सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
17. मुर्शीद और मुरीद का संबंध
तथा हमने भेजा नूह़ को
उसकी जाति की ओर, उसने कहाः हे मेरी जाति के लोगो! अल्लाह की इबादत (वंदना) करो, उसके
सिवा तुम्हारा कोई पूज्य नहीं है, तो
क्या तुम डरते नहीं हो? (क़ुरआन : 23/23)
अर्थात अल्लाह
ने जिस प्रकार तुम्हारे आर्थिक जीवन के साधन बनाये उसी प्रकार तुम्हारे आत्मिक
मार्ग दर्शन की व्यवस्था की और रसूलों को भेजा जिन में नूह़ अलैहिस्सलाम प्रथम
रसूल थे।
अपने पालनहार से क्षमा माँगो। फिर उसकी ओर ध्यानमग्न
हो जाओ। वह आकाश से तुमपर धारा प्रवाह वर्षा करेगा और तुम्हारी शक्ति में अधिक
शक्ति प्रदान करेगा और अपराधी होकर मुंह न फेरो। (क़ुरआन : 11/52)
सूफ़ी साहित्य में गुरु के
लिए मुर्शीद, पीर, शेख़ और औलिया
शब्द का व्यवहार हुआ है। इस साहित्य में प्रयुक्त कुछ अन्य प्रमुख
शब्द हैं, हादी, जिसका शाब्दिक
अर्थ मार्गदर्शक या राह दिखाने वाला होता है। सूफी साधना
में गुरु शिष्य को ईश्वर के सच्चे मार्ग पर ले जाता है, इसलिए उन्हें 'हादी' कहा जाता है। रहबर
एक फारसी शब्द है, जिसका अर्थ रास्ता दिखाने
वाला या गाइड होता है। सूफी कवियों ने साधना के कठिन मार्ग (तरीकत) पर
मार्गदर्शन करने वाले गुरु के लिए इस शब्द का खूब इस्तेमाल किया है। दस्तगीर का
अर्थ है हाथ पकड़ने वाला या संकट में
सहारा देने वाला। सूफी मत में माना जाता है कि गुरु शिष्य का हाथ पकड़कर उसे संसार
रूपी भवसागर से पार लगाता है। खिद्र (या खिज्र) शब्द का प्रयोग भी गुरु के लिए
किया गया है। सूफी परंपरा
में हजरत खिज्र को एक अमर और रहस्यमयी मार्गदर्शक माना जाता है, जो भटके हुए लोगों
को रास्ता दिखाते हैं। सूफी साहित्य में प्रतीकात्मक रूप से सच्चे गुरु को 'खिज्र' या 'खिज्र-ए-राह' (रास्ते का
मार्गदर्शक) कहा गया है। हालांकि आलिम शब्द का सामान्य अर्थ विद्वान होता
है, लेकिन सूफी संदर्भों में 'आलिम-ए-रब्बानी' (ईश्वरीय ज्ञान
रखने वाला गुरु) के रूप में इसका व्यवहार हुआ है। मुअल्लिम का अर्थ शिक्षक या गुरु होता
है, जो शिष्य के आत्मिक और रूहानी विकास की शिक्षा देता है। साहब-ए-दिल का
अर्थ है दिल वाला या आत्मज्ञानी। सूफी साहित्य में गुरु को
अक्सर 'साहब-ए-दिल' या 'अहल-ए-दिल' कहा गया है, जिसका हृदय
ईश्वर के प्रेम से भरा हो।
सूफीमत में मुर्शिद (गुरु) और मुरीद (शिष्य) का संबंध बेहद पवित्र, गहरा और
आध्यात्मिक माना गया है। सूफ़ी साधना में गुरु का बहुत
महत्त्व है। गुरु के बिना सूफ़ी साधना की कल्पना ही
नहीं की जा सकती। सूफी साधना (तरीक़त) में बिना मुर्शिद के
ईश्वर (हक) को पाना असंभव माना जाता है। बिना पीर की कृपा के और उसकी मदद के मुरीद
के लिए कुछ भी कर पाना संभव नहीं है। अपने संबंध को एक दृढ़ और
सक्रिय आधार पर स्थापित करने के लिए सूफ़ी मार्ग के साधकों (सालिक) के लिए
यह ज़रूरी है कि शिष्य जो पहली चीज़ करना सीखता है, वह है ख़ुद को
पूरी तरह से मुर्शीद के हाथों में सौंप दे। मुरीद को अपने
मुर्शिद के प्रति पूरी तरह समर्पित होना पड़ता है। सूफी परंपरा में एक प्रसिद्ध
कहावत है कि शिष्य को अपने गुरु के हाथों में वैसा ही होना चाहिए जैसे "ग़स्साल (शव को
नहलाने वाले) के हाथों में मुर्दा"। इसका अर्थ है
कि शिष्य का अपना कोई अहंकार या इच्छा नहीं बचती, वह पूरी तरह
गुरु की आज्ञा में रहता है। मुर्शीद में ऐसी शक्ति होती है कि वह मुरीद को
आध्यात्मिक मार्ग में लगा देता है। सांसारिक प्रलोभनों से
बचाए रखने में वह सहायक होता है। सूफ़ी मार्ग की एक मंजिल से
दूसरी मंजिल तक पहुँचाने में वह उसकी निगरानी भी करता है। परमात्मा के
साथ मिलन भी उसके बिना संभव नहीं है। ऐसा माना जाता है कि जो
साधक बिना गुरु के इस मार्ग पर आगे बढ़ता है वह शैतान को अपना मार्गदर्शक माने हुए
है। गुरु सब कुछ
जानने वाला है। सूफ़ीमत में परमात्मा से भी अधिक गुरु को
मानने के लिए कहा गया है। साधक जो कुछ भी करे, अपने शेख़ के
सामने उसे ज़रूर रखे। गुरु की साधारण सी बात भी शिष्य के लिए
क़ानून है। मुरीद का अपने मुर्शिद पर अंधविश्वास
नहीं, बल्कि अटूट रूहानी विश्वास (इरादा) होना चाहिए। गुरु की हर सीख और
निर्देश, चाहे वह समझ में आए या न आए, शिष्य के
कल्याण के लिए ही होती है।
मुर्शीद असाधारण शक्ति वाला
होता है। उसने ख़ुद भी अपनी साधना के वक़्त हरेक
विघ्न, बाधाओं, कठिनाइयों का सामना किया हुआ होता है। वह ‘अहवालों’ (सूफ़ी मार्ग
में प्राप्त होने वाली अवस्थाओं) के आनंद का अनुभव किए हुए होता है। परमात्मा के
अनंत सौन्दर्य का प्रत्यक्ष किए हुए रहता है। इसलिए वह
शिष्यों की मनःस्थिति को जान जाता है। अपने अनुभवों के माध्यम से
शिष्य के साथ काम करने के बाद, शेख़ शिष्य की
ताकत के साथ-साथ कमजोरियों का भी पता लगाता है। मुर्शिद को मुरीद का 'रूहानी वालिद' (आध्यात्मिक
पिता) माना जाता है। जैसे माता-पिता बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास का ध्यान
रखते हैं, वैसे ही मुर्शिद अपने मुरीद के रूहानी
(आत्मिक) विकास और आत्मा की शुद्धि का ध्यान रखता है। यह संबंध केवल नियमों से
नहीं, बल्कि गहरे ईश्वरीय प्रेम (इश्क) और सम्मान (अदब) पर टिका
होता है। मुरीद अपने गुरु को ईश्वर का रूप या ईश्वर तक पहुँचने का माध्यम मानता
है।
सूफीमत में गुरु की संगति (सोहबत)
को सबसे बड़ा माध्यम माना गया है। मुर्शिद की उपस्थिति मात्र से ही शिष्य के भीतर
का अंधकार और बुराइयाँ नष्ट होने लगती हैं। साधना के मार्ग में कई चरण होते हैं
जिनसे शिष्य को शेख़ की निगरानी में गुजरना पड़ता है। वह सबसे पहले सर्वशक्तिमान के
नाम को सिर्फ अपनी जीभ से दोहराता है। फिर वह इसमें अपना दिल और आत्मा इस हद तक
डालता है कि केवल उसकी जीभ ही नहीं बल्कि उसका दिल और आत्मा भी सर्वशक्तिमान के
नाम के अलावा कुछ भी नहीं बोलता है। तब शिष्य से कहा जाता है कि वह हर समय नाम के
उच्चारण में लगे रहें और तब तक ज़ारी रखे जब तक कि उसे वास्तव में ऐसा महसूस न हो
कि वह अपने दिल और आत्मा के साथ व्यस्त है और अपने निर्माता के अलावा किसी और चीज़
में नहीं लगा है। इस अंतिम चरण में शिष्य पहली बार सर्वशक्तिमान के साथ उस जुड़ाव
को प्राप्त करता है जो अकेले उसके लिए अपने प्रयास में आगे बढ़ना संभव बनाता है। गुरु
द्वारा नियोजित और निर्धारित कार्यक्रम में लंबी प्रार्थना, रात भर जागरण
की श्रृंखला, भोजन, नींद, आराम आदि में
आत्म-निषेध को पूरा करने के लिए मुरीद को काफी मेहनत करनी पड़ती है। इस कड़ी मेहनत
के लिए सूफ़ियों ने मुजाहदा (तपस्या, इबादत, इंद्रिय निग्रह)
नाम दिया है। सूफी दर्शन और पारंपरिक सिद्धांतों के अनुसार, बिना गुरु (मुर्शिद)
के मुजाहदा (आंतरिक संघर्ष या कठिन साधना) करना न केवल असंभव माना गया है, बल्कि अत्यंत
जोखिम भरा भी माना गया है। सूफी मत में एक बहुत प्रसिद्ध कथन है: "जिसका कोई
मुर्शिद नहीं होता, उसका मुर्शिद
शैतान बन जाता है।" बिना गुरु के मुजाहदा क्यों संभव नहीं
है। मुजाहदा का मुख्य उद्देश्य अपने 'नफ़्स' (इंद्रियों और वासनाओं) को नियंत्रित करना
है। सूफी मानते हैं कि नफ़्स बहुत चालाक होता है। जब कोई व्यक्ति बिना गुरु के
अकेले कठिन तपस्या या उपवास करता है, तो उसका नफ़्स
उसे यह भ्रम दे सकता है कि "तुम बहुत बड़े
संत या सिद्ध पुरुष बन गए हो।" यह गुप्त अहंकार (रिया) साधक को बर्बाद
कर देता है। केवल एक पूर्ण मुर्शिद ही इस सूक्ष्म धोखे को पहचानकर मुरीद की रक्षा
कर सकता है।
जब कोई मुरीद किसी मुर्शीद
के पास जाता है तो गुरु उसे तीन वर्षों तक कुछ नियमों का पालन करते हुए जीवन यापन
करने का विधान देता है, जिससे कि वह सांसारिक वस्तुओं का त्याग करने में सफल हो
सके। इस मुजाहदा के अंतर्गत कम खाना, कम सोना और
एकांतवास जैसी कठिन क्रियाएं आती हैं। यह एक प्रकार की रूहानी चिकित्सा है। जैसे
बिना डॉक्टर (हकीम) के पर्चे के कोई भी ताकतवर दवा खाना जानलेवा हो सकता है, वैसे ही मुर्शिद की देखरेख के बिना अत्यधिक मुजाहदा करने से साधक का मानसिक
संतुलन बिगड़ सकता है या वह अवसाद में जा सकता है। मुर्शिद मुरीद की क्षमता देखकर
ही उसे साधना की खुराक तय करके देता है।
सूफी
यात्रा (सुलूक) में कई ऐसे पड़ाव आते हैं जहाँ साधक को अजीबोगरीब अनुभव, दिव्य आवाजें या दृश्य (कश्फ़) दिखाई
देने लगते हैं। बिना गुरु के साधक इन्हें ही अपनी अंतिम मंजिल मानकर वहीं रुक जाता
है या भटक जाता है। मुर्शिद एक मार्गदर्शक (गाइड) की तरह हाथ पकड़कर इन रास्तों से
सुरक्षित बाहर निकालता है। सूफी मत में मुजाहदा केवल साधक की व्यक्तिगत
मेहनत नहीं है, बल्कि उसमें
मुर्शिद की रूहानी दृष्टि या ध्यान (तवज्जुह) की भी जरूरत होती है। मुर्शिद अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा से मुरीद के दिल की
सफाई करता है, जिससे मुरीद के
लिए मुजाहदा करना आसान हो जाता है। सैद्धांतिक रूप से कोई व्यक्ति बिना गुरु के
भूखा रह सकता है या एकांत में बैठ सकता है, लेकिन सूफी मत की परिभाषा में उसे 'मुजाहदा' नहीं बल्कि केवल
शारीरिक कष्ट माना जाएगा। आध्यात्मिक प्रगति और नफ़्स की वास्तविक शुद्धि के लिए मुर्शिद की
छत्रछाया अनिवार्य है।
शिष्य को गुरु के द्वारा तय
मुजाहदा की परीक्षा में पास करना होता, तभी उसे सूफ़ी
साधना मार्ग पर जाने का अधिकारी माना जाता है। उसे पहला वर्ष लोगों की सेवा में
लगाना पड़ता है। दूसरे वर्ष में उसे परमात्मा की सेवा में लगाना पड़ता है। और तीसरा
वर्ष उसे अपने ह्रदय की निगरानी में लगाना होता है। उसे ख़ुद में दीनता और विनम्रता
का भाव पैदा करना होता है। उसे स्वार्थों का परित्याग करना होता है। यहां पर
मुर्शीद और मुरीद के संबंध को स्पष्ट करने के लिए और किस प्रकार मुर्शीद मुरीद को
आध्यात्मिक मार्ग के लिए तैयार करता है, हज़रत शिवली की कहानी
बताना बहुत ज़रूरी है। यह घटना सूफी इतिहास की सबसे प्रसिद्ध और प्रेरणादायक कथाओं
में से एक है। यह दर्शाती है कि कैसे एक महान आध्यात्मिक गुरु (मुर्शिद)
अपने शिष्य (मुरीद) के भीतर सदियों से जमा सामाजिक प्रतिष्ठा, पद और अहंकार (नफ़्स)
के कचरे को साफ करता है।
हज़रत अबू बक्र शिबली, हज़रत जुनैद
बग़दादी के सबसे प्रिय और प्रमुख शिष्यों (मुरीद)
में से थे। सूफी इतिहास में इन दोनों महान संतों का संबंध बेहद खास और आदरणीय माना
जाता है। हज़रत अबू बक्र शिबली कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे। दीक्षा लेने से पहले
वे बग़दाद (इराक़) के एक बहुत बड़े क्षेत्र के गवर्नर (हाकिम) थे। वे एक धनी, प्रभावशाली और अत्यंत सम्मानित शाही परिवार से ताल्लुक रखते थे। जब उनके
भीतर ईश्वर से मिलने की तड़प जगी, तो वे तत्कालीन
समय के सबसे बड़े सूफी संत हज़रत जुनैद
बग़दादी की खानकाह
(आश्रम) में पहुँचे।
जब हज़रत शिबली रेशमी
वस्त्रों में सजकर पूरे ठाट-बाट के साथ हज़रत जुनैद के पास गए और कहा, “आपके पास
परमात्मा संबंधी ज्ञान का मोती है। उसे मेरे हाथ बेच दें।” हज़रत जुनैद ने कहा, “तुम जिस ज्ञान की बात कर रहे हो, उसकी कीमत बहुत
ऊंची है। उस मोती का मूल्य चुकाने का दाम तुम्हारे पास नहीं है, और उसे मैं मुफ्त
में तुम्हें दे दूं तो उसका मूल्य समझना तुम्हारे लिए कठिन होगा। इसलिए तुम भी
मेरी तरह आँख मूँद कर इस समुद्र में धंस पड़ो जिसे मैं धैर्य के साथ इंतज़ार करते
हुए पा सका था। यदि तुम्हें यह
ज्ञान चाहिए, तो तुम्हें पहले खुद को मिटाना होगा, यानी अपने अहंकार को शून्य करना होगा।”
हज़रत शिवली ने हाथ जोड़कर
कहा— "आप जो कहेंगे, मैं वही
करूँगा। बताइए मैं क्या करूं?” हज़रत जुनैद ने उनकी पहली
परीक्षा लेते हुए कहा— "जाओ, अपने ये शाही कपड़े उतारो, फटे-पुराने
कपड़े पहनो। बाज़ार से नमक खरीदो और एक बोरी अपने सिर पर लादकर बग़दाद की गलियों
और बाज़ारों में उसे बेचो।" यह हज़रत शिबली के लिए बहुत बड़ी परीक्षा थी। जो
व्यक्ति कल तक उस शहर का हाकिम था, जिसके एक इशारे
पर लोग झुकते थे, आज उसे उसी शहर के बाज़ारों में आम लोगों
के सामने आवाज़ लगा-लगाकर नमक बेचना था। शिबली ने गुरु की आज्ञा मानी। वे सिर पर
नमक की बोरी रखकर बग़दाद की गलियों में निकल पड़े। जब लोग उन्हें देखते, तो हैरान रह
जाते— "अरे! यह तो हमारे गवर्नर साहब हैं, इन्हें क्या हो
गया?" कुछ लोग उन्हें पागल समझने लगे, कुछ उन पर
हंसते, तो कुछ ताने मारते। शिबली एक साल तक रोज़ यही काम करते रहे। इस मुजाहदा
(कठिन साधना) का असर यह हुआ कि समाज में उनकी जो प्रतिष्ठा की भावना थी, जो पद का घमंड
था, वह धीरे-धीरे धूल में मिल गया। उनका 'नफ़्स' (अहंकार) पूरी
तरह टूट गया। एक वर्ष बाद वह इस व्यापार में काफी विख्यात हो गए थे।
जब एक साल बाद वे हज़रत
जुनैद के पास लौटे, तो गुरु ने कहा— "अभी काम पूरा
नहीं हुआ है। अगले एक साल तक तुम्हें बग़दाद की गलियों में घूमकर लोगों से भीख (खैरात)
मांगनी होगी।" हज़रत शिवली बगदाद की गलियों में एक वर्ष
तक भीख माँगते रहे। उनकी और किसी ने ध्यान ही नहीं दिया। वे हज़रत जुनैद के पास गए
और बताया, “मेरी और कोई ध्यान ही नहीं देता।” हज़रत जुनैद ने
कहा, “तुम उन लोगों
की और ध्यान ही न दो और उन लोगों की ओर से अपना ध्यान बिलकुल हटा लो।” शिबली ने यह भी किया।
इसके बाद हज़रत जुनैद ने
हज़रत शिवली से कहा, “तुम उस प्रांत में जाकर सब लोगों से माफी
मांगो, जहां का गवर्नर रहते हुए तुमने बहुतों को सताया होगा।” हज़रत शिवली
चार वर्षों तक सबसे माफी माँगते रहे।
वे लौटकर हज़रत जुनैद के पास
आए। हज़रत जुनैद ने उनसे कहा, “तुममें अभी भी
नाम की कामना है, इसलिए तुम्हें एक वर्ष और भिक्षा वृत्ति
करनी होगी।” रोज़ हज़रत
शिवली भीख मांगकर लाते, हज़रत जुनैद को
देते और हज़रत जुनैद उसे दूसरों को बाँट देते। दूसरे दिन भोर तक हज़रत शिवली को भूखा
रखते। एक वर्ष तक ऐसा करने पर हज़रत जुनैद ने हज़रत शिवली को इस शर्त पर शिष्य बनाया
कि नौकर रहकर उन्हें दूसरों की सेवा करनी होगी। एक वर्ष तक उन्होंने वैसा ही किया।
एक वर्ष बाद हज़रत जुनैद ने हज़रत शिवली से पूछा, “तुम अपने बारे
में अब क्या सोचते हो।” हज़रत शिवली ने कहा, “परमात्मा कि
सृष्टि में मैं अपने आपको अधम समझता हूँ।” हज़रत जुनैद ने कहा, “अब तुम्हारी
निष्ठा दृढ़ है।” हज़रत जुनैद बग़दादी को पूरा भरोसा हो गया कि शिबली के भीतर का 'गवर्नर' पूरी तरह मर चुका है और अब केवल एक सच्चा साधक बचा है, तब उन्होंने शिबली को गले से लगा लिया और उन्हें आध्यात्मिक दीक्षा दी। आगे चलकर शिबली खुद सूफी जगत के एक महान स्तंभ बने।
सूफ़ी साधना में अपने अहं को
मिटाना बहुत ज़रूरी है। इसके लिए साधक को उपवास, मौन-व्रत, एकांत वास, ध्यान आदि का
सहारा लेना पड़ता है। पीर में वह सामर्थ्य है कि वह मुरीद में आध्यात्मिक शक्ति का
प्रवेश करा दे। इस शक्ति प्रवेश की क्रिया को ‘तवज्जह’ कहते हैं। सूफी
साधना में 'तवज्जह' का शाब्दिक
अर्थ 'ध्यान देना', 'दृष्टि डालना' या 'उन्मुख होना' होता है। लेकिन
सूफी पारिभाषिक शब्दावली में, यह मुर्शिद (गुरु)
द्वारा अपने मुरीद (शिष्य) के दिल पर डाली जाने वाली रूहानी दृष्टि या आध्यात्मिक
एकाग्रता को कहा जाता है। यह सूफी साधना का एक
अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली माध्यम है, जिसके द्वारा
गुरु अपनी आत्मिक ऊर्जा को सीधे शिष्य के हृदय में स्थानांतरित करता है। जब एक
मुरीद लाख कोशिशों के बाद भी अपने मन (नफ़्स) की बुराइयों को दूर नहीं कर पाता, तब मुर्शिद
अपनी रूहानी ताक़त से उसके दिल पर ध्यान केंद्रित करता है। इस प्रक्रिया से शिष्य
के दिल के विकार (जैसे काम, क्रोध, लोभ, अहंकार) जलकर
भस्म होने लगते हैं और उसमें ईश्वरीय प्रेम का संचार होता है। सूफी संतों के
अनुसार, एक मुर्शिद कई तरीकों से अपने शिष्य पर
तवज्जह डाल सकता है। तवज्जह-ए-चश्मी (दृष्टि द्वारा) में मुर्शिद केवल अपनी
आँखों से मुरीद की आँखों में या उसके दिल की तरफ देखता है। इस रूहानी नज़र (कृपा
दृष्टि) मात्र से शिष्य की आत्मिक अवस्था बदल जाती है। तवज्जह-ए-क़ल्बी (हृदय
द्वारा) में मुर्शिद और मुरीद आमने-सामने बैठते हैं। मुर्शिद आँखें बंद करके
अपने दिल की रूहानी तरंगों को मुरीद के दिल की तरफ मोड़ देता है। तवज्जह-ए-लाफ़्ज़ी
(शब्दों द्वारा) में मुर्शिद के मुख से निकला एक शब्द या उनका
उपदेश सीधा मुरीद के अंतर्मन को बेध देता है और उसे दिव्य आनंद की स्थिति में ले
जाता है। तवज्जह के दौरान मुरीद अक्सर एक चुंबकीय खिंचाव या बिजली के झटके जैसा
अनुभव करता है। कई बार तवज्जह के प्रभाव से मुरीद बेहोशी या मदहोशी की स्थिति
(जिसे सूफी मत में 'वज्द' या हाल
आना कहते हैं) में चला जाता है। एक पूर्ण मुर्शिद के लिए दूरी मायने नहीं रखती।
यदि शिष्य सैकड़ों मील दूर भी बैठा हो, तो भी मुर्शिद
अपने स्थान से ही उस पर तवज्जह-ए-ग़ायबाना (परोक्ष ध्यान) डाल सकता है और
उसकी आत्मिक मदद कर सकता है। सूफी इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ वर्षों
की कठिन इबादत से जो मुक़ाम हासिल नहीं हुआ, वह मुर्शिद की
एक 'तवज्जह' या एक निगाह से पल भर में मिल गया।
निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो, या शाह नियाज़
और उनके मुरीदों के बीच तवज्जह के कई ऐतिहासिक प्रसंग मिलते हैं। शिष्य चाहे जितना
बड़ा साधक हो जाए, गुरु से बड़ा नहीं हो सकता। शिष्य की हरेक
गतिविधि और आध्यात्मिक स्थिति का ज्ञान गुरु को रहता है। मुजाहदा जहाँ शिष्य की
अपनी निजी मेहनत और तपस्या है, वहीं तवज्जह गुरु की वह
ईश्वरीय कृपा है जो शिष्य की यात्रा को आसान और तीव्र बना देती है। सूफी साधना में
तवज्जह प्राप्त करने के लिए मुरीद के भीतर 'तसव्वुर-ए-शेख' (अपने गुरु का
हृदय में निरंतर ध्यान करना) की अवस्था होना ज़रूरी है।
कई विद्वानों का मत है कि शिष्य-गुरु
के इस प्रकार के संबंध का सूफ़ीमत में प्रवेश, हो सकता है भारत से आया हो, क्योंकि
इस्लाम धर्म में इस प्रकार की कोई परंपरा नहीं थी। गुरु-शिष्य संबंधों के इस पहलू
पर शुरुआती सूफ़ियों ने उतना ही ज़ोर दिया है जितना बाद के सूफ़ियों ने। वहीं, रूढ़िवादी
धर्मशास्त्रियों ने इसकी बहुत कड़ी आलोचना की है। प्रारंभिक सूफ़ियों ने अपने जीवन
में शरीयत की भूमिका पर काफी ज़ोर दिया था, इसके बावजूद, गुरु की अंध
आज्ञाकारिता के इस रवैये को उन्होंने इस आधार पर उचित ठहराया कि यह साधना के शुरुआती
विकास में सिर्फ एक गुजरने वाला एक आवश्यक चरण था, और इसके बिना, शुरुआत करने
वाले के लिए व्यक्तिगत और आत्म-केंद्रित फ्रेम से बाहर निकलना उनके लिए असंभव था। जब
सूफी संत भारत आए (विशेषकर चिश्ती और सुहरावर्दी सिलसिले के संत), तब भारतीय भूमि पर इस संबंध को एक नया विस्तार और
गहरा सांस्कृतिक सामंजस्य मिला। भारत में
पहले से ही प्राचीन गुरु-शिष्य
परंपरा (नाथ पंथ, बौद्ध और हिंदू
दर्शन में) गहराई से स्थापित थी। जब भारतीय लोगों ने सूफी संतों की 'मुर्शिद-मुरीद' व्यवस्था को
देखा, तो उन्हें यह बहुत जानी-पहचानी और अपनी
जैसी लगी। भारत आने के बाद सूफियों ने स्थानीय तौर-तरीकों को अपनाया। जैसे—मुर्शिद
के सम्मान में सिर झुकाना (ज़मीनबोस), शिष्य बनते समय
सिर मुंडवाना (हलक), और गुरु के
निवास को 'खानकाह' के साथ-साथ 'आश्रम' की तरह संचालित करना। बाद के काल में
सूफियों ने भारतीय नाथ योगियों के प्राणायाम और ध्यान की तकनीकों को भी अपने 'मुजाहदा' (साधना) में शामिल किया। सैद्धांतिक
और ऐतिहासिक रूप से मुर्शिद-मुरीद का संबंध पूर्णतः
इस्लामी और मध्य-पूर्वी (Perso-Arabic) मूल का है। परंतु, भारत की गुरु-शिष्य परंपरा के साथ इसके गहरे तालमेल के कारण ही सूफी मत
भारतीय उपमहाद्वीप में इतनी तेजी से और मजबूती से लोकप्रिय हो सका। भारत में चिश्ती सिलसिले (जैसे ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और निजामुद्दीन औलिया) ने भारतीय गुरु-शिष्य
परंपरा के तत्वों को सबसे ज्यादा अपनाया था।
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मनोज
कुमार
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