बुधवार, 2 दिसंबर 2009

देसिल बयना - 8 : गोनू झा मरे गाँव को पढ़े !

-- करण समस्तीपुरी

राम-राम हजूर ! देखते ही देखते हफ्ता बीत गया और फिर आ गया बुधवार देसिल बयना की शाम! अब का बताएं, आज भोरे-भोर ब्लॉग पर आए तो ऐसन अमोल बोल देखे कि गाँव का एगो पुराना कहावत याद आ गया। उ हमरे मिथिलांचल में कहते हैं
'गोनू झा मरलथि ! सौंसे गाम जंचलथि!!' हम उ का हिंदी में कर देते हैं, 'गोनू झा मरे ! गाँव को पढ़े !!'

अरे, गोनू झा का किस्सा याद है न ?? नहियो याद है तो कौनो बात नहीं। हम फेर से कह देते हैं। वही कमला-बलान के किनारे मिथिला का प्रसिद्द गाँव है, भरवारा। ई बड़की पोखर के भीर पर उंचका डीह जो देखते हैं न.... उ गोनुए झा का न है। गोनू झा के चालाकी का किस्सा तो मिथिलांचल क्या अगल-बगल के एरिया में भी एक युग से प्रचलित है। गोनू झा कौनो इस्कूल-कॉलेज के पढ़े नहीं... उ तो मिथिला के एगो सीधा-सादा किसान थे। लेकिन हाज़िरजवाबी और चतुराई में बड़े-बड़े विद्वान को धूल चटा देते थे।

अब तो गाँव की बात पता ही है। उनकी चालाकी से भी सभी गाँव वाले जलते थे मगर मुंह पर उनका 'फैन' बने फिरते थे। लेकिन गोनू झा की छट्ठी बुद्धि को शक था कि ई लोगो के प्यार में कुछ झूठ मिश्रित है। उ बहुत दिन से गाँव-घर के लोगों के अनमोल प्यार की परीक्षा लेने का पिलान बना रहे थे। अगर बात सिर्फ गाँव वालों की ही होती तब तो गोनू झा अपने जोगार टेक्नोलोजी से उनको तुरत फिट कर देते। मगर उनको तो अपने घर के लोगों की बातों में भी मिलाबट की महक आती थी। सो उन्होंने सोचा कि क्यूँ न सबका एक ही 'कॉमन टेस्ट एग्जाम' ले लिया जाय।

बहुत सोच-विचार के झा जी एक दिन सुबह में उठबे नहीं किये। सूरुज चढ़ गया छप्पर पर मगर गोनू झा बिछौना नहीं छोड़े। तब ओझाइन को जरा अंदेशा हुआ। गयी जगाये तो ई का.... आहि रे दैय्या.... रे बाप रे बाप...!!! झा जी के मुंह से तो गाज-पोटा निकला हुआ था और बेचारे बिछौना से नीचा एगो कोना में लुढ़के पड़े थे। ओझाइन तो लगी कलेजा पीट के वहीं चिल्लाए। बेटा भी माँ की आवाज़ सुन कर बाबू के कमरे में आया। उहाँ का नजारा देख कर उका कलेजा भी दहल गया। उहो लगा फफक-फफक कर रोये।

इधर ओझाइन कलेजा पर दुहत्थी मार-मार कर चिग्घार रही हैं,.... उधर बेटा कहे जा रहा है कि हमारा सब कुछ कोई लेले बस हमरे बाबूजी को लौटा दे। ई महा दुखद खबर सुन के गोनू झा से उनको मरणोपरांत अपने खर्चा पर गंगा भेजने का वादा करने वाले मुखिया जी भी पहुँच गए। गोदान का भरोसा दिलाने वाले सरपंच बाबू भी। लगे दुन्नु जने झा जी के बेटा को समझाए। "आ..हा...हा... ! बड़े परतापी आदमी थे। पूरे जवार में कोई जोर नहीं। अब विध का यही विधान था।"

उधर जिनगी भर झा जी का चिलमची रहा अकलू हजाम औरत महाल में ज्ञान बाँट रहा है। 'करनी देखो मरनी बेला !' देखा गोनू झा जैसे उमिर भर सब को बुरबक बनाते रहे वैसा ही चट-पट में अपना प्राण भी गया। सारा भोग बांकिये रह गया।' सरपंच बाबू ओझाइन को दिलासा दिए, 'झा जी बहुत धर्मात्मा आदमी थे। सीधे सरंग गए। अब इनके पीछे रोने-पीटने का कौनो काम नहीं है। कुछ रुपैय्या पैसा रखे हैं तो गौदान करा दीजिये। बैकुंठ मिलेगा।'

उधर मुखिया जी उ का बेटा को बोले, जल्दी करो भाई, घर में लाश ज्यादे देर तक नहीं रहना चाहिए। ऊपर से मौसम भी खराब है। प्रभुआ और सीताराम को तुम्हरे गाछी में भेज दिया है पेड़ काटने। जल्दी से ले के चलो। फिर दू आदमी से पकड़ के झा जी को कमरे से बाहर निकालने लगे। लेकिन गोनू झा कद काठी के जितना ही बड़े थे उनका घर का दरवाजा उतना ही छोटा था। अपना जिनगी में तो झा जी झुक कर निकल जाते थे। लेकिन अभी लोग बाहर करिए नहीं पा रहे थे। तभी मोहन बाबू कड़क कर बोले, अरे सुरजा बढई को बुलाओ। दरवाजा काट देगा।

सुरुज तुरत औजार-पाती लेके हाज़िर भी हो गयातभी झा जी का बेटा बोल पड़ा, 'रुको हो सुरुज भाई ! बाबू जी तो अब रहे नहीं। उ बड़ा शौक से ई दरवाजा बनवाये रहे। ई का काटे से उ का आत्मा को भी तकलीफ होगी। अब तो उ दिवंगत होय गए। शरीर तो उनका रहा नहीं। सो उनका पैरे को बीच से काट कर छोटा कर देयो। फिर आराम से निकल जायेंगे।'

हूँ कर के सुरुज बढई जैसे ही झा जी के घुटना पर आरी भिड़ाया कि गोनू झा फटाक से उठ कर बैठ गए.... और बोले रुको! अभी हम मरे नहीं हैं। उ तो हम तुम सब लोगों का परीक्षा ले रहे थे कि मुंह पर ही खाली अपने हो कि मरे के बाद भी। अब तो सरपंच बाबू, मुखिया जी, अकलुआ हजाम, सूरज बढ़ई और उनका अपना बेटा... सब का मुंह बसिया जलेबी की तरह लटक गया। आखिर सब की कलई जो खुल गयी थी। गोनू झा तो नकली मर के असली जी गए लेकिन तभी से ई कहावात बन गया कि "गोनू झा मरे ! गाँव को पढ़े !!" मतलब बुरे वक़्त में ही हित और अहित की पहचान होती है।

12 टिप्‍पणियां:

  1. सच्चे बात। खराब समये में त अपना और पराया चिन्हा जाता है।

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  2. aa haaa ha eee to bada mast baat kah diye aap. aur u bhi ekdum desla estyle mein. aab kaa kijiye ga ehe to duniya hai.ae go baat bataeye karan ji etna dhasu-dhasu idea kahan se aata hai aapko.bhai maan gaye aapko. aapke soch aur aapki unglyon ka ka kehna jo kuch bhi likhti hain logon ko gyan dete-dete unhe moh leti hain.aap yun hi apni soch aur ungliyon ko bina kisi seema k unmukt bhagate raho. KEEP IT UP

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  3. आप तो अईसी कहानी पढवा दिए की बचपन में सुनी नाना नानी की कहानी याद आ गयी...अब तो कभिये-कभिये याद कर पाते हैं गोनू झा को...टाइमे नहीं मिलता है और सच्च कहें तो हम लोग इन कथा-कहानियों को बिसराने की कोशिश में लगे रहते है...

    लगता है आप बचपन की सैर करा दिए है...

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  4. KA KHUB KAHAWAT HAI ...AJ FERO SE DESIL BAYNA PADH KE MAN GADGAD HO GAYA...GONU JHA KI TO BATE NIRALI HAI..AUR KARAN G APKA KYA KAHNA AP TO INNA ACHA LIKHTE HAI KI HUM APKE FAN HO GAYE HAI..AISE HE HAMARA MANORANJAN KARTE RAHE AP..DHANYABAD...

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  5. हम लोग इन कथा-कहानियों को बिसराने की कोशिश में लगे रहते है...

    लगता है आप बचपन की सैर करा दिए है...

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  6. bahutai badhiyan auro gonu jha ke kahani aaye ta mail kar na jha.varunjha.varun6@gmail pad

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  7. bahutai badhiyan auro gonu jha ke kahani aaye ta mail kar na jha.varunjha.varun6@gmail pad

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  8. Acchi mssg thi...... Par yeh gonu Jha Jee ki kahani nahi thi..... Acha laga pad kar.,.

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