मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

ये मेरा जीवन एकाकी

-- मनोज कुमार

ये मेरा जीवन एकाकी।
नित - नित नूतन रूप तुम्हारा, देखूं मैं तो हारा - हारा।
कभी उर्वशी, कभी मेनका, लगो परी तुम इन्द्र सभा की।
ये मेरा जीवन एकाकी।

डालो एक नज़र है काफी, अंतिम सफ़र अभी भी बाक़ी।
मैं पीऊं तुम मुझे पिलाओ, पल भर को बन जाओ साक़ी।
ये मेरा जीवन एकाकी।

कहने को अधराधर तरसे, वही बात आंखों से बरसे।
गहन वेदना से भारी मन, लेकर आया बूंद घटा की।
ये मेरा जीवन एकाकी।

नियति जाल में उलझ-उलझ कर,अस्त हुआ ख़ुशियों का दिनकर।
संध्या के इस क्रंदन में है, कहां छुपी मुसकान उषा की।
ये मेरा जीवन एकाकी।
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16 टिप्‍पणियां:

  1. मनोज कुमार जी रचना अच्छी लगी, बहुत आभार प्रस्तुत करने का.

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  2. लिखते और पढ़ते रहिएगा..,मेरी शुभकामनाएँ..

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  3. ये मेरा जीवन एकाकी।
    नित - नित नूतन रूप तुम्हारा, देखूं मैं तो हारा - हारा।
    कभी उर्वशी, कभी मेनका, लगो परी तुम इन्द्र सभा की।
    वाह क्या बात है जी, बहुत सुंदर रचना, धन्यवाद

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  4. मनोज जी,

    क्लासिकल अंदाज में आपनी बात खूब कही है :-

    नियति जाल में उलझ-उलझ कर,अस्त हुआ ख़ुशियों का दिनकर।
    संध्या के इस क्रंदन में है, कहां छुपी मुसकान उषा की।

    सच है नियति जो ना कराये वो.....

    सादर,


    मुकेश कुमार तिवारी

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  5. कहने को अधराधर तरसे, वही बात आंखों से बरसे।
    गहन वेदना से भारी मन, लेकर आया बूंद घटा की।
    ये मेरा जीवन एकाकी।

    नियति जाल में उलझ-उलझ कर,अस्त हुआ ख़ुशियों का दिनकर।
    संध्या के इस क्रंदन में है, कहां छुपी मुसकान उषा की।
    ये मेरा जीवन एकाकी।
    ....
    भावों को क्या उकेरा है आपने. विशुद्ध काव्य के अंदाज में बहुत अच्छा लगा पढ़ कर.

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  6. बहुत ख़ूबसूरत और शानदार रचना लिखा है आपने!

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  7. कवि महोदय,इस सुंदर रचना को पेश करने के लिए आपको थैंक्स । कविता मन को छू गई ।

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