शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

त्यागपत्र : भाग - 7

इस से पहले आपने पढ़ा, 'विश्वविद्यालय की पढाई के लिए रामदुलारी की पटना जाने की आकांक्षा पर घरवालों का प्रबल विरोध। बाबा की आज्ञा ने दिया साथ। कॉलेज में समीर और रुचिरा रामदुलारी को उद्दंड छात्रों की रैगिंग से बचाते हैं। अब आगे पढ़िए....!!

गाँव में बाबा की पराती में अपने कल-कंठी स्वर की मिसरी घोलने वाली बड़े घर की रामदुलारी होस्टल के छोटे से कमरे के रौशनदान से आ रही पीली रोशनी में सिरहाने रखी कलाई घड़ी को बार-बार उठा कर देख रही थी। उसे लगा पटना की सुबह कैसी गंदली-गंदली और थमी-थमी सी है। ऐसा लग रहा था जैसे सूरज को निकलने में आलस्य आ रहा हो। गाँव में तो रात के तीसरे पहर से ही मवेशियों के गले के घुंघरू और किसानो के पदचाप प्रभात के स्वागत मे लग जाते हैं। लेकिन पटना में तो मंथर गति से उदयाचल पर बढ़ रहे सूरज कि रौशनी सिर्फ मकानों और मंडियों पर ही पर रही थी। सुबह उसका भी जी उठने को नहीं कर रहा था। बदन तो ऐसा दुख रहा था जैसे रात भर पैदल चली हो। यहां तो जिससे मिलो, जिससे बात करो, कुछ-न-कुछ शिकायत ज़रूर रख देगा सामने। एक भी व्यक्ति नहीं मिला अभी तक जिसे पटना पर गर्व हो। क्या यहां गर्व करने लायक़ कोई चीज़ नहीं है। झट से उसके दिमाग़ में आया .. गोलघर गोलघर तो है ही, पटनदेवी भी। शायद उसने राघोपुर में पटना साहिब, अगम कुंआ, कुम्हरार आदि के महत्व के बारे में न सुना हो।

उसे लोग परेशान ही नहीं बेचैन भी लगे। बिखरे, उदास, परेशान। गांव में कितना सुखचैन होता है। लोगों से पटना के बुरे हालात सुन-सुन कर उसे भी वैसे ही दृश्य याद आने लगे जिस पर उसने अब तक कोई खास ध्यान नहीं दिया था। अशोक राजपथ की भीड़ और ट्राफिक जाम, तिन पहिया टैम्पो की ठेलम-ठेल। कटोरे में सिक्के उछल-उछल कर भीख मांग रहे स्वस्थ्य लोग। राजकमल प्रकाशन और भारती-भवन की दुकानों पर किताबें देखने वालों की भीड़। युवाओं की उसके शरीर की भूगोल और ज्यामिति नापती चर्मभेदी नज़रें। सड़क के किनारे नाले से निकला कचड़ा, बदबू से फटती नाक। फल की दुकान पर हाजीपुर का चिनिया केला के नाम पर चित्तिदार केले और तम्बाकू खाने वाले के दांतों की तरह काले दानों वाले फटे अनार। कमरे में भी रामदुलारी का हाथ बरबस नाक पर चला गया और वितृष्णा से भरा मन अनायास दौर चला गाँव की राह। मेरा राघोपुर कितना सुन्दर है। रामदुलारी ने आहें भरी। हरे-भरे वृक्ष, महकते फूल, पेड़-पौधों में लगे ताजे फल, सूर्योदय से सूर्यास्त तक गाँव को गुलजार करते श्रमसाध्य लोग... निश्छल मगन बाल-मंडली.... ! और कहाँ ये नीरस शहरी जीवन। लेकिन कुछ पाने के लिए कुछ तो खोना ही पड़ता है। आखिर बड़े सपने पलते भले गाँव में भी हों पर सजते तो शहरों में ही हैं। रामदुलारी बिछावन से उठ स्नान-घर की ओर बढ़ गयी।

रविवार का दिन था। स्नान के बाद आयी स्फुर्ती में मैदे की पूरी और आलूदम के नाश्ते ने थोड़ा और इजाफा किया तो रामदुलारी रेडियो ऑन कर के बैठ गयी। "कोयल बिनु बगिया न शोभे राजा..... !" शारदा सिन्हा के लोकगीत आ रहे थे। अब उसे बहुत राहत मिल रही थी। 'ठक..ठक...ठक...' दरवाजे पर दस्तक हुई। उसने अन्दर से ही पूछा, 'कौन?' 'रामदुलारी मैं हूँ...." आधे जवाब से ही वह पहचान गयी। यह तो रुचिराजी की आवाज़ है। वह पहले भी एक-आध बार उनसे मिल चुकी थी।

दरवाजा खोला। रुचिरा के साथ समीर को देख रामदुलारी थोड़ी असहज भी हुई पर अगले ही क्षण संयत होती हुई हाथ जोड़ कर दोनों का अभिवादन किया। दरवाजे के एक ओर हटती हुई बाईं हाथ को कमरे की ओर लहरा दिया। मानो आगंतुकों को कमरे में आने का नीरव निमंत्रण दे रही हो।

कमरे को तारीफ़ की नजर से देखते हुए दोनों की नजरें रामदुलारी के सौम्य मुख-मंडल पर अटक गयीं। रामदुलारी थोड़ी झेंप सी गयी। रुचिरा ने ही बातों का सिलसिला शुरू किया। समीर! ये है रामदुलारी। इसके बारे में मैं जितना भी जानती हूँ वो तुम्हे बता ही चुकी हूँ। और जो बांकी है वो इसका सजा हुआ कमरा और इसके मासूम चेहरे पर दमकते लिलार की चमकती रेखाएं खुद ही बता रही हैं। समीर और रामदुलारी के होंठ थोड़े फैल गए थे। परिचय का दूसरा चरण जारी रखती हुई वह बोली, "रामदुलारी ! यह है मेरा अनन्य मित्र, समीर। पटना के सम्भ्रांत और सबसे बड़े रईसों में से एक "बाबू दिन दयाल का होनहार सुपुत्र। घर में 'लक्ष्मी' चेरी बनी फिरती हैं लेकिन जनाब हैं कि सरस्वती की साधना में संलग्न। अभी स्नातक अंतिम वर्ष में हैं। और विषय हम तीनों का एक ही है - हिंदी।'

अब तक चुप रामदुलारी ने हाथ जोड़ कर समीर को नमस्ते कहा। बारी अब समीर की थी। उसने सकुचाते हुए कहा, ये रुचिरा जी की सहृदयता है जो ये मुझे अपना अनन्य मित्र मानती हैं। वरना इनके सामने मेरी हस्ती ही क्या है? इनकी प्रतिभा, विदग्धता और वाक्चातुर्य का लोहा पूरा पटना विश्वविद्यालय मानता है।

रुचिराजी के प्रति रामदुलारी ने आभार प्रकट किया और यह बताना नहीं भूली कि उस दिन उनके नहीं आने से वह न जाने किन मुसीबतों में घिर जाती।समीर ने भी रामदुलारी की बातों पर मुहर लगाते हुए कहा, आपका परिचय बिल्कुल सही शख्शियत से हुआ है। इन्होंने पूरे पटना में महिला अधिकारों की रक्षा की मुहिम चला रखी है।

रुचिरा ने अपने पसंद के विषच पर अपना मत रखा, हमारे राज्य में लंबे समय से महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए लड़ना पड़ा है। अब भी कोई स्थिति सुधर गई हो, ऐसा नहीं है। पर इतना तो तय है कि महिलाओं को समानता का अवसर दिया जाना चाहिए। यह बहुत ही ज़रूरी है। उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है उन्हें सुरक्षा का आश्वासन देना। जब ये भयग्रस्त रहेंगी तो इनका विकास कैसे होगा।

रामदुलारी को वो दिन याद आने लगे जब वह आगे की पढ़ाई के लिए अपने ही परिजनों से लड़ रही थी। और यहां आने के बाद नई मुसीबतों से पाला पड़ रहा है। उसे लगा वह एक वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही है। एक ऐसा वर्ग जो संघर्ष रत है। और यह संघर्ष अतीत, वर्तमान एवं भविष्य को एक साथ जीने का संघर्ष है।

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पटना शहर में अकेली रादुलारी को मिला रुचिरा और समीर का मजबूत साथ। तीनों करते हैं 'महिला आधिकारों की रक्षा की बात। लेकिन आगे क्या होगा, पढ़िए अगले हफ्ते ! इसी ब्लॉग पर !!

त्याग पत्र के पड़ाव

भाग ॥१॥, ॥२॥. ॥३॥, ॥४॥, ॥५॥, ॥६॥, ॥७॥, ॥८॥, ॥९॥, ॥१०॥, ॥११॥, ॥१२॥,॥१३॥, ॥१४॥, ॥१५॥, ॥१६॥, ॥१७॥, ॥१८॥, ॥१९॥, ॥२०॥, ॥२१॥, ॥२२॥, ॥२३॥, ॥२४॥, ॥२५॥, ॥२६॥, ॥२७॥, ॥२८॥, ॥२९॥, ॥३०॥, ॥३१॥, ॥३२॥, ॥३३॥, ॥३४॥, ॥३५॥, ||36||, ||37||, ॥ 38॥

16 टिप्‍पणियां:

  1. Bahut sundar upanyas padne ko mil raha hai lekin dukh hai ki Ansho me .Mann tho kar raha hai ki puri rachna ek baar me pad lu.Dhanyawad.

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  2. अच्छी रचना । आज का भाग भी अच्छा रहा । गांव एवं शहर के जीवन का सुंदर तुल्नात्मक चित्रण देखने को मिल रहा है ।

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  3. बहुत सुंदर आज का भाग भी धन्यवाद

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  4. आज की कड़ी ताजगी से भरपूर है।

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  5. bahut dino ke baad apne shahar se judi koi achhi kahani padhne ko mili... aage ke bhagon ka intejaar rahega.

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  6. Suruchi poorn,saral sundar abhivyakti...!
    Sirf ek sawal manme aaya so ye: Mahilayon ke chhatrawas me purush kaise? Mai khud chhatrawas me rah padhi hun...hame to hostel ke mehman kakshme bhi ladkon ko milne kee ijazat nahee thee..!

    http://shamasansmaran.blogspot.com

    http://aajtakyahantak-thelightbyalonelypath.blogspot.com

    http://kavitasbyshama.blogspot.com

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  7. Maaf kijiyega mere xams ki wajah se bahut dino se aapki etni khubsurat rachnao ko parh na paya.Bahut dilchasp lagi aaj ki yeh rachna aapki.Raamdulari ka patna sehar mein rehna aur en musibato ko woh kaise saamna karti hai yeh sunn ne mein bada maja aayega.

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  8. भारतीयता के धरातल पर लिखित यह रचना बहुत अच्छी लगी।

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  9. sahi samasya uthaya hai. striyon kee upekshaa kar samaaj kabhi aage nahee badh sakta......

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  10. कथा सशक्त भाषा में लिखी होने के साथ-साथ नारी संघर्ष का सफलतापूर्वक निर्वाह करती नज्ञर आती हैं।

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