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मंगलवार, 1 नवंबर 2011

भगवान अवधूत दत्तात्रेय-4


भगवान अवधूत दत्तात्रेय-4

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक तक भगवान दत्तात्रेय के चौबीस गुरुओं की चर्चा की गयी। इस अंक में उनकी अन्य शिक्षाओं को जानने के पहले इनके जीवन के विषय में थोड़ी चर्चा कर लेते हैं। वैसे इसकी चर्चा प्रथम अंक में ही करनी चाहिए थी। लेकिन पहले इस विषय पर इतनी लम्बी चर्चा करना अभीष्ट नहीं था।

प्रथम अंक में यह बताया गया था कि ये विश्वविख्यात महर्षि अत्रि और माता अनसूया की संतान हैं। महर्षि अत्रि का आश्रम प्रसिद्ध तीर्थ चित्रकूट में था। यहीं भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ और बचपन बीता। कहा जाता है कि महाराज यदु के साथ पूर्वोक्त संवाद यहीं हुआ था, भगवान दत्तात्रेय एक बालक थे। वैसे भागवत महापुराण में ग्यारहवें स्कंध के सातवें अध्याय में उल्लिखित पचीसवें श्लोक के अनुसार महाराज यदु के साथ उनकी भेंट तरुण अवस्था में हुई थी -

अवधूतं द्विजं कञ्चिच्चरन्तमकुतो भयम्।

कविं निरीक्ष्य तरुणं यदुः पप्रच्छ धर्मवित्।।11-07-25।।

चित्रकूट उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश की सीमा पर विन्ध्य पर्वतमाला में स्थित है। महर्षि अत्रि के आश्रम के पीछे एक ऊँची चोटी है और वहीं पास में स्थित एक गुफा से मन्दाकिनी की निर्मल धारा निकलती है। कहा जाता है कि वहाँ के वातावरण में आज भी निर्भयता और शान्ति पूर्णरुपेण पूर्ववत व्याप्त है। इस स्थान के बहुत करीब रहकर भी कभी वहाँ जाकर देखा नहीं, इस पोस्ट को लिखते समय इस पर बहुत ही क्षोभ हो रहा है। पं. राजमणि तिगुणैत अपनी पुस्तक The Tradition of the Himalayan Masters में लिखते हैं कि यहाँ तीर्थयात्रियों के हाथ से चावल आदि के ग्रास उछलकर मछलियाँ निर्भयता से ले लेती हैं। बन्दर आकर उनका स्वागत करने के आदी हैं। आज भी सौम्य और शान्त आवाज वहाँ गूँजती रहती है कि अपनी भावशून्य बौद्धिकता से संतों द्वारा सिंचित चेतना को दूषित न करें। यह स्थान आज भी उनकी पावन साधना से चेतन तथा सजीव है और सत्यान्वेषी साधकों के लिए गुरुवत मार्गदर्शन करता है।

इसके अतिरिक्त भगवान अवधूत दत्तात्रेय की तपोभूमि गुजरात से लेकर हिमालय के पूर्वोत्तर क्षेत्र तक फैली हुई है। गुजरात में स्थित गिरिनार सबसे प्रसिद्ध स्थान है जहाँ इन्होंने तपस्या की थी। कहा जाता है कि भगवान परशुराम को दीक्षा देने के बाद उन्होंने इसी स्थान पर आकर 12 वर्ष तक तपस्या करने का निर्देश दिया था। हिमालय के पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्थित नीलाचल में भी भगवान दत्तात्रेय ने तपस्या की और काफी समय तक यहाँ रहे। भगवान परशुराम की दीक्षा-स्थली यही भूमि है। लोगों का मानना है कि ये जिन स्थानों पर रहे वे आज भी इनकी आध्यात्मिक चेतना से परिपूर्ण हैं और जो साधक इन स्थानों पर साधना करते हैं, उनकी आध्यात्मिक चेतना की सूक्ष्म तरंगों से लाभान्वित होते हैं।

भगवान अवधूत दत्तात्रेय की परम्परा योग और तंत्र दोनों में पायी जाती है। सिद्धों की परम्परा में भी तंत्र और योग दोनों का समागम देखा जाता है। आधुनिक विज्ञान की तरह आध्यात्मिक क्षेत्र में भी प्रयोग होते रहे हैं। यही कारण है कि यह जगत जितना वैज्ञानिक उपलब्धियों से परिपूर्ण है, उससे कहीं अधिक आध्यात्मिक उपलब्धियों से। ये विभिन्न मार्ग अथवा धर्म आज अस्तित्व में हैं या थे, वे हमारी आवश्यकता के अनुसार ऋषियों ने डिजाइन किए थे। हमारी मानसिक दशा और मूल प्रवृत्तियों के अनुसार हमें एक आध्यात्मिक मार्ग की आवश्यकता होती है। उसका निर्धारण सद्गुरु ही कर सकता है। इसीलिए स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था कि जो लोग यह सोचते हैं कि उन्हीं का धर्म सबसे अच्छा है और इसलिए उन्हीं का धर्म बचेगा तथा अन्य सभी धर्म नष्ट हो जाएँगे, लेकिन जिस दिन ऐसा होगा, वह दुनिया के लिए सबसे बड़े दुर्भाग्य का दिन होगा। क्योंकि वे जानते थे कि सभी धर्म लोगों की आवश्यकता हैं।

विज्ञानभैरव नामक ग्रंथ का अवलोकन करते समय मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि उसमें यौगिक साधना की कुल 112 विधियों का उल्लेख है। कुछ साधक विद्वान इसे आगम (तांत्रिक) ग्रंथ भी मानते हैं। इस ग्रंथ के विषय में आपने प्रवचन में कहा है कि इसमें प्रदत्त कुछ विधियाँ उन लोगों के लिए हैं जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, कुछ उनके लिए हैं जो अभी यहाँ हैं और कुछ उनके लिए हैं जो भविष्य में पैदा होंगे। अतएव जो धर्म के रहस्य को जानते हैं, वे दूसरे धर्म की न तो निन्दा करते हैं और न ही उनका अनादर। वे ही महान आध्यात्मिक विभूतियाँ जगह-जगह अवतार लेकर वहाँ के लोगों के कल्याण के लिए विभिन्न आध्यात्मिक मार्गों का विधान करते रहते हैं, जिन्हें हम धर्म या कुछ नाम देकर उनके बारे में एक भिन्न अवधारणा बना लेते हैं।

भगवान कृष्ण के इस कथन स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः का बहुत ही गलत अर्थ समझा और समझाया गया। इसका भाव यही है कि हमारी अपनी मूल मनोवृत्तियाँ और प्रकृति के अनुकूल मार्ग ही हमारे लिए कल्याणकारी हो सकते हैं। किसी गुरु के चमत्कारिक कृत्यों से आकर्षित या सम्मोहित होकर अपने उचित मार्ग को छोड़ देना घातक होता है। लेकिन यदि वह सद्गुरु है, तो आपको कदापि भ्रमित न कर अपने मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक चलने की प्रेरणा देगा। कहा जाता है कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शरीर छोड़ने के बाद स्वामी विवेकानन्द गुरु की खोज में इधर-उधर भटकते रहे। इसी प्रयास में गाजीपुर में स्थित एक गुफा में रहने वाले पवहारी बाबा के पास गये। पहले तो महीनों उनसे भेंट ही नहीं हो पायी। क्योंकि पवहारी बाबा अपने मन के मालिक थे, उनकी इच्छा हुई बाहर आयें या बिना खाए-पिए महीनों अन्दर ही पड़े रहें। जब एक दिन संयोग से स्वामी विवेकानन्द की उनसे मुलाकात हुई, तो उन्होंने सीधे स्वामी जी से कहा कि ठाकुर से अधिक तुम्हें कोई नहीं दे सकता। जाओ और उनके आदेश का पालन करो, तुम्हारा कल्याण होगा।

इसी प्रकार का उल्लेख परमहंस योगानन्द जी की आत्मकथा Autobiography of A Yogi (योगी कथामृत) में मिलता है। 1935 में उन्होंने क्रिसमस के अवसर पर अपने एक शिष्य श्री ई.ई.डिकिन्सन को एक चाँदी का कप भेंट किया। इसपर वे भाव-विभोर हो गए और परमहंस जी को बताया कि 43 वर्ष पहले जब वे स्वामी विवेकानन्द के पास दीक्षा लेने गए थे, तो उन्होंने कहा था कि आपका गुरु आएगा और आपको चाँदी का कप भेंट देगा। तबसे मैं इसकी प्रतीक्षा कर रहा था।

अतएव धर्मान्तरण साधक की आवश्यकता होती। प्रलोभन देकर धर्मान्तरण कराना और प्रलोभन में आकर धर्मान्तरण करना, दोनों के लिए घातक है। जो सद्गुरु हैं वे साधक या जिज्ञासु के आध्यात्मिक विकास को ध्यान में रखकर उसे दिशा निर्देश देते हैं। गुरु का निर्देश कभी लोभ के कारण नहीं होता। शिष्य से उसका प्रेम अहेतुक (unconditional) होता है और इसी प्रेम का बीज वह अपने शिष्य के हृदय में बोता है, जिसे प्रारम्भ में समझना काफी कठिन होता है और एक अजीब तरह की उबन और घबराहट होती है। दीक्षा के पहले हमारी तैयारी जितनी अधिक होती, इस प्रकार की समस्या कम होती है।

इन परम्पराओं की नींव हम लोगों की कल्पना से परे है। जबतक हम सद्गुरु के मार्गदर्शन में अपनी आध्यात्मिक यात्रा शुरु कर आगे नहीं बढ़ते, हम आभास तक कर सकते। उसके पूर्व हमारे मन में अनेक शंकाएँ उठती हैं, विश्वास और अविश्वास के बीच भ्रमित मनोदशा हमें दिशाहीन कर पलायन के लिए प्रेरित करती है और अधिकांश लोग अपना पथ छोड़कर पुनः पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। साधना के पूर्व की तैयारी बहुत आवश्यक होती है, ताकि सद्गुरु को हम आकर्षित कर सकें। हम सामान्य मनुष्य के पास वह दृष्टि नहीं होती कि अपने गुरु को पहिचान सकें, जबतक कि वह स्वयं न बताए। इस कथन के पक्ष और विपक्ष में काफी तर्क की सम्भावना है। पर, एक साधक को इन मनोदशाओं से होकर गुजरना पड़ता है।

ऐसे साधक यदि उन स्थानों पर, जहाँ उनके गुरु या उस परम्परा के सद्गुरुओं ने साधना की है, या उसका गुरु जिस स्थान पर साधना करने का निर्देश दे, वहाँ साधना करने से उसकी आध्यात्मिक उन्नति सुगम और त्वरित गति से होती है। इसीलिए सम्भवतः दीक्षा देने के बाद भगवान अवधूत दत्तात्रेय ने भगवान परशुराम को गिरिनार जाकर तपस्या करने का आदेश दिया था। यदि दूसरी परम्परा के साधक भी उन स्थानों पर साधना करते हैं, तो उन्हें भी वहाँ व्याप्त आध्यात्मिक तरंगें लाभ पहुँचाती हैं।

इस अंक में बस इतना ही। सम्भव हुआ तो आगे से भगवान दत्तात्रेय के प्रिय शिष्य भगवान परशुराम पर चर्चा की जाएगी।

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मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

भगवान अवधूत दत्तात्रेय

अंक-3

भगवान अवधूत दत्तात्रेय


चार्रशुराम राय

पिछले दो अंकों में भगवान दत्तात्रेय के 17 गुरुओं और उनसे प्राप्त शिक्षाओं का उल्लेख किया जा चुका है। इस अंक में शेष सात गुरुओं और उनकी शिक्षाओं पर चर्चा की जाएगी।

महाराज यदु के पूछने पर भगवान दत्तात्रेय ने अपने अठारहवें गुरु के रूप में एक छोटे पक्षी कुरर का उल्लेख किया है। वे कहते हैं कि हे राजन्, एक बार मैंने देखा कि एक कुरर पक्षी अपनी चोंच में मांस का टुकड़ा एक छोटा लेकर उड़ा जा रहा था। तभी शक्तिशाली पक्षी उस मांस के टुकड़े को छीनने के लिए उसके पीछे पड़े और अपनी चोंचों से उसपर आघात करने लगे। अन्त में अपनी रक्षा करने के लिए कुरर को मांस का टुकड़ा छोड़ना पड़ा। तब कहीं दूसरे पक्षियों ने उसका पीछा छोड़ा और कुरर को शान्ति मिली। मैंने उससे सीखा कि मनुष्य को संग्रह की प्रवृत्ति का परित्याग कर सदा अकिंचन भाव से रहना चाहिए। इससे उसे कभी कोई कष्ट नहीं होता, वह सदा सुखी रहता है।

भगवान तदत्तात्रेय ने अपना उन्नीसवाँ गुरु एक बालक (शिशु) को बताया है। वे कहते है कि एक बच्चा भूख लगने पर रोता है और माँ के दूध पिला देने के बाद वह चुप हो जाता है। संतुष्ट होने के बाद माँ कितना ही क्यों न खिलाने-पिलाने की कोशिश करे, वह मुँह फेर लेता है और मस्त रहता है। उसे मान-अपमान का जरा भी ध्यान नहीं रहता। उन्होंने आगे बताया कि इस संसार में केवल दो ही प्रकार के व्यक्ति निश्चिन्त और परम आनन्द में रहते हैं - एक नन्हा सा बालक और गुणातीत पुरुष। इसलिए मैं भी एक छोटे बालक की तरह अपनी आत्मा में रमता हूँ और सदा मौज में रहता हूँ।

हे राजन्, मेरा बीसवाँ गुरु एक क्वारी कन्या है। एक बार जब मैं भिक्षाटन करते हुए एक गाँव में गया। वहाँ एक घर के सामने भिक्षा के लिए रुका। घर से एक क्वारी कन्या बाहर आई और मुझे प्रतीक्षा करने के लिए कहा। खाना बनाते समय उसके हाथ की चूड़ियाँ आपस में टकराकर बज रही थीं। अतएव उसने एक चूड़ी उतारकर रख दी। फिर भी दूसरी चूड़ियाँ आपस में टकराकर बजती रहीं। इस प्रकार वह दोनों हाथों की एक-एक चूड़ी उतारती रही। जब एक बच गयी तो आवाज भी बन्द हो गयी। इससे मैंने सीखा कि एक से अधिक होने पर लोगों के बीच आपस सहमति, असहमति आदि को लेकर कलह, टकराव होते रहते हैं। शान्ति केवल एकान्त में ही मिलती है।

इसके बाद भगवान दत्तात्रेय ने बताया कि उनका इक्कीसवाँ गुरु बाण बनानेवाला है। उन्होंने कहा कि हे राजन्, एक बार मैं जब एक स्थान से गुजर रहा था, तो देखा कि एक बाण बनानेवाला बाण बनाने में इतना दत्तचित्त था कि राजा की पूरी सवारी निकल गयी और उसे पता तक नहीं चला। उससे मैंने सीखा कि व्यक्ति को वैराग्य और अभ्यास के द्वारा अपने मन को वश में कर उसे एक लक्ष्य में लगा देना चाहिए। इस प्रकार वह सतोगुण की वृद्धि से रजोगुणी और तमोगुणी वृत्तियों का त्याग कर शान्त हो जाता है जैसे ईंधन के अभाव में अग्नि। फिर धीरे-धीरे वह चेतना के सूक्ष्म से सूक्ष्मतर और अन्त में सूक्षतम स्तर पर जाग्रत होने में सफल होता है।

अपने बाइसवें गुरु के रूप में भगवान दत्तात्रेय ने साँप का उल्लेख किया है। साँप अपना घर नहीं बनाता। वह या तो चूहे आदि दूसरे जीवों के द्वारा खाली किए बिलों में रहता है या पेड़ों के कोटरों में निवास करता है और अकेले रहता है, कभी यह झुंड में नहीं रहता। वह एक स्थान पर बहुत दिनों तक नहीं रहता, अपना स्थान बदलता रहता है। अतएव मैंने उससे सीखा कि संन्यासी को सदा अकेले रहना चाहिए और एक स्थान पर कभी भी अड्डा या मठ बनाकर तो कभी भी नहीं। उसे हमेशा विचरण करते रहना चाहिए। वह अपना स्थायी निवास कभी न बनाए।

भगवान दत्तात्रेय ने अपना तेइसवाँ गुरु कड़ी को बताया है। उन्होंने कहा हे राजन्, एक बार मैंने देखा कि एक छोटी मकड़ी जाला बनायी और जब बड़ी मकड़ी ने उसे खाने के लिए उसका पीछा की तो वह जाकर उसमें छिप गयी। तभी बड़ी घनघोर वर्षा होने लगी और वह छोटी मकड़ी अपने जाल में उलझ गयी और बड़ी मकड़ी ने उसे निगल लिया। मैंने उससे यह सीखा कि मनुष्य इस जगत में रहकर अपने लिए मानसिक जगत का निर्माण कर उसी में उलझा रहता है और जन्म-मृत्यु के बन्धन से निकल नहीं पाता।

भागवत महापुराण में इसे इस प्रकार कहा गया है कि मकड़ी जाल बनाती है और फिर बाद में उसे पुनः निगल लेती है जैसे ईश्वर इस सृष्टि को एक ओर से बनाता रहता है और दूसरी ओर से उसे समाप्त करता रहता है, अर्थात् सृजन और विनाश का अनवरत क्रम परिवर्तन के रूप में चलता रहता है।

अपना चौबीसवाँ गुरु भगवान दत्तात्रेय ने भृंगी (बिलनी) को कहा है। वह एक कीड़े को दीवार पर अपनी जगह ले जाकर बन्द देता है और वह कीड़ा भय से उसका चिन्तन करते-करते बिना अपना शरीर छोड़े वैसा ही शरीर धारण कर लेता है। उससे मैंने यह सीखा कि स्नेह से, द्वेष से या फिर भय से जान-बूझकर मन को एकाग्र करके लगा दे, तो वह तद्रूप हो जाता है।

अन्य ग्रंथों में यह बताया गया है कि गानेवाला पक्षी एक प्रकार के कीड़े को अपने घोंसले में ले जाकर वह मधुर स्वर में गाता है और कीड़ा उसके गाने पर इतना मुग्ध हो जाता है कि कब पक्षी उसे खा जाता है कि उसे पता ही नहीं चलता। इसी प्रकार मनुष्य को नाद-ब्रह्म में ऐसा लीन हो जाना चाहिए जिस प्रकार वह मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है और उसे मृत्यु तक का बोध नहीं रहता।

अगले अंक में इसी संदर्भ में कुछ और चर्चा होगी। इस अंक में बस इतना ही।

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मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

भगवान अवधूत दत्तात्रेय : अंक - 2

अंक-2 : भगवान अवधूत दत्तात्रेय

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- आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में भगवान दत्तात्रेय के आठ गुरुओं की चर्चा हुई थी। इस अंक में उनके नौ गुरुओं, और उनकी शिक्षा की चर्चा की जाएगी और शेष सात गुरुओं की अगले अंक में। पिछले अंक में एक भूल हो गयी थी। इस संवाद का उल्लेख भागवत महापुराण में ग्यारहवें स्कंध के सातवें से नौवें अध्याय में हुआ है। पिछले अंक में इसके स्थान पर सातवाँ और आठवाँ बताया गया था।

भगवान दत्तात्रेय ने आगे महाराज यदु को बताया कि उन्होंने अपने नौवें गुरु अजगर से भी बहुत कुछ सीखा। दत्तात्रेय जी कहते हैं कि हे राजन्, संसार में प्राणी अपने पूर्व जन्म के कर्म के अनुसार सुख और दुख भोगता है। इसलिए बुद्धिमान पुरुष को, जिसे सुख और दुख के रहस्य मालूम हैं, चाहिए कि वह इनके लिए इनकी न चाह करे और न ही उन्हें पाने का प्रयत्न करे। वह अजगर की तरह प्रारब्ध के अनुसार जो कुछ मिले, उससे सन्तुष्ट रहे। अजगर एक बार भोजन कर लेने के बाद बहुत दिनों तक शिकार नहीं करता। इससे मैंने सीखा कि जब मेरी आवश्यकता पूरी हो जाय, तो अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अनावश्यक रूप से परेशान नहीं होना चाहिए।

उन्होंने दसवें गुरु के रूप में समुद्र का उल्लेख किया है। वे कहते हैं कि हे राजन्, पूरे जगत की बरसात का जल, नदियों का जल समुद्र में आता है या इतनी भीषण गरमी पड़ती है, किन्तु उसमें न बाढ़ आती है और न ही जल का स्तर कम होता है। वह सदा अपनी सीमा में रहता है। अतएव समुद्र से मैंने सीखा कि उत्तम से उत्तम सुख मिले या कितनी ही विषम परिस्थिति क्यों न हो, अपनी सीमा (अनुशासन) का परित्याग नहीं करना चाहिए।

पतिंगे को भगवान दत्तात्रेय अपना ग्यारहवाँ गुरु मानते हैं। भागवत महापुराण के अनुसार भगवान दत्तात्रेय कहते हैं कि पतिंगा अग्नि की लपटों पर आकर्षित होकर अपना सर्वनाश कर लेता है। अतएव मनुष्य को चाहिए कि उसे संसार की परिवर्तनशील (नाशवान) वस्तुओं से आकर्षित होकर अपना सर्वनाश न करे, बल्कि उसे सदा अपने विवेक का आश्रय लेना चाहिए।

कुछ अन्य स्थानों पर ऐसा मिलता है कि भगवान दत्तात्रेय ने पतिंगों से सीखा कि जैसे वह प्रकाश को देखकर निर्भयता पूर्वक अपने प्राणों की आहुति दे देता है, वैसे ही निर्भय होकर ज्ञान की अग्नि में अपने कर्म-बन्धनों को जलाकर स्वयं को परिवर्तित करना चाहिए और अपने स्वरूप को उपलब्ध होना चाहिए।

भागवत महापुराण में भगवान दत्तात्रेय के बारहवें गुरु के रूप में भौंरे या मधुमक्खी का उल्लेख है, जबकि अन्य स्थानों पर इन्हें अलग-अलग बताया गया है। जहाँ इन्हें अलग-अलग बताया गया है, वहाँ शहद निकालनेवाले का उल्लेख नहीं है। भौरे के विषय में वे कहते हैं कि भौंरा बड़े-छोटे सभी पुष्पों से केवल अपनी आवश्यकता के अनुसार रस लेता है, संग्रह नहीं करता। उसे लेने के पहले वह फूलों के आस-पास गाता है, नाचता है और एक उल्लास का वातावरण बनाता है। इसके साथ ही जितना उनसे लेता उससे अधिक उन्हें देता है, उनमें परागण की क्रिया कराकर उन्हें समृद्धि प्रदान करता है। इसी प्रकार हम प्रकृति से जो कुछ लेते हैं, उसका हमें संवर्धन करते रहना चाहिए।

मधुमक्खियाँ विभिन्न फूलों से आवश्यकता से अधिक रस लेती हैं और उसे मधु के रूप में संग्रह करती हैं तथा अपनी आवश्यकता पूरीकर शेष दूसरों के लिए छोड़ देती हैं। इसी प्रकार हमें विभिन्न शास्त्रों का ज्ञान प्राप्तकर उसे आत्मसात करना चाहिए और दूसरों को उसे उदारता पूर्वक प्रदान करना चाहिए। भागवत महापुराण में कहा गया है कि मधुमक्खियों की भाँति संग्रह करने की प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए, अन्यथा हम अपनी संग्रह की गयी वस्तुओं के साथ अपना जीवन गवाँ बैठते हैं। इसलिए एक संन्यासी के पास यदि भिक्षा का कोई पात्र हो, तो प्राप्त करने के लिए केवल हाथ और संग्रह करने के लिए केवल पेट।

अपने तेरहवें गुरु के विषय में बताते हुए भगवान दत्तात्रेय कहते हैं कि हे राजन एक बार मैने एक हाथी को बड़े विचित्र ढंग से फँसा देखा। फँसाने वालों ने एक गड्ढा खोदकर उसे वृक्ष की टहनियों से ढक दिया था और दूसरी ओर एक पालतू हथिनी को बाँध रखा था। हथिनी को देखकर हाथी उसकी ओर लपका और उस गड्ढे में फँस गया। वह हाथी ही मेरा तेरहवाँ गुरु है। उसने मुझे सिखाया कि अपनी भावनाओं और इच्छाओं से सजग रहना चाहिए, अन्यथा इनके कारण ये सांसारिक आकर्षण इन्द्रियों को बेकाबू कर देते हैं और बलवान होने के बावजूद मन उनके जाल में फँसकर निर्बल हो जाता है।

मधुहारी (मधु (शहद) निकालनेवाले) के विषय में भगवान दत्तात्रेय कहते हैं कि जिस प्रकार एक लोभी व्यक्ति बहुत परिश्रम करके धन संचय करता है, सुपात्र को उसका न तो दान करता और न ही स्वयं उसका उपभोग करता है। उस धन की वही दशा होती है जो मधुमक्खियों द्वारा संचित शहद की होती है, अर्थात् मधुमक्खियों के उपभोग से पहले ही मधुहारी उसे उनसे छीन लेता है। इसी प्रकार संचित और अनुपभुक्त धन का उपभोग कोई दूसरा कर लेता है। इस प्रकार मैंने अपने चौदहवें गुरु मधुहारी से यह सीखा कि लोभी की तरह धन इकट्ठाकर मधुहारी जैसे व्यक्ति को उसका उपभोग करने का अवसर नहीं देना चाहिए।

भगवान दत्तात्रेय कहते हैं कि हे राजन्, मेरा पन्द्रहवाँ गुरु हरिन है। वह अन्य विभिन्न ध्वनियों को सुनकर सजग हो जाता है। लेकिन शिकारी की वंशी की ध्वनि से सम्मोहित होकर उसके जाल में फँस जाता है। कहा जाता है कि हरिणी के गर्भ से उत्पन्न ऋष्यशृंग मुनि स्त्रियों का विषय-सम्बन्धी गीत, वाद्य एवं नृत्य आदि देख-सुनकर उनके हाथ की कठपुतली बनकर रह गए थे। अतएव मैंने हरिन से सीखा कि हम उन शब्दों के प्रति, जो हमारी इच्छाओं, आसक्ति और वासना को उद्दीप्त करते हैं, सजग रहें ताकि हमारा जीवन बन्धन से मुक्त रह सके।

अपने सोलहवें गुरु के रूप में भगवान दत्तात्रेय ने मछली का उल्लेख किया है। उन्होंने महाराज यदु से कहा कि हे राजन्, मछली काँटे में लगे हुए माँस के टुकड़े के लोभ में अपने प्राणों से हाथ धो बैठती है। मनुष्य भले ही अपने सभी इन्द्रियों पर काबू पा ले, लेकिन जबतक वह अपनी रसनेन्द्रिय पर अधिकार नहीं कर लेता, मछली की भाँति वह अपने जीवन को नष्ट कर देता है। जब इस स्वादेन्द्रिय पर वह अधिकार कर लेता है, तो वह माया के काँटे में नहीं फँसता, यह सीख मैंने मछली से ली।

भगवान दत्तात्रेय ने अपने सत्रहवें गुरु के रूप में पिंगला नामक एक वेश्या का उल्लेख किया है। उन्होंने कहा, हे राजन्, महाराज विदेह की नगरी मिथिला में कभी पिंगला नाम की एक बहुत ही सुन्दर वेश्या रहती थी। न तो वह अपने ग्राहकों को दिल से प्यार करती थी और न ही ग्राहक उसे। वह ग्राहकों के धन पर आकर्षित थी और ग्राहक उसके रूप पर। उसे धन चाहिए था और ग्राहकों को अपनी वासना की पूर्ति। उसे यह लगता था कि कोई धनाढ्य पुरुष आएगा और जो उसे बहुत सा धन देगा। पर वैसा हुआ नहीं। ऐसे धनी व्यक्ति की प्रतीक्षा में उसकी नींद जाती रही, उसका मुँह सूख गया, चित्त व्याकुल हो गया। अन्त में वह निराश हो गयी। इस परिस्थिति ने उसके अन्दर वैराग्य को जन्म दिया। उसने धनिकों की प्रतीक्षा और उनसे मिलने की इच्छा का सर्वथा परित्याग कर अपनी शय्या पर लेट गयी। इसके बाद उसे बड़ी शान्ति और सुख की नींद मिली। अतएव मैंने उस वेश्या से सीखा कि इस दुनिया में जितना भी मिलता है, वह हमेशा कम पड़ता है, कभी सन्तुष्टि नहीं होती। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह सांसारिक वस्तुओं से आत्म-संतुष्टि की आशा छोड़कर केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए आत्म-सम्मान के साथ आत्म-चिन्तन करे और अपने को जाने।

अगले अंक में भगवान दत्तात्रेय के शेष गुरुओं पर चर्चा की जायगी।

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

भगवान अवधूत दत्तात्रेय

भगवान अवधूत दत्तात्रेय

- आचार्य परशुराम राय

श्री जितेन्द्र त्रिवेदी जी इन दिनों कुछ आवश्यकता से अधिक व्यस्त हो गए हैं। इसलिए वे अपनी पोस्ट नहीं भेज पाए हैं। मेरे मन में भी इस विषय पर पिछले एक वर्ष से कुछ विचार उमड़-घुमड़ रहे थे। सोचा, ऐतिहासिक पर्व चल ही रहा है, तो क्यों न ब्रेक में पुराणेतिहास के कुछ पहलुओं पर चर्चा कर ली जाए। अतएव श्री त्रिवेदी जी के ब्रेक का लाभ उठा लिया।

भगवान दत्तात्रेय कई वैदिक मंत्रों के द्रष्टा महर्षि अत्रि और माता अनसूया के पुत्र हैं। इनका नाम दत्त है। आत्रेय (अत्रि की सन्तान) इनके पिता के नाम से बना विशेषण है, जो इनके नाम के साथ लगा है। महर्षि अत्रि की तीन सन्तानें हैं- भगवान दत्तात्रेय, महर्षि दुर्वासा और चन्द्रमा। यहाँ इनके लिए वर्तमान काल का प्रयोग किया गया है, क्योंकि मान्यता है कि भगवान दत्तात्रेय और दुर्वासा अमर हैं और साधक आज भी उनके भौतिक अस्तित्व का साक्षात् करते हैं।

भगवान दत्तात्रेय एक योगी तथा तन्त्र के वामाचार और दक्षिणमार्ग के गुरु के रूप में प्रसिद्ध हैं। इन्हें अवधूत भी कहा जाता है। शायद ये पहले (आदि) अवधूत हैं। अवधूत को परिभाषित करते हुए कहा गया है- अक्षरत्वात् वरेण्यत्वात् धूतसंसारबन्धनात् तत्त्वमस्यर्थसिद्धत्वादवधूतोSभिधीयते सुना जाता है कि क्षत्रिय समुदाय का इक्कीस बार संहार करने के बाद भगवान परशुराम अत्यन्त उद्विग्न और निराश होकर शान्ति की खोज में अपने गुरु कश्यप ऋषि के पास गए और अपनी समस्या का निदान पूछा। कश्यप ऋषि का इस सृष्टि के विकास में महान योगदान माना जाता है। कहा जाता है कि इस सृष्टि में जितने भी प्राणी हैं, वे इन्हीं की सन्तानें हैं। इन्हें महाराज, महर्षि, प्रजापति आदि कहा जाता है। कश्यप ऋषि ने भगवान परशुराम को भगवान दत्तात्रेय जी की शरण में जाने के लिए कहा।

पुराणों के अनुसार भगवान दत्तात्रेय ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों के सम्मिलित अवतार हैं। इनके उपदेश या शिक्षाएँ विभिन्न पुराणों, दत्त संहिता, अवधूत गीता, दत्तात्रेय उपनिषद् और अवधूत उपनिषद् में संग्रहीत हैं। कहा जाता है कि इनके 24 गुरु थे। भागवत महापुराण में अवधूतोपाख्यान के रूप में अपने अन्तिम दिनों में भगवान कृष्ण ने उद्धव से दत्तात्रेय और महाराजा यदु के इस संवाद का उल्लेख किया है। इसका विवरण एकादश स्कन्ध के सातवें और आठवें अध्याय मिलता है।

भगवान कृष्ण कहते हैं कि उनके पूर्वज धर्म के मर्मज्ञ महाराज यदु, जिनकी बुद्धि अत्यंत शुद्ध थी, ने त्रिकालदर्शी और परम तेजस्वी तरुण अवधूत दत्तात्रेय से उनका सत्कार कर नम्रतापूर्वक पूछा कि “हे ब्रह्मन्, न आप कोई काम करते हैं, न आपको यश, आयु, सम्पति आदि की जिज्ञासा है, फिर भी आपके पास इतनी निपुण बुद्धि कैसे प्राप्त हुई? आपने किससे शिक्षा ग्रहण की? अपने माता-पिता से?

भगवान दत्तात्रेय ने महाराज यदु से कहा कि “हे राजन्, सबसे कुछ न कुछ सीखा है, केवल माता-पिता से ही नहीं। इसके लिए मैंने कई गुरुओं से शिक्षा ग्रहण की। मेरे गुरु हैं- पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंग, मधुमक्खी, हाथी, शहद निकालने वाला, हरिण, मछली, पिंगला वेश्या, कुरर पक्षी, बालक, क्वारी कन्या, बाण बनानेवाला, सर्प, मकड़ी और भृंगी कीट।

इसके बाद उन्होंने महाराज यदु से इनसे ली गयी शिक्षाओं का उल्लेख निम्नलिखित प्रकार किया -

माँ पृथ्वी मेरी पहली गुरु हैं। उन्होंने मुझे बताया कि मुझे लोग रौंदते हैं, अपने-अपने प्रारब्ध के अनुसार तरह-तरह के उत्पात करते हैं। फिर भी मैं रोती-चीखती नहीं, उनसे बदला नहीं लेती। बल्कि उन्हें वह सबकुछ देती हूँ, जो उनके लिए आवश्यक है। धीर साधु पुरुष को चाहिए कि वह लोगों की मजबूरी को समझे, न क्रोध करे और न ही अपना धैर्य छोड़े। वृक्षों और पर्वतों की सभी चेष्टाएँ दूसरों के हित में लगी रहती हैं। हमें चाहिए कि उनकी शिष्यता स्वीकार कर उनसे परोपकार की शिक्षा लें।

मेरे दूसरे गुरु पवन हैं। वह अनवरत चलता रहते हैं। वह फूल, काँटा, पवित्र, अपवित्र सबको समान रूप से स्पर्श करते हैं। सबको ताजगी प्रदान करते हैं, बिना किसी से आसक्त हुए। उनसे मैंने बिना किसी से आसक्त हुए या घृणा किए, बिना ईर्ष्या के, बिना भेदभाव के सबको ताजगी प्रदान करना सीखा। शरीर के अन्दर रहने वाली प्राण वायु के रूप में उन्होंने सिखाया कि आवश्यकता के अनुसार ही वस्तुओं का ग्रहण करें, इन्द्रियों की अनावश्यक चाह की पूर्ति में अपना श्रम व्यर्थ न करे।

मेरे तीसरे गुरु आकाश हैं। इस जगत में आग लगती है, बरसात होती है, सूर्य, चन्द्र अनेक खगोलीय पिंड भ्रमण करते हैं। वे बिना किसी भेदभाव, बिना किसी से आसक्त हुए दृश्य, अदृश्य सबको समान रूप से उचित स्थान देते हैं। लेकिन उनमें से कोई भी उनकी चेतना को प्रभावित नहीं करता। वह सभी घटनाओं के असम्पृक्त भाव से द्रष्टा हैं।

मेरा चौथा गुरु जल है। यह जगत में जीवन के नाम से जाना जाता है। जो भी इसके सम्पर्क में आता है, उसे स्वच्छ करता है, जीवन प्रदान करता है। यह हमेशा प्रवाहमान रहता है। यदि ठहर जाय, तो विकृत हो जाता है। इसलिए सदा प्रवाहमान रहते हुए अर्थात् विचरण करते रहना चाहिए और लोगों का भला करते रहना चाहिए।

उन्होंने अपने पाँचवें गुरु अग्नि के विषय में बताया कि यह सबको जलाकर प्रकाश और उष्णता में बदल देती है, उसके तेज को कोई दबा नहीं सकता। उसके पास संग्रह करने के लिए कोई पात्र नहीं है। अतएव मैंने इनसे सीखा कि जीवन में जो कुछ मिलता है, उसे बिना संग्रह किए और विभिन्न परिस्थितियों से अप्रभावित रहते हुए प्रकाश में परिवर्तित कर देना चाहिए ताकि उस प्रकाश में लोग सुरक्षित होकर चल सकें।

अपने छठवें गुरु चन्द्रमा के विषय में भगवान दत्तात्रेय बताते हैं कि वह बढ़ता, घटता रहता है, पर अपने अस्तित्व और आकृति को कभी नहीं खोता। अतएव चाहे दुख हो, सुख हो, उत्थान या पतन हो, हानि या लाभ हो अथवा शरीर की विभिन्न अवस्थाएँ- शैशव, बाल, यौवन, वार्धक्य हों, उससे बिना प्रभावित हुए मैं सदा अपने अस्तित्व के प्रति सजग रहता हूँ।

सातवें गुरु सूर्य के विषय में उन्होंने बताया कि वह अपनी तप्त किरणों से जल सोखकर बादल में परिवर्तित करता है, जो बिना किसी भेदभाव के जंगल, पहाड़, रेगिस्तान, गाँव, शहर, हर जगह वितरित करता है। इससे मैंने सीखा कि विभिन्न स्रोतों से ज्ञान प्राप्त करके उसे व्यावहारिक ज्ञान में परिवर्तित कर बिना भेदभाव के सबमें समान रूप से वितरित करना चाहिए।

मेरा आठवाँ गुरु कबूतर है। बहेलिए द्वारा अपने दल या परिवार के पकड़े जाने पर कबूतर उन्हें बन्धन से छुड़ाने के चक्कर में स्वयं जाल में फँस जाते हैं। इनसे मैंने सीखा कि भले ही सकारात्मक प्रतिक्रिया क्यों न हो, मोह और भावावेश में पड़कर अपना सर्वनाश नहीं करना चाहिए। ऐसे पुरुष को ज्ञानीलोग आरूढच्युत (मूर्ख) कहते हैं। मानव शरीर मुक्ति का खुला हुआ द्वार है। वह अपने परास्वरूप को प्राप्त कर सकता है। केवल गृहस्थी ही उसकी सीमा नहीं है।

अगले अंक में अवधूत दत्तात्रेय जी के शेष गुरुओं के विषय में और अपने निजी जीवन, सामाजिक जीवन या आधुनिक प्रबंधन में नीति के रूप में इनकी प्रासंगिकता पर चर्चा करना अच्छा रहेगा, क्योंकि यह पोस्ट काफी लम्बी हो चली है। आभार।

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