टियुक्त भविष्यज्ञाता काव्यपुरुष को तीनों लोकों की प्रजा की हितकामना से काव्यविद्या (काव्यशास्त्र) का प्रचार करने के लिए नियुक्त किया। काव्यपुरुष ने सर्वप्रथम सहस्त्राक्ष आदि काव्यविद्या के दिव्य स्नातकों को अठारह भागों में विभक्त काव्यशास्त्र का उपदेश दिया। उनमें से प्रत्येक ने इस विद्या के एक-एक भाग का विशिष्ट ज्ञान अर्जित कर अपने-अपने विषय के अलग-अलग ग्रंथों की रचना की। इनके विवरण नीचे दिए जा रहे हैं:

नाम ग्रंथ/विषय

1. सहस्त्राक्ष(इन्द्र) कवि-रहस्य

2. उक्तिगर्भ उक्ति विषयक ग्रंथ

3. सुवर्णनाभ रीति विषयक ग्रंथ

4. प्रचेता अनुप्रास विषयक ग्रंथ

5. यम यमक सम्बन्धी

6. चित्राङ्गद चित्रकाव्य विषयक

7. शेष शब्दश्लेष पर

8.पुल्स्त्य वास्तव (स्वभावोक्ति) पर

9. औपकायन उपमा अलंकार पर

10. पाराशर अतिशयोक्ति पर

11. उतथ्य अर्थश्लेष पर

12. कुबेर उभयालंकार (शब्द और अर्थ) पर

13. कामदेव विनोद सम्बन्धी

14. भरत नाट्यशास्त्र

15. नन्दिकेश्वर रस पर

16. धिषण(वृहस्पति) काव्यदोषों पर

17. उपमन्यु काव्य के गुणों पर

18. कुचमार उपनिषद सम्बन्धी विषयों पर

इस तरह भिन्न-भिन्न विषयों पर ग्रंथों की रचना से काव्यविद्या अनेक भागों में विभक्त होकर छिन्न-भिन्न हो गयी। अतएव काव्यविद्या के सभी आवश्यक विषयों को संक्षेप में मेरे द्वारा अठारह अधिकरण (अध्याय/परिच्छेद) से युक्त इस काव्यमीमांसा नामक ग्रंथ की रचना की गयी।

इस आख्यायिका का उल्लेख काव्यमीमांसा के अतिरिक्त किसी अन्य ग्रंथ में नहीं मिलता। इसलिये यह आख्यायिका कितनी प्रामाणिक है, कहना कठिन है। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि उक्त ग्रंथकारों के एक भी ग्रंथ नहीं मिलते हैं। हो सकता है कि काव्यमीमांसाकार ने अपनी बात कहने के लिए प्रतीकों का सहारा लिया हो। वैसे भी, सभी शास्त्रों, विद्याओं का उत्स यदि हम परम बोधि को मानते हैं, तो राजशेखर द्वारा प्रतीकों के माध्यम से इस विद्या के अवतरण को उसी परम सत्ता से मानना अनावश्यक नहीं प्रतीत होता। इसे एक विचारधारा माना जा सकता है, भले ही ऐतिहासिक दृष्टि से प्रामाणिक न हो।

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10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी चर्चा आरम्भ की गयी है। साधुवाद।

    (यद्यपि मैं सहमत हूं कि साहित्य के अधिकांश अधिकांश विद्यार्थियों में उच्च कोटि की चर्चा और तत्वों को समझने सामर्थ्य, रूचि, आदि का अभाव है लेकिन इसके आगे आप द्वारा कही हुई बात शायद सत्य न हो कि उत्तम स्तर के ग्रन्थों का अभाव है। वस्तुत: बहुत सारे ऐसे ग्रन्थ अब स्कैन करके अन्तरजाल पर उपलब्ध हैं जो पहले साधारण पहुँच वाले आदमी के लिये दुर्लभ थे। मुझे लगता है कि मम्मट की सरी रचनाएं अन्तरजाल पर उपलब्ध हैं।)

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  2. Bahut hi achcha vishay hai, jaari rakhen!

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  3. बहुत ही सार्थक विषय है । मेरे लिये काफी नई जानकारी है इसे सहेज कर रख लिया एक बार फिर पढूँगी धन्यवाद्

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  4. गोस्वामी तुलसी दास जी ने लिखा है
    आखर अरथ अलंक्रिति नाना।
    छंद प्रपंच अनेक विधाना॥
    भाव भेद रस भेद अपारा।
    कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा॥

    नाना प्रकार के अक्षर, अर्थ और अलंकार, अनेक प्रकार की छ्न्द रचना, भावों और छ्न्दों के अपार भेद और कविता के भांति-भांति के गुण दोष होते हैं। मैंने परशुराम जी आपसे निवेदन किया था कि आप इस विषय पर कुछ लिखें ताकि इस विषय को लोगों के सामने लाया जा सके। आपने मेरा आग्रह स्वीकार कर हमें क्तितार्थ किया।
    @ श्री अनुनाद सिंह ने जो बात बताई है वह सही है कि आजकल इंटरनेट पर बहुत कुछ उपलब्ध है। पर परशुराम जी के पास इस सुविधा का अभाव है। इसीलिये आलेख में उन्होंने वैसा लिखा।

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  5. बहुत अच्छी जानकारी। धन्यवाद।

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  6. काव्य चर्चा शुरू करने का धन्यवाद! आधुनिक कविता या शायरी तो हिन्दी ब्लॉग में यत्र-तत्र दिख रही है परन्तु काव्य की शास्त्रीय व्याख्या की कमी सी थी. जारी रखिये.

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  8. "कहा कहौं मन की खुशी, कहत न बने खगेश....!'
    राय जी ! समझ में नहीं आता कि किस प्रकार आपको धन्यवाद दूँ ! आपके पोस्ट ने कॉलेज की कक्षाओं की याद दिला दी! इतनी सम्यक और बोधगम्य विवेचना तो कॉलेज में भी नहीं मिली थी........... कम से कम मुझे ! सद्ग्रंथों के लुप्त होने की मार विश्वविद्यालय जीवन में मैं स्वयं झेल चुका हूँ !!! आपका पोस्ट पढ़ कर वर्षों से 'कराल तकनीकी व्यवस्था के कोहरे से कुम्हला रहा हृदय पुष्प' सहस पल्लवित हो गया !!! कोटि-कोटि आभार !!! काश यह पोस्ट.......... स्नातक की कक्षाओं में मिल जाता......... काव्यशास्त्र के छठे पत्र में मेरे अंक ८९ ही नहीं होते.......... ! कभी-कभी स्वीकार करना पड़ता है, "समय से पूर्व और भाग्य से अधिक नहीं मिलता !!!" एक बार फिर से धन्यवाद !!!!

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