शनिवार, 19 सितंबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-26

 

महात्मा गांधी हत्या केस-26

17 जनवरी, 1948

गांधीजी के सचिव प्यारेलाल बताते हैं कि गांधीजी के लंबे उपवासों के बारे में एक हैरान करने वाली बात यह थी कि उस दौरान उनमें ज़बरदस्त मानसिक ताक़त और ऊर्जा दिखाई देती थी। जैसे-जैसे उपवास आगे बढ़ता, उनका मन और तेज़ और सतर्क हो जाता, अंतर्ज्ञान और गहरा हो जाता, और उनकी आत्मा ज़्यादा संवेदनशील, तीव्र और माफ़ी व दया से भर जाती। इस बात की पुष्टि इससे भी मिलती है कि 17 जनवरी, 1948 (उनके उपवास के पांचवां दिन) को उनका कार्यक्रम इस प्रकार था: सुबह 3.30 बजे हमेशा की तरह सुबह की प्रार्थना; रिचर्ड साइमंड्स को एक पत्र लिखवाया, जिन्हें कुछ हफ़्ते पहले ही उन्होंने अपना मरीज़ बनाया था और बिड़ला हाउस में एंटरिक (आंतों का बुखार) के हमले के दौरान उनकी देखभाल की थी; रोज़ाना बंगाली लेखन के बाद सुबह के अख़बार, और ज़रूरी आने वाले पत्र और टेलीग्राम उन्हें पढ़कर सुनाए गए; डॉक्टरों द्वारा मेडिकल जांच, उसके बाद 10.30 बजे तक मालिश और स्नान आदि; बाथ-टब में लेटे हुए ही पाकिस्तान के नकद हिस्से को जारी करने के भारत सरकार के फ़ैसले पर अपना बयान सचिव प्यारेलाल को लिखवाया। सुबह 10.30 बजे से दोपहर के बीच सात लोगों से मुलाक़ात की, जिनमें रियासतों के तीन शासक प्रमुख शामिल थे। दोपहर 12.30 से 3.35 बजे के बीच, आराम और प्राकृतिक चिकित्सा के विभिन्न उपचारों के साथ-साथ, फिर से दस लोगों के साथ गंभीर बातचीत की, जिनमें पंडित नेहरू, मौलाना आज़ाद और दिल्ली के चार मौलाना शामिल थे। शाम की प्रार्थना के बाद लोगों की एक बड़ी भीड़ से मुलाक़ात की, जिसमें एक महाराजा, एक मुख्यमंत्री और भारतीय संघ के केंद्रीय मंत्रिमंडल के लगभग आधे दर्जन मंत्री शामिल थे।

17 जनवरी (उपवास का पाँचवाँ दिन) को गांधीजी की हालत और ख़राब हो गई। शाम होते होते उन्हें मतली आने लगी। उनके सिर में भारीपन बढ़ गया और दिल में बेचैनी होने लगी। वजन अब भी 107 पौंड ही था। ऐसा लग रहा था कि शरीर में पानी जमा हो रहा है, शायद एनिमा (इरिगेशन) की वजह से। डॉक्टर ने उन्हें पानी में नारंगी का रस मिलाकर पीने के लिए कहा, तो गांधीजी ने जवाब दिया, “उस सूरत में मुझे 21 दिनों का और उपवास करना होगा।” वे घंटों तक चुपचाप आराम करते रहे या सोते रहे। डॉक्टरों के बुलेटिन में गंभीर बात कही गईं: "लोगों को यह बताना हमारा फ़र्ज़ है कि वे बिना देर किए उपवास खत्म करने के लिए ज़रूरी हालात बनाने के वास्ते तुरंत कदम उठाएं।"

नेहरू आए और रो पड़े। गांधीजी ने प्यारेलाल को शहर भेजा ताकि यह पता लगाया जा सके कि मुसलमानों का लौटना सुरक्षित है या नहीं। शाम को गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने औपचारिकता की सारी परंपरा को तोड़कर पत्नी सहित गांधीजी से मिलने आए। उसने कहा, “मेरे लिए यह एक मुलाक़ात से अधिक है। एक मित्र के स्वास्थ्य की स्वाभाविक चिंता के अलावा मैं संसार और महात्माजी को भी – यह बता देने के लिए उत्सुक था कि मैं उनके उपवास के उद्देश्य से सहमत हूं।”

राजधानी में शांति के लिए आयोजित एक बड़ी रैली को संबोधित करते हुए मौलाना आज़ाद ने लोगों को बताया कि दोपहर में उनकी गांधीजी से मुलाकात हुई थी। उन्होंने गांधीजी से ऐसी ठोस शर्तें बताने का अनुरोध किया था, जिनके पूरा होने पर वे अपना उपवास तोड़ने को तैयार हो जाएं। इस पर गांधीजी ने उन्हें सात शर्तें बताईं। जब सभी पक्ष उन शर्तों पर हस्ताक्षर कर देंगे, तभी उपवास समाप्त किया जाएगा। हजारों की संख्या में दोनों क़ौमों के लोगों का जुलूस बिड़ला हाउस पहुंचा। उन्होंने एक साथ रहने का संकल्प लिया। 17 जनवरी की शाम को अलग-अलग समुदायों के 130 प्रतिनिधि उनके घर पर मिले और शांति बनाए रखने का प्रस्ताव पास किया, लेकिन देखा गया कि कुछ असंतुष्ट गुट बैठक में शामिल नहीं हुए थे। रात और अगली सुबह उन्हें इकट्ठा किया गया। आखिर में उनके प्रतिनिधियों ने समझौते पर दस्तखत करने की पेशकश की। ऐसा लगा कि अगर ये सभी प्रतिनिधि बिड़ला हाउस आएं और दिल्ली में मुसलमानों की सुरक्षा की कसम खाएं, तो गांधीजी अपना उपवास तोड़ने के लिए मान जाएंगे।

दिल्ली के सारे होटल, रेस्तरां और ढाबों के कर्मचारियों ने खाना परोसने से इंकार कर दिया। वे बोले गांधीजी फाका कर रहे हैं तो हमें उनका नैतिक साथ देना चाहिए। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में बनी 130 लोगों की शांति समिति सतत काम कर रही थी। शहर के सारे शरणार्थी कैम्प से यह लिखित निवेदन इकट्ठा किया गया कि “अब दंगे नहीं होंगे और न ही अव्यवस्था होगी”। राजेन्द्र प्रसाद के घर पर करोल बाग़, पहाडगंज, सब्ज़ी मंडी और दूसरे इलाक़ों के अगुओं की बैठक हुई। सब्जी मंडी के मुसलमानों का आर्थिक बहिष्कार कर दिया गया था। अब वहां के ग़ैर-मुसलिम दुकानदारों ने ऐलान कर दिया कि आर्थिक बहिष्कार उठा लिया गया है। शरणार्थी शिविरों के हिन्दुओं और सिखों ने इस वादे पर दस्तख़त किए कि वे मुस्लिम मिल्कियत वाली जगहों को और मस्जिदों को ख़ाली कर देंगे। दिल्ली प्रशासन ने घोषणा की कि एक सप्ताह के भीतर दिल्ली के प्रत्येक ग़ैर-मुसलिम निराश्रितों को किसी न किसी प्रकार का आश्रय दे दिया जाएगा। पंडित नेहरू और केंद्रीय कैबिनेट के कुछ मंत्रियों ने बेघर शरणार्थियों के लिए अपने सरकारी आवास खोल दिए, बस वे ख़ुद वहां से बाहर नहीं गए।

यह सब बिल्कुल सही समय पर हुआ, क्योंकि रात में कई बार गांधीजी की हालत ऐसी हो गई थी कि वे बेसुध-से हो गए थे। वे बिस्तर पर ले जाए जाने की बात कहते थे, जबकि वे पहले से ही बिस्तर पर थे। उन पर एक अजीब-सी कमजोरी छा गई थी, और जब वे बोलते थे तो उनकी आवाज़ इतनी धीमी होती थी कि शब्द समझना लगभग नामुमकिन होता था।

द स्टेट्समैन' के अनुभवी पत्रकार और पूर्व संपादक आर्थर मूर, सामाजिक समस्याओं को सुलझाने के लिए उपवास के तरीके की प्रभावशीलता को लेकर हमेशा से ही संशय में रहते थे। लेकिन जब उन्हें राजधानी में सांप्रदायिक शांति के लिए गांधीजी के उपवास के फैसले के बारे में पता चला, तो उन्होंने भी उनके साथ एकजुटता दिखाते हुए उपवास शुरू कर दिया। गांधीजी को लिखे एक नोट में उन्होंने कहा: “मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो आपको रोकने की कोशिश करेंगे। मुझे यकीन है कि आप सही हैं। अगर नफ़रत का यह दौर जारी रहा, तो सिर्फ़ कोई चमत्कार ही दोनों देशों को और भयानक तबाही से बचा सकता है। आपने कलकत्ता में बहुत कुछ किया। लेकिन यहाँ और भी बहुत कुछ करने की ज़रूरत है; आप ही एकमात्र उम्मीद हैं। ... मुझे लगता है कि जो लोग आपकी बात का समर्थन करते हैं और आपके साथ सहानुभूति रखते हैं, वे आपके साथ उपवास रखकर आपकी मदद और हौसला बढ़ा सकते हैं। इसी वजह से, मंगलवार से—यानी जब से आपने उपवास शुरू किया है—मैंने भी पानी के अलावा कुछ नहीं खाया-पिया है, और जब तक आप उपवास रखेंगे, मैं भी ऐसा ही करता रहूँगा। ... कल रात मैं एक डिनर पर गया था, लेकिन मैंने सिर्फ़ बातचीत में हिस्सा लिया। मुझे लगता है कि इस बार आप बहुत से लोगों का दिल बदल देंगे। आप यकीन रखिए कि मेरी दुआएँ आपके साथ हैं।”

हत्या की साज़िश

नाथूराम गोडसे जासूसी उपन्यास बहुत शौक से पढ़ता था और उसका पसंदीदा लेखक अर्ल स्टेनली गार्डनर था। वहीं दूसरी ओर, आप्टे को अगाथा क्रिस्टी ज़्यादा पसंद थीं। लेकिन कहानियों में अपराध के बारे में पढ़ने-जानने से उन्हें असल ज़िंदगी में अपराधियों के तौर-तरीकों के बारे में कुछ भी पता नहीं चला। वे आखिर तक पूरी तरह अनाड़ी बने रहे और जो भी काम किया, उसमें बुरी तरह नाकाम रहे। नाथूराम तो एक हिसाब-किताब की डायरी भी रखता था, जिसमें वह अपने साथियों को दिए गए पैसे का पूरा ब्यौरा बहुत बारीकी से लिखता था। अपने सुराग मिटाने की कोशिश करने के बजाय, ऐसा लगता था जैसे वह जान-बूझकर ऐसे निशान छोड़ रहा था जिनसे आसानी से उनका पता लगाया जा सके।

बडगे को पिस्तौल देने के बाद, नाथूराम के पास बॉम्बे जाने वाली ग्यारह बजे की ट्रेन से पहले अपने माता-पिता से मिलने का काफ़ी समय था। 17 तारीख की सुबह नाथूराम, बड़गे और किष्टैय्या बंबई में थे। नाथूराम गोडसे ने उससे पहले ट्रेन पकड़ी और पूना से बंबई आ गया और दादर में उतरा।

बडगे आधी रात के बाद तक शर्मा के साथ अपना काम पूरा नहीं कर पाया, और उसके बाद बॉम्बे के लिए अगली ट्रेन रात 2 बजे ही थी। उसी दिन सुबह 2.40 बजे बड़गे और किष्टैय्या ने पुणे से बंबई के लिए ट्रेन पकड़ी। हमेशा की तरह, थर्ड-क्लास के डिब्बे खचाखच भरे हुए थे, और उसे और शंकर को एक ही डिब्बे में जगह नहीं मिल पाई। रात उन्होंने लकड़ी की सख़्त बेंचों पर बैठकर बिताई। उन्होंने तय किया था कि शंकर दादर स्टेशन पर उतरेगा और हिंदू महासभा के ऑफ़िस में बडगे का इंतज़ार करेगा। शंकर किष्टैय्या दादर में उतरा। सुबह सात बजे ट्रेन विक्टोरिया स्टेशन पहुँची। बडगे नीचे उतरा। आप्टे और नाथूराम प्लेटफ़ॉर्म पर उसका इंतज़ार कर रहे थे।

आप्टे-गोडसे को यह जानकर बेहद ख़ुशी हुई कि बड़गे ने छोटी पिस्तौल को बदल कर अच्छी पिस्तौल प्राप्त करने में सफलता पा ली है। उन्होंने तय किया कि सुबह का समय अपने मिशन के लिए पैसे जुटाने में लगाएंगे। अपनी परियोजना को पूरा करने के लिए धन की आवश्यकता थी, और वे धन इकट्ठा करने के अभियान पर बॉम्बे पहुंचे थे। इसके लिए उन्होंने एक टैक्सी ली और पूरे बॉम्बे में उन लोगों से मिलने गए जिनके पते हिंदू मकसद के लिए चंदा देने वालों की लिस्ट में थे। फंड इकट्ठा करने के लिए उन्हें चन्द्रदास मेघजी, गणपतराव अफ़जालपुरकर और महादेव जी. काले से मिलना था। पहले वे टैक्सी से लालबाग के पास बम्बे डायिंग वर्क्स के मालिक चरणदास मेघजी मथुरादास से मिलने गए लेकिन वह नहीं था। फिर वे दादर आए और शंकर को लिया। इसके बाद वे फोर्ट इलाके में सी ग्रीन होटल (साउथ) गए, जहाँ से रोती-बिलखती मनोरमा साल्वी को साथ लिया और सिसकती हुई हालत में ही उसे उसके घर के पास बायकुला में छोड़ा।

 

गोडसे ने बड़गे से कहा कि बंबई छोड़ने से पहले हमें चलकर सावरकर का आशीर्वाद लेना चाहिए। सावरकर सदन पहुंचने पर शंकर को टैक्सी में छोड़ तीनों ने सावरकर सदन में प्रवेश किया। ग्राउंड फ्लोर पर बड़गे को छोड़ कर आप्टे और गोडसे फर्स्ट फ्लोर पर गए। पांच से दस मिनट के भीतर ही वे वापस आ गए। पीछे से सावरकर भी आए। उन्होंने गोडसे से कहा “यशस्वी होऊन या!” मतलब, “कामयाब होकर लौटना!”। उसके बाद वे रुइया कॉलेज की तरफ़ चल पड़े। रास्ते में आप्टे ने कहा था, ‘सावरकर ने भविष्यवाणी कर दी है कि गांधीजी के सौ साल जीने का अब अंत होने वाला है। इसमें कोई संदेश नहीं कि हम सफल होंगे।’ यह बात पूरी तरह समझ में आती है कि नाथूराम और आप्टे अपने मिशन पर निकलने से पहले सावरकर से मिलना चाहते थे। वे दोनों सावरकर का काफी सम्मान करते थे और उन जैसे व्यक्ति के दर्शन से अपने काम की शुभ शुरुआत करना चाहते थे। लेकिन अगर यह मुलाक़ात हुई भी थी, तो उससे यह नतीजा निकालना चाहिए कि सावरकर ने ही उन दोनों को गांधी की हत्या करने का निर्देश दिया था, या उन्होंने ऐसी हत्या को मंज़ूरी दी थी जिसे इतने भद्दे और अमानवीय तरीके से अंजाम दिया जाना था, यह पूरी तरह बेतुकी बात होगी। टैक्सी ड्राइवर घर से दूर ही रहा, और शंकर, जिसे गेट के बाहर इंतज़ार करना पड़ा था, सावरकर को कभी नहीं देख पाया।

इसके बाद वे अफ़जालपुरकर के घर गए। वहां कुछ देर रुके। उसने उन्हें सौ रुपए दिए। उसके बाद वे काले के घर गए। बीच में उन्होंने पाटनकर को ले लिया, क्योंकि वही काले का घर जानता था। गोडसे और आप्टे ने काले से अंग्रेज़ी में बातें की जो बड़गे की समझ से परे था। काले ने गोडसे को करीब डेढ़ हज़ार रुपयों की एक थैली दी। एक बार फिर वे बम्बे डायिंग वर्क्स गए। उन्होंने शंकर और बड़गे को टैक्सी से उतार दिया। उसी टैक्सी से गोडसे और आप्टे कहीं और के लिए निकल गए। करीब डेढ़ घंटे के बाद टैक्सी आई, लेकिन उसमें आप्टे अकेला था। गोडसे अन्य टैक्सी से किसी और काम को सम्पन्न करने के लिए गया था। तब तक उस कंपनी का मालिक चरणदास मेघजी मथुरादास भी गया था। आप्टे ने उससे अंग्रेज़ी में बात की।

फिर दोपहर में नाथूराम, आप्टे और बड़गे दीक्षित महाराज के घर गए। वे दीक्षित महाराज से मिले और रिवाल्वर की मांग की। दीक्षित ने उसे एक पिस्तौल दिखाई। आप्टे रिवाल्वर चाहता था। दीक्षित ने कहा यही इंतजाम हो पाया है, लेकिन वह बिना पेमेंट के पिस्तौल नहीं देगा। आप्टे ने कहा भी कि तुम्हारे बड़े भाई दादा महाराज ने बिना पैसों के पिस्तौल दिलवाने की बात कही थी, लेकिन दीक्षित पैसे के लिए अड़ा रहा। अंततः उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा। फिर भी वे निराश नहीं थे। उनके पास दो रिवाल्वर थीं!

दोपहर तक, तब तक वे 2000 रुपये से ज़्यादा जमा कर चुके थे, और उन्हें अभी भी दो और लोगों से मिलना था जिन्होंने उन्हें दिन में बाद में आने के लिए कहा था। लेकिन अब आप्टे और नाथूराम के लिए टाटा एयरलाइंस के ऑफ़िस जाकर एयरपोर्ट जाने वाली कंपनी की बस पकड़ने का समय हो चुका था। जिन दो लोगों ने पैसे देने का वादा किया था, उनमें से एक कुर्ला इलाके में रहता था और दूसरा महालक्ष्मी इलाके में रहने वाला मिल-मालिक था। मिल-मालिक ने भले ही कोई तय रकम नहीं बताई थी, लेकिन उन्हें पक्का यकीन था कि उसका योगदान सबसे ज़्यादा होगा। आप्टे-गोडसे ने 'खर्चों के लिए' बडगे को 350 रुपये दिए और कहा कि वह दोपहर बाद कुर्ला वाले व्यक्ति से 400 रुपये ले ले, और वे खुद मिल-मालिक के पास चले गए। वहाँ उन्हें 1000 रुपये और मिले, लेकिन उन्हें एहसास हुआ कि उनका एक घंटा बर्बाद हो गया है, इसलिए उन्होंने ड्राइवर से उन्हें सीधे सांताक्रूज़ एयरपोर्ट ले जाने को कहा, जो कम से कम पंद्रह मील दूर था। उनकी फ़्लाइट दोपहर 2 बजे उड़ने वाली थी।

चारों टैक्सी से एयरपोर्ट के लिए रवाना हुए। पूरे रास्ते वे बड़े जोश के साथ बातें करते रहे। दिल्ली के लिए उन दोनों की उड़ान लगभग छूट ही गई थी, क्योंकि वे पहले गलत हवाई अड्डे चले गए। गोडसे और आप्टे को सांताक्रुज हवाई अड्डे से दिल्ली के लिए उड़ान भरनी थी। लेकिन वे गलती से जुहू हवाई अड्डे चले गए, जो उस समय मुख्य वाणिज्यिक हवाई अड्डा नहीं था। जब टैक्सी जुहू हवाई अड्डे पहुँची, तो उन्हें पता चला कि उनका प्लेन करीब एक मील आगे सांताक्रुज हवाई अड्डे से उड़ान भरने वाला था। प्लेन छूटने की चिंता में आप्टे ड्राइवर से तेज़ी से गाड़ी चलाने को कहता रहा। वे तेजी से सांताक्रुज हवाई अड्डे की तरफ भागे। वे उड़ान प्रस्थान के ठीक आखिरी पलों में वहाँ पहुँचने में सफल रहे, जिससे उनकी दिल्ली की फ्लाइट छूटते-छूटते बची।  आप्टे और नाथूराम प्लेन पकड़ने के लिए तेज़ी से भागे और बडगे से टैक्सी का किराया चुकाने को कहा।

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आप्टे ने बड़गे को 350 रुपए दिया था और कहा था कि वह उसी रात ट्रेन से दिल्ली के लिए निकल पड़े। आप्टे ने बडगे को उसी शाम की 'फ्रंटियर मेल' पकड़ने की अहमियत समझाई और वादा किया कि वे अगली शाम नई दिल्ली स्टेशन पर उससे मिलेंगे। लेकिन अगर किसी वजह से वे स्टेशन पर एक-दूसरे से नहीं मिल पाए, तो बडगे को अकेले हिंदू महासभा भवन जाना था, जहाँ उनमें से कोई एक उसका इंतज़ार कर रहा होगा।

बडगे ने उसी टैक्सी को 400 रुपये लेने के लिए कुर्ला वापस जाने के लिए भी रखा। बड़गे और शंकर उसी टैक्सी से, पटवर्धन से मिलने कुर्ला गए थे। पटवर्धन घर पर नहीं था। उन्होंने प्रतीक्षा करने का निर्णय किया। बड़गे ने टैक्सी छोड़ देना उचित समझा। बडगे, जो अभी भी साधुओं जैसे भड़कीले कपड़ों में था, उसने किराया दिया और ड्राइवर को हैरान करते हुए रसीद मांगी। ड्राइवर, ऐतप्पा कोटियन, ने खुशी-खुशी रसीद दे दी। 55 रुपए 50 पैसे के भुगतान का रसीद उन दिनों के हिसाब से वह एक बहुत बड़ी सवारी थी। उस समय एक टैक्सी ड्राइवर की रोज़ की आमदनी लगभग 30 रुपये होती थी। कोटियन को इसीलिए सवारी का चेहरा काफी समय तक याद रहा!

पटवर्धन 9.30 बजे आया। उसने बड़गे को 400 रुपए दिए। अब उनके पास काफी पैसा था। आप्टे से मिले निर्देशों के बावजूद बड़गे ने दिल्ली के लिए उस दिन गाड़ी नहीं पकड़ी! बंबई में स्टेशन की ओर जाने के बजाए बड़गे और शंकर ने अपने एक होटल मालिक मित्र नवारे के आसरा होटल की और रुख किया। नवारे ने उसे 'मालिक के मेहमान' के तौर पर अपने होटल में रात बिताने के लिए बुलाया था। दोनों नवारे के आतिथ्य में रम गए और यह सुध भूल गए कि उन्हें फ़्रंटियर मेल पकड़ने स्टेशन भी जाना है। दोस्त ने उसे होटल में एक आरामदायक कमरा दिया। बडगे ने – जो पिछले चार दिनों से काफी भाग-दौड़ कर रहा था और ठीक से सो भी नहीं पाया था - एक असली बिस्तर पर आराम से सोने का फैसला किया। उसने खुद से कहा, अगर वह अगली शाम भी बॉम्बे से निकलता, तो भी वह गांधी की हत्या की साजिश में अपनी भूमिका निभाने के लिए समय पर दिल्ली पहुंच जाता। शूटर बंबई में ही था!

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आप्टे और गोडसे हवाई जहाज पकड़ने के लिए चले गए। उन्होंने कथित नामों के तहत अपने टिकट खरीदे थे, गोडसे ने खुद को डीएन करमारकर और आप्टे, का टिकट एस मराठे नाम से था। उड़ान से पहले हुई इतनी पब्लिसिटी के बाद, आप्टे और नाथूराम का नकली नामों से टिकट खरीदने की मेहनत करने का कोई खास मतलब नहीं रह गया था। जिस फ्लाइट से वे जा रहे थे, उसे रास्ते में अहमदाबाद भी रुकना था। अहमदाबाद जाने वाले यात्रियों में एक अहम धार्मिक सभा में शामिल होने जा रहे दादा महाराज भी थे!

दादा महाराज मुंबई (बॉम्बे) के एक धनी और प्रभावशाली वैष्णव संप्रदाय (पुष्टिमार्ग) के प्रमुख थे। दादा महाराज अहमदाबाद में एक बेहद महत्वपूर्ण धार्मिक सभा में भाग लेने के लिए जा रहे थे। नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे हथियार जुटाने के सिलसिले में पहले मुंबई में दादा महाराज से मिल चुके थे और उनसे मदद मांगी थी। लेकिन बाद में दादा महाराज उनके प्रति ठंडे पड़ गए थे। दादा महाराज आप्टे-गोडसे से इतने बेरुखे हो चुके थे कि उन्होंने बॉम्बे में उनसे मिलने के बारे में सोचा तक नहीं था। प्लेन में गोडसे-आप्टे की नज़र दादा महाराज पर पड़ी और उन्होंने हाथ हिलाकर इशारा किया, जिसके जवाब में दादा महाराज ने भी हाथ हिलाया। अहमदाबाद में फ्लाइट लैंड होने पर एयरपोर्ट की बिल्डिंग में, अपने भक्तों के लाए हारों से लदे दादा महाराज ने हॉल के उस पार से आप्टे से कहा: “तुम तो बड़े-बड़े कारनामे करने की बहुत डींग हांक रहे थे, लेकिन किया कुछ भी नहीं।”  इस पर आप्टे का जवाब था: “जब हम कुछ करेंगे, आप ख़ुद जान जाएंगे।” इसके बाद दादा महाराज अपने भक्तों के साथ अहमदाबाद में रुक गए, जबकि गोडसे और आप्टे उसी विमान से आगे दिल्ली के लिए रवाना हो गए।

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लेकिन, एक मिसाल कायम करने के मामले में, दूसरी टीम—करकरे और मदनलाल—ने अपने सीनियर साथियों के काम को भी पीछे छोड़ दिया था। करकरे, जो अपनी ज़्यादातर कमाई दूसरों पर खर्च कर देता था, गरीबी के माहौल में इतना पला-बढा था कि उसे खुद पर पैसे खर्च करने की आदत ही नहीं थी। अपनी सही ट्रेन छूट जाने की वजह से उसे एक बहुत धीमी ट्रेन से जाना पड़ रहा था—जिस सफ़र में आम तौर पर चौबीस घंटे लगते थे, उसमें अब चालीस घंटे से ज़्यादा लगने वाले थे—फिर भी करकरे और मदनलाल ने थर्ड क्लास में ही सफ़र किया। डिब्बे में भरे हुए करीब बीस यात्रियों में आमचेकर नाम का एक व्यक्ति भी था। वह पाकिस्तान से आया एक शरणार्थी था, जो वहाँ सरकारी नौकरी करता था और अब अपनी नौकरी का भारत में ट्रांसफर करवाने के लिए दिल्ली जा रहा था। आमचेकर ने एक यात्री को दूसरे से मराठी में कुछ कहते सुना, जो आमचेकर की मातृभाषा थी। आमचेकर ने उस व्यक्ति से बातचीत शुरू की। उसने बताया कि उसका नाम करकरे है, वह हिंदू महासभा के लिए काम करता है और महासभा से जुड़े किसी काम के सिलसिले में दिल्ली जा रहा है। आमचेकर की परेशानियाँ सुनने के बाद और यह जानने पर कि वह दिल्ली में बिल्कुल नया है और उसके पास रहने की कोई जगह नहीं है, करकरे ने—जो हमेशा शरणार्थियों की मदद के लिए तैयार रहता था—आमचेकर को हिंदू महासभा भवन ले जाने की पेशकश की। वहाँ पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए कुछ कमरे थे और करकरे व मदनलाल के भी वहीं ठहरने की योजना थी। पेशावर एक्सप्रेस शनिवार दोपहर दिल्ली के मुख्य रेलवे स्टेशन पहुँची। अपनी हरकतों से करकरे ने यह पक्का किया था कि आमचेकर उसे और मदनलाल को याद रखे! दिल्ली पहुंचने से पहले ही इस गिरोह के सदस्य बहुत लापरवाह थे। इन लापरवाहियों की भारी कीमत दोनों को चुकानी पड़ी। नाथूराम गोडसे, जिसने असल में गांधीजी की हत्या की थी, ने अपना जुर्म कबूल कर लिया, और मदनलाल रंगे हाथों पकड़ा गया; लेकिन आप्टे और करकरे के खिलाफ़ मामले शायद इतने मज़बूती से साबित नहीं हो पाते अगर दोनों ने पीछे सुराग छोड़ने में इतनी लापरवाही न बरती होती और अनजान लोगों पर अपनी पहचान की छाप छोड़ने के लिए बार-बार जान-बूझकर कोशिश न की होती, जिससे आस-पास खड़े लोग अहम गवाह बन गए।

इस तरह दोपहर में ही करकरे और मदनलाल पाहवा विस्फोटकों और हथगोलों के साथ दिल्ली पहुंच गए। रास्ते में जिस सहयात्री से करकरे की दोस्ती हुई थी, शांताराम आत्माराम आम्चेकर नाम का वह शख्स भी साथ में था। तीनों पहले हिन्दू महासभा भवन गए, लेकिन वहां उन्हें कमरा नहीं मिला। फिर वे बिड़ला मंदिर से जुड़ी सराय (यात्रियों के ठहरने की जगह) गए, लेकिन वहां भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी।

फिर वे तांगे से चांदनी चौक गए। फ़तेहपुरी के एक छोटे और सस्ते होटल शरीफ़ हिन्दू होटल में उन्होंने तीन बिस्तरों वाला एक कमरा कमरा नं. 2 बुक किया। रामलाल दत्त, उस होटल का महाप्रबंधक था और उसका पार्टनर शांतिप्रकाश था। होटल का खानसामा रामसिंह था। करकरे ने अपना नाम बदल कर रजिस्टर में बी.एम. बियास साइन किया जबकि आम्चेकर और मदनलाल ने अपना सही नाम लिखा। हां, मदनलाल पाहवा ने अंग्रेज़ी में अपना नाम लिखा, लेकिन 'स्थायी पता' कॉलम में गलत पता दर्ज किया।

करकरे किसी काम से बाहर निकल गया। ऐसा लग रहा था कि दिल्ली में करकरे को कई काम निपटाने थे और वह ज़्यादातर समय बाहर ही रहता था, जिसकी वजह से मदनलाल और आमचेकर होटल के कमरे में अकेले रह जाते थे।

मदनलाल ने आम्चेकर से रिफ्यूजी जत्थों में अपने अनुभवों के बारे में लंबी बातें कीं और एक-दूसरे से निजी बातें साझा कीं। मदनलाल ने आमचेकर को अपने रिश्तेदारों के घर चलने के लिए भी कहा, जहां वे 'शादी के लिए एक लड़की देखने' जा रहे थे। पाहवा और आम्चेकर भी थोड़ी देर बाद बाहर निकले। पाहवा उसको अपने एक रिश्तेदार के यहां ले गया, जहां उसे अपनी होने वाली पत्नी को देखना था। उन घरों में उन्हें 'चाय पिलाई गई' और 'कई औरतें मदनलाल को देखने आईं'। एक हफ़्ते से भी कम समय में, पाहवा शेवंती को भूल चुका था!

लौटते वक़्त वे एक सभा में रुके जहां जयप्रकाश नारायण का भाषण उन्हें सुनने को मिला। वहां पर पाहवा ने नारेबाज़ी भी की और पुलिस से बचकर होटल वापस आ गया। करकरे रात में भी नहीं लौटा। उस रात, करकरे के न आने से बाकी दोनों लोग काफी हैरान हुए।

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दिल्ली में कड़ाके का जाड़ा पड़ रहा था। गोडसे और आप्टे बंबई से हवाई सफ़र करके सफ़दरजंग एयरपोर्ट पर उतरे थे। तब तक पालम एयरपोर्ट भी चालू नहीं हुआ था। इनके शेष साथी ट्रेन से दिल्ली आ रहे थे। टैक्सी से वे कनाट प्लेस पहुंचे। कनॉट प्लेस के मरीना होटल में, जिसे अब रेडिसन ब्लू मरीना होटल कहा जाता है, नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे आए। दोनों ने एस देशपांडे और एम देशपांडे नामों से कमरा बुक करवाया। 8.30 बजे तक उन्हें होटल के थर्ड फ्लोर का कमरा नंबर 40 मिला। इस होटल में वे 20 तारीख तक रहे। होटल में चेक इन करने के बाद उन्होंने रात का खाना खाया और हिन्दू महासभा भवन गए। वहां करकरे उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। उन्होंने करकरे से थोड़ी बातचीत की और अपने होटल लौट आए।

होटल के कमरे में गांधीजी की हत्या पर चर्चा का प्लान बनाते वक़्त आप्टे अपने लिए व्हिस्की मंगवाता था। गोडसे व्हिस्की नहीं पीता था। वह कॉफ़ी प्रेमी था। वह होटल में बार-बार कॉफ़ी मंगवाता रहता। तय हुआ कि गांधी जी पर 20 जनवरी को उनकी प्रार्थना सभा के दौरान बम से हमला किया जाएगा।

साज़िश रचने वाले अलग-अलग दिनों में और अलग-अलग तरह से यात्रा करके दिल्ली पहुँच रहे थे। मंदिर मार्ग पर स्थित हिंदू महासभा भवन उनके मिलने की जगह बन गया।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस

संदर्भ : यहाँ पर

 

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