सोमवार, 2 जुलाई 2012

शान्तनु के देश में


शान्तनु के देश में

श्यामनारायण मिश्र

देखने की
डालकर आदत अंधेरे में,
देखता हूं
पास ही बिखरे पड़े हैं
रोशनी के सभी साधन
          यहीं डेरे में।

सिर्फ़ मेरे चाहने से
कुछ नहीं होगा पितामह !
शान्तनु के शिश्नजीवी देश में
आपकी
मेरी तरह यह बाद वाली पीढ़ियां
सोई पड़ी हैं
एक दुर्योधन खड़ा है तैश में।
क़त्ल होते जा रहे अभिमन्यु
षडयंत्र के दुष्चक्र घेरे में।

सात घोड़ों की
सवारी से नहीं उतरा
अभी तक रोशनी का देवता।
लोग
टोने-टोटके की सीढ़ियां
सर पर उठाए
ढूंढ़ते हैं स्वर्ग जाने का पुराना रास्ता।
एक छोटा ही सही
दीपक जलाकर टेरता हूं
लौटना कोई नहीं अब चाहता
          फिर से बसेरे में।
***  ***  ***
चित्र : आभार गूगल सर्च

21 टिप्‍पणियां:

  1. वाकई प्राचीन प्रतीकों के साथ आज की कविता! बहुत खूब!

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  2. एक छोटा ही सही
    दीपक जलाकर टेरता हूं
    लौटना कोई नहीं अब चाहता
    फिर से बसेरे में।

    बहुत सुंदर रचना ...!!

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  3. वाह....

    बहुत सुन्दर रचना....

    सादर.

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  4. अद्भुत बिम्ब/संकेत... क्या सुंदर कविता...
    पढ़ता रचना सोचता, हो बैठा तल्लीन।
    वर्तमान दिखला रहा, आईना प्राचीन।


    सादर आभार।

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  5. टोटकों से आक्रांता डर जाते तो क्या बात थी..

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  6. बहुत बहुत आभार |
    बढ़िया प्रस्तुति ||

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  7. टोने-टोटके की सीढ़ियां
    सर पर उठाए
    ढूंढ़ते हैं स्वर्ग जाने का पुराना रास्ता।
    अतीत खुद को दोहराता ही रहता है। सुन्दर कविता।

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  8. प्रतीकों के माध्यम से युग-चित्रण - प्रभावी बन पड़ा है .

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  9. एक छोटा ही सही
    दीपक जलाकर टेरता हूं
    लौटना कोई नहीं अब चाहता
    फिर से बसेरे में।
    किन्तु,
    एक छोटीसी किरण भी काफी है
    सूरज के उस स्त्रोत तक पहुँचने को,
    सुंदर रचना ....आभार !

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  10. एक छोटीसी किरण भी काफी है
    सूरज के उस स्त्रोत तक पहुँचने को,
    बहुत सुन्दर रचना ....आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  11. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल के चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आकर चर्चामंच की शोभा बढायें

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  12. लौटना कोई नहीं अब चाहता
    फिर से बसेरे में…………सत्य को उदघाटि्त करती सुन्दर प्रस्तुति

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  13. आज की रचना श्याम नारायण मिश्रा जी की और कविताओं से अलग ही रंग लिए हुये है .... बहुत सुंदर

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  14. एक छोटीसी किरण भी काफी है
    सूरज के उस स्त्रोत तक पहुँचने को,
    बेहतरीन ...

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  15. सात घोड़ों की
    सवारी से नहीं उतरा
    अभी तक रोशनी का देवता।

    अद्भुत बिम्ब/संकेत

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  16. वाह॥ मज़ा आगया आज यह पोस्ट पढ़कर आज इस कविता के माध्यम से युग चित्रण का एक अलग ही रंग देखने को मिला। आभार

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  17. I read your post interesting and informative. I am doing research on bloggers who use effectively blog for disseminate information.My Thesis titled as "Study on Blogging Pattern Of Selected Bloggers(Indians)".I glad if u wish to participate in my research.Please contact me through mail. Thank you.

    http://priyarajan-naga.blogspot.in/2012/06/study-on-blogging-pattern-of-selected.html

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  18. क्या बात है .बहुत ही अव्वल दर्जे की रचना पढवाई -सिर्फ़ मेरे चाहने से
    कुछ नहीं होगा पितामह !
    शान्तनु के शिश्नजीवी देश में
    आपकी
    मेरी तरह यह बाद वाली पीढ़ियां
    सोई पड़ी हैं
    अभिनव प्रयोग .

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  19. एक छोटा ही सही दीपक जला कर टेरता हूं
    लौटना कोई नही चाहता इस बसेरे में ।

    सटीक सामयिक भी ।

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