महात्मा
गांधी हत्या केस-27
18 जनवरी, 1948
18 जनवरी (उपवास का छठा दिन) को गांधीजी की
हालत काफ़ी ख़राब हो गई। पेट में दर्द भी हो रहा था। वजन 107 पौंड बना हुआ था। यह
बुरा लक्षण था। वे इतने थके हुए लग रहे थे कि डॉक्टर भी उनके बचने की उम्मीद खो
बैठे थे। नेहरू भी निराश हो गए थे, क्योंकि
उन्हें लग रहा था कि अब उन्हें बचाना मुमकिन नहीं है। लेकिन जैसे-जैसे सुबह आगे
बढ़ी, यह साफ़ हो गया कि कुछ अहम फ़ैसले लिए जा रहे
थे।
शांति समिति ने गांधीजी को लिखित आश्वासन दिया
कि सभी क़ौमों के लोग शांति के साथ रहना चाहते हैं। महात्मा गांधी को भरोसा दिया
गया कि--महरौली में सूफ़ी संत कुतुबउद्दीन बख़्तियार
काकी का उर्स हर साल की तरह मनाया जाएगा। मुसलमानों के जानमाल की रक्षा करना हमारा
कर्त्तव्य है। मुसलमान दिल्ली के अपने घरों में जा सकेंगे। मस्जिदों को हिन्दुओं
और सिखों के क़ब्ज़े से ख़ाली कराया जाएगा। मुसलमान इलाक़ों को अवैध कब्ज़ों से
छुड़ाया जाएगा। डर से जो मुसलमान अपना घर छोड़कर भागे हैं उनके वापस आने पर हिन्दू
आपत्ति नहीं जताएंगे। भागे हुए मुस्लिम शहर में वापस लौट सकते हैं। जो मस्जिद
हिन्दू और सिक्खों के क़ब्ज़े में हैं, उन्हें मुसलमानों को लौटा दिया जाएगा। समिति
ने गांधीजी से उपवास छोड़ देने का अनुरोध किया। इस बार के व्रत ने राजधानी में नंगा
नाच दिखाने वाली पाशविकता को सचमुच वश में कर लिया था।
गांधीजी का कमरा खचाखच भरा हुआ था। पटेल,
नेहरू, मौलाना आज़ाद, राजेंद्र बाबू, पाकिस्तान के हाई कमिश्नर जाहिद हुसैन, दिल्ली
के मौलाना, सिख नेता, आर.एस.एस. और हिंदू महासभा के नेता, सब उपस्थित थे। दिल्ली
में पाकिस्तान के हाई कमिश्नर (राजदूत) जनाब ज़ाहिद हुसैन साहब भी मौजूद थे। राजेन्द्र
बाबू ने सबों की ओर से गांधीजी से निवेदन किया कि गांधीजी उपवास भंग करें। गांधीजी
ने कहा, आपके वायदों से मुझे आश्वासन हो गया है। यह आश्वासन मात्र दिल्ली तक सीमित
नहीं होना चाहिए। जो दिल्ली में आज हुआ है वह सारे देश में कल होगा। अगर दिल्ली
संभल जाएगी तो पाकिस्तान में भी स्थिति संभल जाएगी।
गांधीजी ने आगे कहा, 'दिल्ली
भारतीय डोमिनियन का हृदय है और आप दिल्ली के सबसे प्रतिष्ठित लोग हैं। यदि आप पूरे
भारत को यह एहसास नहीं करा सकते कि हिंदू, सिख
और मुसलमान सभी भाई हैं, तो
यह दोनों डोमिनियन के भविष्य के लिए बुरा संकेत होगा। अगर वे दोनों आपस में लड़ते
हैं तो भारत का क्या होगा?' यहाँ गांधीजी भावनाओं में बहकर टूट पड़े; उनके धंसे हुए गालों पर आँसू बहने लगे। वहाँ
मौजूद लोग सिसकियाँ लेने लगे; कई
लोग रो पड़े। जब उन्होंने फिर से बोलना शुरू किया, तो
उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि सुनाई नहीं दे रही थी; इसलिए
डॉ. सुशीला नय्यर ने ज़ोर से दोहराया कि उन्होंने उनसे क्या धीरे से कहा था। गांधी
ने पूछा कि क्या वे उन्हें धोखा दे रहे थे। क्या वे बस उनकी जान बचाने की कोशिश कर
रहे थे? क्या वे दिल्ली में शांति बनाए रखने और उन्हें
रिहा करने की गारंटी देंगे, ताकि
वे पाकिस्तान जाकर वहाँ शांति की अपील कर सकें? मौलाना
आज़ाद और दूसरे मुस्लिम विद्वानों ने गांधीजी से बात की और उन्हें भरोसा दिलाया कि
यह रवैया इस्लामी नहीं है। R.S.S. और
हिंदू महासभा की ओर से बोलते हुए गणेश दत्त ने गांधीजी से अपना उपवास तोड़ने का
आग्रह किया। पाकिस्तान के राजदूत ने भी महात्मा से कुछ दोस्ताना शब्द कहे। एक सिख
प्रतिनिधि ने भी अपना वचन दिया।
विभिन्न दलों और पार्टियों के प्रतिनिधियों ने
गांधीजी की उपस्थिति में एक प्रतिज्ञापत्र पर हस्ताक्षर किये जिसमें उन्होंने
दिल्ली में शांति बनाये रखने का जिम्मा लिया। गांधीजी ने इसे मंज़ूर कर लिया और कहा: “मैं उपवास तोड़ूँगा। ईश्वर की मर्ज़ी पूरी हो। आप
सभी इसके गवाह बन सकते हैं।”
पारसी, मुस्लिम
और जापानी धर्मग्रंथ पढ़े गए और फिर हिंदू श्लोक पढ़ा गया:
मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो,
अंधकार से प्रकाश की ओर,
मृत्यु से अमरता की ओर।
गांधीजी के साथ की लड़कियों ने एक हिंदू गीत और गांधी का
पसंदीदा ईसाई भजन 'व्हेन आई सर्वे द वंडरस क्रॉस' गाया।
12
बजकर 45 मिनट पर सभी सात समुदायों के लिखित आश्वासन पर कि वे न सिर्फ दिल्ली में बल्कि
पूरे देश में साम्प्रदायिक सौहार्द्र का वातावरण पुनः स्थापित करेंगे, 78 वर्ष की उम्र के गांधीजी ने 121 घंटे 30
मिनट का उपवास मौलाना आज़ाद के हाथों नारंगी का रस ग्रहण कर भंग किया। उनके लिविंग
रूम में जमा हुए सौ मेहमानों को संतरे और केले बाँटे गए, और
फिर एक-एक करके, उनके दर्शन करने के बाद, वे बिड़ला हाउस से बाहर चले गए। सबसे आश्चर्यजनक
बात यह हुई कि उपवास की समाप्ति पर गांधीजी से मिलने बुर्का ओढकर कई मुस्लिम महिलाएं आई थी। उन्होंने भी
कहा था कि आपके उपवास के दौरान हमने भी अन्न नहीं खाया।
गांधीजी
के छह दिनों के उपवास के टूटने पर देश और दुनिया ने राहत की सांस ली। नेहरूजी की
आंखों से आंसू बह रहे थे। सभी लोगों के चले जाने के बाद गांधीजी और नेहरू जी अकेले
रह गए थे। नेहरू जी भी साथ-साथ उपवास कर रहे थे। लेकिन यह बात उन्होंने किसी को
नहीं बताई थी। इंदिरा गांधी ने उन्हें बताया कि उनके पिता ने भी अनशन शुरू कर दिया
है। यह खबर सुनकर उन्हें हैरानी और खुशी तो हुई, लेकिन
वे घबरा भी गए। उन्होंने तुरंत कांपते हाथों से एक छोटा सा पत्र लिखा और नेहरू से
अनशन तुरंत खत्म करने का आग्रह किया। गांधीजी ने अपने सचिव प्यारेलाल जी को एक
पत्र लिखने को कहा, “चिरंजीवी
जवाहर, उपवास छोड़ो, बहुत वर्ष जियो और हिंद के जवाहर बनो। बापू के आशीर्वाद। 18.1.48
उसी
दोपहर, गांधीजी ने ब्रिटिश मालिकाना हक वाले दैनिक
अखबार 'स्टेट्समैन' के
पूर्व संपादक आर्थर मूर से बातचीत की। मूर ने लिखा, 'वे
बहुत खुशमिजाज और जिंदादिल थे। मुझसे बात करते समय उनकी दिलचस्पी खुद में नहीं, बल्कि मुझमें थी; उन्होंने
मुझसे कई तीखे सवाल पूछे।' गांधीजी ने आर्थर मूर को कहा, “अब तुम भी उपवास छोड़ दो।” उसने बताया कि आपके उपवास छोड़ने का समाचार
मिला है। थोड़ी देर पहले ही एक प्याला काफी और एक सिगार पीकर मैंने भी अपना उपवास
भंग कर लिया है।
उसी
दिन शाम की प्रार्थना सभा में गांधीजी बीस मिनट तक बोले। गांधीजी ने प्रार्थना सभा
में कहा कि वे इस प्रतिज्ञा का अर्थ यह समझते हैं कि 'चाहे
कुछ भी हो जाए, हिंदुओं, मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों
और यहूदियों के बीच पूरी दोस्ती बनी रहेगी—ऐसी दोस्ती जो कभी टूटेगी नहीं।' पाकिस्तान के विदेश मंत्री सर मोहम्मद ज़फ़रुल्ला खान ने
लेक सक्सेस में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को बताया कि उपवास के जवाब में
दोनों डोमिनियन के बीच दोस्ती की भावना और इच्छा की एक नई और ज़बरदस्त लहर पूरे
उपमहाद्वीप में फैल रही है।
जिस
ब्रिटिश पत्र ने उनके पिछले उपवासों की खिल्ली उड़ाई थी और उनको ब्लैकमेल करने वाली
रणनीति कहकर उसकी निंदा की थी, लंदन के उसी ‘न्यूज़ क्रोनिकल’ ने लिखा था, “इस आध्यात्मिक ताकत के सामने अणु बम भी क्षुद्र
हो जाएगा क्योंकि वह तो मनुष्य की बुद्धि और साहस की उपज है, लेकिन मनुष्य की कृति
मनुष्य से वरिष्ठ कदापि नहीं बन सकती। बापू ने अपने उपवास द्वारा यह सिद्ध कर
दिखाया है। उनके उत्सर्ग से मानव संहार थम गया है और पाशविकता के मध्य भी दिव्यता
शाश्वत है। गांधीजी ने उपवास के द्वारा साबित कर दिया कि हिंसा तथा विद्वेष के
गर्त में डूबती मानवता को वे अपने आध्यात्मिक बल पर बचा सकते हैं।”
इस व्रत ने दिल्ली में नंगा नाच दिखाने वाली
पाशविकता को वश में कर लिया। उपवास के बाद सांप्रदायिक उपद्रवों का ज़ोर बराबर घटता
गया। इसने भारतीय मुसलमानों के मन की भय की भावना को
दूर किया। इस उपवास के बाद सांप्रदायिक उपद्रवों का जोर बराबर घटता गया। गांधीजी
ने भविष्य की योजनाओं की ओर अपना ध्यान लगाया। उन्होंने सोचा कि दोनों देशों और
दोनों संप्रदायों के बीच सद्भावना बढ़ाने के लिए उन्हें स्वयं पाकिस्तान जाना
चाहिए। उन्होंने प्यारेलाल को पाकिस्तान के हाई कमिश्नर जाहिद हुसैन के पास यह
पूछने के लिए भेजा कि क्या गांधीजी पाकिस्तान जा सकते हैं। जाहिद हुसैन ने कहा, “अभी नहीं। परन्तु मुझे आशा है कि जल्दी ही
हालात काफी सुधर जाएंगे।”
हिन्दू-मुसलमानों में
संघर्ष और तनाव बना रहे ऐसी राजनीति दोनों कौमों के धर्मान्धों द्वारा चलाई जा रही थी। । विभाजन के
बाद फैले दंगों की चपेट में दिल्ली भी आ गयी थी। दिल्ली तो मानो कत्लखाना ही बन गयी थी। गांधीजी का आमरण अनशन 13 जनवरी, 1948 को शुरू हुआ। जैसा कि प्रचार किया गया उसके विपरीत यह अनशन पचपन करोड़ रुपयों के लिए नहीं था। दिल्ली में
शान्ति स्थापित हो सके, इसके लिए था। उपवास के
समय सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपने सचिव वी. शंकर को
गांधीजी के पास भेजकर पुछवाया था कि मैं क्या कर सकता हूँ। तब गांधीजी ने कहा था कि पाकिस्तान को
पचपन करोड़ रुपया दे दो। यद्यपि यह बात गांधीजी ने उपवासकाल में कही थी, पर उपवास पचपन करोड़ रुपयों के लिए नहीं था। पर झूठा
प्रचार किया गया। उपवास शुरू होने के दूसरे-तीसरे
दिन गांधीजी
ने कहा था अगर दिल्ली में
शान्ति स्थापित हुई तो मैं उपवास छोड दूंगा। बिड़ला हांउस के कमरे
में जिस खटिया पर गांधीजी लेटे थे उसीके
चारों ओर बैठकर 15 जनवरी, 1948 को मंत्रिमंडल की बैठक
हुई, जिसमें पाकिस्तान को
पचपन करोड़ रुपये देने का निर्णय लिया गया। 18 जनवरी को दोपहर 12.45 बजे पर उपवास समाप्त हुआ। अगर पचपन करोड़
रुपये के लिए उपवास होता तो 15 जनवरी के मंत्रिमंडल के निर्णय के बाद उसी दिन या ज़्यादा-से-ज़्यादा दूसरे दिन 16 जनवरी को उपवास समाप्त होना चाहिए
था। तीन दिन बाद गांधीजी
ने उपवास छोड़ा। स्पष्ट है कि पचपन करोड़ रुपया और गांधीजी के उपवास का आपस में कोई
परस्पर सम्बन्ध नहीं
था। उपवास दिल्ली में शान्ति की स्थापना के लिए था। शान्ति की स्थापना हो, और गांधीजी
का उपवास समाप्त हो इसके लिए डॉ. राजेन्द्रप्रसाद की अध्यक्षता में सब धमों के 130 प्रमुख लोगों की
शान्ति समिति गठित की गयी थी। समिति के समक्ष गांधीजी ने उपवास-समाप्ति के लिए 7 शतें रखी थीं। ये सात
शतें 17 जनवरी, 1948 को स्वीकृत होने पर 18 जनवरी को गांधीजी ने उपवास समाप्त किया था। स्वीकृत शतों में पचपन करोड़ रुपये देने का कहीं उल्लेख नहीं था।
गांधीजी का मानना था कि जब कोई दुख आ पड़े जो
दूर न किया जा सके, तब मनुष्य को उपवास और प्रार्थना करनी चाहिए। वे उपवास को
सत्याग्रह का अभिन्न अंग मानते थे। वे कहते थे ‘उपवास सत्याग्रही का अन्तिम शस्त्र
है।’ अपने जीवन में उन्होंने विभिन्न अवधियों के अठारह उपवास किए। इनमें सबसे
लम्बा तीन सप्ताह का था। इनके अलावा गांधीजी ने आंशिक उपवास भी किए थे। दक्षिण
अफ़्रीका में वे चार महीने तक रोज़ एक ही बार अल्पाहार पर रहे थे। 1946 में नोआखाली
में वे केवल 600 कैलोरी का अल्पाहार लेते थे और वह भी केवल फलों और ग्लूकोज़ के रूप
में।
गांधीजी के आखिरी उपवास ने एक चमत्कार कर
दिखाया—न केवल दिल्ली में शांति बहाल की, बल्कि
दोनों देशों में धार्मिक दंगों और हिंसा को भी खत्म कर दिया। दुनिया भर में फैली
एक समस्या का वह आंशिक समाधान, एक
ऐसे व्यक्ति की नैतिक शक्ति का प्रतीक है, जिसकी
सेवा करने की इच्छा जीवन के मोह से कहीं ज़्यादा थी। गांधीजी को जीवन से प्यार था
और वे जीना चाहते थे। लेकिन मरने के लिए तैयार होकर उन्होंने सेवा करने की क्षमता
फिर से हासिल कर ली, और इसी में उन्हें खुशी मिली। उपवास के बाद के
बारह दिनों में वे खुश और प्रसन्न रहे; निराशा
दूर हो गई थी और वे आगे के कामों की योजनाओं में लगे हुए थे। उन्होंने मौत का
सामना किया और उन्हें एक नई ज़िंदगी मिली। जब गांधीजी सांप्रदायिक हिंसा से जूझने
में लगे थे, वह इस बात को नहीं भूले थे के भारत की वास्तविक
समस्या यहां के लोगों का आर्थिक और सामाजिक पिछड़ापन है। राजनैतिक स्वाधीनता के
बाद गांधीजी का ध्यान रचनात्मक कार्यों की ओर अधिक आकर्षित होने लगा। इसके
अतिरिक्त वे अपनी अहिंसा-प्रविधि को नये ढंग से सुधारना भी चाहते थे। लेकिन
रचनात्मक कार्यों को पुनः हाथ में लेना मानो बदा ही न था। कुछ दल और उसके नेता
शायद नहीं चाहते थे कि राष्ट्र-निर्माण का कोई कार्य गांधीजी करें।
हत्या की साज़िश
उसी दिन हिन्दू महासभा के मंच तले एक बैठक हुई।
इस बैठक में भारत सरकार को पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने पर मजबूर करने और हिन्दू शरणार्थियों को
मुसलमानों के घरों में नहीं रहने देने की तीखी आलोचना की। इस बैठक में महात्मा
गांधी के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक शब्दों का भी इस्तेमाल किया गया। उन्हें
तानाशाह कहा गया और उनकी तुलना हिटलर से की गई। हिन्दू महासभा के सचिव आशुतोष
लाहिड़ी ने हिन्दुओं को संबोधित करते हुए एक पर्चा निकाला। यह एक शपथ पत्र था। उस
पर लोगों के हस्ताक्षर लिए गए।
18 जनवरी को मरीना होटल में आप्टे, नाथूराम और
करकरे सुबह का नाश्ता करने के बाद तीनों एक तांगे में बैठकर बिड़ला हाउस देखने गए, जहाँ गांधीजी ठहरे हुए थे। दिल्ली में बिड़ला
हाउस उस समय परिवार के मुखिया घनश्याम दास बिड़ला का घर हुआ करता था। आज बिड़ला
हाउस एक राष्ट्रीय स्मारक है और जिस सड़क पर यह स्थित है - जिसे पहले अल्बुकर्क
रोड कहा जाता था - उसका नाम बदलकर 'तीस
जनवरी मार्ग' कर दिया गया है, ताकि
गांधीजी की हत्या की तारीख को याद रखा जा सके।
हालाँकि, जो
कोई भी गांधीजी की शाम पाँच बजे वाली प्रार्थना सभाओं में शामिल होना चाहता था, वह बिड़ला हाउस के परिसर में आसानी से जा सकता
था, लेकिन दिन के बाकी समय में गेट पर तैनात पुलिस
गार्ड को पार करना आसान नहीं था। लेकिन, बगीचे
के लेआउट और उस जगह का सामान्य अंदाज़ा लगाने के लिए जहाँ प्रार्थनाएँ होती थीं, गेट के अंदर जाना ज़रूरी नहीं था। चारों तरफ़ का
चक्कर लगाकर इन्होंने जायजा लिया। प्रवेश द्वार के पास नौकरों का आवास था। वहां से
कम्पाउंड और प्रार्थना स्थल की तरफ़ जाया जा सकता था। घर के दोनों तरफ़ और पीछे की
तरफ़ सर्विस लेन थीं, और पीछे बने कई नौकरों के क्वार्टर और गैराज तक
जाने के लिए एक अलग रास्ता था। इन लेन से बगीचे का काफ़ी हिस्सा दिखाई देता था; यहाँ तक कि सुबह के समय मुख्य सड़क से भी, ईंट की नीची दीवार के पार गांधीजी को अक्सर
बेंत की कुर्सी पर धूप में बैठे देखा जा सकता था—कंधे पर तौलिया डाले, वे या तो अपने कागज़ों में झुके होते थे या
किसी सेक्रेटरी को कुछ लिखवा रहे होते थे।
दिल्ली में अभी तक उस गैंग का शूटर, बड़गे नहीं
पहुंचा था। उसके बिना तो काम को अंजाम
दिया ही नहीं जा सकता था। उस दिन इन तीनों ने गांधीजी की 5.00 बजे शाम की प्रार्थना सभा में भाग लिया। गांधीजी
वहाँ नहीं आए क्योंकि वे बिस्तर पर थे; लेकिन
उन्होंने पब्लिक एड्रेस सिस्टम पर पढ़कर सुनाने के लिए एक संदेश भेजा था। साज़िशकर्ताओं
ने वस्तुस्थिति का भलीभाँति अपनी योजना के अनुसार मुआयना किया। यह वह दिन था जब
गांधीजी ने अपना उपवास तोड़ने का फ़ैसला किया था और उनके जीवनी-लेखक डी.जी.
तेंदुलकर के अनुसार, 'यह उनके और उन सभी के लिए खुशी का दिन था'। सभा में भीड़ आम दिनों से थोड़ी ज़्यादा थी
और लोग ऐसे घूम-फिर रहे थे जैसे अचानक मिली छुट्टी पर उत्साहित स्कूली बच्चे हों।
साज़िश रचने वाले तीनों लोग पूरे बगीचे में घूमते रहे और अपनी योजना को अंतिम रूप
दिया। अब जब उपवास खत्म हो गया था, तो
उन्हें पूरा भरोसा था कि गांधीजी बाहर आएंगे और एक-दो दिन में खुद प्रार्थना शुरू
कर देंगे। आप्टे ने बताया कि जहां गांधीजी बैठते हैं, उनकी पीठ की तरफ़ एक 12 फुट
की दूरी पर नौकरों के आवास का एक जालीदार वेंटिलेटर है। वहां से गांधीजी पर गोली
चलाई जा सकती है। उस ग्रिल से हथगोला भी फेंका जा सकता है। अब उन्हें सर्वेंट
क्वार्टर में पहुंचने का रास्ता खोजना था।
***
सब कुछ ठीक-ठाक होता देख बिड़ला भवन से वे नई
दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँचे, जहाँ
बॉम्बे से आने वाली दो तेज़ ट्रेनें—पंजाब मेल और फ्रंटियर मेल—एक घंटे के
अंदर-अंदर पहुँचने वाली थीं। दिल्ली रेलवे स्टेशन पर गोपाल गोडसे आने वाला था।
गोपाल गोडसे पंजाब मेल से आ रहा था, जबकि बड़गे और शंकर फ़्रंटियर मेल से आ रहे थे।
एक घंटे के अंतराल में दोनों गाड़ियां दिल्ली रेलवे स्टेशन समय से पहुंची। उन्होंने
कई बार पूरी ट्रेन का चक्कर लगाया, फिर
भी उन्हें न तो बडगे और शंकर दिखे और न ही गोपाल। उन्हें तो पता ही नहीं था कि बड़गे
और शंकर ने 17 तारीख को गाड़ी पकड़ी ही नहीं थी। जबकि गोपाल
वहाँ नहीं उतरा। अपने तीनों में किसी साथी के नहीं मिल पाने से आप्टे-गोडसे गैंग
को लगा कि योजना खटाई में पड़ती जा रही है। वे मरीना होटल वापस आ गए। पहली बार
उन्हें उदासी और घबराहट महसूस हुई क्योंकि मदनलाल भले ही उनके लिए विस्फोटक ले आया
था, लेकिन उनकी दोनों रिवॉल्वर नहीं आई थीं। गोडसे ने अपने लिए कॉफी मंगवाई जबकि करकरे और
आप्टे व्हिस्की में डूब गए। लिकर रजिस्टर में गेस्ट का नाम लिखा जाता था।
उस रात करकरे शरीफ़ होटल वापस नहीं गए, बल्कि हिंदू महासभा भवन में उसे जो कमरा दिया
गया था, वहीं सोया। उसे पता था कि अगर वे किसी तरह
रेलवे स्टेशन पर गोपाल और बाकी दो लोगों से नहीं मिल पाए, तो गोपाल
या बाकी दो लोग ज़रूर महासभा भवन आएँगे, और वह
उनसे चूकना नहीं चाहता था। लेकिन बडगे और शंकर नहीं आए, और न
ही गोपाल आया। याद होगा कि अगर वे रेलवे स्टेशन पर एक-दूसरे
से नहीं मिल पाए, तो उन्होंने हिंदू महासभा भवन में मिलने का
प्लान बनाया था, जहाँ करकरे और मदनलाल के ठहरने की उम्मीद थी।
नाथूराम, जो पार्टी का एक जाना-माना और असरदार
कार्यकर्ता था और दिल्ली में पार्टी के कई सम्मेलनों में शामिल हो चुका था, पार्टी के सेक्रेटरी आशुतोष लाहिड़ी को अच्छी
तरह जानता था। उसने करकरे को लाहिड़ी के नाम एक परिचय पत्र दिया, और इसी वजह से 18 तारीख की दोपहर से करकरे को
कमरा नंबर 3 दे दिया गया, जो बाद में उनकी गुप्त बातचीत की जगह बन गया, जहाँ उन्होंने तय किया कि उनमें से हर एक को
क्या भूमिका निभानी है।
उसी दोपहर, मदनलाल, आमचेकर के साथ चांदनी चौक इलाके में शादी के
लिए लड़कियों को देख रहा था। शेवंती को लगभग भूल चुका मदनलाल किसी और लड़की के साथ
घर बसाने के सपने देखने लगा था। लेकिन
उसका यह सपना भी टूट गया, क्योंकि
करकरे द्वारा 19 जनवरी को उसे हिंदू महासभा के दफ़्तर में शिफ्ट होने के लिए कहा
गया।
***
गोपाल की ट्रेन लेट थी, और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँचने के कुछ समय
पहले वह गहरी नींद में था। जब ट्रेन नई
दिल्ली पहुँची तो वह अब भी सो रहा था, उसका भाई, नाथूराम, जो उसे लेने आया था, उसे नहीं देख सका। ट्रेन पुरानी दिल्ली चली गई, और वहां गोपाल उतरा और शरणार्थियों के एक समूह के
साथ उसने प्लेटफार्म पर ही बिस्तर बिछा लिया। बॉम्बे से अगली ट्रेन के आने और चले
जाने तक प्लेटफ़ॉर्म पर इंतज़ार करने के बाद, वह
एक बेंच पर सिकुड़कर सो गया, ताकि
अगर रात में उनका भाई या कोई और उसे ढूँढते हुए आए, तो
वे मिल सके।
***
18 जनवरी को बंबई में बड़गे और शंकर दीक्षित महाराज से मिलने गए। वहां से न कोई पैसा मिला न
ही शस्त्र। वे 2.30 बजे विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन आ गए।
पंजाब मेल पकड़ी और दिल्ली के लिए रवाना हुए।
*** *** ***
मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर
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