सोमवार, 2 मार्च 2015
रंगारंग फ़ागुन में...
शनिवार, 19 मार्च 2011
फ़ुर्सत में – होली के रंग गीतों के संग
फ़ुर्सत में – होली के रंग गीतों के संग
-- करण समस्तीपुरी
आया मधुमास। हिमगात हेमंत की मार से नीलवर्ण आकाश को मिला उजास। शीत की श्वेतिमा में मिले केसर के रंग। फूले कुसुम। गदराया सरसों। बौराये रसाल से झहरे मकरंद। सुगंध महुआ का मादक... पुनर्नवा हुई प्रकृति। लौट आया वसुंधरा का यौवन। फूटे कोयल की कूक। पपीहे की हूक। अमराई में भौंरों का गुंजार। सरसों के मुकुलित आंचल में गौरैयों की अठखेलियां.... अरुण प्रसून संभाले सेमल की फुनगी पे सुग्गों की टें-टें... सांझ-भिनसार बांस के बीट में विहग-वृंद का कलरव.... टी-बी-टी-टुट-टुट।
शरद के साहचर्य से सकुचाई धरा के बहुरे दिन। किसलय की कोमलता, काकली के गीत का माधुर्य, पुष्पों से ले पराग, ओढ़ धानी चुनर वसुधा ऋतुराज से मिलन को इतराई। मनचली बसंती हवा हरजाई.... बन अनंग के वाण। अतृप्त प्राण। आकुल आत्मा ढूंढे प्रणय के संगीत। फ़ागुन के गीत..... “पिया संग खेलो होरी...फ़ागुन आयो री...” (पूरा गीत सुनने के लिये यहां क्लिक कीजिये।)
स्वर्णिम धरा। रक्ताभ गगन। कभी मंद कभी झकझोर। पवन का हिलोर। झुमती अलसी। झांझ बजाती गेहुँ की स्वर्णाभ बालियाँ। खेत के मेड़ों पे फ़ागुनी गाये कृषक-कन्याएं – “पिया ला दे कुसुम रंग साड़ी झमाझम पानी भरूँ।“ झुक गया अरहर का तन। खिल उठे किसानों के मन। हर गली बरसाना। हर गांव वृंदावन। हर ताल सरयू। हर तलैय्या यमुना-तट। पनिहारिन गोपियां। सर पे गगरी। कैसे खेलें होरी। कृष्ण करे बलजोरी, “फ़ाग में न मानिहौं बात तोरी एक भी ! चुनरी रंगा ले गोरी, होरी साल भर पे आई है!” अह्ह्हा... सकल मनोरथ पुरे उनके, जिन देखा यह दृश्य। कालिंदी-कूल। कदंब की डार। मुरलीधर मुकुंद। टेरे राग धमार। अनुनय करे ब्रजनारी। ना माने गिरिधारी। ऐसी मारी पिचकारी... भींगी अंगिया-साड़ी। गोपियां बेचारी। कान्हा की बलिहारी। अब तो जल लेने दो मुरारी। ऐ बंदवारी.... !
भरने दे हो गागर बंदवारी.... भरने दे !
भरने दे हो गागर बंदवारी..... भरने दे !!
लाज है औरत की साड़ी लोग बोलें कुछ हम नहीं !
ऐ मेरे ब्रजराज मोहन, है तुझे कुछ गम नहीं !!
लहंगा-साड़ी लाज हमारी....
मत मारो रंग पिचकारी....... हो-हो मत मारो रंग पिचकारी.... भरने दे.... !
भरने दे हो गागर बंदवारी.... भरने दे !!
हूँ भला मानुस सदा, होशियार और बुद्धियार हूँ !
जानता हूँ सब मगर इस फाग भर लाचार हूँ !!
नंद-छैल जग में जस तेरो.....
हो फैल रही है है उजियारी........ हो-हो फैल रही है उजियारी.... भरने दे... !
भरने दे हो गागर बंदवारी.... भरने दे !!
जानकर अनजान पनघट पर हो बनते क्यों लला ?
द्रौपदी की लाज रखी थी, बताओ क्यों भला ??
बात तेरी सत्य है ब्रजनायिका सुन तो सही !
द्रौपदी की लाज रखी थी, मगर फ़ागुन नहीं !!
हाँ-हाँ करत रंग डारे मुरारी.....
भीजि गयी पटुकी-साड़ी...... हो-हो भीजि गये पटुकी-साड़ी.... भरने दे !
भरने दे हो गागर बंदवारी.... भरने दे !!
ऐ कन्हैया बेवफ़ा अब छोड़ दे बकवादियाँ !
देख लेंगे लोग सब, होगी नगर बदनामियाँ !!
सासु-ननद घर खोजत होइहैं....
देर भए तो दिये गारी...... हो-हो देर भए तो दिये गारी...... भरने दे !
भरने दे हो गागर बंदवारी.... भरने दे.... !!
इस प्रकार होली खेलय नंदलाल बृज में (यहां क्लिक कीजिये) और अवध में होली खेले रघुवीरा (यहां क्लिक कीजिये)। चौपाल पे फ़ागुन आयो... मस्ती लायो.... जोगीजी धीरे-धीरे.... ! (गीत का आनन्द लेने के लिये यहां क्लिक कीजिये।) ऐसे में प्रियतमा अपने प्रियतम से क्या गुहार करती है, सुनिए एक मधुर मैथिली होली गीत में। (यहाँ क्लिक कीजिये।)
रंग बरसे...! हिय हरसे.... सदा आनन्द रहे आपके द्वारे.... रंगोत्सव की सरस शुभ-कामनाएं !