बुधवार, 16 दिसंबर 2009

देसिल बयना - 10 : मियाँ बीवी के झगड़ा !

जय हो, पाठक वृन्द !
मान गए साहिब आपको ! एक तो बुध आते ही हम सुध खो देते हैं और महराज आप भी सब कुछ भुला कर देसिल बयना का बाट जोहते रहते है। ई सब आपका प्रेम ही है नहीं तो आज तो हमरा मूडे ऑफ था। अब आप आ गए हैं तो एगो देसिल बयना सुना देते हैं। बंकिये आज से हम फैसला किये हैं कि सब करम करेंगे.... मगर केकरो पंचायती नहीं करेंगे। चाहे ई समाज रहे या जाए कोशी के बाढ़ में.... कोई जीए या मरे... हमको कौनो जरूरत नही है।
भांड़ में जाए दुनिया ! हम बजाएं हरमुनिया !! आपको लगता होगा कि हम खा-म-खा बकवास कर रहे हैं। हमरा गुस्सा नाजायज है। लेकिन आप बात सुनियेगा तो सब समझ जाइएगा।

अब का बताएं.... दिन भर कचहरी में मगज खपा के खर-खरिया साईकिल पर चढ़े चले आ रहे थे। उतरबारी टोल पहुंचे ही थे कि उधर से खखोरन काका बायां हाथ झुकी हुई कमर पर रक्खे और दायें हाथ को वर्षा मे कार का शीशा पोछने वाला वाइपर जैसे तेजी से हिलाते एकदम झटके चले आ रहे थे। आ..हा...हा... उ तो हमरा साईकिल बच्चा वाला गुरकुनिया जैसे गुरक रहा था नही तो धक्को लग जाता। जैसे-तैसे चक्का में सट के कक्का रुके और कमर पर रक्खे हाथ का जोर बढ़ा दूसरे हाथ को हेड-लाईट के ढक्कन की तरह आँखों के ऊपर रख कर हाँफते हुए बोले, "बौआ... रेलवे तरफ़ से आ रहे हो का ?" हम बोले, "हाँ, काका ! मगर आप इतना घबराए हुए कहाँ जा रहे हैं?" खखोरन काका हमरे साईकिल का हेंडिल पकड़ के कमर को सीधा करते हुए बोले, "अब का बताएं बिटवा ! ई बुढापा में हमको और कौन-कौन दिन देखना बचा है ? ई सब मौगत दिखाए से भगवान हमका उठा काहे नही लेते...!" कह के काका एकदम से फफक पड़े। हम साईकिल को इस्टेंड पर खड़ा कर के काका का कन्धा पकड़ के कहा, "काका ! आप बच्चा के तरह रोते काहे हैं ? अरे कुछ बताइये तो सही कि बात का है ?"

कक्का कहे लगे, "हमरे छोटका बेटा और बहुरिया है न सिंघपुर वाली... परसुए से दुन्नु परानी में पता नही काहे का खट-पट चल रहा था। आज भोर में बात और बिगड़ गयी.... मरद का जात ! कितना सहे... मंगरुआ शायद दू-चार हाथ रख दिहिस। उ पर औरतिया जो हंगामा मचाया है, पूछो मत बौआ ! हमरा और तोहरे काकी के तन-बदन का भी एक्को गत नही छोड़ी, ई बुढ़ापा में। चूल्हा चौका छोड़ कर दिन भर सरापते रही। अभी छौड़ा आया है सांझ भरे, तो फिर एक झोंक हो गया। हम समझाए गए तो और उल्टा पड़ गया... गाली-सराप भी दिया और छोकरा के साथ-साथ हम बूढा-बूढ़ी पर भी इल्जाम लगाते हुए भागी है रेल में कटने। पाछे से छौड़ा भी गया है... ! हमरे तो दम नही धरा जा रहा है। पता नही क्या हुआ... !!" इतना कह खखोरन काका गमछी के खूंट से आँख पोछे लगे।

हम कहे, "कुछ नही होगा काका ! चलिए देखते हैं कहाँ गया है दुन्नु।" फिर हम साईकिल घुमाए और कक्का को बैठा के खरंजा पर खर-खरिया को रोकेट की तरह उड़ा दिए। रेलवे किनारे कोस भर खोजे मगर कौनो चख-चुख नही मिला... जैसे-जैसे मिलने में देर हो, काका के हिरदय की धुक-धुक्की लोहार के भाथी जैसे बढ़ा जा रहा था। घूम-फिर के हम लोग गौरी पोखर पर पहुंचे। वहाँ झल-फल सांझ में दू गो परछाईं दूरे से दिखाई दिया। हम कक्का को भरोस दिए। सच में, वही दुन्नु था।

हम गए उका पास में। जोरू जोर लगा रही थी। मरद उका हाथ पकड़े कभी बुझा रहा था तो कभी डरा रहा था। हम भी दुन्नु को समझाए लगे। लेकिन ई का... हमरे गोदी में खेला मंगरुआ लगा हमरे पर खिसियाये। ससुर के नाती तैस मे आके कहे लगा, "उ कोट-कहचरी का धमकी हमरे ना दिखाओ... ! नही तो तुम भी कुछ सुन जाओगे !!" हम दपट दिए उको तो चुप होय गया मगर सिंघपुर वाली के तो सच्चे में सिंघ फूटा हुआ था। लगी हमरे खानदान का उद्धार करे, "दिन भर कहचरी में दांत निपोरते हैं और अभी हमरे मरद को सिखाये चले हैं। अपना घर से बाहर तक कौन गत है सो जैसे किसी को मालूमे नही।"

उका प्रवचन सुन के और लोग भी इकट्ठा होय गए थे। हमको भाड़ी बेइज्जती बुझा रहा था। हम से भी रहा नही गया। कहे, "जुबान को लगाम दो दुल्हिन, नही तो बहुत ख़राब बात हो जाएगा। तभी से समझा रहे हैं, हमरा गुस्सा अभी नही देखी हो तुम !" अरे बाप रे बाप ! हमरे मुंह से इतना निकला नही कि उ नागिन की तरह और मंगरुआ नाग सांप की तरह हमरे पर फुंफकार छोड़े लगा ! कहे लगा, "हे... इतना रोआब मत दिखाओ, भैय्या ! का कर लोगे गुस्सा आ गया तो ? अभी उका मरद जिंदा है !" सिंघपुर वाली का हाथ पकड़ के कहिस, "ई का हाथ पकड़े हैं रच्छा के लिए। हमरे रहते जो इसपर आँख उठाएगा उका आँख निकाल लेंगे।" अभी तक मंगरुआ से हाथ छुड़ा रही सिंघपुर वाली भी वही के सीना से चिपक कर लगी हमरे तरफ़ हाथ चमकाए। फेर दुन्नु हाथ में हाथ दिए अन्हरिये में घर का राह पकड़ लिए।

हम अपना खीझ खखोरने काका पर उतारे। कहे, "लो काका जी, आपका बेटा-पतोहू तो गए हाथ में हाथ धरे ! और हम बीच मे बेकार में लबरा बन गए! उधर भीड़ में से बादल को छांट कर निकलते हुए सूरज की तरह शकुंतला फुआ प्रकट होते हुए बोली, "हाँ रे बेटा ! मियाँ-बीवी के झगरा ! पंचायती करे लबरा !! औरत-मरद के बीच में तो बोलना ही बेकार है। देखा तीन दिन से कित्ता नौटंकी कर रहे थे। अभी समझाए वाला पर ही पलट गए। तुरत रूठना-मनाना, रेल में कटना, पोखर में डूबना और क्षणे में कैसे सब को बुरबक बना गलबहियां डाले चले गए !!! सच मे, मियाँ-बीवी के झगरा ! पंचायती करे लबरा !! देखा लैला-मजनू ने कैसे सबको लबरा बना दिया !!!"

फुआ तो एक बार कह के चुप होय गयी। लेकिन वहाँ खड़ा बच्चा लोग तो कविते बना दिया।" मियां-बीवी के झगरा ! पंचायती करे लबरा !!" पढ़-पढ़ के लगे हमरे ओर देख के ताली देने। अब आपही बताइये, ई बात पर गुस्सा आएगा कि नही ? क्या नाजायज है हमरा गुस्सा ?? तभी से हम उल्टा हाथे कान पकड़े कि अब किसी का पंचायती नही करेंगे। ख़ास कर मियाँ-बीवी का तो भूल कर भी नही। लेकिन एक बात है। हम लबरा बने तो बने। एक कहावत भी तो बन गया, "मियाँ-बीवी के झगरा ! पंचायती करे लबरा !!" मतलब करीबी लोगों की छोटी-छोटी बातों में दखल देना बेवकूफी ही है। हाँ तो हजूर ! हम तो एक बार लबरा बनिए चुके हैं ! आप दोबारा मत बनाइएगा। टिपण्णी जरूर दीजिएगा !!! तो अब चलते हैं। जय राम जी की !!

13 टिप्‍पणियां:

  1. बंधु , बहुत अच्छा खते हैं आप । पढ़कर सारी थकान दूर हो जाती है । आज की प्रसतुति भी शानदार रही । शुभकामनाएं ...

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  2. Wakai gaon ki bhasha apke madhyam sae sun hi leta hu.Bahut mithas hai apki is bhasha aur lekhni me .Achi rachna ke liye badhai.

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  3. अच्छी शैली, कहानी मज़ेदार, और आपका पंच बनना .. हा-हा-हा-हा-
    बहुत अच्छा लगा .. देसिल बयना।

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  4. प्रभावशाली भाषा में लिखे इस देसिल बयना द्वारा सामाजिक-पारिवारिक स्थितियों से उपजती विडंबनाओं को ढोती पात्रों की बेबसी और असहायता के साथ-साथ अनकी मानवीय दुर्बलताओं को भी रेखांकित किया गया है। बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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  5. बहुत मज़ा आया पढ़ कर ......... ई लो अब टीपिया भी दिए हैं ..........

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  6. हा हा हा बहुत रोचक और मस्त है धन्यवाद्

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