सोमवार, 12 अप्रैल 2010

बरसात का एक दिन!

-- मनोज कुमार

कलकत्ता में वर्षा झट से आती है और जमके बरसती है। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। डेली यात्री के हाथ में बांए कंधे पर बैग और दाएं हाथ में छाता आवश्‍यक सामग्री है। धर्मतल्ला पर बस से उतरते ही जोर की वर्षा शुरू हो गई। जब तक छाता खोलते थोड़ा बहुत भींग ही गए। पर इतनी मूसलाधार बारिश थी कि खुद को बचते बचाते फुटपाथ पर आश्रय लेना पड़ा। बहुत सारे लोग थे। एक दूसरे से चिपके पानी की बूंदो से खुद को बचाते। कुछेक महिलाएं भी थी, पानी की बूंदे तो उन्‍हें परेशान कर ही रही थी लोगों की नजरों एवं उनकी हरकतों से भी उन्‍हें खुद को बचाना होता था।

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तभी एक खूबसूरत शोड़षी पर नजर पड़ी। सावन के इस सुहाने मौसम में उसकी दुबली पतली काया पर पीत वस्‍त्र मानों सरसों के खेत में गुलाब का फूल। शायद उस दुकान के सामने की जगह में पचासों लोगों की घूरती निगाहें उसे विचलित कर रही थी। या और कोई विवशता थी, पता नहीं पर वह बार बार इधर उधर देख रही थी और कुछ क्षणोपरांत धीरे-धीरे सरकते – सरकते मेरे बगल में आ गई।

मध्‍यम किंतु मीठे कोकिल स्‍वर में बोली, “तुम्‍हारे पास छाता है।”

“हूँ।” मैं थोड़ा सकुचाया। वहां की सैंकड़ों जोड़ी आंखे अब मुझपर भी शिफ़्ट हो गई थी। उस सुदंरी के संग मैं था, कहना सही नहीं होगा, पर मेरे पास वह थी, यह वहां के मौसम में इर्ष्‍या घोलने के लिए काफी था।

वह मेरी ओर देखी। मैं सकुचाया और नीचे देखने लगा। पर मेरे हृदय की धड़कने बेलगाम हो चुकी थी कूद कूद कर घोषणा कर रही थी , लव ऐट फ़र्स्ट साइट! ऊँह! अहा!! और मैं मन ही मन प्रसन्‍न, इन्‍द्र देवता को बार बार आभार प्रकट कर रहा था, “सब प्रभू आपकी कृपा है।”

वह बालों में घुस आये जलकण को झटके से दूर करती बोली, “छाता है, ... तो यहां क्‍या कर रहे हो? .. चलो यहां से! उस समय वह इन्‍द्रसभा की अप्सरा ही तो लग रही थी। पीली साड़ी के साथ नीला ब्‍लाऊज और गुलाबी चोटी भी अब मुझे दिखा। लाल लिपिस्‍टिक वाले होठ के पीछे से मोती से भी सफेद दंत पंक्तियां मेरे सौभाग्य की पराकाष्‍ठा का ऐलान कर रही थी। मैनें साथ निकल पड़ने की सारी इच्‍छाओं के बावजूद कहा, “पर इतनी बारशि में भींग जाएंगे!”

“कुछ नहीं होगा। यहां जो सारे घूर रहे हैं! सब जलेंगे, जब तुम मेरे साथ चलोगे! चलो ना, मजा करते हैं!!” वह इठलाते हुए बोली।

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मैं उसके सौदंर्य के जादू, यौवन की तपिश और व्‍यक्तित्‍व के आकषण में ऐसा खोया कि मुझे कुछ अंदाज नहीं रहा कब मैं उसके साथ सड़क पर आ गया। उस वक्‍त धर्मतल्‍ला पर मौजूद सबसे खूबसूरत लड़की मेरे छाता में घुसी! मुझे अपने भाग्‍य पर यकीन ही नहीं हो रहा था! यह सच था कि वह तब तक मेरे छाता में आ चुकी थी। फिर हम दोनों छाता में थे। फिर वह मेरे छाता में थी और मैं उसके साथ था। फिर छाता उसके हाथ में था और मैं छाता में था। फिर वह छाता में और मैं साथ में था। फिर वह छाता में थी और मैं उसे देखता हुआ पीछे-पीछे वर्षा की बूदों का मजा ले रहा था। वह काफी तेज गति से सड़क पार करती जा रही थी। मैं उसे धीमी गति से पकड़ने की कोशिश कर रहा था। वह आगे और आगे गई। मेट्रो सिनेमा के नीचे उसने आश्रय लिया। इधर-उधर देखने लगी। मैं सोचा मैं पीछे रहा गया था, शायद मुझे खोज रही हैं। मैं लपक कर वहां पहुंचा। तब तक दूसरी तरफ़ से एक युवक आया और उससे बोला, “कहां रह गई थी? मैं कब से वेट कर रहा था।”

“वर्षा में फंस गई थी। ये तो इन भद्र पुरुष, का छाता मिला717049-51896, ...तो चली आई।” वह उस आ चुके युवक का हाथ पकड़ कर बोली, “चलो-चलो! पिक्‍चर शुरू हो गई क्‍या.......?” फिर वह मेरी और पलटी, छाता थमाया और बोली, “थैंक्‍यू दादा।”

मैं मेट्रो के बाहर छाता मोड़ कर वर्षा के जल में भींगता धीमी गति से आगे बढ़ रहा था। न मुझे कहीं जाने की ज़ल्दी थी और न मैं ज़ल्दी में था।

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25 टिप्‍पणियां:

  1. खैर की ऐसी ही बात हुई ..आपने धर्मतल्ला कहा मैं डर गई थी .. वहां पर शाम में अलग ही नज़ारे होते हैं

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  2. कभी कभी भलाई भी करना पडता है.
    बढिया लगा यह आलेख/संस्मरण.

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  3. ये बरसात तो बड़ी तुषारापात कर गयी आपके ख्यालों पर.....बढ़िया संस्मरण....उस युवती का पिक्चर हाल में जाने का और आपके चेहरे पर आये भावों की कल्पना कर रही हूँ....:):)

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  4. हाय राम............ ! मैं तो इसे कहानी समझ रहा था लेकिन पाठकों की बहुसंख्य प्रतिक्रिया से पता चला कि ये आपका संस्मरण है........... अब तो अल्लाह खैर करे..... !!!!! कथा है तो थोड़ी उलझी हुई लेकिन अच्छी !!!! इस कथा पर आचार्य परशुराम राय की समीक्षा की प्रतीक्षा रहेगी !!!!!! धन्यवाद !!!!!!!!!!!

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  5. Wah wah Manoj ji...kya barish hui hogi... kya mulakat rahi hogi...very romentic story...mujhe to comedy bhi lagi aur padhkar maja aaya...
    Manoj Ji ab to mai bas apki dharampatni ke comment ka wait kar rai hun :)

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  6. @रचना जी ई कहानी उनको पढने के लिए कहा। उनका कमेट इस प्रकार है
    "मार बढनी के! त आज हमकॊ पता चला, ऊ जे आलमारी में छत्ता लटका रहता है, कोनो बरसात में बाहर काहे नहीं नहीं निकलता है।"

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  7. @ करण जी
    -- इसे कहानी ही समझा जाए।
    --- परशुराम जी की राए ही लीजिए।
    ---- समीक्षा तो श्रीमती जी किए ही जा रहीं हैं।

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  8. आप लोग इतने भोले क्‍यों होते हैं? रास्‍ते चलती ही आपको बेवकूफ बना जाती है और अन्‍त में दादा। बढिया रही, लेकिन उसकी दाद देनी पड़ेगी जो भीड़ में भी उसने सबसे भोला जीव ढूंढ ही लिया। हा हा हा हा।

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  9. थेन्क यू दादा .... और बरसात का सारा पानी घड़ो भर भर कर उसके ऊपर गिर गया ...
    भाई आपकी कहानी के पेच में बहुत मज़ा आया ....

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  10. ....बहुत सुन्दर ...लाजबाव... अदभुत अभिव्यक्ति!!
    ....काश छाता अपने पास भी होता क्योंकि हम भी वहां खडे थे ...भले ही बाद में छाता फ़ेंक कर भीगते हुये घर जाते!!!

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  11. वाह क्या नजारा था,लगे रहे कभी तो (बरसात)शामत आएगी।

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  12. यदि संस्‍मरण है तो कुछ नहीं कहना. आपने लिखा, हमने देखा. एक तो बेबाकी के लिए बधाई. दूसरे, ऐसे मिलते-जुलते संस्‍मरण हर किसी के ज़हन में होते हैं पर ऐसे ही पढ़ते-पढ़ाते सब याद आने लगते हैं. इन्‍हे याद दिलाने के लिए धन्‍यवाद्.

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  13. फिर वह मेरी और पलटी, छाता थमाया और बोली, “थैंक्‍यू दादा।”
    बहुत सुन्दर चित्रण |

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  14. वाह ...बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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  15. बहुत ही रोचक प्रस्तुति. आभार...
    सादर,
    डोरोथी.

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  16. मनोज जी बहुत ही खूबसूरत तरीके से आपने बरसात में होने वाले एक रोमांटिक तथ्य को सामने रखा है जो बहुत ही अच्छा संस्मरण है अब आप अपनी ऐसी ही सुन्दर रचनाओं को शब्दनगरी पर भी लिख सकते हैं वहां पर भी वर्षा सुन्दरी के प्रतिलिख व पढ़ सकते हैं..........

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