रविवार, 22 जुलाई 2012

भारतीय काव्यशास्त्र-119


भारतीय काव्यशास्त्र-119
आचार्य परशुराम राय
पिछले अंक में काव्यदोषों के परिहार पर चर्चा कर काव्यदोषों का समापन हो गया था। इस अंक से काव्य के गुणों पर चर्चा प्रारम्भ कर रहे हैं। कुछ आचार्य गुण और अलंकारों की सत्ता अलग-अलग न मानकर एक ही मानते हैं, जबकि अधिकांश आचार्य इन दोनों की अलग-अलग सत्ता मानते हैं।
आचार्य भामह के काव्यालंकार पर लिखी अपनी टीका भामहविवरण में आचार्य भट्टोद्भट काव्य के गुण और अलंकार में भेद नहीं मानते। बल्कि इनमें भेद करनेवाले आचार्यों के मत को गड्डलिकाप्रवाह अर्थात् भेड़चाल कहा है। इनका मानना है कि लौकिक गुणों, शौर्य आदि और कटक आदि अलंकारों (आभूषणों) में भेद तो माना जा सकता हैं, पर काव्य में ओज आदि गुणों तथा उपमा आदि अलंकारों में नहीं। इनके मतानुसार मनुष्यों में शौर्य आदि गुणों का आत्मा के साथ समवाय सम्बन्ध होता है, जबकि काव्य में शौर्य आदि गुणों का संयोग सम्बन्ध-
समवायवृत्त्या शौर्यादयः संयोगवृत्त्या तु हारादयः गुणालङ्काराणां भेदः ओज-प्रभृतीनामनुप्रासोपमादीनां चोभयेषामपि समवायवृत्त्या स्थितिरिति गड्डलिकाप्रवाहेणैवैषां भेदः।
किन्तु काव्यालङ्कारसूत्र के प्रणेता आचार्य वामन काव्य में भी काव्य के गुण और अलंकार में भेद मानते हैं। इनके मतानुसार शब्द और अर्थ के प्रसाद, ओज आदि धर्म जो काव्य की शोभा बढ़ाते हैं, वे काव्य के गुण हैं और काव्य के गुणों में वृद्धि या उत्कर्ष के कारक या धर्म अलंकार होते हैं-
ये खलु शब्दार्थयोः धर्माः काव्यशोभां कुर्वन्ति ते गुणाः। ते च ओजप्रसादादयः न यमकोपमादयः।
जिस प्रकार किसी युवक या युवती के सौन्दर्य में अलंकार (आभूषण) वृद्धि करते हैं, उसी प्रकार काव्य में ओज, प्रसाद आदि गुणों में शब्दालंकार और अर्थालंकार वृद्धि करते हैं। अतएव रस काव्य की आत्मा, ओज आदि गुण और अलंकार गुण की वृद्धि के कारक माने जाते हैं।
आचार्य आनन्दवर्धन का भी यही मत है। वे ध्वन्यालोक में लिखते हैं कि रसादिरूपी ध्वनि काव्य की आत्मा है, उसपर आश्रित रहनेवाले धर्म गुण और अलंकार कटक आदि आभूषणों की तरह काव्य के अंग शब्द और अर्थ के धर्म होते हैं -
तमर्थमवलम्बन्ते  येSङ्गिनं ते गुणाः समृताः।
अङ्गाश्रितास्त्वलङ्कारा मन्तव्याः कटकादवत्।।
इसी प्रकार आचार्य मम्मट भी काव्य में गुण और अलङ्कार अलग-अलग स्थिति मानते हैं। उनके शब्दों में - आत्मा के शौर्य आदि धर्मों की तरह रस के अचल रूप से स्थित काव्य के उत्कर्ष के कारक या धर्म गुण कहलाते हैं और काव्य में विद्यमान अङ्गी रस का शब्द तथा अर्थ से उत्कर्ष बढ़ानेवाले अनुप्रास, उपमा आदि हार आदि की भाँति अलंकार कहलाते हैं-
ये रसस्याङ्गिनो धर्माः शौर्यादय इवात्मनः।
उत्कर्षहेतवस्ते   स्युरचलस्थितयो   गुणाः।।
उपकुर्वन्ति तं सन्तं ये अङ्गद्वारेण जातुचित्।
हारादिवदलङ्कारास्तेSनुप्रासोपमादयः।।
साहित्यदर्पणकार आचार्य विश्वनाथ भी काव्य में प्रधानभूत रस के माधुर्य, ओज और प्रसाद धर्मों को गुण मानते हैं-
रसस्याङ्गित्वमानस्य धर्माः शौर्यादयो यथा।  
गुणाः माधुर्यमोजोSथ प्रसाद इति ते त्रिधा।।
आचार्यों के द्वारा दिए उपर्युक्त विवरणों से यह स्पष्ट होता हैं कि काव्य में गुण और अलंकारों का अस्तित्व अलग-अलग होता है। संक्षेप में कहा जाय, तो इन दोनों में निम्नलिखित अन्तर होते हैं-
1.      गुण काव्य के आभ्यन्तर धर्म होते हैं, जबकि अलंकार बाह्य धर्म।
2.      रस के अभाव में गुण का अस्तित्व नहीं हो सकता, जबकि अलंकार रस के अभाव में भी काव्य में हो सकते हैं।
3.      गुण काव्य के सीधे धर्म होते हैं, जबकि अलंकार पोषक होते हैं।
    इस अंक में बस इतना ही। अगले अंक में गुणों के भेद पर विचार किया जाएगा।
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8 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. धीरेन्द्र जी,
      यदि आपको ये प्रस्तुति वास्तव में सुन्दर लगी है तो बताइये 'आदर्शवादी नेता' के स्वर में कौन-से गुण का तत्व सर्वाधिक पाया जाता है? :)

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  2. काव्य के गुण,धर्म के बारे में यह शास्त्रीय जानकारी बहुत ही अच्छी लगी। अगली कड़ी का इंतजार रहेगा।

    बूंद-बूंद इतिहास पर आज नई पोस्ट प्रयोगवादी कविता की प्रवृत्तियां प्रकाशित हुई है। कृपया अवलोकन कर अपने विचारों से अवगत कराएं। धन्यवाद!!!

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  3. आप तो ज्ञान की गंगा बहा रहे हैं,
    हम इसमें डुबकी लगाकर लाभ उठा रहे हैं।

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    1. @ मनोज जी,

      यदि सचमुच आपने इस जानकारी से लाभ लिया है तो बताइये 'चापलूसी से भरे काव्य में किन-किन गुणों की उपस्थिति संभव हो सकती है? :)

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    2. कहीं वही तो नहीं जो हमने किया है, यानी किसी चीज़ को बढ़ा-चढ़ा कर कहा जाना।

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    3. मनोज जी,


      अरे, आप तो बात अपने पर ले लिए.... मैं तो ऐसा नहीं चाह रहा था.

      मेरा कहने का अर्थ था...

      चारणकाव्य में जैसे ...... ओज गुण नज़र आता है. [यह प्रायः पुरुषों की वंदना में इस्तेमाल होता है.]

      शृंगारकाव्य में ..... माधुर्य गुण [यह प्रायः स्त्रियों की वंदना में इस्तेमाल होता है.]

      भक्तिकाव्य में ..... प्रसाद गुण [यह प्रायः ईश्वर की वंदना में इस्तेमाल होता है.]

      लेकिन 'भक्ति' जब प्रेम/वात्सल्यपरक हो जाती है... तब वह माधुर्य गुण वाली हो जाती है.

      और जब 'भक्ति' स्तुति/गुणगानपरक हो जाती है.... तब वह ओजमयी गुणों वाली भी हो सकती है.

      किन्तु, ............... शुद्ध चापलूसी वाली बातों या रचनाओं में एक गुण जबरदस्त रूप से पाया जाता है, वो ये कि यह कृत्रिम सौहार्द बहुत जल्द बना लेता है, घनिष्ठता बढ़ाता है, किसी ना किसी रूप में लाभ दे जाता है. :)


      सादर

      प्रतुल

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