साहित्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
साहित्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 8 अक्टूबर 2022

प्रेमचन्द जी की पुण्यतिथि पर

 प्रेमचन्द जी की पुण्यतिथि पर ...

मनोज कुमार


आज प्रेमचन्द जी की पुण्यतिथि है। उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर हम उनके जीवन के बारे में कुछ बातें आपके समक्ष लेकर आए हैं। किसी भी साहित्यकार की रचना को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए उसके व्यक्तित्व और जीवन दृष्टि को जानना बहुत आवश्यक होता है। उनका जीवन सहज और सरल होने के साथ-साथ असाधारण था। उनके जीवन के बारे में उनकी ही पंक्तियों में कहा जाए तो सही होगा,

“मेरा जीवन सपाट, समतल मैदान है, जिसमें कहीं-कहीं गड्ढ़े तो हैं, पर टीलों, पर्वतों, घने जंगलों, गहरी घाटियों और खंडहरों का स्थान नहीं है। जो सज्जन पहाड़ों की सैर के शौकीन हैं उन्हें तो यहां निराशा ही होगी।”

मानवीय अनुभव की विविधता को चित्रित करने वाले मुंशी प्रेमचंद का जन्म एक गरीब घराने में काशी से चार मील दूर बनारस के पास लमही नामक गाँव में 31 जुलाई 1880 को हुआ था। अन्तिम दिनों के एक वर्ष सन् 1933-34 को छोड़कर, जो बम्बई की फिल्मी दुनिया में बीता, उनका पूरा समय बनारस और लखनऊ में गुजरा, जहाँ उन्होंने अनेक पत्र पत्रिकाओं का सम्पादन किया और अपना साहित्य सृजन करते रहे। उनके बचपन का नाम नवाब और असली नाम धनपतराय था। उनके पिता मुंशी अजायबलाल डाकखाने में डाकमुंशी थे। उनकी माता का नाम आनंदी देवी था। आठ वर्ष की अल्पायु में ही उन्हें मातृस्नेह से वंचित होना पड़ा। चौदह वर्ष की आयु में पिता का निधन हो गया। अपने बल-बूते से पढ़े। परिवार में फ़ारसी पढ़ने की परम्‍परा के कारण नवाब की शिक्षा फ़ारसी से शुरू हुई थी। तेरह वर्ष की उम्र तक उन्हें हिन्दी बिल्कुल ही नहीं आती थी। गोरखपुर के मिशन स्कूल आठवीं कक्षा पास करने के बाद उनका दाखिला बनारस के क्वीन्स कॉलेज में नवें दर्जे में हुआ। उस समय उनकी स्थिति ऐसी थी कि वे ख़ुद लिखते हैं, “पांव में जूते न थे। देह पर साबित कपड़े न थे। हेडमास्टर ने फ़ीस माफ़ कर दी थी।” हाई स्‍कूल की पढ़ाई के दौरान उनका विवाह हो गया और गृहस्‍थी का भार आ पड़ा विद्यार्थियों को ट्यूशन पढ़ा कर किसी तरह उन्होंने न सिर्फ़ अपनी रोज़ी-रोटी चलाई बल्कि एक साधारण छात्र के रूप में मैट्रिक भी पास किया। 15 वर्ष की अवस्था में हाई स्‍कूल की पढ़ाई के दौरान, इनका विवाह कर दिया गया और गृहस्‍थी का भार आ पड़ा ऐसी परिस्थिति में पढ़ाई-लिखाई से ज़्यादा रोटी कमाने की चिन्ता उनके सिर पर आ पड़ी।

1898 में उन्होंने चुनार के एक मिशन स्कूल में मास्टरी शुरु की, तो पत्नी को साथ न ले गएवेतन प्रति माह अट्ठारह रुपए था। यह नौकरी करते हुए उन्होंने एफ. ए. और बी.ए. पास किया। एम.ए. भी करना चाहते थे, पर कर नहीं सके। शायद ऐसा सुयोग नहीं हुआ। एक बार उनके स्कूल की टीम का गोरों की टीम से फुटबॉल मैच हो रहा था। इसमें उन्होंने अन्य छात्रों के साथ गोरों की पिटाई कर दी। इसकी क़ीमत उन्हें नौकरी गंवा कर चुकानी पड़ी। साल भर के भीतर 1900 में उन्हें बहराइच के ज़िला स्कूल में नौकरी मिल गई। फिर वहां से उनका तबादला प्रतापगढ़ हो गया। इसी बीच आर्य समाज आन्दोलन के प्रभाव में आकर उसके सदस्य भी बने। दो वर्ष की छुट्टी लेकर उन्होंने 1902 में इलाहाबाद के टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज में दाखिला लिया। 1904 में यहां से उत्तीर्ण हुए। 1905 में वे तबादला होकर कानपुर पहुंचे। उन्हीं दिनों कानपुर से “ज़माना” नामक उर्दू पत्रिका निकलनी शुरू हुई थी। इसके संपादक मुंशी दयानारायण निगम थे। नवाब राय नाम से उन्होंने ‘ज़माना’ में कहानियां और साहित्यिक टिप्पणियां लिखना शुरू कर दिया। ज़माना’ में वे ‘रफ़्तारे ज़माना’ स्तंभ लिखते थे। आर्य समाज का प्रभाव तो था ही, वे हिन्दू समाज की समस्याओं पर भी लिखते रहे।

स्कूलों के सब-डिपुटी इंस्पेक्टर के रूप में जून 1909 में उनका तबादला हमीरपुर हो गया। यहीं पर एक ऐसी घटना हुई कि प्रेमचन्द का जन्म हुआ। दरअसल 1901 से ही उन्होंने  मे उपन्यास लिखना शुरू कर दिया था। 1907 से कहानी लिखने लगे। उर्दू में नवाबराय नाम से लिखते थे। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों लिखी गई 1908 में उनकी कहानी सोज़े वतन प्रकाशित हुई थी। 1910 में यह कहानी ज़ब्त कर ली गई। सरकार को पता चल गया कि ‘सोज़े वतन’ के लेखक वास्तव में धनपत राय ही हैं। धनपत राय को तलब किया गया। किसी तरह नौकरी तो बच गई पर उनके लिखने पर पाबंदी लगा दी गई। 'सोज़े-वतन'की हज़ारों प्रतियां क्या जली वतन को प्रेमचन्द मिल गया। नवाब की कलम पर हुकूमत की पाबन्दी हो गयी थी। नवाब भूमिगत हो गए किन्तु कलम चलती रही।  अंग्रेज़ों के उत्पीड़न के कारण प्रेमचंद नाम से लिखने लगे। 

1914 में उनका तबादला बस्ती हो गया। उन दिनों पेचिश की बीमारी ने उन्हें ऐसा घेरा कि वे इससे जीवन भर जूझते रहे। कमज़ोर सेहत के कारण वे निरीक्षण का काम छोड़कर कम वेतन पर स्कूल में शिक्षक के रूप में आ गए। 1916 में उनका तबादला गोरखपुर हो गया। यहीं उर्दू में उन्होंने ‘बाज़ारे हुस्न’ की रचना की। उनका पहला कहानी संग्रह ‘सप्त सरोज’ और ‘बाज़ारे हुस्न’ का हिन्दी रूपान्तरण “सेवा सदन” इसी अवधि में प्रकाशित हुआ। थोड़े दिनों के बाद उन्होंने उर्दू में “गोशाए आफ़ियत” की रचना की जो बाद में हिन्दी में “प्रेमाश्रम” के नाम से प्रकाशित हुई।

1920 तक सरकारी नौकरी की फिर सत्याग्रह से प्रभावित हो, नौकरी छोड़ दी। हुआ यह कि सन 1921 में गोरखपुर में गांधी जी ने एक बड़ी सभा को संबोधित किया। गांधी जी ने सरकारी नौकरी से इस्तीफे का नारा दिया, तो प्रेमचंद ने गांधी जी के सत्याग्रह से प्रभावित हो, सरकारी नौकरी छोड़ दी। रोज़ी-रोटी चलाने के लिए उन्होंने कानपुर के मारवाड़ी स्कूल में काम किया। पर कुछ दिनों बाद ही त्‍यागपत्र देकर मर्यादा” (बनारस) पत्रिका का संपादन करने लगे। इसके बाद काशी विद्यापीठ में हेडमास्टर के पद पर नियुक्त हुए। पर इसमें भी उनका मन नहीं लगा। नौकरी छोड़कर उन्होने 1923 में बनारस में सरस्वती प्रेस की स्थापना की। प्रेस ठीक से नहीं चला। काफ़ी नुकसान हुआ। 1924 में वे गंगा पुस्तक माला के साहित्यिक सलाहकार के रूप में लखनऊ पहुंचे। 1925 में उन्होंने “चौगाने हस्ती” की रचना की। गंगा पुस्तक माला की नौकरी छोड़कर वे 1927 में “माधुरी” के संपादक के रूप में लखनऊ पहुंचे। 1930 में हंस का प्रकाशन शुरु किया। 

जून 1933 में वे अजन्ता सिनेटोन कम्पनी के प्रोपराइटर एम. भवनानी के निमन्त्रण पर मुम्बई पहुंचे। अप्रैल 1934 तक उस कंपनी में रहे। वही उन्होंने “गोदान” लिखना शुरू किया जिसे बनारस वापस आकर पूरा किया। अजन्ता सिनेटोन कम्पनी के बंद हो जाने पर वे वापस बनारस आ गए। गोदान प्रकाशित हुआ। पर उनका स्वास्थ्य बिगड़ता गया। 8 अक्टूबर 1936 को जलोदर रोग से बनारस में उनका देहावसान हुआ 

प्रेमचन्द जी के व्यक्तित्व के बारे में अगर अमृत राय के शब्दों में कहें तो, “नितांत साधारण वेशभूषा, उटंगी हुई धोती और साधारण कुर्ता, अचानक सामने पड़ जाने पर कोई विश्वास ही न करे कि ये हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक प्रेमचन्द हैं, साधारण जनसमूह के बीच आ पड़ने पर सबका हालचाल, नाम-गांव पूछने वाला, कोई हंसी की बात उठने पर ज़ोरदार ठहाका लगाने वाला, कभी-कभी बच्चों जैसी शरारत करने और मुस्कुराने वाला, नितांत साधारण, बंधी-टंकी दिनचर्या से जुड़ा, अपने को क़लम का मज़दूर मानने वाला यह आदमी हिन्दी का महान उपन्यासकार प्रेमचन्द था 

वे एक प्रकाश स्‍तंभ थे जो जीवन मूल्‍यों को बताते थे। प्रेमचंद साहित्य को उद्देश्य परक मानते थे। इसीलिए उनके साहित्य में सामान्य मनुष्य को पृष्ठभूमि में न रखकर केंद्र में रखा गया है और उसकी संवेदना, पीड़ा और संकट को साहित्य में उठाया गया है। प्रेमचंद के पहले हिन्दी उपन्यास साहित्य रोमानी ऐयारी और तिलस्मी प्रभाव में लिखा जा रहा था। उन्होंने उससे इसे मुक्त किया और यथार्थ की ठोस ज़मीन पर उतारा। यथातथ्यवाद की प्रवृत्ति के साथ प्रेमचंद जी हिंदी साहित्य के उपन्यास का पूर्ण और परिष्कृत स्वरूप लेकर आए। आम आदमी की घुटन, चुभन व कसक को अपने कहानियों और उपन्यासों में उन्होंने प्रतिबिम्बित जब हम उनके उपन्यासों का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि उनके साहित्य में ऐसे पात्र भी हैं जो रूढ़ि जर्ज़र संस्कारों से संघर्ष ही नहीं करते बल्कि उन औपनिवेशिक शक्तियों के ख़िलाफ़ भी खड़े होते हैं, जो उनका शोषण कर रहे हैं। उनके पात्रों में में ऐसी व्यक्तिगत विशेषताएं मिलने लगीं जिन्हें सामने पाकर अधिकांश लोगों को यह भासित होता था कि कुछ इसी तरह की विशेषता वाले व्यक्ति को हमने कहीं देखा है। 

प्रेमचंद देश का वह महान रत्‍न थे जिन्‍होंने जनवादी लेखनी को नया आयाम दिया। 1936 में लखनऊ में एक अधिवेशन में भाषण देते हुए प्रेमचंद जी ने कहा था, साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है – उसका दरज़ा इतना न गिराइए। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं है, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।” 

प्रेमचंद का जीवन औसत भारतीय जन जैसा है। यह साधारणत्व एवं सहजता प्रेमचंद की विशेषता है। प्रेमचंद दरिद्रता में जनमे, दरिद्रता में पले और दरिद्रता से ही जूझते-जूझते समाप्त हो गए। फिर भी वे भारत के महान साहित्यकार बन गए थे, क्योंकि जीवन को कसौटी पर कसने के लिए उन्‍होंने एक मापदंड दिया। उन्होंने अपने को सदा मज़दूर समझा। बीमारी की हालत में, मरने के कुछ दिन पहले तक भी अपने कमज़ोर शरीर को लिखने पर मज़बूर करते थे। कहते थे, “मैं मज़दूर हूं! मज़दूरी किए बिना  मुझे भोजन का अधिकार नहीं है।” इसीलिए प्रेमचंद के साथ खड़े होने का मतलब मुक्ति के साथ खड़ा होना है। लाखों-करोडों भूखे, नंगे, निर्धनों की वे ज़बान थे। धार्मिक ढ़कोसलों को ढ़ोंग मानते थे और मानवता को सबसे बड़ी वस्तु। उनके उपन्यासों में उठाई गई प्रत्येक समस्या के मूल में आर्थिक विषमताओं का हाथ है। उनके उपन्यासों में प्रत्येक घटना इसी विषमता को लेकर आगे बढती है। शायद पहली बार शोषित, दलित एवं ग़रीब वर्ग को नायकत्व प्रदान किया। इनमें मुख्य रूप से किसान, मज़दूर और स्त्रियां हैं। 

प्रेमचंद का साहित्य आज भी प्रासंगिक है। उनकी कहानियों में आम आदमी की संवेदना है। प्रेमचंद ने अपने साहित्‍य के माध्‍यम से मानवीय मूल्‍यों को स्‍थापित करने का गंभीर प्रयास किया। प्रेमचंद के उपन्‍यासों में आम आदमी का चरित्र दिखाई देता है। प्रेमचंद ने जो अभिशाप देखा था, अपने जीवन में भोगा था, उसी को उन्होंने अपने साहित्य में प्रमुख स्थान दिया। डॉ. नगेन्द्र कहते हैं, “गत युग के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में आर्थिक विषमताओं के जितने भी रूप संभव थे, प्रेमचंद की दृष्टि उन सभी पर पड़ी और उन्होंने अपने ढंग से उन सभी का समाधान प्रस्तुत किया है, परन्तु उन्होंने अर्थवैषम्य को सामाजिक जीवन का ग्रंथि नहीं बनने दिया। .. उनके पात्र आर्थिक विषमताओं से पीड़ित हैं परंतु वे बहिर्मुखी संघर्ष द्वारा उन पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, मानसिक कुंठाओं का शिकार बनकर नहीं रह जाते।” 

हिंदी साहित्‍य में उनके योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। वे लेखनी के माध्‍यम से भविष्‍य का मार्ग दर्शन भी करते थे। आज उनके दिखाए जीवन का मूल्‍य भुलाया जा रहा है। प्रेमचंद का साहित्‍य सामाजिक जागरूकता के प्रति प्रतिबद्ध है क्योंकि उनका साहित्य आम आदमी की साहित्‍य है। मुंशी प्रेमचंद अपनी सरल भाषा और व्‍यावहारिक लेखन के कारण पाठकों में शुरू से ही प्रिय रहे हैं। गांव या किसानों का सजीव वर्णन हो या गरीबी के अंश, प्रेमचंद की कथाओं में किसी भी भावना को शब्‍दों के माध्‍यम से चित्रित होते साफ देखा जा सकता है। प्रेमचंद की भाषा सरल, सजीव, और व्‍यावहारिक है। उसे साधारण पढ़े-लिखे लोग भी समझ लेते हैं। उसमें आवश्‍यकतानुसार अंग्रेजी, उर्दू, फारसी आदि के शब्‍दों का भी प्रयोग है, प्रेमचंद की भाषा भावों और विचारों के अनुकूल है। वे गरीबी में जन्‍में, अभावों में पले बढ़े और दरिद्रता से जूझते हुए ही संसार से चले गए।

***   ***   ***

प्रेमचंद का रचना संसार – 

उपन्यास- वरदान, प्रतिज्ञा, सेवा-सदन(१९१६), प्रेमाश्रम(१९२२), निर्मला(१९२३), रंगभूमि(१९२४), कायाकल्प(१९२६), गबन(१९३१), कर्मभूमि(१९३२), गोदान(१९३२), मनोरमा, मंगल-सूत्र(१९३६-अपूर्ण)।
कहानी-संग्रह- प्रेमचंद ने कई कहानियाँ लिखी है। उनके २१ कहानी संग्रह प्रकाशित हुए थे जिनमे ३०० के लगभग कहानियाँ है। ये शोजे वतन, सप्त सरोज, नमक का दारोगा, प्रेम पचीसी, प्रेम प्रसून, प्रेम द्वादशी, प्रेम प्रतिमा, प्रेम तिथि, पञ्च फूल, प्रेम चतुर्थी, प्रेम प्रतिज्ञा, सप्त सुमन, प्रेम पंचमी, प्रेरणा, समर यात्रा, पञ्च प्रसून, नवजीवन इत्यादि नामों से प्रकाशित हुई थी।

प्रेमचंद की लगभग सभी कहानियोन का संग्रह वर्तमान में 'मानसरोवर' नाम से आठ भागों में प्रकाशित किया गया है।

नाटक- संग्राम(१९२३), कर्बला(१९२४) एवं प्रेम की वेदी(१९३३)

जीवनियाँ- महात्मा शेख सादी, दुर्गादास, कलम तलवार और त्याग, जीवन-सार(आत्म कहानी)
बाल रचनाएँ - मनमोदक, कुंते कहानी, जंगल की कहानियाँ, राम चर्चा।

अनुवाद  : इनके अलावे प्रेमचंद ने अनेक विख्यात लेखकों यथा- जार्ज इलियट, टालस्टाय, गाल्सवर्दी आदि की कहानियो के अनुवाद भी किया।

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की आज जन्म तिथि है।


महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की आज जन्म तिथि है।

 मनोज कुमार


जन्म :: 21 फरवरी, 1899
मृत्यु :: 15 अक्तूबर 1961 (दारागंज, इलाहाबाद)
स्थान ::
पश्चिमी बंगाल के मेदिनीपुर ज़िले के महिषादल रियासत में!
मूलतः वे उत्तर प्रदेश के उन्‍नाव जिले के बांसवाड़ा जनपद के गढ़ाकोला नामक गांव के रहने वाले थे|
शिक्षा ::
हाईस्‍कूल तक। हिंदी बंगला, अंग्रेजी और संस्‍कृ‍त का ज्ञान स्वतंत्र रूप से प्राप्त किया।
वृत्ति ::
 प्रायः 1918 ई. से लेकर 1922 ई. के मध्‍य तक महिषादल राज्‍य की सेवा में। उसके बाद से संपादन स्‍वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य। 1923 ई के अगस्त से मतवाला मंउल, कलकत्‍ता में। मतवाला से संबंध किसी न किसी रूप में 1929 ई. के मध्‍य तक। फिर कलकत्ता छोड़े तो लखनऊ आए । गंगा-पुस्‍तकमाला कार्यालय और सुधा से संबद्ध रहे । 1942-43 ई. से इलाहाबाद में रहकर स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य ।
कृतियां ::
प्रमुख कृतियां   परिमल, गीतिका, अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नए पत्ते, अर्चना, अराधना, गीत गुंज, सान्‍ध्‍य काकली (कविता) अप्‍सरा, अलका, प्रभावती, निरूपमा, कुल्‍ली भाट, बिल्‍लेसुर बकरिहा (उपन्‍यास) रवीन्‍द्र-कविता-कानन, प्रबंध-पद्म, प्रबंध प्रतिमा, चाबुक, चयन, संग्रह (निबंध) आदि ।


            महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्‍म पश्चिमी बंगाल के मेदिनीपुर ज़िले के महिषादल रियासत में 21 फरवरी, 1899 को हुआ था। मूलतः वे उत्तर प्रदेश के उन्‍नाव जिले के बांसवाड़ा जनपद के रहने वाले थे पर बंगाल उनकी कर्मभूमि थी। निराला की आरंभिक शिक्षा महिषादल में ही हुई थी। निराला का बंगाल से जितना गहरा संबंध था, उतना ही अंतरंग संबंध बांसवाड़ा से भी था। इन दोनों संबंधों को जो नहीं समझेगा वह निराला की मूल संवेदना को नहीं समझ सकता। इन दो पृष्‍ठभूमियों की अलग-अलग प्रकार के सांस्‍कृतिक परिवेश का उनके व्‍यक्तित्‍व पर गहरा असर पड़ा जिसका स्‍पष्‍ट प्रभाव हम उनकी रचनाओं में भी पाते हैं, जब वे बादल को एक ही पंक्ति में कोमल गर्जन करने हेतु कहते हैं, वहीं वे दूसरी ओर घनघोर गरज का भी निवेदन करते हैं।
झूम-झूम मृद गरज-गरज घन घोर!
राग अमर! अम्‍बर में भर निज रोर !”
            निराला ने बंगाल की भाषिक संस्‍कृति को आत्‍मसात किया था। उन्‍होंने संस्‍कृत तथा अंग्रेजी घर पर सीखी। बंगाल में रहने के कारण उनका बंगला पर असाधारण अधिकार था। उन्‍होंने हिंदी भाषा सरस्‍वती और  मर्यादा पत्रिकाओं से सीखी। रवीन्‍द्र नाथ ठाकुर, नजरूल इस्‍लाम, स्‍वामी विवेकानंद, चंडीदास और तुलसी दास के तत्‍वों के मेल से जो व्‍यक्तित्‍व बनता है, वह निराला है।
            चौदह वर्ष की आयु में उनका विवाह संपन्‍न हो गया। उनका वैवाहिक जीवन सुखी नहीं रहा। युवावस्‍था में ही उनकी पत्नी की अकाल मृत्‍यु हो गई। उन्‍होंने जीवन में मृत्‍यु बड़ी निकटता से देखी। पत्नी की मृत्यु के पश्‍चात् पिता, चाचा और चचेरे भाई, एक-के-बाद-एक उनका साथ छोड़ चल बसे। काल के क्रूर पंजो की हद तो तब हुई जब उनकी पुत्री सरोज भी काल के गाल में समा गई। उनका कवि हृदय गहन वेदना से टूक-टूक हो गया।
            निराला ने नीलकंठ की तरह विष पीकर अमृत का सृजन किया। जीवन पर्यन्‍त स्‍नेह के संघर्ष में जूझते-जूझते 15 अक्तूबर 1861 में उनका देहावसान हो गया।
            निराला जी छायावाद के आधार-स्‍तम्‍भों में से एक हैं। गहन ज्ञान प्रतिभा से उन्‍होंने हिंदी को उपर बढ़ाया। वे किसी वैचारिक खूंटे से नहीं बंधे। वे स्‍वतंत्र विचारों वाले कवि हैं। विद्रोह के पुराने मुहावरे को उन्‍होंने तोड़ा वे आधुनिक काव्‍य आंदोलन के शीर्ष व्‍यक्ति थे। सौंदर्य के साथ ही विद्रूपताओं को भी उन्‍होंने स्‍थान दिया। निराला की कविताओं में आशा व विश्‍वास के साथ अभाव व विद्रोह का परस्‍पर विरोधी स्‍वर देखने को मिलता है।
           
उन्‍होंने प्रारंभ में प्रेम, प्रकृति-चित्रण तथा रहस्‍यवाद से संबधित कविताएं लिखी। बाद में वे प्रगतिवाद की ओर मुड़ गए। आधुनिक प्रणयानुभूति की बारीकियां निराला की इन पंक्तियों से झलकती हैं
नयनों का-नयनों से गोपन-प्रिय संभाषण,
पलकों का नव पलकों पर प्रथमोत्थान-पतन।
पर विद्रोही स्वभाव वाले निराला ने अपनी रचनाओं में प्रेम के रास्ते में बाधा उत्पन्न करने वाले जाति भेद को भी तोड़ने का प्रयास किया है। पंचवटी प्रसंग में निराला के आत्म प्रसार की अकांक्षा उभर कर सामने आई है।
छोटे-से घर की लघु सीमा में
बंधे हैं क्षुद्र भाव
यह सच है प्रिये
प्रेम का पयोनिधि तो उमड़ता है
सदा ही निःसीम भू पर
प्रगतिवादी साहित्‍य के अंतर्गत उन्‍होंने शोषकों के विरूद्ध क्रांति का बिगुल बजा दिया। जागो फिर एक बार, महाराज शिवाजी का पत्र,झींगुर डटकर बोला”, महँगू महँगा रहा आदि कविताओं में शोषण के विरूद्ध जोरदार आवाज सुनाई देती है। विधवा भिक्षुक और वह तोड़ती पत्‍थर आदि कविताओं में उन्‍होंने शोषितों के प्रति करूणा प्रकट की है। निराला के काव्‍य का विषय जहां एक तरफ श्री राम है वहीं दूसरी तरफ दरिद्रनारायण भी।
वह आता-
दो टूक कलेजे के करता, पछताता
पथ पर आता । ......
चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए ।
जहों एक ओर जागो फिर एक बार कविता के द्वारा निराला ने आत्म गौरव का भाव जगाया है वहीं दूसरी ओर निराला ने विधवा को इष्टदेव के मंदिर की पूजा-सी पवित्र कहा है।
उनकी प्रकृति संबंधी कविताएं अत्‍यंत सुंदर और प्रभावशाली हैं। निराला की सांध्य सुंदरी जब मेघमय आसमान से धीरे-धीरे उतरती है तो प्रकृति की शांति, नीरवता और शिथिलता का अनुभव होता है। वहीं उनकी बादल राग कविता में क्रांति का स्‍वर गूंजा है।
                        अरे वर्ष के हर्ष !
बरस तू बरस-बरस रसधार!
पार ले चल तू मुझको,
बहा, दिखा मुझको भी निज
गर्जन-गौरव संसार!
उथल-पुथल कर हृदय-
मचा हलचल-
चल रे चल-
निराला ने भाव के अनुसार शिल्‍प में भी क्रांति की। उन्‍होंने परंपरागत छंदो को तोड़ा तथा छंदमुक्‍त कविताओं की रचना की। पहले उनका बहुत विरोध हुआ। परंतु बाद में हिंदी साहित्‍य मानों उनकी पथागामिनी हुई। भाषा के कुशल प्रयोग से ध्‍वनियों के बिंब उठा देने में वे कुशल हैं।
धँसता दलदल
हँसता है नद खल् खल्
बहता कहता कुलकुल कलकल कलकल
उनका भाषा प्रवाह दर्शनीय है। उनकी अनेक कविताओं के पद्यांश शास्‍त्रीय संगीत और तबले पर पड़ने वाली थाप जैसा संगीतमय हैं। भाषा अवश्‍य संस्‍कृतनिष्‍ठ तथा समय-प्रधान होती है। पर कविता का स्‍वर ओजस्‍वी होता है। निराल के साहित्‍य में कहीं भी बेसुरा राग नहीं है। उनके व्‍यक्तित्‍व एवं कृतित्‍व में कोई भी अंतरविरोध नहीं है। निराला जी एक-एक शब्‍द को सावधानी से गढते थे वे प्रत्‍येक शब्‍द के संगीत और व्‍यंजना का पूरा ध्‍यान रखते थे।
            बंगाल की काव्‍य परंपरा का उन पर प्रभाव है। निराला में संगीत के जो छंद हैं, वे किसी अन्‍य आधुनिक कवि में नहीं है। वे हमारे जीवन के निजी कवि हैं। हमारे दुःख-सुख में पग-पग पर साथ चलने वाले कवि हैं। वे अंतरसंघर्ष, अंतरवेदना, अतंरविरोध के कवि हैं। बादल निराला के व्‍यक्तित्‍व का प्रतीक है जो दूसरों के लिए बरसता है।
            आंचलिक का सर्वाधिक पुट निराला की रचनाओं में मिलता है, जबकि इसके लिए विज्ञप्‍त हैं फणीश्‍वर नाथ रेणु। सर्वप्रथम आंचलिकता को कविता व कहानी में स्‍थान देने का श्रेय भी निराला को ही दिया जा सकता है। निराला की रचनाओं में बंगला के स्‍थानीय शब्‍दों के अलावा बांसवाड़ा के शब्‍द भी प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आंचलिकता के जरिए उन्‍होंने हिंदी की शब्‍द शक्ति बढ़ाई।
            निराला की मूल संवेदना राम को ही संवेदना हैं। डा. कृष्‍ण बिहारी मिश्र का कहना है कि निराला के समग्र व्‍यक्तित्‍व को देखें तो निराला भारतीय आर्य परंपरा के आधुनिक प्रतिबिंब नजर आएंगे। आज जब संवेदना की खरीद-फरोख्‍त हो रही है , बाजार संस्‍कृति अपने पंजे बढ़ा रही है, ऐसे समय महाप्राण निराला की वही हुंकार चेतना का संचार कर सकती है।
आज सभ्‍यता के वैज्ञानिक जड़ विकास पर गर्वित विश्‍व
नष्‍ट होने की ओर अग्रसर.........
फूटे शत-शत उत्‍स सहज मानवता-जल के
यहां-वहां पृथ्‍वी के सब देशों में छलके
            निराला के व्‍यक्तित्‍व में ईमानदारी व विलक्षण सजगता साफ झलकती थी। जो भी व्‍यक्ति ईमानदार होगा, उसकी नियति भी निराला जैसी ही होगी। उनमें वह दुर्लभ तेज था, जो उनके समकालीन किसी अन्‍य कवि में नहीं दिखता। निराला ने अपने जीवन को दीपक बनाया था, वे अंधकार के विरूद्ध आजीवन लाड़ने वाले व्‍यक्ति थे। निराला ने कभी सर नहीं झुकाया, वे सर ऊँचा करके कविता करते थे। तभी उनका कुकुरमत्ता गुलाब को फटकार लगाने की हैसियत रखता है।
सुन बे गुलाब !
पाई तूने खुशबू-ओ-आब !
चूस खून खाद का अशिष्‍ट
डाल से तना हुआ है कैप्‍टलिस्‍ट !

वे अनलक्षितों के कवि थे ।
वह तोड़ती पत्‍थड़
इलाहाबाद के पथ पर ।

निराला की दृष्टि वहां गयी जहां उनके पहले किसी की दृष्टि नहीं पहुंची थी। सरोज स्मृति में जिस वात्सल्य भाव का चित्रण हुआ है वह कहीं और नहीं मिलता। निराला ने अपनी पुत्री सरोज की स्मृति में शोकगीत लिखा और उसमें निजी जीवन की अनेक बातें साफ-साफ कह डाली। मुक्त छंद की रचनाओं का लौटाया जाना, विरोधियों के  शाब्दिक प्रहार, मातृहीन लड़की की ननिहाल में पालन-पोषण, दूसरे विवाह के लिए निरंतर आते हुए प्रस्ताव और उन्हें ठुकराना, सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ते हुए एक दम नए ढ़ंग से कन्या का विवाह करना, उचित दवा-दारू के अभाव में सरोज का देहावसान और उस पर कवि का शोकोद्गार। कविता क्या है पूरी आत्मकथा है। यहां केवल आत्मकथा नहीं है, बल्कि अपनी कहानी के माध्यम से एक-एक कर सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार किया गया है।
ये कान्यकुब्ज-कुल कुलांगार
खाकर पत्तल में करें छेद
इनके कर कन्या, अर्थ खेद,
यह निराला ही हैं, जो तमाम रूढ़ियों को चुनौती देते हुए अपनी सद्यः परिणीता कन्या के रूप का खुलकर वर्णन करते हैं और यह कहना नहीं भूलते कि पुष्प-सेज तेरी स्वयं रची!’ । है किसी में इतना साहस और संयम।
चुनौती देना और स्वीकार करना निराला की विशेषता थी। विराट के उपासक निराला की रचनाओं में असीम-प्रेम के रहस्यवाद की भावना विराट प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त होती है। निराला के साहित्‍य में गहरी अध्यात्‍म चेतना, वेदांत, शाक्‍त, वैष्‍णवधारा का पूर्ण समावेश है । जीवन की समस्‍त जिज्ञासाओं को निराला ने एक व्‍यावहारिक परिणति दी। एक द्रष्‍टा कवि की हैसियत से निराला ने मंत्र काव्‍य की रचना की है। विराट के उपासक निराला की रचनाओं में असीम-प्रेम के रहस्यवाद की भावना विराट प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त होती है।
            निराला के जीवन में अपने व्‍यक्तिगत दुःख तो सहे ही, उन्‍होंने दूसरों के दुःखों को भी सहा। वे दूसरों की पीड़ाओं से स्‍वयं दुःखी हुए। इसलिए संसार-भर की व्‍यथाओं ने उन्‍हें तोड़ डाला। वे अपनी पीड़ाओं से अधिक दूसरों की पीड़ाओं से व्‍यथित थे। वे केवल महान साहित्‍यकार ही नहीं थे, वे उससे भी बड़े मनुष्‍य थे। उनकी मानवता कला से ऊपर थी। वे कला और साहित्‍य का चाहे सम्‍मान न करें , किंतु मानवता का अवश्‍य सम्‍मान करते थे। उनकी महानता इस बात में थी कि वे छोटों का खूब सम्‍मान करते थे। उनका कहना था कि गुलाम भारत में सब शुद्र हैं। कोई ब्राह्मण नहीं है। सब समान हैं। यहां ऊंच नीच का भेद करना बेकार है। हमें जाति के आधार पर ऊँचा कहलाने की आदत छोड़ देनी चाहिए। उनके इन्‍ही विचारों के कारण  भारत के परंपरावादी, जातीवादी, ब्राह्मणवादी लोग उनसे चिढ़ते थे। वे निराला को धर्म-भ्रष्‍टक मानते थे। परंतु दूसरी ओर, गरीब किसान और अछूत माने जाने वाले लोग उन्‍हें बहुत चाहते थे। उनकी सरलता के कारण जहां पुराणपंथी उनसे कटते थे, वहीं गरीब किसान और अछूत उन पर जान देते थे। वे चतुरी चमार के लड़के को घर पर पढ़ाते थे। इसी प्रकार वे फुटपाथ के पास बैठी पगली भिखारिन से बहुत सहानुभूति रखते थे।
            जैसे गांधीजी में कहीं बेसुरापन नहीं मिलता वैसे ही साहित्‍य के क्षेत्र में निराला में भी कहीं बेसुरापन नहीं था। जिन्‍हें भारतीय धर्म, दर्शन व साहित्‍य का पता है वह निराला को समझ सकते हैं। मनुष्‍य को नष्‍ट तो किया जा सकता है किन्‍तु पराजित नहीं किया जा सकता। निराला के साहित्‍य में हमें यही संदेश मिलता है। वे हिंदी साहित्‍य प्रेमियों के हृदय सम्राट हैं। वे बड़े साहित्‍यकार अवश्‍य थे,‍ किंतु उससे भी बड़े मनुष्‍य थे।  

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

वेलेंटाइन डे और … प्रेम-प्रदर्शन


फ़ुरसत में ... वेलेंटाइन डे और  … प्रेम-प्रदर्शन

मनोज कुमार


एक वो ज़माना था जब वसंत के आगमन पर कवि कहते थे,
अपनेहि पेम तरुअर बाढ़ल
कारण किछु नहि  भेला ।
साखा पल्लव कुसुमे बेआपल
सौरभ दह दिस गेला ॥ (विद्यापति)
आज तो न जाने कौन-कौन-सा दिन मनाते हैं और प्रेम के प्रदर्शन के लिए सड़क-बाज़ार में उतर आते हैं। इस दिखावे को प्रेम-प्रदर्शन कहते हैं। हमें तो रहीम का दोहा याद आता है,
रहिमन प्रीति न कीजिए, जस खीरा ने कीन।
ऊपर से तो दिल मिला, भीतर फांके तीन॥
खैर, खून, खांसी, खुशी, बैर, प्रीति, मद-पान।
रहिमन दाबे ना दबत  जान सकल  जहान॥
हम तो विद्यार्थी जीवन के बाद सीधे दाम्पत्य जीवन में बंध गए इसलिए प्रेमचंद के इस वाक्य को पूर्ण समर्थन देते हैं, “जिसे सच्चा प्रेम कह सकते हैं, केवल एक बंधन में बंध जाने के बाद ही पैदा हो सकता है। इसके पहले जो प्रेम होता है, वह तो रूप की आसक्ति मात्र है --- जिसका कोई टिकाव नहीं।”
उस दिन सुबह-सुबह नींद खुली, बिस्तर से उठने जा ही रहा था कि श्रीमती जी का मनुहार वाला स्वर सुनाई दिया, “कुछ देर और लेटे रहो ना।”
जब नींद खुल ही गई थी और मैं बिस्तर से उठने का मन बना ही चुका था, तो मैंने अपने इरादे को तर्क देते हुए कहा, “नहीं-नहीं, सुबह-सुबह उठना ही चाहिए।”
“क्यों? ऐसा कौन-सा तीर मार लोगे तुम?”
मैंने अपने तर्क को वजन दिया, “इससे शरीर दुरुस्त और दिमाग़ चुस्त रहता है।”
अब उनका स्वर अपनी मधुरता खो रहा था, “अगर सुबह-सुबह उठने से दिमाग़ चुस्त-दुरुस्त रहता है, तो सबसे ज़्यादा दिमाग का मालिक दूधवाले और पेपर वाले को होना चाहिए।”
“तुम्हारी इन दलीलों का मेरे पास जवाब नहीं है।” कहता हुआ मैं गुसलखाने में घुस गया। बाहर आया तो देखा श्रीमती जी चाय लेकर हाज़िर हैं। मैंने कप लिया और चुस्की लगाते ही बोला, “अरे इसमें मिठास कम है ..!”
श्रीमती जी मचलीं, “तो अपनी उंगली डुबा देती हूं .. हो जाएगी मीठी।”
मैंने कहा, “ये आज तुम्हें हो क्या गया है?”
“तुम तो कुछ समझते ही नहीं … कितने नीरस हो गए हो?” उनके मंतव्य को न समझते हुए मैं अखबार में डूब गया।
मैं आज जिधर जाता श्रीमती जी उधर हाज़िर .. मेरे नहाने का पानी गर्म, स्नान के बाद सारे कपड़े यथा स्थान, यहां तक कि जूते भी लेकर हाजिर। मेरे ऑफिस जाने के वक़्त तो मेरा सब काम यंत्रवत होता है। सो फटाफट तैयार होता गया और श्रीमती जी अपना प्रेम हर चीज़ में उड़ेलती गईं।
मुझे कुछ अटपटा-सा लग रहा था। अत्यधिक प्रेम अनिष्ट की आशंका व्यक्त करता है।
जब दफ़्तर जाने लगा, तो श्रीमती जी ने शिकायत की, “अभी तक आपने विश नहीं किया।”
मैंने पूछा, “किस बात की?”
बोलीं, “अरे वाह! आपको यह भी याद नहीं कि आज वेलेंटाइन डे है!”
ओह! मुझे तो ध्यान भी नहीं था कि आज यह दिन है। मैं टाल कर निकल जाने के इरादे से आगे बढ़ा, तो वो सामने आ गईं। मानों रास्ता ही छेक लिया हो। मैंने कहा, “यह क्या बचपना है?”
उन्होंने तो मानों ठान ही लिया था, “आज का दिन ही है, छेड़-छाड़ का ...”
मैंने कहा, “अरे तुमने सुना नहीं टामस हार्डी का यह कथन Love is lame at fifty years! यह तो बच्चों के लिए है, हम तो अब बड़े-बूढ़े हुए। इस डे को सेलिब्रेट करने से अधिक कई ज़रूरी काम हैं, कई ज़रूरी समस्याओं को सुलझाना है। ये सब करने की हमारी उमर अब गई।”
“यह तो एक हक़ीक़त है। ज़िन्दगी की उलझनें शरारतों को कम कर देती हैं। ... और लोग समझते हैं ... कि हम बड़े-बूढ़े हो गए हैं।
“बहुत कुछ सीख गई हो तुम तो..।”
वो अपनी ही धुन में कहती चली गईं,
“न हम कुछ हंस के सीखे हैं,
न हम कुछ रो के सीखे है।
जो कुछ थोड़ा सा सीखे हैं,
तुम्हारे  हो  के सीखे हैं।”
मैंने अपनी झेंप मिटाने के लिए विषय बदला, “पर तुम्हारी शरारतें तो अभी-भी उतनी ही अधिक हैं जितनी पहले हुआ करती थीं ...
उनका जवाब तैयार था, “हमने अपने को उलझनों से दूर रखा है।
उनकी वाचालता देख मैं श्रीमती जी के चेहरे की तरफ़ बस देखता रह गया। मेरी आंखों में छा रही नमी को वो पकड़ न लें, ... मैंने चेहरे को और भी सीरियस कर लिया। चेहरे को घुमाया और कहा, “तुम ये अपना बचपना, अपनी शरारतें बचाए रखना, ... ये बेशक़ीमती हैं!”
अपनी तमाम सकुचाहट को दूर करते हुए बोला, “लव यू!”
और झट से लपका लिफ़्ट की तरफ़।
शाम को जब दफ़्तर से वापस आया, तो वे अपनी खोज-बीन करती निगाहों से मेरा निरीक्षण सर से पांव तक करते हुए बोली, “लो, तुम तो खाली हाथ चले आए …”
“क्यों, कुछ लाना था क्या?”
बोलीं, “हम तो समझे कोई गिफ़्ट लेकर आओगे।”
मन ने उफ़्फ़ ... किया, मुंह से निकला, “गिफ़्ट की क्या ज़रूरत है? हम हैं, हमारा प्रेम है। जब जीवन में हर परिस्थिति का सामना करना ही है तो प्रेम से क्यों न करें?
लेकिन वो तो अटल थीं, गिफ़्ट पर। “अरे आज के दिन तो बिना गिफ़्ट के नहीं आना चाहिए था तुम्हें, इससे प्यार बढ़ता है।”
मैंने कहा, “गिफ़्ट में कौन-सा प्रेम रखा है? ...” अपनी जेब का ख्याल मन में था और ज़ुबान पर, “जो प्रेम किसी को क्षति पहुंचाए वह प्रेम है ही नहीं।” मैंने अपनी बात को और मज़बूती प्रदान करने के लिए जोड़ा, “टामस ए केम्पिस ने कहा है A wise lover values not so much the gift of the lover as the love of the giver. और मैं समझता हूं कि तुम बुद्धिमान तो हो ही।”
उनके चेहरे के भाव बता रहे थे कि आज ... यानी प्रेम दिवस पर उनके प्रेम कभी भी बरस पड़ेंगे। मेरा बार बार का एक ही राग अलापना शायद उनको पसंद नहीं आया। सच ही है, जीवन कोई म्यूज़िक प्लेयर थोड़े है कि आप अपना पसंदीदा गीत का कैसेट बजा लें और सुनें। दूसरों को सुनाएं। यह तो रेडियो की तरह है --- आपको प्रत्येक फ्रीक्वेंसी के अनुरूप स्वयं को एडजस्ट करना पड़ता है। तभी आप इसके मधुर बोलों को एन्ज्वाय कर पाएंगे।
मैंने सोचा मना लेने में हर्ज़ क्या है? अपने साहस को संचित करता हुआ रुष्टा की तरफ़ बढ़ा।
“हे प्रिये!”
“क्या है ..(नाथ) ..?”
“(हे रुष्टा!) क्रोध छोड़ दे।”
“गुस्सा कर के मैं कर ही क्या लूंगी?”
“मुझे अपसेट (खिन्न) तो किया ही ना ...”
“हां-हां सारा दोष तो मुझमें ही है।”
“चेहरे से से लग तो रहा है कि अब बस बरसने ही वाली हो।”
“तुम पर बरसने वाली मैं होती हूं ही कौन हूं?”
“मेरी प्रिया हो, मेरी .. (वेलेंटाइन) ...”
“वही तो नहीं हूं, इसी लिए ,,, (अपनी क़िस्मत को कोस रही हूं) ...”
"खबरदार! ऐसा कभी न कहना!!" 
"क्यों कहूंगी भला! मुझे मेरा गिफ्ट मिल जो गया! सब कुछ खुदा से मांग लिया तुमको मांगकर!"   
"........................"
***
हमारे जीवन में हमारा प्रेम-प्रदर्शन इसी तरह होता आया है।
इस पथ का उद्देश्य नहीं है श्रांति भवन में टिक रहना
किन्तु पहुंचना उस सीमा पर जिसके आगे राह नहीं
अथवा उस आनन्द भूमि में जिसकी सीमा कहीं नहीं। (जयशंकर प्रसाद)