मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

स्वागत बसंत


-- करण समस्तीपुरी

स्वागत ! स्वागत !! स्वागत बसंत !!!

हे प्रेमपुँज ! हे आश रूप !!

ऋतुपति ! तेरी सुषुमा अनंत !!

स्वागत ! स्वागत !! स्वागत बसंत !!!

कानन की कांति के क्या कहने !

किसलय-कली-कुसुम बने गहने !!

अवनी सूचि पीत सुमन पहने !

मानो, विधि की रचना जीवंत !!

स्वागत ! स्वागत !! स्वागत बसंत !!!

नव आम्र मंजर की महक से !

और खगकुल की चहक से !!

और अलीगण की भनक से,

गूंजते हैं दिक्-दिगंत !!

स्वागत ! स्वागत !! स्वागत बसंत !!!


मन्मथ की मार बनी असहय !

कोकिल की कूक करुण अतिशय !!

सुन विरही उर उपजे संशय !

विरहानल को भड़काने या,

करने आये हो सुखद अंत !!

स्वागत ! स्वागत !! स्वागत बसंत !!!


17 टिप्‍पणियां:

  1. वसन्त का स्वागत सुन्दर कविता के माध्यम से प्रस्तुत किया है आपने.बधाई..

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  2. इस अद्वितीय मधुर रचना ने तो बसंत को और भी मधुमय बना दिया....

    बहुत बहुत बहुत ही सुन्दर हृदयहारी मनमोहक रचना...

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  3. bahut hee sunder basant geet abhinandan v varnan karate hue.........

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  4. कवि का प्रकृति से साक्षात्कार दिलचस्प है।

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  5. राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  6. बसंत का स्वागत करती, एक सुंदर कविता ।

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  7. बसंत का स्वागत .... बहुत सुंदर किया है आपने....


    नोट: लखनऊ से बाहर होने की वजह से .... काफी दिनों तक नहीं आ पाया ....माफ़ी चाहता हूँ....

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  8. अलन्कारो से आभुशित यह कविता अच्छी लगी.

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  9. wah bhi waah mazaa aagaya. basant ke is manohari shaam mein aisi sugandhit manmohak kavita k liye DHANYAWAD..........

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  10. निराला जी के अंदाज वाली अच्छी रचना

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  11. हर हाल में बसंत को अगर बसंत मान लेने की जिद हो, तो मेरा कहना व्यर्थ है कि जलवायु परिवर्तन ने बसंत को घायल कर दिया है। कायदे से बसंत को एक माह होने चला है, लेकिन स्वेटर, जैकेट, गिजर और हिटर बक्शे में नहीं गये हैं। घूर चारों ओर से घिरा है।
    हे कवि ! सच तो यह है कि मौसम-चक्र बदल चुका है। अगर इस कविता को चालीस-पचास वर्ष पीछे ले जाकर पढ़ लूं, तो यह प्रकृति-सौंदर्य का बेहतरीन शब्द-चित्र लगेगा। कवि से काल-बोध की अपेक्षा तो होती ही है।

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