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बुधवार, 1 मई 2013

श्रमकर पत्थर की शय्या पर

श्रमकर पत्थर की शय्या पर

आज एक मई है। यानी कि मजदूर दिवस! इन श्रमकरों के श्रम के बिना हम जीवन में कुछ नहीं हासिल कर सकते। उनका श्रम वंदनीय है। मुम्बई में श्रमिकों की सभा को संबोधित करते हुए 15 दिसम्बर 1907 को लोकमान्य तिलक ने कहा था,

“अपनी खेती अपने काम के आए, अपनी मेहनत अपनी रोटी कमा लाए, इसी का नाम स्वराज्य है। मज़दूरी जब इस भावना के बिना होती है तब पशु की मेहनत के बराबर होती है।”

श्रमजीवी हमारे लिए तरह-तरह की रंगबिरंगी दुनियां तैयार करते हैं पर उनका स्वयं का जीवन विभिन्न प्रकार के संकटों से घिरा रहता है। मैक्सिम गोर्की के शब्दों में कहें तो , “वे अपने कन्धों पर उठाकर हजारों मन अनाज जहाज पर लादते हैं ताकि अपना पेट पालने के लिए एक-दो-सेर अनाज उपलब्ध कर सकें।

पर इनका जीवन एक अंधियारी रात की तरह है होती है, एक भयंकर स्वप्न-सा। ये लोग ज़िन्दगी भर अपना खून पसीना एक करते हैं, परन्तु इनका स्वयं का जीवन अज्ञान के घोर अन्धकार में बीतता है।

हम इन मेहनतकशों को सलाम करते हैं! उन्हें बेहतर सुविधाएँ मिलनी चाहिए… पर इसकी चिंता कौन करता है? मालिको के शोषण का शिकार न हों इसके लिये क़ानून तो हैं पर कितने सक्षम, सक्रिय और सफल, यह किसी से छुपा नहीं है। आज भी श्रमजीवियों की हालत बहुत अच्छी नहीं है. कुछ संस्थानों मे अच्छे वेतनमान मिल रहे हैं लेकिन अधिकांश श्रमजीवियों को अभी भी सम्मानजनक वेतन नहीं मिल पाता। यह दुःख की बात और चिंता का विषय है।

जब किसी श्रमकर को दिनभर मेहनत-मशक्कत कर शाम और रात में ज़मीन पर सोये देखता हूँ तो मन भावुक हो जाता है और कविता की कुछ पंक्तियां बन जाती हैं। इन्हें ही प्रस्तुत कर रहा हूँ, दुनिया के तमाम मेहनतकश सच्चे मजदूरों के लिए-

दिन जीते जैसे सम्राट, चैन चाहिए कंगालों की।
रहते मगन रंग महलों में, ख़बर नहीं भूचालों की।
 
तरु के नीचे श्रमकर सोये, पत्थर की शय्या पर।
दिन भर स्वेद बहाया, अब घर लौटे हैं थककर।
शीतलता कुछ नहीं हवा में, मच्छर काट रहे हैं।
दिन भर की झेली पीड़ाएं, कह-सुन बांट रहे हैं।
अम्बर ही बन गया वितान, चिंता नहीं दुशालों की।


 

जब से अर्ज़ा महल, तभी से तुमने नींद गंवाई।

सुख सुविधा के जीवन में, सब आया नींद न आई।
कोमल सेज सुमन सी, करवट लेते रात ढ़लेगी।
समिधा करो कलेवर की, तब यह जीवन अग्नि जलेगी।
दुख शामिल रहता हर सुख में, उक्ति सही मतवालों की।

किसी काम का नहीं, अनर्जित जीवन में जो आया।
सुख व शांति उसी ने पाई, जिसने स्वेद बहाया।
सार्थक सृजन हेतु करना है, त्याग हमें आराम का।
पर अब तक जो जिया अलस, वह जीवन है विश्राम का।
सुख सुविधाओं के जंगल में, गुंजलिका जंजालों की।

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

दुर्नामी लहरें

 

आजकल मन में भावनाऒं का सैलाव उठा है। जब बात झकझोड़ती है तो मन उद्वेलित हो जाता है। फिर भावनाओं का आवेग सारे बांध तोड़ उमड़ पड़ता है। जैसे सुनामी!

प्राकृतिक आपदाओं में सुनामी अब बड़े पैमाने पर जान-माल की तबाही का पर्याय बनने लगी है। छह साल पहले 2004 में देश के पूर्वी तट पर आए सुनामी में लाखों लोगों की जिंदगी तबाह हो गई थी। लाखों लोगों ने अपना सब कुछ गंवा दिया था।

१४ अक्तूबर को वर्ल्ड डिजास्टर रिडक्शन डे (World Disaster Reduction Day) मनाया जाता है। उस दिन तो हम देसिल बयना लेकर आएंगे।  इसलिए आज ही उस पर विशेष प्रस्तुति करने का मन बन गया। सुनामी के कहर के बाद एक कविता लिखी थी। आज वही प्रस्तुत है।

दुर्नामी लहरें

IMG_0130मनोज कुमार

हुई पुलिन1 पर मौन,                                  1. पुलिन :: जल के हट जाने से निकली जमीन

उदधि की प्रबल तरंगे

           सिर धुनकर।

हतप्रभ है जग,

अब वसुधा की

विकल वेदना सुन-सुनकर।

 

अण्डमान की वह रसवन्ती,

देह हो गई क्षत-विक्षत।

ले अंतिम उच्छ्वास मौन है,

जड़-चेतन मय जीव-जगत।

लहरों के

घातक करघे से,

मौत गई बरबादी बुनकर।

 

थमी तरंगों पर पतवारें,

शिथिल हुई कमज़ोर मुट्ठियां।

शिशुओं के मुख, माताओं के

आंसू की भर गई घुट्टियां।

विधना ने खारा जल सींचा

सबकी

पलकों पर

                चुन-चुनकर।

 

आज नियति जीवन की,

टूटे नक्षत्रों जैसा भटकाव।

डोल रही धरती ख़बरों से,

आज यहां कल वहां पड़ाव।

उठे हाथ,

फिर गिरे जानु पर

अपना ही सिर धुन-धुनकर।

 

आशा जीवन की रही नहीं,

न साधन है न कोई साध्य।

पीड़ाओं के बस पहाड़,

नित नई मौत मरने को बाध्य।

बुझी हुई आंखों में सपने

मरते जाते

                घुन-घुनकर।

(चित्र आभार गूगल सर्च)

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

मैं गया था अपने गांव --- मनोज कुमार

एक कविता पढ़ी थी। स्‍कूल के दिनों में। राष्‍ट्रकवि स्‍व. मैथिली शरण गुप्‍त की।

अहा ग्राम्‍य जीवन भी क्‍या है ?

क्‍यों न इसे सबका मन चाहे.....

तब यह काफी भाता था। तब यह कहा जाता था, भारत देश है कृषि प्रधान। हम है उसकी संतान। लहलहाती इसकी धरती है। भारत की आत्‍मा गांवों में बसती है। आज...... ? बीस बाइस सालों से देश के विभिन्न भागों में बिहार की मिट्टी से दूर रह्ते हुए पीछे छूट गए गांव की जबर्दस्त कसक सताती है। ग्रामीण परिवेश में पला-बढ़ा, शिक्षा-दीक्षा की शुरुआत हुई सो उसके प्रति ममता हृदय से गई नहीं हैं। गांव की सादगी, ईमानदारी और अपनापन बार-बार अपनी ओर आकर्षित करता रहता है। अपने गांव की स्मृतियां ही वह पूंजी है जिसके बल पर कई ऐसी कविता या कहानी लिख डाला। मेरे जैसे बहुत से ऐसे लोग हैं जो शहर को मिथ्या और गांव को सत्य मानते हैं। पर आज का सत्य तो बड़ा कठोर, निर्मम और क्रूर है।

किसान किसान का पेशा अगर आपने अपना लिया तो आपका परिवार भूख से, बिमारी से बेबसी ओर लाचारी से तड़प तड़प कर मर जाएगा। आए दिन किसानों की आत्‍महत्‍या की खबरें देखने-पढ़ने को मिलती हैं। गांव की धूल मिट्टी भरी आवो हवा और गोबर की दुर्गंध ने वहां के युवकों को पलायन हेतु प्रेरित किया है। चर-चांचर की ज़िन्दगी से चंद रूपयों की चाकरी भली। झींगुरदास का बेटा तो अपनी परिवार के बोझ तले एवं जानलेवा बीमारी के दर्द से इतना परेशान हुआ कि रेल में कट कर अपनी मुक्ति पा ली।

पर जब आठ साल के अंतराल पर (हैदराबार के निकट एद्दुमैलारम की अपनी पोस्टिंग के वक्‍त) अपने गांव गया था, अहा ग्राम्‍य जीवन का आनंद लेने तो झींगुरदास का छोटा बेटा मुनिया समस्‍तीपुर रेलवे स्‍टेशन से गांव तक की 12 किलोमीटर की हमारी दूरी तय कराने तांगा लेकर आया था। रास्‍ते में बोल रहा था, “आब गाम कोनो रहई वाला छई? धुत्त! मूरूखे ओत्तs रहतई। हमहूँ सोचई छियई समसतीयेपुर चइल एबइ।”

गांव की मिट्टी से लगाव नहीं। लोग करें भी तो क्‍या? मूलभूत सुविधाओं का सर्वथा अभाव, महंगी होती कृषि सामग्री, फसलों का उचित मूल्‍य न मिलना और ऊपर से प्राकृतिक आपदाएं बाढ़ आदि ने तो वहां के लोगों का जीना दूभर कर दिया है।

विधालय, चिकित्‍सा और बिजली पानी की समस्‍या इतनी विकराल है कि लोग शहर की ओर भाग रहे हैं। इसी ब्‍लॉग के एक योगदानकर्ता करण समस्‍तीपुरी से बेहतर इस समस्‍या का भुक्‍तभोगी कौन होगा। उन्होंने गांव में रहकर इन सब समस्‍याओं से जूझ कर स्‍नातकोत्तर की न सिर्फ पढ़ाई की। विश्‍वविद्यालय में अव्‍वल आए। यह तो भला हो उस पुश्‍तैनी साइकिल का, जो इनके पिताजी ने इन्‍हें दे दिया था, सो शहर से गाव की दूरी इन्‍होंने गांव में रह कर तय करली वरना काला अक्षर से दूर रहते और काली भैंस इनके पास न होती।

गौशाला-१ शहरीकरण का प्रसार इस तीव्र गति से हो रहा है कि गांव की सभ्‍यता बुरी तरह संक्रमित हो रही है। गांव में पहले चौपाल होती थी, पेठिया पोखर होते थे, पनघट कुंआ, दालाना बथान। सब प्रायःगायब होते जा रहे हैं। जब मैं अपने बच्‍चों को गांव के पेठिया में झिल्‍ली बड़ी कचरी खिलाने के प्रलोभन से ले गया तो वहां पेप्सी की मौज़ूदगी ने अहा! ग्राम्य जीवन का मेरा सारा उत्‍साह ठिकाने लगा दिया।

घोघ तानने (घूंघट डाले) झरझरी वाली मेरे चेहरे पर की लकीरें पढ़ते हुए बोली, “बउआ की तकई छियई ।....... अब किछो नई भेटत । सब गेलई.......बज़ार!”

गांव जब जा रहा था तो मन में था कि अभी भी वहां गांव का बहुत कुछ बचा होगा और जब लौट रहा था तो स्पष्ट था कि वहां से बहुत कुछ विलुप्त हो चुका है। मेरे मन में प्रश्‍न था कि हम गांवों को आत्मनिर्भर, सुंदर और सुविधा-संपन्न क्यों नहीं बनाना चाहते थे? अब तो वह सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन भी नहीं हैं जिसकी कामना करके मैं वहां गया था। फिर सोचता हूँ गांव किसके लिए हैं? युवक वर्ग वहां रहना नहीं चाहते। अवसर ही नहीं है। उसकी तलाश में वे शहर भागते हैं। गांव से आ कर जो लम्बे समय तक शहर में रहे, वे गांव लौटना नहीं चाहते। गांव में रहने वाला मुनिमा भी अब गांव में रहना नहीं चाहता। जुगेसर ने शहर में सैलून खोल ही लिया है। हां, झींगुरदास की तरह के अभिशप्त लोग ही रहते हैं गांव में।

21 साल की नौकरी के बाद भी किसी शहर में न ज़मीन ली है, न मकान। शायद रिटयर होने के बाद गांव में ही रहूँ, कह नहीं सकता। वहां से लौट कर, आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद में, तब एक कविता लिखी थी, उस ग्राम्‍य गमन के पश्‍चात! पेश है।

मैं गया था अपने गांव


बरसों के बाद गया

मैं अपने गांव,

क्या करता छू आया

बस बड़ों के पांव।

KONICA MINOLTA DIGITAL CAMERA गौशालों की गंध से

थी सनी हवाएं,

छप्परों पर धूल सी

जमी मान्यताएं।

स्वेद सिक्त, श्रमरत,

सर गमछे की छांव।

सूरज तो भटक गया

शहरों की भीड़ में,

चांदनी भी फंस गई

मेघ की शहतीर में।

खोजते हैं शहर

वहां अपने ही दांव।

गौशाला-२ मक्खियाँ तक अब नहीं

करती हैं भिन- भिन,

आम के दरख़्तों पर

ठिठुरे से दिन।

सब गए शहर कहे

अम्मा की झाँव।

सिकुड़ी आँखों झुककर

झांके झींगुर दास,

पेठिये के शोरगुल पर

मण्डी का उपहास।

कब्बार के कोने उपेक्षित

दादाजी की खड़ाउँ।

कुंआ झुर्रियों ढपी आंखें

सपने अब शेष नहीं,

शहर इन गांवों को

छोड़ आया दूर कहीं।

इनारों की जगत पर

शाम का ठिठकाव।

मंगलवार, 9 मार्च 2010

मन तरसे इक आंगन को

-- मनोज कुमार

हुआ असह्य अब एकाकी

यांत्रिक जीवन, आपाधापी !

मिले जो कुछ मनभावन को,

मन तरसे इक आंगन को !


ओसारे पर की बैठक,

बहुओं की चुहलबाजियां !

ननदों की शरारतें

देवरों की मस्तियां !!

सासों के ताने,

ससुर का खांसना !

बधुओं का घुंघट से,

शर्माकर झांकना !!

देना इशारे छुप-छुप कर,

सजनी का साजन को !

मन तरसे इक आंगन को !!


शहर के फ्लैटों में,

अपना सा आंगन नहीं !

बालकनी से झांकते,

अपरिचित से चेहरे कहीं-कहीं !!

कॉरीडोर की खुसर-पुसर,

लिफ्ट का एकाकीपन !

कंक्रीट के इस शहर में,

ढ़ूंढ़ता बेवश मन !!

सर्द, शोख, चंचल, हवाएं,

छूकर जाए दामन को !

मन तरसे इक आंगन को !!


अपने-अपने मन का संत्रास,

दिल की व्यथाएं !

ड्राइंग रूम की साजिशों में,

दबती चौपाल की कथाएं !!

आंगन का तुलसी चौरा,

सिमटकर गमले में बंद !

सुमनों की सुरभि की जगह,

इत्र की शीशी का मकरंद !!

आग उगलती धरती,

क्या हो गया, सावन को?

मन तरसे इक आंगन को !!


वहां,

छप्परों पर फैली कद्दुओं की लत्तियां !

यहां,

दो-चार मणीप्लांट की हरी-हरी पत्तियां !!

वहां,

होली में गांव भर की भौजाइयों का,

आकर रंगों से सराबोर कर जाना !!

यहां,

पड़ोस के शर्माजी का, माथे पर,

गुलाल का छोटा-सा टीका लगाना !

औपचारिकता के बीच खोजे,

मानवता के आनन को !!

मन तरसे इक आंगन को !!

*** *** ***

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

त्यागपत्र : भाग 13

पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, "राघोपुर की रामदुलारी का परिवार के विरोध के बावजूद बाबा की आज्ञा से पटना विश्वविद्यालय आना! फिर रुचिरा-समीर और प्रकाश की दोस्ती ! गाँव की गोरी रामदुलारी अब पटना की उभरती हुई साहित्यिक सख्सियत है ! किन्तु गाँव में रामदुलारी के खुले विचारों की कटु-चर्चा होती है ! उधर समीर के पिता के कालेज की अध्यापिका रुचिरा का आकर्षण समीर के प्रति बढ़ता ही जा रहा है ! अब पढ़िए आगे !!

-- करण समस्तीपुरी


मंद-मकरंद रथ पर सवार सरस बसंत साक्षात विहार कर रहा था राघोपुर गाँव में। गेहूं के पौधे ठूंठ भर बड़े हो गए थे। नन्हे गेहूं के दूर-दूर तक फैले खेतों में श्रमसाध्य किसान हरी मखमली चादर पर कलरव करते बालवृन्द से प्रतीत हो रहे थे। उस पर पीले फूलों से लदे सरसों के तरुण पौधे........ आ...हा...हा...! क्या नयनाभिराम दृश्य है! मानो शस्य श्यामला वसुंधरा धानी चुनर ओढ़ के अंगराई ले रही हो। आम में मंजर लग गए हैं.... महुआ का यौवन भी फूट पड़ा है......... उसकी गंध विहग-वृन्द को रात्री में भी निश्चिन्त नहीं सोने देते। प्रजापति बाबू की पसरी अमराई में बसंत दूत भ्रमर का अविराम गुंजन चल रहा है। लेकिन आज मोहल्ले में कोई और चर्चा गरम थी।



प्रजापति बाबू के परोसी हैं स्वरुप चौधरी। घर-परिवार समृद्ध है लेकिन परोसी की तरह लक्ष्मी चेरी नहीं हैं। दोनों परिवारों में उपरी मित्रता अपनेपन के हद तक है किन्तु महान बनाने के अवसर से कभी नहीं चूकना चाहते। बात अलग है कि ऐश्वर्या और ख्याति के बदौलत प्रजापति बाबू का परिवार होर में हमेशा आगे निकल जाता है। लेकिन आज संयोग सुन्दरी स्वरुप चौधरी के परिवार के साथ हैं। दोपहर का वक़्त है। चौधुरी जी भोजन कर के तम्बाकू में चाटी मार रहे हैं। बड़ा पुत्र गाँव में ही गेहूं पीस कर आंटा निकालने का मशीन चलता है। मझिला समस्तीपुर कचहरी में मोहरीर है और सबसे छोटा लहेरियासराय में डाक्टरी पढता है। परतापुर वाली चाची बँगला पान में गमकौआ जर्दा डाल कर चबाते हुए आँगन में अरहर सुखा रही हैं। बड़की बहुरिया हाथ-मशीन पर नयका आलू का चिप्स काट रही है और मझली बहू सीम के अंचार में तेल डाल रही है।


बाहर से व्यंग्य भरी खनकती आवाज आती है, "छौरा-छौरी के राज हुआ.... कुत्ता कोतवाल हुआ... !!" हा...हा...हा... ! जब भी खनकती कहावत कानों में पड़ती है, राघोपुर वालों को समझते देर नहीं लगती की हायाघाट वाली ओझाइन आ रही हैं। चूरी खनकाते बेधरक आँगन में घुसते हुए ओझाइन बोली, "कहाँ छियैक ऐ परतापुर वाली कनिया.... अए........... कि सब सुनै छियैक यै...... एँ.... जे कहियो नहि से लोहिये में.... नया जमाना के नया किस्सा.... !!" एक सांस में ही ओझाइन बोले जा रही थी। तभी परतापुर वाली चाची पैर छू कर पीढ़िया आगे करती हुई बोली, "कि बात छैक ओझाइन... ? आई बड़ चहकि-चहकि के फकरा सभ पढि रहल छथिन्ह ! कनेक दम्म ध' लथु।" ओझाइन बोली, "हाँ ऐ कनिया ! ठीके कहै छी... हम सभ त' दम्मे धेने छी लेकिन अहाँ सब कखन दम्म धरब... ? अए...किछु सुनलियैक कि नहि.... ?" "से की ?" अब चाची की जिज्ञासा भी चरम पर थी।



बड़ी बहू बीड़ी ले कर ओझाइन की सेवा में हाज़िर थी तो मंझली कैसे पीछे रहती.... माचिस तो वही ला रही थी। श्रोताओं को गंभीर देख ओझाइन भी गंभीर हो गयी। बोली, "अहाँ सबहक नहि पता अछि.... अच्छा इम्हर आऊ ! दीवारों के कान होयत छैक। केहु सुनी नहि लैक.... ! ओझाइन की आवाज़ मद्धिम और भाव-भंगिमाएं तीक्ष्ण हुई जा रही थी। तीनो सास-बहू ओझाइन को घेर कर बैठ गयी। ओझाइन ने प्रवचन शुरू किया, "सासू कोहबर आ पतोहू दरबार ! आब त' गामो के बेटी-पुतहु सभ हाई कोट पटना जाएत।" ही....ही...ही... मंझली बहू हंसी नहीं रोक पायी जबकि मुस्कराहट तो सभी होंठों पर तैर गए। ओझाइन ने कहना जारी रखा, "अए... गोबधनमा के बेटी पटना मे अकेले रही छैक? जवाब में चाची ने सिर्फ अपनी गर्दन को ऊपर नीची हिला दिया। फिर ओझाइन कहने लगी, "देक्खियाऊ.... आ हे.... सुनै छियैक जे ओ कोट-पैंट पहिन के कौलेजिया छौरा सभ के साथे घुमैत-फिरैत छैक... !" परतापुर वाली चाची तो चौंक ही गयी। बोली, "नहि यै ओझाइन, रमदुलारिया एना नहि कए सकैत छैक....!" तुरत ओझाइन का व्यंग्य-वां छूटा, "अ धुर्र.... लुटती लागौक हम्मर मुंह में। केओ विश्वास नहि करत त' हम अपने मुंह किये खाली करू ?" व्यग्रता के साथ चाची बोली, "नहि यै ओझाइन ! कहथुन ने...।" फिर ओझाइन कहने लगी, "अहाँ सभ के विश्वास नहि होएत अछि ने... ? मुदा बटेसरा ओकरा अपना आंखि से देखलकैक एगो छुरा साथे बोतल पिबैत.... आ अहाँ से कहै छियैक... खेरवन वाला बैजुआ त' कहैत रहैक जे गोबधनमा के बेटी त' इस्टेज पर नाच्बो कराइ छैक.... दाई गे दाई.... केहन ज़माना आबि गेलैक..... ?" ओझाइन बीड़ी का लम्बा सा कश खींच कर धुंआ उगलते हुए बोली, "लेकिन हे कनिया ! अहाँ सब के हमरे शप्पथ, ई सभ बात केकरो कहबई नहि!"



ओझाइन तो गयी, लेकिन चर्चा चौधुरी जी के आँगन से दालान तक पहुँच गयी। आखिर परतापुर वाली चाची भी कितनी देर तक उदार-ताप सहती...? तभी सड़क पर जा रही फुलवरिया वाली पर नजर पड़ीं। उसे आवाज़ लगा कर बुलाया... फिर ओझाइन का सारा कथोपकथन उड़ेल दिया... और हाँ ! ये निर्देश देना नहीं भूली कि "हे केकरो कहबै नहि!" फिर चाह-बीड़ी के साथ दोनों में बड़ी देर तक गहन मंत्रणा चलती रही।



सांझ में पानी भरने के लिए आयी कोनैला वाली के मुंह पर आज एक अजीब रहस्यमय मुस्कान थी। लेकिन चेहरे पर एक अंदेशे की चादर भी थी। आखिर रामदुलारी की माँ ने पूछ ही लिया, "कि बात छैक यै...?" कोनैला वाली ने कहना शुरू किया, "कनेक देर पहिने बाबा के चूना लाबी फुलवरिया वाली ओतय गेल छलियैक... ओहि ठाम रामदुलारी बौआ के बारे में सब कि-कि नहि बजैत रहैक.... !" फिर कोनैला वाली ने सप्रसंग व्याख्या पूरी अभिव्यक्ति के साथ रामदुलारी की माँ को सुना दिया। छोटी चाची भी बड़े मनोयोग से कोनैला वाली की फुसफुसाती आवाज़ सुन रही थी। "हम जे सुनली सैह कहै छी चाची..." इतना कह कोनैला वाली दोनों घरा उठा कर कुँए पर चल पड़ीं। माँ और चाची अपने अपने कमरे की ओर मुड़ गयी।



"खेत से आये गोबर्धन बाबू की आवाज़ कड़की। 'कहाँ मर गए हैं सब... दिया-बत्ती का समय हो गया और कोई दिख नहीं रहा है। अभी तक बाबू को चाह भी नहीं दिया है... ! हमलोग खेत में खट-खट मरें... इन औरतों का कुछ जाता है.... इधर-उधर टल्ली मारे फिरती हैं। रामदुलारी की माँ अपने कमरे से बाहर आयी। आँखें सूजी हुई थी। प्रौढ़ कपोल पर आंसू अभी भी झलक रहे थे। उन्हें देखते ही गोबर्धन बाबू का गुस्सा काफूर हो गया। करीब जा कर हौले से पूछे, "का बात है ? रो काहे रही हो ?" लेकिन उर्मिला कुछ बोल नहीं सकी। उसके कुढ़न अब गले फार रहा था। उधर द्वार-पर चुप-चाप खड़े छोटे चाचा पत्नी का इशारा पाकर अपने कमरे में जा चुके थे। बाबा भी आँगन में आ गए। कुछ देर में गिरधारी अपने कमरे से निकले। फिर जो रहस्योद्घाटन उन्होंने किया उससे प्रजापति बाबू के आँगन में कोहराम मच गया। गोबर्धन, गिरधारी, उर्मिला.... सबकी विचलित आँखें दोषारोपण की मुद्रा में बाबा पर उठी।



बाबा बिना कुछ बोले आँगन से बाहर आने लगे। पसीना उनकी पेशानी पर भी आ गया था लेकिन कुछ बोले नहीं। द्वार पर आ कर सिर्फ सिर्फ इतना ही कहा था, "गोबर्धन ! गिरधारी !! मेरी कोठारी में आ जाओ !"



क्या होगा अब ? बाबा का विश्वास रहेगा कायम या कोप बन कर टूटेगा रामदुलारी के सपनों पर ?? जानने के लिए पढ़िए अगले हफ्ते इसी ब्लॉग पर !!

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

तेरी याद सताए

--मनोज कुमार

खिले धूप, यदि छटे कुहासा
फिर बगिया लहराए,
देखें जब हरियाली अंखियाँ
रूप तेरा मन आये,
सरदी के इस मौसम में अब
तेरी याद सताए।


होठों पर हैं कम्पन,
लेकिन गीतों के बोल नहीं,
घना कुहासा,व्याकुल मन है
व्याकुलता अनमोल नहीं?
किरणों-की मुस्कान तिहारी
उसको धुंध छिपाए,
सरदी के इस मौसम में अब
तेरी याद सताए।

घने धुन्ध में रूप तुम्हारा
सिमट-सिमट कर आया,
जिसे देख भारी होता मन
थोड़ा सा शरमाया।
सुरभि तुम्हारी तिरे चतुर्दिक्
पवन उसे बतलाए,
सरदी के इस मौसम में अब
तेरी याद सताए।

द्वारे सजी रंगोली रह-रह
मुझ से करे ठिठोली,
बूंद ओस की झूल रही है,
पाती-पाती डोली।
मधुर मिलन की मनोकामना
मन ही मन इठलाए,
सरदी के इस मौसम में अब
तेरी याद सताए।

सूरज को तो गहन लगा है
दिल में बढा अंधेरा,
दोपहरी में मध्य निशा ने
डाल रखा है डेरा ।
तेरा रूप रोशनी माँगे
झलक जो तू दिखाए,
सरदी के इस मौसम में अब
तेरी याद सताए।

*****