असहयोग आन्दोलन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
असहयोग आन्दोलन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 19 फ़रवरी 2025

288. नाम-गांधी, जाति-किसान, धंधा-बुनाई

राष्ट्रीय आन्दोलन

288. नाम-गांधी, जाति-किसान, धंधा-बुनाई



1922

मार्च 1922 की बात है। बारडोली का सत्याग्रह स्थगित किया जा चुका था। गांधीजी को गिरफ़्तार करने की ज़रूरत नहीं थी। लेकिन आन्दोलन रोक देने के कारण गांधीजी के प्रति जनता और राष्ट्र के नेता क्षुब्ध हैं, यह देखकर उस प्रभावशाली नेता को जेल भेजने का निश्चय सरकार ने किया।

अहमदाबाद की अदालत में मुकदमा चला। गांधीजी ने अपराध स्वीकार करते हुए कहा, इस शासन के विरुद्ध असन्तोष पैदा करना मेरा धर्म है।

इसके पहले लोकमान्य तिलक को छह वर्ष की सज़ा दी गयी थी। उसी उदाहरण को सामने रखकर न्यायाधीशों ने गांधीजी को भी छह वर्ष की सज़ा सुनाई। अब छह साल तक बाहर रहकर बापू देश को नेतृत्व देने वाले नहीं थे। महादेवभाई रोने लगे। तात्या साहब केलकर उन्हें धीरज बंधा रहे थे। दृश्य बड़ा ही हृदय विदारक था।

उधर बंगाल के एक गांव में एक मकान में एक संतरी रो रहा था। क्यों? वह भला क्यों रो रहा था?

उस मकान में क्रांतिकारी उल्लासकर दत्त रहते थे। अभी-अभी वे जेल से छूटे थे। अपने मकान के पहरेदार को रोते देख वे उसके पास गए। उसके हाथ में एक अख़बार था। क्रांतिकारी दत्त ने उससे पूछा, क्यों रोते हो?

पहरेदार ने कहा, मेरी जाति के एक आदमी को छह वर्ष की सज़ा हुई है। वह बूढ़ा है। 54-55 वर्ष की उसकी उमर है। देखो, इस अख़बार में छपा है।

अख़बार में गांधीजी के उस ऐतिहासिक मुकदमे की तफ़सील थी। गांधीजी ने मुकदमे के दौरान अपनी जाति किसान बतायी थी और धन्धा कपड़े की बुनाई लिखाया था। वह पहरेदार मुसलमान था। वह बुनकर जाति का था। यह ख़बर पढ़कर उसकी आंखें भर आई थी।

क्रांतिकारी दत्त की समझ में सारी बातें आ गई। वह अपने संस्मरण में लिखते हैं, हम कैसे क्रांतिकारी हैं? सच्चे क्रांतिकारी तो गांधीजी हैं। सारे राष्ट्र के साथ वे एकरूप हुए थे। मैं किसान हूं, मैं बुनकर हूं, --- यह उनका शब्द राष्ट्र भर में पहुंच गया होगा। करोड़ों लोगों को यही लगा होगा कि हममें से ही कोई जेल गया। जनता से जो एकरूप हुआ, जनता से जिसने संपर्क जोड़ा, वही विदेशियों के बन्धन से देश को मुक्त कर सकता है। उस सच्चे महान क्रांतिकारी को प्रणाम!

***     ***  ***

मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

287. गया कांग्रेस अधिवेशन

राष्ट्रीय आन्दोलन

287. गया कांग्रेस अधिवेशन



1922

दिसंबर, 1922 में कांग्रेस का अड़तीसवाँ अधिवेशन गया में हुआ। देशबंधु चितरंजन दास उसके अध्यक्ष चुने गए। इस अधिवेशन में चितरंजन दास ने मज़दूरों और किसानों को कांग्रेस के प्रभाव में लाने की आवश्यकता पर बल दिया। इस अधिवेशन में सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने औपनिवेशिक सत्ता का विरोध करने के लिए एक नई रणनीति की वकालत की। यह प्रस्ताव पेश किया गया कि 1920 के मांटेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड सुधार के अन्तर्गत केन्द्रीय विधान सभा के चुनाव लड़ने चाहिए। अध्यक्ष पद से भाषण देते हुए उन्होंने कहा कि या तो काउंसिलों का इस तरह सुधार किया जाना चाहिए कि उनके द्वारा भारत को स्वतंत्र किया जा सके, या उन्हें समाप्त कर देना चाहिए। काउंसिल में प्रवेश को वह असहयोग आंदोलन की भावना के विपरीत नहीं मानते थे। उनका कहना था कि हम काउंसिल में जाकर अंदर से बहिष्कार और असहयोग करेंगे। प्रस्ताव के समर्थन में अध्यक्ष देशबंधु सीआर. दास, मोतीलाल नेहरू, विट्ठल भाई पटेल, श्रीनिवास आयंगर, केलकर और हक़ीम अजमल ख़ान आदि थे।

उन दिनों असहयोग आन्दोलन के तहत सरकार के सम्पूर्ण बहिष्कार का कार्यक्रम चल रहा था। चुनाव लड़ना सरकार की व्यवस्था में सहयोग देने के बराबर था। राजेन्द्र प्रसाद, वल्लभभाई पटेल, अंसारी, राजगोपालाचारी, कस्तूरी रंगा आयंगार और जमुनालाल बजाज ने प्रस्ताव का विरोध किया था। उनका कहना था कि काउंसिल में प्रवेश रणनीति का परिवर्तित रूप नहीं अहिंसात्मक असहयोग की मूल भावना और सिद्धांतों पर प्रहार ही है। हमारा तो शुद्ध, पवित्र और निष्कलंक आंदोलन है। इसमें कूटनीति के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। इस छल-कपट को कोई भी सत्याग्रही समर्थन नहीं कर सकता।

कांग्रेस के नेता दो दलों में बंट गए थे। जो असहयोग के कार्यक्रम में परिवर्तन चाहते थे, ‘परिवर्तनवादी’ कहलाए। जबकि सरदार वल्लभभाई पटेल, राजेन्द्र बाबू, राजाजी आदि ‘अपरिवर्तनवादी’ थे। काउंसिल-प्रवेश के प्रश्न को लेकर काफ़ी बहस  हुई। प्रस्ताव पर मतदान करना पड़ा। 890 के मुकाबले 1,748 मतों से कांग्रेस ने चुनाव के विरोध में अपना स्पष्ट मत ज़ाहिर कर दिया। प्रस्ताव नामंजूर हो गया।

सी.आर. दास ने गया कांग्रेस के तत्काल बाद कांग्रेस की अध्यक्षता से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने मोतीलाल नेहरू के साथ मिलकर मार्च 1923 में अपनी अलग ‘कांग्रेस स्वराज पार्टी’ बनाई, जो बाद में ‘स्वराज पार्टी’ के नाम से जाना गया। वे स्वयं इसके अध्यक्ष बने और मोतीलाल नेहरू को मंत्री नियुक्त किया। सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू दोनों सफल वकील थे। दोनों नरम पंथी थे। दोनों ने गांधीजी के असहयोग आंदोलन के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया था और वकालत छोड़ दी थी। दोनों ने अपने (कलकता और इलाहाबाद) के आलीशान मकान को देश को समर्पित कर दिया था। दोनों ही गांधीजी के प्रशंसक थे। लेकिन उन दिनों की राजनीति में दोनों ही गांधीजी के बराबरी के दर्ज़े के थे। दोनों सांसद भी थे। दास भावुक और धार्मिक आस्था में विश्वास रखते थे, जबकि नेहरू अनीश्वरवादी और शांत व्यक्ति थे। दोनों ही भाषण देने में माहिर थे। संगठन की दोनों में अद्भुत क्षमता थी।

कांग्रेस के अपरिवर्तनकारी बहिष्कार और असहयोग आंदोलन को ज़ारी रखना चाहते थे, इसलिए वे काउंसिल में प्रवेश का विरोध कर रहे थे। लेकिन दोनों खेमा यह मानता था कि सविनय अवज्ञा तुरंत शुरू नहीं किया जा सकता। दोनों यह भी मानते थे कि कोई जनआंदोलन अनिश्चित काल तक नहीं चलाया जा सकता। दोनों यह मानते थे कि संगठन को और मज़बूत बनाने तथा लोगों को प्रशिक्षित करने के लिए और वक़्त चाहिए। लेकिन मतभेद की वजह थी कि आंदोलन की निष्क्रियता के समय राजनीतिक गतिविधियों को कैसे ज़ारी रखा जाए? स्वराजी राजनीतिक निष्क्रियता को ख़त्म करने के लिए कौंसिल में प्रवेश को ज़रूरी मानते थे। इससे लोगों का मनोबल बढ़ेगा और राजनीतिक आंदोलन को बल मिलेगा। यदि कांग्रेस चुनावों में भाग नहीं लेती है, तो चुनाव के दौरान जो लोग चुनाव में भाग लेंगे उनके बीच कांग्रेस का प्रभाव कम हो जाएगा और महत्त्वपूर्ण पदों पर ग़ैर-कांग्रेसी क़ाबिज़ हो जाएंगे। विधानमंडल में भाग लेकर वे इसे  राजनीतिक संघर्ष का एक मंच तैयार कर सकते हैं और औपनिवेशिक सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए इसका एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं।  अपरिवर्तनकारियों का मानना था कि संसदीय कार्यों में संलग्न हो जाने के बाद रचनात्मक कार्यों की उपेक्षा होगी। संघर्षशील शक्तियों का मनोबल गिरेगा और राजनीतिक भ्रष्टाचार पनपेगा। जो विधान परिषदों में जाएंगे वे संघर्ष की राजनीति छोड़ देंगे। वे समय के साथ साम्राज्यवादी हुक़ूमत का साथ देने लगेंगे।

जिस तरह की परिस्थितियां बन रही थीं, उससे यह ख़तरा मंडराने लगा कि कहीं कांग्रेस में विभाजन न हो जाए। इसलिए दोनों खेमाओं पर यह दबाव डाला गया कि वे एक दूसरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलना बंद करें और समझौता करें। दोनों ने समझौतावादी रुख़ अपनाया। स्वराज पार्टी ने कांग्रेस के कार्यक्रमों को अपना कार्यक्रम बनाया। नए संवैधानिक सुधारों के तहत नवंबर 1923 में काउंसिलों के चुनाव होने थे। इस पार्टी ने चुनावों में भाग लेने का निर्णय लिया। दिल्ली के विशेष कांग्रेस अधिवेशन में एक समझौता हुआ जिसके तहत जो लोग विधान-सभा के चुनाव लड़ना चाहें उन्हें उसकी इज़ाज़त दी गई, बशर्ते वे अपने बनाए हुए स्वराज्य पार्टी कि ओर से लड़ें, न कि कांग्रेस की ओर से। और चुनावों में कांग्रेस का रुपया काम में न लाया जाए। कांग्रेसियों ने स्वराज्य पार्टी के तहत चुनाव लड़े। गांधीजी जब 1924 में जेल से छूटकर बाहर आए तो स्वराज पार्टी और कांग्रेस के मतभेद को दूर किया। दोनों पार्टी एक हो गई।

***     ***  ***

मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2025

286. जन नेता गांधी

राष्ट्रीय आन्दोलन

286. जन नेता गांधी



1922 तक गाँधी जी ने भारतीय राष्ट्रवाद को एकदम परिवर्तित कर दिया और इस प्रकार फ़रवरी 1916 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अपने भाषण में किए गए वायदे को उन्होंने पूरा किया। अब यह व्यावसायिकों व बुद्धिजीवियों का ही आंदोलन नहीं रह गया था, अब हजारों की संख्या में किसानों, श्रमिकों और कारीगरों ने भी इसमें भाग लेना शुरू कर दिया। इनमें से कई गाँधी जी के प्रति आदर व्यक्त करते हुए उन्हें अपना महात्माकहने लगे। उन्होंने इस बात की प्रशंसा की कि गाँधीजी उनकी ही तरह के वस्त्र पहनते थे, उनकी ही तरह रहते थे और उनकी ही भाषा में बोलते थे। अन्य नेताओं की तरह वे सामान्य जनसमूह से अलग नहीं खड़े होते थे बल्कि वे उनसे समानुभूति रखते तथा उनसे घनिष्ठ संबंध भी स्थापित कर लेते थे। सामान्य जन के साथ इस तरह की पहचान उनके वस्त्रों में विशेष रूप से परिलक्षित होती थी। जहाँ अन्य राष्ट्रवादी नेता पश्चिमी शैली के सूट अथवा भारतीय बंद गला जैसे औपचारिक वस्त्र पहनते थे वहीं गाँधी जी लोगों के बीच एक साधारण धोती में जाते थे। इस बीच, प्रत्येक दिन का कुछ हिस्सा वे चरखा चलाने में बिताते थे। अन्य राष्ट्रवादियों को भी उन्होंने ऐसा करने के लिए  प्रोत्साहित किया। सूत कताई के कार्य ने गाँधी जी को पारंपरिक जाति व्यवस्था में प्रचलित मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम की दीवार को तोड़ने में मदद दी।

इतिहासकार शाहिद अमीन ने एक मंत्रमुग्ध कर देने वाले अध्ययन में स्थानीय प्रेस द्वारा ज्ञात रिपोर्टरों और अफ़वाहों के जरिए पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसानों के मन में महात्मा गाँधी की जो कल्पना थी, उसे ढूँढ़ निकालने की कोशिश की है। फ़रवरी 1921 में जब वे इस क्षेत्र से गुजर रहे थे तो हर जगह भीड़ ने उनका बड़े प्यार से स्वागत किया। उनके भाषणों के दौरान वैसा माहौल होता था इस पर गोरखपुर के एक हिंदी समाचारपत्र ने यह रिपोर्ट लिखी है: भटनी में गाँधी जी ने स्थानीय जनता को संबोधित किया और इसके बाद ट्रेन गोरखपुर के लिए रवाना हो गई। नूनखार, देवरिया, गौरी बाजार, चौरी-चौरा और कुसुमही ;स्टेशनों पर 15 से 20 हजार से कम लोग नहीं थेमहात्मा जी कुसुमीही के दृश्य को देखकर बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि जंगल के बीच स्थित होने के बावजूद उस स्टेशन पर 10,000 से कम लोग नहीं थे। प्रेम में अभिभूत होकर कुछ लोग रोते हुए देखे गए।

देवरिया में लोग गाँधी जी को भेनी ;दान देना चाहते थे किंतु इसे उन्होंने उनसे गोरखपुर में देने को कहा। लेकिन चौरी-चौरा में एक मारवाड़ी सज्जन ने किसी तरह उन्हें कुछ दे दिया। इसके बाद यह क्रम रुका ही नहीं। एक चादर फ़ैला दी गई जिस पर रुपयों और सिक्कों की बारिश होने लगी। यह दृश्य थागोरखपुर स्टेशन के बाहर महात्मा एक ऊँची गाड़ी पर खड़े हो गए और लोगों ने कुछ मिनटों के लिए उनके दर्शन कर लिए। गाँधीजी जहाँ भी गए वहीं उनकी चमत्कारिक शक्तियों की अफ़वाहें फ़ैल गई। कुछ स्थानों पर यह कहा गया कि उन्हें राजा द्वारा किसानों के दुख तकलीफ़ों में सुधार के लिए भेजा गया है तथा उनके पास सभी स्थानीय अधिकारियों के निर्देशों को अस्वीकृत करने की शक्ति है। कुछ अन्य स्थानों पर यह दावा किया गया कि गाँधीजी की शक्ति अंग्रेज बादशाह से उत्कृष्ट है और यह कि उनके आने से औपनिवेशिक शासक भाग जाएंगे। गाँधीजी का विरोध करने वालों के लिए भयंकर परिणाम की बात बताती कहानियाँ भी थीं। इस तरह की अफ़वाहें फैलीं कि गाँधीजी की आलोचना करने वाले गाँव के लोगों के घर रहस्यात्मक रूप से गिर गए अथवा उनकी फ़सल चौपट हो गई।

गाँधी बाबा’, ‘गाँधी महाराजअथवा सामान्य महात्माजैसे अलग-अलग नामों से ज्ञात गाँधीजी भारतीय किसान के लिए एक उद्धारक के समान थे जो उनकी ऊँची करों और दमनात्मक अधिकारियों से सुरक्षा करने वाले और उनके जीवन में मान-मर्यादा और स्वायत्तता वापस लाने वाले थे। गरीबों विशेषकर किसानों के बीच गाँधीजी की अपील को उनकी सात्विक जीवन शैली और उनके द्वारा धोती तथा चरखा जैसे प्रतीकों के विवेकपूर्ण प्रयोग से बहुत बल मिला। जाति से महात्मा गाँधी एक व्यापारी व पेशे से वकील थे, लेकिन उनकी सादी जीवन-शैली तथा हाथों से काम करने के प्रति उनके लगाव की वजह से वे गरीब श्रमिकों के प्रति बहुत अधिक समानुभूति रखते थे तथा बदले में वे लोग गाँधीजी से समानुभूति रखते थे। जहाँ अधिकांश अन्य राजनीतिक उन्हें कृपा की दृष्टि से देखते थे वहीं ये न केवल उनके जैसा दिखने बल्कि उन्हें अच्छी तरह समझने और उनके जीवन के साथ स्वयं को जोड़ने के लिए सामने आते थे।

महात्मा गाँधी का जन अनुरोध निस्संदेह कपट से मुक्त था और भारतीय राजनीति के संदर्भ में तो बिना किसी पूर्वोदाहरण के यह भी कहा जा सकता है कि राष्ट्रवाद के आधार को और व्यापक बनाने में उनकी सफ़लता का राज उनके द्वारा सावधानीपूर्वक किया गया संगठन था। भारत के विभिन्न भागों में कांग्रेस की नई शाखाएँ खोली गयी। रजवाड़ों में राष्ट्रवादी सिद्धान्त को बढ़ावा देने के लिए प्रजा मंडलोंकी एक श्रृंखला स्थापित की गई। गाँधीजी ने राष्ट्रवादी संदेश का संचार शासकों की अंग्रेजी भाषा की जगह मातृ भाषा में करने को प्रोत्साहित किया। इस प्रकार कांग्रेस की प्रांतीय समितियाँ ब्रिटिश भारत की कृत्रिम सीमाओं की अपेक्षा भाषाई क्षेत्रों पर आधारित थीं। इन अलग-अलग तरीकों से राष्ट्रवाद देश के सुदूर हिस्सों तक फ़ैल गया और अब इसमें वे सामाजिक वर्ग भी शामिल हो गए जो अभी तक इससे अछूत थे।

अब तक कांग्रेस के समर्थकों में कुछ बहुत ही समृद्ध व्यापारी और उद्योगपति शामिल हो गए थे। भारतीय उद्यमियों ने यह बात जल्दी ही समझ ली कि उनके अंग्रेज प्रतिद्वंद्वी आज जो लाभ पा रहे हैं, स्वतंत्र भारत में ये चीजें समाप्त हो जाएंगी। जी- डी- बिड़ला जैसे कुछ उद्यमियों ने राष्ट्रीय आंदोलन का खुला समर्थन किया जबकि अन्य ने ऐसा मौन रूप से किया। इस प्रकार गाँधीजी के प्रशंसकों में गरीब किसान और धनी उद्योगपति दोनों ही थे हालांकि किसानों द्वारा गाँधीजी का अनुकरण करने के कारण उद्योगपतियों के कारणों से कुछ भिन्न और संभवत: परस्पर विरोधी थे। हालाँकि महात्मा गाँधी की स्वयं बहुत महत्वपूर्ण भूमिका थी लेकिन गांधीवादी राष्ट्रवादका विकास बहुत हद तक उनके अनुयायियों पर निर्भर करता था।

1917 और 1922 के बीच भारतीयों के एक बहुत ही प्रतिभाशाली वर्ग ने स्वयं को गाँधीजी से जोड़ लिया। इनमें महादेव देसाई, वल्लभ भाई पटेल, जे- बी- कॄपलानी, सुभाष चंद्र बोस, अबुल कलाम आजाद, जवाहरलाल नेहरू, सरोजिनी नायडू, गोविंद वल्लभ पंत और सी- राजगोपालाचारी शामिल थे। गाँधी जी के ये घनिष्ठ सहयोगी विशेषरूप से भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के साथ ही भिन्न-भिन्न धार्मिक परंपराओं से आए थे। इसके बाद उन्होंने अनगिनत अन्य भारतीयों को कांग्रेस में शामिल होने और इसके लिए काम करने के लिए प्रेरित किया।

***     ***  ***

मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

285. क्या पहला असहयोग आंदोलन असफल रहा?

राष्ट्रीय आन्दोलन

285. क्या पहला असहयोग आंदोलन असफल रहा?



1922

1920 में गांधीजी द्वारा एक वर्ष के भीतर स्वराज लाने के वादे ने आशाओं और आकांक्षाओं को बहुत बढ़ा दिया था। यह नतीज़ा निकालना भी एक भूल होगी कि यह पहला असहयोग आंदोलन असफल रहा। इसने अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ पूरे देश में बिजली-सी लहर पैदा की। लोगों में अभूतपूर्व उत्साह पैदा हुई। जनता में, उसकी आर्थिक समस्यायों और राजनीतिक मसलों, विशेषकर साम्राज्यवाद की चेतना जगाने में निश्चय ही उस आंदोलन की देन है। यहां तक कि सीधे-सादे ग्रामीणों ने भी यह महसूस करना शुरु किया कि उनकी तकलीफ़ों को दूर करने की सबसे अच्छी दवा स्वराज है। राष्ट्रीय संघर्ष में हिस्सा लेकर उन्होंने स्वाधीनता के एक नये बोध का अनुभव किया। राज के डर पर विजय पा ली गयी थी। साधारण लोगों ने, स्त्रियों और पुरुषों ने, धनिक और ग़रीब ने, सरकार की अवज्ञा करके दंड के रूप में तकलीफ़ें बर्दाश्त करने की इच्छा और क्षमता दिखाई। खादी पर बल देना गांवों की आवश्यकताओं का एक वास्तविक मूल्यांकन था। इसकी असफलता का बहुत महत्व नहीं था क्योंकि वह केवल अस्थाई ही हो सकती थी। गांधीजी ने स्वयं व्याख्या की, जो संघर्ष 1920 में शुरु हुआ वह निर्णयात्मक संघर्ष है, चाहे वह एक महीना या एक साल चले, चाहे कई महीनों या कई वर्षों तक।

1922 तक गाँधीजी ने भारतीय राष्ट्रवाद को एकदम परिवर्तित कर दिया और इस प्रकार फ़रवरी 1916 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अपने भाषण में किए गए वायदे को उन्होंने पूरा किया। अब यह व्यावसायिकों व बुद्धिजीवियों का ही आंदोलन नहीं रह गया था, अब हजारों की संख्या में किसानों, श्रमिकों और कारीगरों ने भी इसमें भाग लेना शुरू कर दिया। इनमें से कई गाँधीजी के प्रति आदर व्यक्त करते हुए उन्हें अपना महात्माकहने लगे। लोगों ने इस बात की प्रशंसा की कि गाँधीजी उनकी ही तरह के वस्त्र पहनते थे, उनकी ही तरह रहते थे और उनकी ही भाषा में बोलते थे। अन्य नेताओं की तरह वे सामान्य जनसमूह से अलग नहीं खड़े होते थे बल्कि वे उनसे समानुभूति रखते तथा उनसे घनिष्ठ संबंध भी स्थापित कर लेते थे। सामान्य जन के साथ इस तरह की पहचान उनके वस्त्रों में विशेष रूप से परिलक्षित होती थी। गाँधीजी लोगों के बीच एक साधारण धोती में जाते थे। इस बीच, प्रत्येक दिन का कुछ हिस्सा वे चरखा चलाने में बिताते थे। अन्य राष्ट्रवादियों को भी उन्होंने ऐसा करने के लिए  प्रोत्साहित किया। सूत कताई के कार्य ने गाँधीजी को पारंपरिक जाति व्यवस्था में प्रचलित मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम की दीवार को तोड़ने में मदद दी। गाँधी बाबा’, ‘गाँधी महाराजअथवा सामान्य महात्माजैसे अलग-अलग नामों से ज्ञात गाँधीजी भारतीय किसान के लिए एक उद्धारक के समान थे जो उनकी ऊँची करों और दमनात्मक अधिकारियों से सुरक्षा करने वाले और उनके जीवन में मान-मर्यादा और स्वायत्तता वापस लाने वाले थे। ग़रीबों विशेषकर किसानों के बीच गाँधीजी की अपील को उनकी सात्विक जीवन शैली और उनके द्वारा धोती तथा चरखा जैसे प्रतीकों के विवेकपूर्ण प्रयोग से बहुत बल मिला।

उस समय के भारतीय राजनीति के संदर्भ में देखें तो यह भी कहा जा सकता है कि राष्ट्रवाद के आधार को और व्यापक बनाने में उनकी सफ़लता का राज उनके द्वारा सावधानीपूर्वक किया गया संगठन था। भारत के विभिन्न भागों में कांग्रेस की नई शाखाएँ खोली गयी। रजवाड़ों में राष्ट्रवादी सिद्धान्त को बढ़ावा देने के लिए प्रजा मंडलोंकी एक श्रृंखला स्थापित की गई। गाँधीजी ने राष्ट्रवादी संदेश का संचार शासकों की अंग्रेजी भाषा की जगह मातृ भाषा में करने को प्रोत्साहित किया। इस प्रकार कांग्रेस की प्रांतीय समितियाँ ब्रिटिश भारत की कृत्रिम सीमाओं की अपेक्षा भाषाई क्षेत्रों पर आधारित थीं। इन अलग-अलग तरीकों से राष्ट्रवाद देश के सुदूर हिस्सों तक फ़ैल गया और अब इसमें वे सामाजिक वर्ग भी शामिल हो गए जो अभी तक इससे अछूत थे।

अब तक कांग्रेस के समर्थकों में कुछ बहुत ही समृद्ध व्यापारी और उद्योगपति शामिल हो गए थे। भारतीय उद्यमियों ने यह बात जल्दी ही समझ ली कि उनके अंग्रेज प्रतिद्वंद्वी आज जो लाभ पा रहे हैं, स्वतंत्र भारत में ये चीजें समाप्त हो जाएंगी। जी.डी. बिड़ला जैसे कुछ उद्यमियों ने राष्ट्रीय आंदोलन का खुला समर्थन किया। इस प्रकार गाँधीजी के प्रशंसकों में गरीब किसान और धनी उद्योगपति दोनों ही थे। 1917 और 1922 के बीच भारतीयों के एक बहुत ही प्रतिभाशाली वर्ग ने स्वयं को गाँधीजी से जोड़ लिया। इनमें महादेव देसाई, वल्लभ भाई पटेल, जे.बी. कॄपलानी, सुभाष चंद्र बोस, अबुल कलाम आजाद, जवाहरलाल नेहरू, सरोजिनी नायडू, गोविंद वल्लभ पंत और सी. राजगोपालाचारी शामिल थे। गाँधीजी के ये घनिष्ठ सहयोगी विशेष रूप से भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के साथ ही भिन्न-भिन्न धार्मिक परंपराओं से आए थे। इसके बाद उन्होंने अनगिनत अन्य भारतीयों को कांग्रेस में शामिल होने और इसके लिए काम करने के लिए प्रेरित किया।

खिलाफ़त आंदोलन का प्रभाव

अधिकतर नेताओं के जेल में होने के कारण पहला असहयोग आंदोलन बिना जन-व्यापी नागरिक अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत के ही ख़त्म हो गया। उसके शीघ्र बाद ही ख़िलाफ़त का प्रश्न भी महत्वपूर्ण नहीं रह गया। कमालपाशा का शासन हो गया और नवंबर 1922 में सुल्तान के सारे राजनैतिक अधिकार छीन लिए गए। उसने तुर्की के आधुनिकीकरण करने और उसे एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाने का काम शुरु किया। ख़िलाफ़त की परम्परा भी समाप्त कर दी गयी।

कुछ लोग महसूस करते हैं कि खिलाफ़त आंदोलन सुविचारित नहीं था, प्रतिगामी था क्योंकि अंततः एक समय उसने एक राजनैतिक आंदोलन में धार्मिक भावधारा का समावेश किया। उससे हिन्दू-मुस्लिम एकता की उपलब्धि नहीं हुई। ऐसे लोग मानते हैं कि ख़िलाफ़त आन्दोलन एक भूल थी।

किन्तु अच्छी तरह से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि खिलाफ़त आंदोलन ने निश्चय ही शहरी मुसलमानों को राष्ट्रीय आन्दोलन में शरीक़ किया। उस समय सभी वर्गों के लोगों में आंदोलन के उत्साह का बोध जागा था। व्यापक स्तर पर उत्साह था और इसका एक बड़ा कारण ख़िलाफ़त ही था।

***     ***  ***

मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर