भाषा जीवन के किसी भी मोड़ पर जब भी तुम रोये हो ऐसे बहुतों ने पोछे हैं तुम्हारे आंसू जिनकी भाषा को तुमने हमेशा ही समझा है बहुत छोटा करके, बिताई होंगी कितनी रातें उन्हीं छोटी भाषा वाले लोगों ने छटपटाते हुए सिर्फ देखने के लिए एक टुकड़ा सुख तुम्हारी आंखोंमें। तुम शायद देख नहीं पाये उनका अन्तर्द्वन्द्व , उनका आर्तनाद क्योंकि तुमने कभी जानना ही नहीं चाहा भाषा निकलती नहीं है सिर्फ- होठों की देह छूकर, निकलती है हदय के कपाट खोलकर प्रतिवेशी करुणा की उंगली थामे। किन्तु इस सत्य से साक्षात्कार के लिए तुम्हें तोड़ना होगा अहंकार का दर्पण और खोलने होंगे अपने चारो ओर के दरवाजे ताकि तुम अनुभव कर सको प्रत्येक भाषा के पीछे छुपे दुख, प्रेम और वेदना को, जिस दिन तुमसे सम्पन्न होगा यह विराट सत्य तुम्हें जरूरत नहीं पड़ेगी अपनी भाषा को महानता के सिंहासन पर आसीन करने की तुम देखोगे स्वयं ही खिल उठेगी तुम्हारी भाषा किसी शिशु की मुस्कान की तरह जीवन की महानतम अभिव्यक्ति के रूप में। 000 |
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मंगलवार, ९ फरवरी २०१०
भाषा
प्रस्तुतकर्ता करण समस्तीपुरी पर ६:३१ PM
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16 Comments:
बहुत खूबसूरत रचना....
तुम्हें तोड़ना होगा
अहंकार का दर्पण
और खोलने होंगे
अपने चारो ओर के
दरवाजे
ताकि तुम
अनुभव कर सको
प्रत्येक भाषा के पीछे
धुपे दुख, प्रेम और वेदना को
बहुत ही सशक्त बात.....अच्छी अभिव्यक्ति के लिए बधाई
क्या कहूँ..... सुंदर शब्दों में ...सुंदर रचना.....
रचना जीवन की अभिव्यक्ति है।
बहुत ही सुन्दर कविता लिखी है,बधाई.
यह रचना आधुनिक अनुकरण प्रवृत्ति और अपसंस्कृति की दशा का वास्तविक चित्रण है।
कवि की सुन्दर अभिव्यक्ति .
एक सुन्दर कविता.
बहुत हि खुबसूरत भावो भरी रचना....बधाई!!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/
बहुत ही सुन्दरता से और गहरे भाव के साथ आपने उम्दा रचना लिखा है ! बहुत बढ़िया लगा!
तुम्हें तोड़ना होगा
अहंकार का दर्पण
और खोलने होंगे
अपने चारो ओर के
दरवाजे
ताकि तुम
अनुभव कर सको ...
शशक्त गहरी बात ......... भाषा बहुत कुछ कहती है ..... बहुत अच्छी लगी आपकी रचना ......
काव्यशास्त्रीय गुणों से युक्त एक ज्वलंत मुद्दे की आध्यात्मिक अभिव्यक्ति !!
bahut sunder abhivykti..............
चिंतन को विस्तार देती ,बहुत बहुत बहुत ही सुन्दर रचना...
(कृपया टंकण त्रुटि सुधार लें... )
जिनकी भाषा को तुमने
हमेशा ही समझा है
बहुत "झोटा" करके,
आपकी इस रचना में मानव के सूक्ष्म किंतु व्यक्त सौंदर्य में आध्यात्मिक छाप है।
बेहद रोचक और मार्मिक व्यंग्य है।
बहुत हि खुबसूरत भावो भरी रचना....बधाई!!
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