बुधवार, 13 अप्रैल 2011

देसिल बयना – 76 : तेल न कराही , तलने चले मिठाई

-- करण समस्तीपुरी

“सबहि मन बसै सरजू तीर चैत के महीना। सबहि गांव अयोध्या नगरी। 'घर-घर बाजे बधैय्या हो रामा लिहले रामजी जनमवाँ।’ रामजी के जनम हुआ है... घर-घर बधैया बजेगा। रामनवमी खाली चिकनपुर का बपौती नहीं न है। आजहि मुखियाजी से बात करके पेठिया गाछी में मेला लगा देंगे। चनगछिया वाला कीर्तन मंडली को तो जब कहेंगे, आके झमका देगा। बात करते हैं....! रामनवमी मेला में रेवाखंड को रोकेंगे....! मेला का गुमान है तो इस बार उसी का भट्ठा बैठा देते हैं।” पछारन सिंघ ताल ठोक कर गरज रहे थे। सरपंच बाबू गर्दन हिलाये तो पीछे-पीछे झलकु ठाकुर, महंगी मिसिर, मूसन बबाजी और सिद्धू कक्का भी हुंकार भरने लगे।

रामनवमी का मेला चिकनपुर में ही लगता था, सालों से। पूरे जवार-तहसील में नामी। इलाका-फ़ेमस। मगर गये लगन में कुछ बराती-सराती का लफ़रा हो गया था। चिकनपुरिया बराती को रेवाखंडी सराती कुछ ज्यादे मान-दान कर दिया था। बेचारे इतने खुश हुए कि बोले, “ई रामनवमी में सारा कर्ज उतार देंगे।” गंडक पार वाला खिखरा हजाम के इतना बताते ही रेवाखंडी रंगो में गरम खून दौड़ने लगा था।
आनन-फ़ानन में मुखियाजी से बात हुई और मूसन बबाजी पेठिया-गाछी में हनुमानजी का धाजा गाड़ के बैठ गये। एक्कहि हफ़्ता में सारी तैय्यारी हो गयी। शनिचर हाट में तो जौन आये उको पता लगिये गया और बांकी अगल-बगल में माधोराम डिगडिगिया भी पीट आया था, “डिगा-डिग-डिगा-डिग-डिगा-डिग.... ई बार रेवाखंड पेठिया गाछी में रमरम्मी का धमाचौकरी मेला लगेगा... डिगा-डिग!”
सरपंच बाबू, पछारन सिंघ, झलकु ठाकुर, महंगी मिसिर, मूसन बबाजी और सिद्धू कक्का वगैरह तो पूरा जोर लगा दिये थे। दू-चार दिन गये फूस का टाट घेर कर छोटका-छोटका गोसाईं बाबा को भी स्थापित कर दिये और मूसन बबाजी अपने महंथ होके बैठ गये। रुपचनमा डंडा में फुक्का (गुब्बारा), पिपही और बांसुरी बांध के बेचने के लिये आ गया। खुटेरिया मट्टी के चकरी, चुकरी (गुल्लक), डंफ़ा, सिपाही, और हनुमानजी बना के ले आया था। रमभरोसिया कांधे में कटही बक्सा लटकाये चना-जोर-गरम बेचने आ गया। बुधन साह मूढ़ी-बतासा लेके बैठ गया। उकी जनानी बगले में चूल्ही जोर के कचरी-झिल्ली बना रही थी।

पेठिया गाछी के उतरवारी छोड़ पर खेलावन का नाच पाटी बिहुला का मंच बांध दिया था। फुसही मंदिर के दहिना साइड में चनगछिया के कीर्तन मंडली का परोगराम था। पछियारी छोड़ पर मोगली नट का जादूगर टीम डेरा जमा लिया था। कलकत्त्ता से झूला वाला भी आया है। मनोरंजन का पूरा इंतिजाम। यही तो रेवाखंड की खासियत है। जब औकात पर आ जाये तो सबको औकात दिखा दे। सारी व्यवस्था हो गयी है। रंग-विरंगी बंदनवार-पताका भी खूब लहर रहा है। अब बस अगले दिन ही रामनवमी है। पूरा गांव जुटेगा।

झलकू ठाकुर महंगी मिसिर मूसन बबाजी के साथ पूजा-पाठ की तैय्यारी में लगे हैं। इधर पछारन सिंघ और सिद्धू कक्का अलगे परेशान हैं। काहे रे भाई.... ? तो मेला में सब खेला तो हो गया मगर, जिलेबी कौन बनायेगा ? सगरे इलाका का हलुवाई तो महीना दिन पहिलहि से चिकनपुर में अपना-अपना जगह छेक के चूल्हा बना आया था। अब इहां कौन आये... ? पुराना मेला को छोड़कर नया में आने का रिस्क कौन ले ? आखिर क्या गारंटी है... ? लोग-वाग तो चिकनपुर को जानते हैं..... इहां कहीं पूंजी भी न डूब जाए।
खोजते-खोजते खादी भंडार वाला लटपटिया चाह वाला तैय्यार हुआ। हलांकि सिद्धू कक्का को विश्वास नहीं हो रहा था मगर पछारन सिंघ बोले अरे का होगा ? थोड़ा टेढ़ा-मेढा ही होगा ना... लेकिन नहीं मामा से तो काना मामा ठीक। लटपटिया भी ताल ठोक कर बोला, “खेल नहीं बुझिये लालाजी ! अरे हमभी तपेसर मोदी के चेला हैं... चाय से मिठाई तक सब में आलराउंडर।”
लटपटिआ लगले बुधन साह के बगल में अपना चूल्हा बनाने लगा। कालीमिट्टी का गिलाबा कर के ईंट जोड़ दिया। होते-होते एक पहर बीत गया। लटपटिया पछारन सिंघ को मिठाई का लिस्ट सुना के सिद्धू कक्का से बोला, “जरा देखियेगा... मेला के भीड़-भार में कौनो चूल्हा न भसका दे। हम तनिक समान सब लेके आते हैं।”
सिद्धू कक्का चूल्हा के चौकीदारी करने लगे। इधर पूजा भी शुरु हो गयी। सिद्धू कक्का का धैर्य भी धीरे-धीरे जवाब देने लगा। तभी पछारन सिंघ अपने हिस्से का पूछे, “अरे....! लटपटिया आया नहीं का... ?” “कहां आया है ?”, सिद्धू कक्का बोले। पछारन सिंघ बोले, “ससुरा जरूर कौनो पसीखाना में बैठा होगा...। ठहर उको जरा पकड़ के लाते हैं।”
अब पता नहीं उ बैठा कहाँ था... मगर पछारन सिंघ उको साइकिल पड़ चढ़ा कर लेते आया। बेचारा आकर अपना मोटरी (गठरी) और बड़का झांझ पटका और पसीना पोछकर बोला, “ओह...! बड़ी गरमी है। इत्ता सामान उठाके लाये में हवा निकल गयी।”
सिद्धू कक्का बार-बार घड़िये देख रहे थे। पता नहीं ससुरारी घड़ी थी इसलिये कि कौनो बात का बेगरता लगा हुआ था। उधर मंदिर में 'भए प्रकट किरपाला... दीन दयाला’ शुरु हो गया था। पछारन सिंघ धरफराकर बोले, “अच्छा अपना रमैन बाद में बांचना... चलो फटाफत चूल्हा फूंको और कराही चढाओ और तेल गरम करो...।”
लटपटिया भी ताव में बोला, “हां-हां निकालिये न... तेल और कराही। कहाँ है...? निकालिये न तो फटाफट दू-चार घानी जिलेबी तल दें फिर बालूशाही बनाएंगे।” पछारन सिंघ बोले, “मार छिनरी के.... कराही-तेल हम कहाँ से निकालें...? हलुवाई तू है कि हम....?”
“हें...हें...हें....हें....!” लटपटिया दांत निपोरके बोला, “जा मालिक...! आप तेल और कराही का व्यवस्था नहीं किये का.....? हमरे पास तेल-कराही कहाँ है ? आपतो जनबे करते हैं... हमरा चाह के दूकान में तेल और कराह का कौन काम... किसी तरह तपेसर साह के घर से मांग कर ई झांझ लाये हैं...।”
सिद्धू कक्का वहीं खड़े-खड़े सब सुन रहे थे। खिसियाकर बोले, “मार पाजी कहीं का...! 'तेल न कराही, बनाने तलने चला मिठाई’।” सिद्धू कक्का एतना ही मात्र कहे कि हमरी हंसी नही रुक पायी। खीं...खीं....खीं...खीं....! पछारन सिंघ और लटपटिया भी मँह घुमा के हंसने लगे।
सिद्धू कक्का कनिक और गरमाने का नाटक करते हुए बोले, हिंहिंया काहे रहा है....? कौनो गलत कहे का.... अरे बिना गोली-बंदूक के बौडर पर चला जाएगा लड़्ने तो मरके ही आयेगा न....? सबका अपना-अपना काम और अपना अपना जुगार होता है। हम बिना कलमे के कचहरी चले जायेंगे तो उससे काम होगा...? जिस तरह सिपाही का बंदूक है उसी तरह हलुवाई का कराही है। ई ससुर के नाती लटपटिया बाबू हाथ डोलाते हुए चले आये।
जरा हम भी बीच में अपनी जबान चला दिये, “ई तो जौन किया सो किया.... मगर कक्का ! आप कहावत कमाल गढ़ते हैं – 'तेल न कराही, तलने चले मिठाई’।” कक्का भी बिहंसते हुए बोले, “अरे...! ई में कहावत का है...? जरूरी उपकरण और योग्यता के बिना कौनो कारज सिद्ध हुआ है का...? किसी भी काम को पूरा करने के लिये आवश्यक साधन होना चाहिये। सारा जोगार होना चाहिये। ई बुद्धी का बैरी.... बिना तेल और कराही के ही जिलेबी तलने आ गया...!”

इधर ई तेल-कराही कांड चलिये रहा था कि उधर मंदिर में मूसन बबाजी जयकारा करवा दिये, “अयोध्या रामलला की जाय ! बालरूप भगवान की जय !! सब बच्चे लोग लाइन में बैठ जाओ... सबको आराम से परसाद मिलेगा... ! माता-बहिन जरा साइड हो जाइये।” प्रसाद का नाम सुनकर हम भी उधरे खिसक लिये मगर सिद्धू कक्का की कहावत मन को भीतरे-भीतर तब भी गुदगुदा रही थी, तेल न कराही, तलने चले मिठाई! बोल दे बबुआ रामचन्द्र की जाय !!

17 टिप्‍पणियां:

  1. आपका देशिल बयना जब भी पढ़ता हूं बहुत ही अच्छा लगता है।देशज शव्दों का प्रयोग इसे रूचिकर बना देता है।धन्यवाद।

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  2. भगवान राम की जय.बहुत सुन्दर और सामयिक लिखा है आपने.
    रामनवमी की हार्दिक बधाई,करण जी.

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  3. रामनवमी के उत्सव के साथ कथानक और कहावत तक पहुँचने की यात्रा बड़ी सुखद रही !
    मैंने पहले भी कई बार कहा है और आज फिर कहता हूँ ' करन जी, आपकी लेखनी का ज़वाब नहीं !
    इसकी मिठास और सम्प्रेषण का अनुभव करना सुखद होता है !
    आभार !

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  4. आंचलिक परिवेश के जीवंत चित्रण से देसिल बयना का अर्थ और भी स्पष्ट हो गया है। लेखनी की जादू एक बार फिर से चमत्कार उत्पन्न करने में सक्षम है। लगता है सारे दृश्य आंखों के सामने घूम रहे हों।

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  5. अयोध्या रामलला की जाय !
    बालरूप भगवान की जय !!


    रामनवमी की हार्दिक बधाई.....

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  6. रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएं।
    सामयिक घटनाक्रम में देसिल बयना को पिरोना आपके लेखन की विशेषता है। करण जी आपकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है। आपको शुभकामनाएं।

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  7. रामनवमी के बहाने गाँव और समाज का देसज शब्दों में सुन्दर चित्रण .. बेहतरीन देसिल बयाना में एक और इजाफा ...

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  8. बहुत बढ़िया!
    यह तो वही बात हुई न!
    "घर में नहीं दाने,
    अम्मा चली भुनाने!"

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  9. लेखनी के माध्‍यम से पूरा चित्र उतार देने की कला कोई आपसे सीखे... बधाई स्‍वीकारें.. इतना सुरुचिपूर्ण तरीके से लोकनीतिशास्‍त्र का उद्धार करने के लिए।

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  10. लेखनी के माध्‍यम से पूरा चित्र उतार देने की कला कोई आपसे सीखे... बधाई स्‍वीकारें.. इतना सुरुचिपूर्ण तरीके से लोकनीतिशास्‍त्र का उद्धार करने के लिए।

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  11. लेखनी के माध्‍यम से पूरा चित्र उतार देने की कला कोई आपसे सीखे... बधाई स्‍वीकारें.. इतना सुरुचिपूर्ण तरीके से लोकनीतिशास्‍त्र का उद्धार करने के लिए।

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  12. लेखनी के माध्‍यम से पूरा चित्र उतार देने की कला कोई आपसे सीखे... बधाई स्‍वीकारें.. इतना सुरुचिपूर्ण तरीके से लोकनीतिशास्‍त्र का उद्धार करने के लिए।

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  13. बहुत सुन्दर और सामयिक देसिल बयना है ।

    रामनवमी की हार्दिक बधाई,करें।

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  14. हंसते हंसते पेटवा मा दरद होई रहा है | आपहु बहुत कमाल का लिखत हैं | इ कहावातिया 'तेल न कराही, तलने चले मिठाई’ बहुते अच्छी लगी | इतने अच्छे हास्य-व्यंग्य रचना के लिए बहुत - बहुत धन्यवाद |

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  15. आपके देशी बयने से बहुत कुछ सिखने को मिला | आपका अंदाज निराला और समसामयिक है |

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  16. aisaa lag raha tha ki mai swayam gaon me mouzood hoo aur ye sab saamne ghat raha hai....
    ekdam jeevant varnan hai.......
    apanee shadee me dhyan rakhana...kadaee ghee tel sabheeka Manoj jee se kahna poora intzam pahile se karle....:)

    aasheesh

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