शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020
वेलेंटाइन डे और … प्रेम-प्रदर्शन
रविवार, 22 फ़रवरी 2015
फ़ुरसत में ... मोती की याद!
फ़ुरसत में ... 122
मोती की याद!
मनोज कुमार
पशु-पक्षियों की भी अपनी भाषा होती है। उनका भी अपना एक संप्रेषण सिद्धान्त होता ही होगा। जब संप्रेषण होगा, तो नामकरण भी वे कर ही लेते होंगे। वैसे तो प्रकृति द्वारा ये जीव स्वतंत्र विचरण और स्वच्छंद जीवन के लिए रचे गए हैं, लेकिन हम मनुष्य उन जीवों की स्वतंत्रता और स्वच्छंदता का हरण कर उन्हें पालतू बना लेते हैं, और अपनी सुविधा और रूचि के अनुरूप उनका नाम तय कर देते हैं।
जब हम छोटे थे, तो पालतू पशुओं की संख्या और जाति/ प्रजाति बड़ी सीमित हुआ करती थी। गाएँ और भैंसें – बकरी – घोड़े आदि तो इतने पालतू होते थे कि यदा-कदा परीक्षाओं में हमारे पाठ्यक्रम में निबन्ध के विषय होते थे। बिल्लियों ने तब सामाजिक प्राणी होने का दर्ज़ा तो प्राप्त कर लिया था, लेकिन उन्हें घर में प्रवेश की खुली आज़ादी नहीं मिली थी। चोरी छिपे उनके प्रवेश को भी बड़ी हिकारत की नज़र से देखा जाता था, और कुछ विशेष पेय पदार्थों को सिक्के के ऊपर रखा जाता ताकि वह उनकी पहुंच से दूर हो। कुत्ते तो सही अर्थों में कुत्ते ही थे, और गली तक ही सिमट कर कुत्ते-बिल्लियों की तरह लड़ते रहने का पर्याय बने रहते थे। आम तौर पर गली में फेंके हुए दानों पर निर्भर रहने वालों कुत्तों में से एकाध कुत्ता या उसका पिल्ला कभी कभार हमारे साथ-साथ टहलते-टहलते हमारे घर तक चला आता, तो उसे घर के लोगों की विशेष कृपादृष्टि से कुछ खाने-पीने को भी मिल जाता। एक से अधिक बार इस क्रम के दुहराए जाने के पश्चात उसे मुफ़्त खाने की चसक लग जाती और उसका हमारे घर के समीप आने-जाने का क्रम बढ़ जाता। धीरे-धीरे उसे हमारे यहां आकर खाने की और हमें उसके आने की आदत हो जाती। अब इस आदत को आप पालतू बनाने की प्रक्रिया कहना चाहें तो कह लें! हां इस आने-जाने के क्रम में सहसा उसका नामाकरण भी हो जाता। उन दिनों अधिकांश ऐसे पालतू (फालतू अधिक उपयुक्त होगा) कुत्तों का नाम ‘मोती’ हुआ करता था!! आज के जैसे अनोखे और अलग (something different) नामों का प्रचलन तो उस दौर में था नहीं।
हम कुत्ते को कुत्ता ही कहते थे। बहुत प्यार हुआ तो ‘कुकुर’ भी कह लेते थे। आज अगर किसी पालतू कुत्ते को कुत्ता कह दीजिए तो कुत्ते से पहले उसका स्वामी भौंकेगा – उसे डौगी कहिए, नहीं तो वह बुरा मान जाएगा। और यदि आपने उसके स्वामी द्वारा रखा नाम लिया तो हो सकता वह आपके पैर चाटे या आपकी गोद में भी बैठ कर आपको कृतार्थ करे। इन पालतू जीवों के कई नाम जैसे बौस्की, टाइगर, जैक्सन, आदि प्रचलन में आकर पुराने हो चुके हैं। आज के इस दौर में मेरा भाई जयंत अपने पालतू कुत्ते को ‘घंसू’ कहता है। शायद वह भी ‘पुरातन युग’ में जी रहा है।
अपने छुटपन की बात है। ब्रह्मपुरा रेलवे कॉलोनी के अपने मकान के बारामदे से सड़क को जाती सीढ़ियों पर बैठा ‘अलुहा’ खा रहा था। तभी एक कुत्ते का पिल्ला कहीं से घूमता-फिरता आ गया। मेरी नज़र उस पर गई। बड़ी प्यारी-सी सूरत थी उसकी। ... सीरत भी ! एक-दो कुलांचे उसने भरी, तो हम उसके आकर्षण के बंधन में बंध गए। उसके कुछ करतबों के एवज़ में हमने ‘अलुहे’ का एक टुकड़ा उसे खिलाया। शायद उसे पसंद आया। उसने कई और करतब दिखाए। सबसे ज़्यादा मज़ा आया जब मेरे पैरों पर गिर-गिर कर वह लोट-पोट करने लगा। हम उसे अलुहा खिलाते गए, - वह हमारा होता गया।
उस दिन से ही अपनी प्यारी सूरत और मृदु व्यवहार के कारण वह हमारे घर का सदस्य बन गया। हमारे बालमन का उत्साह चरम पर था। उसके रहने की जगह निर्धारित की गई। उस जगह को ईंट से घेरा गया। नीचे चट्टी बिछाई गई। और जाड़े की ठंड से उसे बचाने के लिए बोरे का इंतज़ाम किया गया। जब बारी उसके नामकरण की आई तो ‘मोती’ से उपयुक्त कोई नाम हमें नहीं सूझा। इस तरह हम उससे निश्चिंत हुए।
निश्चिंत क्या हुए? पढ़ाई-लिखाई छोड़ हर तीसरे-चौथे मिनट हम उसे झांक आते। सोने के बीच उठ-उठ कर उसके दर्शन करते। किसी तरह रात बीती। सुबह उठा तो पाया कि घर में उस पिल्ले ने यत्र-तत्र मलमूत्र का त्याग करना शुरू कर दिया था। सफाई पसंद मां का सख़्त फरमान ज़ारी हुआ कि उसके द्वारा अपवित्र कर दी गई जगहों की सफाई मुझे करनी होगी। इस फरमान को मुझे अपने सिर माथे पर उठाना पड़ा। इस फरमान के कारण मेरे दैनिक कार्यों में इस एक काम का इज़ाफ़ा हुआ।
इस नए काम को अपनी प्रसन्नता का अंश बनाकर मैं निर्वाह किए जा रहा था। प्यारा-सा वह जीव हमारे दिन-रात का हिस्सा बना हुआ था। लेकिन एक नई मुसीबत सामने आई। रोटी-दूध आदि दिए जाने पर वह उन्हें हाथ लगाता ही नहीं था। उसके उदरपूर्ति की समस्या ने हमें चिन्तित कर दिया। समय से भोजन न पाने के कारण उसकी गतिविधियां कम हो गई थी। हम सब उसका समाधान ढूंढ़ने में व्यस्त हो गए। तभी मुझे कल का वाकया याद आया। वह तो अलुहे का दीवाना बन चुका था। हमने उसे फिर से अलुहा परोसा और वह उस पर टूट पड़ा। इसके साथ हमारे सामने यह चुनौती तो थी ही कि इसे इसके भोजन के स्वाद का परिवर्तन भी करवाना होगा।
एक दिन अपने स्कूल से जब सायं काल लौटा तो देखा कि घर का वातावरण गंभीर-सा है। घर का कोई सदस्य मुझसे बात नहीं कर रहा है। मैं सबसे पहले मोती के आश्रय स्थल पर पहुंचा। वह वहां नहीं था। घर-आंगन छान मारा, वह कहीं नहीं दिखा। घर के लोगों के द्वारा सूचना मिली कि वह भाग गया है। मुझे इस पर तनिक भी विश्वास नहीं हुआ। मेरे ज़ोर देने पर लोगों ने बताया कि दिन में घर में मछली बनी थी। जूठन जहां फेंका जाता था वहां पर मोती गया। फेंके गए जूठन में मछली के अंश भी थे। उसका स्वाद उसे भा गया। वह उसे ग्रहण करने लगा। थोड़ा-सा खाने के बाद वह ‘कूं-कूं’ करते इधर-उधर दौड़ने लगा। शायद मछली का कोई कांटा उसके गले में फंस गया था। उसने खून की उल्टी की और बेचारा दूसरी दुनिया के लिए कूच कर गया।
घर के वातावरण से उदासी के आवरण को छंटने में काफी समय लगा। घर के हरेक सदस्य ने यह प्रण किया कि अब इस प्राणी से उतना स्नेह नहीं किया जाएगा। लेकिन ‘होनी’ को कुछ और ही मंज़ूर था। ... फ़र्स्ट नाइट की ड्यूटी (सायं 4 से मध्यरात्रि 12) से घर लौटते वक़्त आधे रास्ते से ही एक श्वान पिताजी की साइकिल के पीछे-पीछे साथ हो लिया। घर तक उसने उनका साथ नहीं छोड़ा। जब पिताजी साइकिल के साथ घर के अन्दर प्रवेश कर रहे थे, तो वह ओसारे के किनारे बैठ गया। पिताजी ने उसे भगाना उचित नहीं समझा होगा। ख़ुद के लिए निकाले गए भोजन में से एक रोटी उसे दी, तो वह उस पर ऐसे टूटा मानों कई दिनों से भूखा हो। अपने हिस्से की रोटियों में से आधे से ज़्यादा उस श्वान को खिला बाक़ी ख़ुद खा सोने चले गए। सुबह उठे, तो देखा वह अतिथि श्वान हमारे गार्डेन में चहलकदमी कर रहा है। बिना किसी फूल-पत्तियों को नुकसान किए उस प्राणी का हमारी बगिया में स्वतंत्र भाव से विचरण करते देख हमें उसके प्रति आकर्षण हुआ। सुबह के नाश्ते में बनी रोटी के एक भाग पर मानों उसका भी अधिकार हो। मां के हाथों परोसी गई रोटियां खाकर व तृप्त हो कुछ देर के लिए वह गायब हो गया। दोपहर के भोजन के वक़्त वह फिर हाज़िर था।
इस प्रकार अनायास ही वह हमारे घर का सदस्य बन गया। नामकरण उसका भी मोती ही हुआ। हम उसके साथ खेलते, वह हमारे साथ। रात्रि के समय घर की पहरेदारी करता। अनजान आने-जाने वाले पर भौंकता भी। वह हमारे घर से प्राप्त आहार को छोड़कर कहीं से कुछ भी दिए गए पदार्थ को स्पर्श नहीं करता। उसके कई इसी तरह के व्यवहार उसे गली के अन्य कुत्तों से अलग करते। परिवार के सभी सदस्यों से घुल मिल जाने के बावज़ूद उसने ओसारे की लक्ष्मण रेखा लांघने की कोशिश तक नहीं की। भूख की व्याकुलता में भी वह अपने लिए निर्धारित मिट्टी के पात्र में भोजन परोसे जाने की प्रतिक्षा करता।
कुछ ही दिनों में वह हमारे दिल के क़रीब हो गया था। पिताजी की जब लास्ट नाइट ड्यूटी (मध्यरात्रि 12 से सुबह 8) होती तो वह उन्हें रेलवे कॉलोनी के बाहर तक छोड़ आता – खासकर उस इलाक़े के बाद तक जहां श्मशान होता था। फ़र्स्ट नाइट की ड्यूटी में उन्हें उस सीमारेखा से रिसीव कर घर तक लाता। उस दिन पिताजी की फ़र्स्ट नाइट की ड्यूटी थी। वे साढ़े बारह तक घर पहुंचे थे। खा-पीकर सोने की तैयारी कर रहे थे कि एक सज्जन दरवाज़े के पास प्रकट हुए। मोती के भौंकने की आवाज़ थम नहीं रही थी। उन सज्जन ने पिताजी से शिकायत की कि आपने कैसा कुत्ता पाल रखा है? मेरे ऊपर भौंके ही जा रहा है। कुछ काम की थकान कुछ नींद की वजह से पिताजी पहले ही परेशान थे। उसपर से बेवजह इस आई शिकायत से वे कुछ खिन्न हुए। मोती को चुप रहने का आदेश दिया। पर घर का वह रखवाला उस दिन किसी की सुनने के मूड में नहीं था। उसके लगातार भौंकने के दुस्साहस ने नींद से बोझिल पिताजी के मन को क्रोधित किया। पिताजी ने गुस्से में आकर मोती पर छड़ी से वार किया और उसे भाग जाने को कहा। मोती वहां से चला गया। वे सज्जन अपने क्रोधयुक्त स्वरों को और तेज़ करते अपनी नसीहतों का पिटारा देते हुए चले गए। पिताजी भी सोने चले गए।
सुबह पिताजी जब सैर करने निकले तो लगभग पांच का समय था। रेलवे लाइन के किनारे सड़क थी। उसी पर वे सुबह की सैर करते थे। थोड़ी दूर पर कुछ लोगों की भीड़ थी। निकट पहुंचने पर उन्होंने अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए पूछा, “क्या बात है?” किसी ने बताया – .. आपका मोती ... ।
पिताजी ने निकट जाकर देखा ... मोती का धड़ पटरी के इस पार और सिर उस पार था।
हम समझ नहीं पाए कि वह दुर्घटना थी या आत्महत्या! लेकिन उसके इस बलिदान को हम आज तक भूल नहीं पाए हैं। उनकी वफ़ादारी तो जगज़ाहिर है, पर कुत्ते में इतनी संवेदनशीलता हो सकती है यह हमें अचंभित किए दे रही थी।
शनिवार, 22 नवंबर 2014
फ़ुरसत में ... 121 निराशा ही निराशा
फ़ुरसत में ... 121
निराशा ही निराशा
मनोज कुमार
कभी-कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है कि मैं निराशावादी होता जा रहा हूं। मुझे पता है कि निराशा बड़ी ख़तरनाक़ चीज़ है। फिर भी, मैं समाज, देश, परिवार के लिए कतई ख़तरनाक़ नहीं हूं। यह बात मुझे संतोष प्रदान करती है। जो आशावादी होते हैं, वे भी तो कभी-कभार ख़तरनाक़ मंसूबे पाल लेते हैं। दरसल उनकी महात्वाकांक्षा विशाल होती है। नेपोलियन, हिटलर, मुसोलिनी आदि भी तो, आशावादी रहे होंगे। उनकी महात्वाकांक्षा ने क्या गुल खिलाया, यह किसी से छिपा है क्या? हां, मेरी निराशा, राष्ट्रीय या मानवीय मूल्यों में कुछ योगदान करने से मुझे वंचित किए दे रही है। जो भी हो मेरी विचारधारा तो ख़तरनाक़ होने से रही। ख़तरनाक़ होने के लिए साहसी होना ज़रूरी है और मेरी निराशा मुझे कुछ करने का साहस ही नहीं प्रदान करती।
यह कोई आज का रोग नहीं है। इसके लक्षण तो शायद शैशवकाल से ही मुझमें रहे होंगे। प्राथमिक कक्षाओं में किसी असाधारण क्षमता रहित मेरा प्रदर्शन घर-समाज के लोगों को यह चिंता करने पर विवश किया करता था कि ‘यह लड़का कैसा होता जा रहा है? हमारे ज़माने में तो ऐसा नहीं था।’ न जाने क्यूँ मैं किसी भी विषय पर अपना स्पष्ट मत नहीं रख पाता जो प्राय: मेरी कमज़ोरी मान ली जाती थी। दूसरी ओर जो बहस करता, वह उसकी विशेषता होती थी। मैं पिता, माता, गुरु, श्रेष्ठ की बातों को मानने में, जिसे लोग आमतौर पर हां-में-हां मिलाने की संज्ञा देते, विश्वास रखता था। समय के साथ यह मेरे व्यक्तित्व का निगेटिव फीचर बन गया। ... और आलोचक की निगाहों में मैं दब्बू! मेरा यही दब्बूपना मेरी निराशा का कारण बनता गया।
जो बहस करता, किसी की बात नहीं मानता, अपनी मनवाता, - वह एक्स्ट्रोवर्ट कहलाता और समाज में उसकी पूछ होती। मैं तो किसी बात पर प्रतिवाद करता ही नहीं। मुझे हर पल यही लगता कि मेरी जानकारी ही क्या है, जो मैं इस विषय पर कुछ बोलूं? मैं अख़बार पढ़ता नहीं था, घर में आता ही नहीं था। रेडियो सुनता था, पर फ़िल्मी गीत भर। विविध भारती का पंचरंगी प्रोग्राम मेरा फेवरिट था। अब उससे मेरा सामान्य ज्ञान तो बढ़ने से रहा। विशेष जयमाला फ़ौजी भाइयों के लिए होता था। उसे सुनते हुए हमेशा यह बोध होता कि देश की रक्षा के लिए सब कुछ त्याग देना ही सर्वोत्कृष्ट है। आज के छोटे-छोटे बच्चों को देखता हूं – वे अखबार पढ़ते हैं (अंग्रेज़ी के) टीवी देखते हैं – इंगलिश चैनल भी, रेडियो तो सुनते ही नहीं हैं, वह आउट ऑफ फैशन है, सुनते भी हों तो रेडियो मिर्ची। वीडियो गेम्स खेलते हैं, मोबाइल पर न जाने क्या-क्या करते रहते हैं, नेट और लैपटॉप उनकी आवश्यक आवश्यकताओं में शुमार हैं। यह सब देख कर मुझे लगता है कि मैंने अपना बचपन तो ढंग से जिया ही नहीं। मिट्टी में कबड्डी खेलना, डोलपात, गुल्ली-डंडा खेलना, .. यह जीना भी कोई जीना था लल्लू!! इन सब को याद करते ही मेरी निराशा और बढ़ जाती है। आज के बच्चे कौन बेटर पीएम होगा, जो ओबामा को सटीक (मुंह तोड़) जवाब देगा – पर बहस कर लेते हैं। मैंने तो मुखिया और सरपंच पर भी अपना मत कभी नहीं रखा। कितनी निराशाजनक स्थिति रही है मेरी।
घर का वातावरण भी वैसा ही था कि मेरी निराशा की लताएं पुष्पित-पल्लवित होती रहें। खेलने तक पर पाबंदी थी। ‘पढ़ो नहीं तो जीवन भर खेलते रह जाओगे’ का मंत्र हर वक़्त पढ़ाया जाता। यह बताया जाता कि चरित्र-निर्माण हमारी सबसे बड़ी पूंजी है। इन सब मंत्रों के चक्कर में हमने उसे ही अपना जीवन-लक्ष्य बना लिया। हालाँकि पढ़-लिखकर भी बस और बस पैसा कमाना कभी उद्देश्य ही नहीं रहा। आज के बच्चों का लक्ष्य बहुत स्पष्ट है – ऊंचा वेतन, ऐश-ओ-आराम का सामान, रुतबा, स्टेटस ... न जाने क्या-क्या! सूचना और जानकारी के इतने माध्यम उनकी मुट्ठी में हैं कि वे हर क़दम पर हमसे दो क़दम आगे हैं। आदर्श, सिद्धांत, नैतिकता गए ज़माने की बात हो गई है जबकि उनसे चिपक कर घोर निराशा में डूब गया हूं मैं।
निराशा के कारण अंधकार और असुरक्षा की भावना मुझमें कूट-कूट कर भर गई है। कई बार तो देखता हूं, जितना मैं कमाते हुए ख़र्च करता हूं, उससे ज़्यादा यह पीढ़ी बेरोज़गारी में फूँक देती है। वे क्रांति की, परिवर्तन की और अधुनिकीकरण की पहल ही नहीं करते, उसमें विश्वास भी रखते हैं। यह देख मुझे आजकल सिद्धांतों की व्यर्थता दिखने लगी है। स्वच्छ प्रशासन मांगने से मुझे डर लगता है। आजकल मैं आदर्शवादी के साथ-साथ त्यागवादी भी बन गया हूं। पर, आजतक मैं निराशा का त्याग नहीं कर पाया हूं।
मेरी निराशाओं ने मुझमें ढेर सारी कुंठाएं भर दी हैं। .. और इन कुंठाओं के सहारे मैं अपना जीवन जी रहा हूं। कुंठा सहित जीवन जीना भी एक कला है। लगता है इस कला में मैं पारंगत हो गया हूं। देश की महंगाई बढ़ती है – मैं निराश हो जाता हूं। अब कुछ नहीं होगा। हालात सुधर ही नहीं सकते। स्वच्छता अभियान से कुछ नहीं होगा। सब दिखावा है। गंदगी यूं ही फलती-फूलती रहेगी, बिखरी पड़ी रहेगी। मैं हाथ-पे-हाथ धरे बैठे हुए अपनी निराशा में जीता रहता हूं।
मॉल कल्चर के युग में भी मैं बीते युग को जी रहा हूं। इस कल्चर का अपना एक अलग आकर्षण है वहीं गांव की संस्कृति की भी अलग महँक है। संक्रमण का एक काल है यह। मैं बदलती परिस्थिति को सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पा रहा। त्याग तो कई किए पर इस निराशा का त्याग नहीं कर पा रहा। यह उस पूरी पीढ़ी की निराशा है या सिर्फ़ मेरी, कह नहीं सकता। कहने सुनने को बचा भी क्या है? आजकल तो बस मुकेश का यह गीत मैं अकसर गुनगुनाता रहता हूं,
तुम्हें ज़िन्दगी के उजाले मुबारक़
अंधेरे हमें आज रास आ गये हैं।
नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी में फ़र्क़ तो है। पर इस फ़र्क़ का किसी को कोई मलाल नहीं। हमारी ज़िन्दगी तो सिर्फ़ पछताने में बीत गई। उस पछतावे से उपजी निराशा को सीने से लगाए मैं यह शे’र दुहराता रहता हूं,
अब ये भी नहीं ठीक के हर दर्द मिटा दें,
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं।
शनिवार, 27 सितंबर 2014
फ़ुरसत में - शब्द
फ़ुरसत में – 120
निर्मित्तं किंचिदाश्रित्य खलु शब्दः प्रवर्तते।
यतो वाचो निवर्तन्ते निमित्तानामभावतः॥
निर्विशेषे परानन्दे कथं शब्दः प्रवर्तते।
(कठरुद्रोपनिषद्)
- अर्थात् शब्द की प्रवृत्ति किसी निमित्त को लेकर होती है। परम तत्त्व में निमित्त का अभाव होने से वाणी वहां से लौट आती है। जो निर्विशेष, परम आनन्दस्वरूप ब्रह्म है, वहां शब्द की प्रवृत्ति कैसे हो?
- कहते हैं इस सृष्टि की रचना शब्द से हुई। कोई ब्रह्मनाद इस ब्रह्मांड में गूंजा, फिर उसने रूप धरना शुरु किया।
- शब्दों में बड़ी शक्ति होती है। शब्द बहुत गहरा प्रभाव उत्पन्न करते हैं। जहां एक ओर एकाग्र-चिन्तन वांछित फल देता है, वही दूसरी ओर शब्द पाकर दिमाग उडने लगता है । इसलिए हम जब भी कुछ कहें, यह समझ कर कहें कि वे हमारे बोले गए शब्द क्या प्रभाव पैदा करेंगे। प्रेम से बोला गया एक शब्द भी अनेक दु:खी आत्माओं को शान्ति प्रदान कर सकता है।
- शब्द विचारों के वाहक हैं। ये हमारे व्यक्तित्व और विचार दोनों बनाते हैं। हमारे बाहर ही नहीं, हमारे भीतर भी शब्द गूंजते हैं। हमारे भीतर क्या गूंज रहा है, हमारा व्यक्तित्व इसी पर निर्भर करता है।
- महात्मा गांधी ने कहा था, “शब्दों में चमत्कार भरा होता है। शब्द भावना को देह देता है और भावना शब्द के सहारे साकार बनती है।”
- हमें याद रखना चाहिए, अच्छे कर्मों से शरीर संवरता है और अच्छे विचारों से मन। अप्रिय शब्द पशुओं को भी नहीं सुहाते हैं, जबकि नरम शब्दों से सख्त दिलों को जीता जा सकता है। आखिर कोमल शब्द कठोर तर्क जो होते हैं (Soft words are hard arguments)।
- महर्षि पतंजलि ने महाभाष्य में कहा है, ‘एकः शब्दः सम्यग् ज्ञातः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुग् भवति।’ अर्थात् एक भी शब्द यदि सम्यक् रीति से ज्ञात हो तथा सुप्रयुक्त हो तो वह इस लोक में और स्वर्ग में मनोरथ पूर्ण करने वाला होता है।
- शब्द नामक ज्योति सारे संसार को प्रकाशित करती है। गुरुनानक देव जी ने कहा है,
शब्दे धरती, शब्द आकास,
शब्द-शब्द भया परगास।
सगली सृस्ट शब्द के पाछे,
नानक शब्द घटे घट आछे।
- शब्द ने पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा सारी दुनिया पैदा की है। यही शब्द सबके भीतर अपनी धुनकारें दे रहा है। गोरखनाथ ने कहा है,
सबदहिं ताला सबदहिं कूंचि, सबदहिं सबद जगाया।
सबदहिं सबद परचा हूआ, सबदहिं सबद समाया॥
- सारे साधु-संतों ने आध्यात्म को समझने के लिए अपने-अपने शब्द दिए हैं। गुरु नानक देव जी ने कहा है, ‘सबदु बीचारि भउसागरु तरै’ – शब्द को विचारने से भवसागर को पार किया जा सकता है।
- जो जबान से निकलता है सिर्फ़ वही शब्द नहीं हैं। यह तो एहसास का मामला है। रज्जब ने कहा है,
वेद सूं बाणी कूप जल दुख सूं प्रापत्ति होई।
सबद साखि सरवर सलिल सुख पीबै सब कोई॥
- हम हमारे शरीर के भीतर भी शब्द की अनुभूति करते हैं। जब हम ध्यान करते हैं तो मंत्र (शब्द) गूंज बनकर नाद उत्पन्न करते हैं। यही भीतरी अनुगूंज हमारे ध्यान में उतरती है।
- धरनीदास की बानी में कहा गया है,
सब्दु सकल घट ऊचरे, धरनी बहुत प्रकार।
जो जाने निज सब्द को, तासु सब्द टकसार॥
- जैसा शब्द हमारे भीतर गूंजता है, हम वैसे ही हो जाते हैं। जिसे परमात्मा की तलाश होती है उसके मन में परमात्मा के शब्द गूंजते हैं। जिसे भौतिक और दैहिक सुख की तलाश रहती है उसके मन में भौतिक इच्छाओं की गूंज रहती है।
- आपके मुख से उच्चारित सभी शब्दों में से कितने शब्द परमात्मा के प्रति होते हैं? परमात्मा को पाने के लिए हम जब व्याकुल होते हैं और उस व्याकुलता में, उस छटपटाहट में जो शब्द उच्चरित होते हैं, वे नाम जप बन जाते हैं। इसकी पुनरावृत्ति से, निरंतरता से, साधना से एक दिन परमात्मा उपलब्ध हो जाते हैं।
- जैनेन्द्र जी की मानें तो, “शब्द बड़ी साधना से उठ पाते हैं; उन्हें गिराने की चेष्टा नहीं होनी चाहिए”।
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शनिवार, 19 जुलाई 2014
फ़ुरसत में ... फ़ुरसत से ...!
फ़ुरसत में ... 118
फ़ुरसत से ...!
महत्वपूर्ण यह नहीं कि ज़िन्दगी में आप कितने ख़ुश हैं, बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि आपकी वजह से कितने लोग ख़ुश हैं। वास्तव में कुछ लोगों की कुछ खास बातें, उनकी कुछ खास अदाएं, उनके कुछ खास अंदाज हमें भरपूर खुशी देते हैं, वहीं कुछ लोगों के हाव-भाव, आदत-अंदाज हमें चिढ़-कुढ़न और घुटन दे जाते हैं। कुछ ऐसे भी अन्दाज़ होते हैं लोगों के जिससे हँसी आती है, गुस्सा आता है और कभी-कभी खीझ भी पैदा होती है। इन तमाम मिले-जुले भावों को एक साथ पैदा करने के पीछे उनके तकियाकलाम का अन्दाज़ छिपा होता है।
अब देखिये न, एक महानगरीय मित्र से बातचीत में अभी मैंने बस इतना ही कहा था कि “फ़ुरसत में जब होते हैं तो, कभी-कभी... और हमेशा भी, अपनी माटी ‘कस’ कर याद आती है।” तो छूटते ही उनके मुंह से निकला, “ओह शिट! मुझे भी अपना नैटिव प्लेस विजिट किए हुए कितने दिन हो गए!” ऐसा लगा मानो उन्होंने अपने “नेटिव प्लेस” से अपनी मुहब्बत को उस एक तकियाकलाम “ओह शिट” में समेट दिया हो।
ये तकियाकलाम भी ग़जब की चीज़ है। बिना इस तकिया की टेक लिये सामने वाला अपना कोई भी कलाम मुकम्मल नहीं कर सकता। सच पूछिये तो यह फ़ुरसत से फ़ुरसतियाने और बैठकर विचारने वाली चीज़ है ही नहीं। यह तो बरबस ही निकलता है, ... निकलता रहता है। इसका मुख्य संवाद के विषय से कोई संबंध नहीं होता। आम लोग ‘माने’, ‘मतलब’, ‘आंए’, ‘हें’, ‘हूं’, आदि बोलते पाए जाते हैं, तो खास लोग ‘ओके’, ‘आई मीन’, ‘यू नो’, ‘एक्चुअली’ आदि। हमारे एक प्रोफ़ेसर थे, वे तो ‘एक्चुअली’ में ‘श’ लगाकर उसे लंबा खींचते थे ... ‘एक्चुअलिश्श्श्श्श्श’! उनकी इस विशेषता ने उन्हें एक उपनाम ही दे दिया था। जब कोई पूछता कि अभी किसकी क्लास है, तो उत्तर होता, ‘एक्चुअलिश्श्श्श्श्श की’।
बड़े प्यारे-प्यारे तकियाकलाम होते हैं। तकियाकलामों में भी रिजनल वैरिएशन होता है। अपनी ‘माटी’ से हमने बात शुरू की थी – तो चलिए वहीं की बात लाऊं। रेलवे कॉलोनी में जब हम रहते थे, तो हमारे पड़ोसी थे ओझा जी। उनको ‘जो है सो कि’ बोलने की आदत थी। ‘हम पटना पहुंचे, तो जो है सो कि वहां बहुते ठंढ़ा लगा’। दूर कहाँ जाएँ, हमारे घर में मौजूद हमारी उत्तमार्ध का तो अंदाज और भी निराला है। उनकी कही गई बातों के रिक्त स्थानों की पूर्ति हमें ‘अथी’ में ढूँढकर करनी होती है। एक बानगी -
“ज़रा-सा अथी देना ..!”
‘? ? ?’
“अथी कहां रख दिए?”
‘? ? ?’
हमारी सीतापुर वाली चाची की हर बात में ‘बुझे कि नहीं’ टाँका रहता है। “आज हमारे साथ तो गजबे हो गया ... बुझे कि नहीं...” कुछ तकियाकलाम के साथ ऐक्शन भी जुड़ा होता है। ख़ासकर बातों को रहस्यमय बनाने और आपसे अपनापन दिखाने के लिये इसका प्रयोग होता है “का कहें सर्र ...! असल बात तो ई है कि.. ” और कहते हुये अपने स्वर को फुसफुसाहट में तब्दील करना किंतु तीव्रता इतनी कि हर अगल-बगल वाले को बात सुनाई दे जाए और अन्दाज़ ऐसा कि बस जैसे वो घोड़े के मुँह से (फ्रॉम हॉर्सेस माउथ) सुनकर आ रहे हैं।
कुछ तकियाकलाम तो सायास निकाले जाते हैं। प्रायः इसके प्रयोग से वे स्वयं अथवा अपने पूर्वजों को ग्लोरिफ़ाई करते हैं (भले ही उनके अतीत में कोई क्राउनिंग ग्लोरी न रही हो) जैसे मैनेजर की आदत है कि वह हर सूक्ति के साथ कहेगा, “मेरे पिताजी कहा करते थे ...”, भले ही वह बात उनके पिताजी ने नहीं, गोस्वामी तुलसीदास जी ने कही हो। वैसे भी आपके पास उसे वेरिफाई करने के लिए कोई उपाय नहीं है। इस तरह के लोगों के प्रयास से आज कबीरदास के दोहों में इतने दोहे जुड़ गए हैं कि स्वयं कबीरदास भी आज अगर हमारे बीच होते तो आश्चर्य करते कि उन्होंने इतने सारे दोहे रच डाले थे!
बिना रफ़ू के गप करने वाले कुछ लोग अपने सायास तकियाकलामों से हमें अकसर ‘झेला’ देने को तैयार बैठे होते हैं। मेरे पिता जी के एक अनन्य मित्र की बात, “तुम लोग क्या पढ़ोगे, हम लोग तो मात्र दो घंटा सोते थे, बाक़ी समय पढ़ते रहते थे।” ने इतना पकाया कि इच्छा होने लगी पढ़ना ही छोड़ दें। ज़िन्दगी में सिर्फ़ एक बार विदेश यात्रा किए, वह भी काठमांडू का, रतन जी बात-बात में आपको जता ही देंगे कि उन्होंने विदेश यात्रा की है। “जब हम काठमांडू गए थे तो वहां एक बात नोट की ..” , जैसे भारत में नोट करने लायक कोई बात उन्हें मिली ही नहीं। ऐसे लोग अपने विदेश यात्रा या किसी खास पोजिशन के ग्लोरिफिकेशन के कारण न सिर्फ़ इरिटेशन बल्कि ऊब पैदा करते हैं। ऐसे लोग स्वयम का विज्ञापन करने के चक्कर में ख़ुद को हास्यास्पद बना लेते हैं। नतीजा यह होता है कि वे हमारी नज़रों में या हमारे दिल में जो सम्मान रखते थे, ख़ुद से, ख़ुद की हरकतों से ध्वस्त करा देते हैं। जहां एक ओर ‘आंए’, ‘बांए’, ‘शांए’ जैसे अनायास निकलने वाले तकियाकलाम प्रायः लोग अपनी कमियों को छुपाने के लिए आदतन इस्तेमाल करते हैं, वहीं सायास तकियाकलाम अपनी हैसियत को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने के लिए।
आईए आज विदा लेने से पहले आपको एक अनायास निकलने वाले तकियाकलाम और सायास निकाले जानेवाले तकियाकलाम की जुगलबंदी से आपको रू-ब-रू कराता चलूं। पटना के दिनों की एक बात का ज़िक्र करता चलूं। एक लॉज में हम पांच मित्र साथ रहते थे। मिलकर खाना-वाना बनाते और प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करते। हरि भाई की हर सेंटेन्स में एक बार ‘आंए’ बोलने की आदत थी। “हमारा तो केमिस्ट्री का प्रिपरेशन पूरा हो गया .. आंए।” उनके इस ‘आंए-आंए’ से सबको चिढ़ होती थी। एक दिन सबने विचार किया कि इसको छुड़वाया जाए। सुबह से ही, जो उनसे बात करता, अपने वाक्य में ‘आंए’ का प्रयोग ज़रूर करता।
“.. और हरि भाई कहां से आ रहे हैं आंए?”
“रात को खूब सोए .. आंए” ...
“नाश्ता कर लिए .. आंए”
कुछ देर तक तो हरि भाई ने हमारी हंसी को मज़ाक़ ही समझा और हमारी बातों का हंस-हंस कर जवाब देते रहे। फिर जब यह सिलसिला घंटा भर से भी अधिक चला तो वे बेचारे सीरियस होने लगे। कभी झल्ला कर तो कभी उकताकर जवाब देते। दो घंटे जब इसी तरह बीत गए और “आँए” का सिलसिला नहीं थमा, तो वे गुस्साने भी लगे। लेकिन इधर हम चार थे वे एक, सो तीसरे घंटे से उन्होंने चुप रहना ही उचित समझा। उनकी ख़ामोशी ने हम पर भी असर किया। और चिढ़ाने वालों की संख्या घटती गई। फिर धीरे-धीरे सब अन्य काम में लग गए बिल्कुल सामान्य ढंग से। एकाएक ग़ौर किया तो पाया कि हरि भाई कमरे से गायब हैं। इधर-उधर ढ़ूंढ़ा लेकिन उन्हें खोज नहीं पाए। शाम हो चुकी थी। अंधेरा घिरने लगा था। मोड़ पर कुछ सामान लेने गया तो मेरी नज़र चाय की दुकान के सामने की बेंच पर पड़ी। देखा हरि भाई बड़े दुखी अवस्था में बैठे थे। उनसे पूछा “आप यहां क्यों बैठे हैं? हम सब आपको चारो तरफ़ खोज रहे थे।”
हरि भाई बोले “तुमने, .... सबने मेरा मजाक बनाकर रख दिया है, आँए। इतना परेशान किया तुम लोगों ने कि मन किया गंगा में कूद कर जान दे दूं, आँए।” मामला इतना संगीन हो चुका था कि उस समय उनकी “आँए” सुनकर न तो हँसी आ रही थी, न खीझ हो रही थी।
बात यहां तक बढ़ जाएगी यह तो कल्पना से भी परे थी। हमने किसी तरह से समझा-बुझाकर हरि भाई को वापस बुलाया। सबसे यह बात बताई। जो माहौल बन चुका था उसमें हरि भाई को समझाना भी मुश्किल था कि ‘यह तो हम सब आपके भले के लिए कर रहे थे ताकि आप इस अनावश्यक दुहराए जाने वाले शब्द से मुक्ति पाएं, यह आपके व्यक्तित्व के विकास में बाधक है।’ या शायद हमारा समझाने की तरीक़ा सही नहीं था।
अगले दिन शाम को जब मैं कोचिंग से लौटा तो देखा कि उस चौकी से, जिस पर हरि भाई अपना डेरा-डंडा डाले रहते थे, चादर-तकिया सब चीज़ नदारद है। हमने पूछा, “हरि भाई कहां हैं?”
शंकर ने बताया, “हरि भाई लॉज छोड़कर चले गए।” यह तो ‘रक्षा में हत्या’ हो गई। हम तो हरि भाई के मुंह से अनायास निकलने वाले तकियाकलाम को छुड़ाने के लिए सायास प्रयास कर रहे थे, लेकिन हरि भाई तो मैदान से ही कूच कर गए। मैंने एक लम्बी-सी सांस ली।
आज महसूस हुआ कि किसी के साथ दोस्ती का महत्व इसमें नहीं है कि कोई उसके साथ होने से कितनी खुशी महसूस करता है बल्कि उसमें है कि उसके नहीं रहने से कितना ख़ालीपन महसूस करता है। मैं उस दिन बहुत ख़ालीपन महसूस कर रहा था।
*** बस ***
शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014
फ़ुरसत में … प्रेम-प्रदर्शन
प्रेम-प्रदर्शन
शनिवार, 1 फ़रवरी 2014
फ़ुरसत में ... 117 : अकेलापन
फ़ुरसत में ... 117
अकेलापन
मनोज कुमार
कभी-कभी हम ज़िन्दगी के ऐसे दोराहे पर खड़े होते हैं, जहां एक ओर हमें सामाजिक मर्यादाओं का ख़्याल रखना पड़ता है तो दूसरी तरफ़ अपने कर्तव्यों को भी अंजाम देना पड़ता है। ऐसे में हमारे दिल और दिमाग़ की रस्शाकशी चल रहा होता है और उस रस्साकशी में हमारा ख़ुद का दम घुट रहा होता है। ऐसे में अपने विवेक का सहारा लेकर किसी निष्कर्ष तक पहुंचना एक तनी रस्सी पर चलने के समान होता है, जिसके एक तरफ़ खाई होती है तो दूसरी तरह कुंआ और हम होते हैं तन्हा। ऐसे तन्हा यानी अकेले लोगों के लिए जहां एक तरफ़ हिंदी की लोकोक्ति होती है, “अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता” वहीं दूसरी तरफ़ गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर का संदेश होता है, -
जोदि तोर डाक शुने केउ ना आसे
तबे एकला चलो रे,
एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे।
इन दो विचारधाराओं के बीच, गहराती रात को नींद नहीं आ रही होती है, तब बिस्तर से उठ बारामदे में टहलते हुए सामने के वृक्ष की शाखाओं के ऊपर नज़र जाती है। देखता हूं एक चिड़ियां दुबकी पड़ी है। उसका अकेलापन मुझे आकर्षित करता है। उसे इस तरह अकेले देख मेरे मन में ख़लील ज़िब्रान की पंक्तियां कौंधती हैं –
“हे रात्रि! तू प्रेमियों की सखी, एकान्तवासियों की सुखदात्री और असहायों का आतिथ्य करने वाली है।”
इस चिड़ियां में अंतिम (आतिथ्य) वाला गुण तो मुझे नहीं लगा, हां पहले दो कारण हो सकते हैं। साथी से बिछुड़ा यह पाखी है या ठुकरा दिया गया, कहना मुश्किल है। हम अपने आसपास भी पाते हैं कि कई बार आपस में तकरार बढ़ जाने पर कुछ लोग अपने जीवन साथी से अलग रहने लगते हैं। इसी लिए कहा गया है – “व्यर्थ बोलने की अपेक्षा मौन रहना ज़्यादा अच्छा है”। कई लोगों को रूठने की आदत-सी होती है। ऐसे लोग रूठते हैं और अलग रहने लगते हैं ... और मन को भरमाने के लिए कहते हैं – मैं अकेलापन एन्ज्वाय कर रहा हूं। अरे! यह रूठना भी कोई रूठना है लल्लू!
रूठने का लुत्फ़ यह है, रूठिए, मान जाइए
रूठते हैं आप, लेकिन रूठना आता नहीं।
हमारे एक रिश्तेदार दम्पत्ति एक-दूसरे से रूठे और पिछले दो सालों से अलग रह हैं। कौन पहल करे की फांस लग गई है दोनों में। ऐसे लोगों के लिए राजस्थान की यह कहावत काफ़ी मायने रखती है – “मित्र इतना ही मान करो जितना आटे में नमक होता है। बार-बार रूठने पर आख़िर तुझे मनाता कौन रहेगा?”
आज वे बेचारे बहुत अकेलापन महसूस कर रहे हैं। किसी के साथ रिश्ते का महत्व यह नहीं है कि कोई उसके साथ होने से कितनी खुशी महसूस करता है बल्कि उसके नहीं रहने से कितना ख़ालीपन महसूस करता है, कितना अकेलापन महसूस करता है। मैंने पूछा ऐसी नौबत क्यों आई? बोले “वो बात-बात में मेरी ग़लती निकालती रहती है।” मैंने कहा “तो क्या हुआ? एक बात जान लो - इस संसार में ग़लतियां तो हर कोई करता है, पर सिर्फ़ बीवी और बॉस को हक़ है कि वे उन्हें ढूंढ़ निकालें, याद रखें और समय-समय पर उसके बारे में बताते रहें।”
इस तरह के अकेलेपन का मुख्य कारण वाद से उत्पन्न विवाद है। इस लिए कहा गया है कि कम ही बोलो। वैसे भी “न्यून वाणी मूर्खों की समझ में नहीं आती और अधिक बोलना विद्वानों को उद्विग्न करता है।” इसलिए कोशिश यही हो कि प्रिय वचन बोला जाए। “प्रिय वचन बोलने से सब प्राणी संतुष्ट हो जाते हैं, अतः प्रिय ही बोलना चाहिए। वचन में क्या दरिद्रता।”
जाते-जाते शेख़ सादी की बात आपके सामने रखता जाऊं – “दो चीज़ें बुद्धि की लज्जा हैं – बोलने के समय चुप रहना और चुप रहने के समय बोलना।” आख़िर –
कुछ न कहना भी किसी के सामने
इक तरह का इन्किशाफ़े-राज़1 है। 1= रहस्य का उद्घाटन
अब मेरे पास कहने के लिए और कुछ नहीं है। इसलिए विराम देता हूं क्योंकि चार्ल्स कैलब काल्टन ने कहा है – “Whenyou have nothing to say, say nothing.’’
***
और अब एक कविता ...
--- --- मनोज कुमार
पाखी ! यहां न कोई तेरा !
तरु- तरु लिपट रहीं वल्लरियां,
भंवरों से चुम्बित मधु कलियां,
और अकेला खड़ा विजन में,
नित देखे तू सांझ – सवेरा ।
सरसिज पर क्रीड़ा मराल की,
लहरें चूमें तृषा डाल की।
तेरे भी कुछ सपने होंगे
चिर-स्नेही हो कोई मेरा।
पाखी ! यहां न कोई तेरा !
सबके साथी अपने-अपने,
देख रहे सब सौ-सौ सपने
तुमको मिला न कोई साथी,
करे यहां जो रैन बसेरा ...! ! ।
पाखी ! यहां न कोई तेरा !
*** ***
शनिवार, 4 जनवरी 2014
फ़ुरसत में … 116 : जरासंध वध
फ़ुरसत में … 116
जरासंध वध
पिछले दिनों हम राजगीर गए थे। कई जगहों के दर्शन हुए। राजगीर के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से एक है जरासंध का अखाड़ा है। इसे जरासंध की रणभूमि भी कहा जाता है। यह महाभारत काल में बनाई गई जगह है। यहां पर भीमसेन और जरासंघ के बीच कई दिनों तक मल्ल्युद्ध हुआ था। कभी इस रणभूमि की मिट्टी महीन और सफ़ेद रंग की थी। कुश्ती के शौकीन लोग यहां से भारी मात्रा में मिट्टी ले जाने लगे। अब यहां उस तरह की मिट्टी नहीं दिखती। पत्थरों पर दो समानान्तर रेखाओं के निशान स्पष्ट दिखाई देते हैं। इसके बारे में लोगों का कहना है कि वे भगवान श्री कृष्ण के रथ के पहियों के निशान हैं। इस जगह ने मुझे जरासंध के बारे में थोड़ा विस्तार से जानने के लिए प्रेरित किया। सोचा आज फ़ुरसत में आपसे शेयर कर ही लूं।
प्राचीन समय से बौद्ध, जैन, हिन्दू और मुस्लिम तीर्थ-स्थल राजगीर पांच पहाड़ियों, वैराभगिरी, विपुलाचल, रत्नगिरी, उदयगिरी और स्वर्णगिरी से घिरी एक हरी भरी घाटी में स्थित है। बिहार की राजधानी पटनासे लगभग 100 कि.मी. की दूरी पर स्थित इस नगरी में पत्थरों को काटकर बनाई गई अनेक गुफ़ाएं हैं जो प्राचीन काल के जड़वादी चार्वाक दार्शनिकों से लेकर अनेक दार्शनिकों की आवास स्थली रही हैं। प्राचीन काल में यह मगध साम्राज्य की राजधानी रही है। प्राचीन काल में इसे कई नामों से जाना जाता था। “रामायण” में इसका नाम “वसुमती” बताया गया है। इसका संबंध पौराणिक राजा वसु से है जो ब्रह्मा के पुत्र कहलाये जाते हैं।
रामायण के अनुसार ब्रह्मा के चौथे पुत्र वसु ने “गिरिव्रज” नगर की स्थापना की। बाद में कुरुक्षेत्र के युद्ध के पहले वृहद्रथ ने इस पर अपना क़ब्ज़ा जमा लिया। वृहद्रथ काफ़ी वीर और बली था। उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। काशिराज की जुड़वा बेटियों से उसका विवाह हुआ था। उसने अपनी दोनों पत्नियों को वचन दे रखा था कि वह दोनों में से किसी के साथ पक्षपात नहीं करेगा। यानी दोनों को बराबरी का दर्ज़ा देगा।
बृहद्ररथ को कोई संतान नहीं हुई। वृद्धावस्था आ चली थी। वह काफ़ी निराश हो चला था। सांसारिक जीवन में उसे कोई रुचि नहीं रह गई थी। उसने अपना राजपाट अपने मंत्रियों के हवाले कर दिया। अपनी पत्नियों के साथ वह वन में चला गया और एक आश्रम में रह कर तपस्या करने लगा। एक दिन उसके आश्रम में चण्डकौशिक मुनि पधारे। वे महर्षि गौतम के वंशज थे। उनका वृहद्रथ ने काफ़ी स्वागत-सत्कार किया। अपनी आवभगत से प्रसन्न होकर मुनि ने राजा को वर मांगने को कहा। राजा ने कहा, “मैं बहुत ही अभागा इंसान हूं। जब पुत्र ही नहीं हुआ तो और क्या आपसे मांगूं?”
यह सुन मुनि को राजा पर दया आई। उन्होंने राजा की समस्या के हल के लिए आम के एक वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान लगाया। थोड़ी देर में उनकी गोद में एक पका हुआ आम गिरा। मुनि ने उसे राजा को दिया और कहा कि इसे अपनी पत्नियों को खिला दे। दोनों पत्नियों में से किसी के प्रति पक्षपात न करने का वचन दे चुके राजा ने उसके दो टुकड़े कर दोनों रानियों को खिला दिया। रानियां गर्भवती हुईं। राजा के ख़ुशी का ठिकाना न रहा। रानियां हर्षित हुईं। लेकिन जब उनके बच्चे पैदा हुए तो दोनों को घोर निराशा हुई। उनके बच्चे का शरीर आधा था। यानी एक के केवल एक हाथ, एक आंख, एक पैर,आदि। उसे देख कर ही घृणा होती थी। यह तो मांसका पिंड था, जिसमें जान थी। उस पिंड को उन्होंने दाइयों के हवाले किया और कहा कि इसे फेंक दिया जाय। दाइयों ने उसे कूड़े के ढ़ेर पर फेंक दिया।
कुछ देर के बाद उधर से एक जरा नामक राक्षसी गुज़र रही थी। वह इंसानों के मांस खाती थी। उसने कूड़े के ढ़ेर पर जब मांस के टुकड़े को देखा तो फूली न समाई। खाने के लिए उसने ज्यों ही मांस के दोनों पिंडों को उठाया तो वे आपस में जुड़ गए और एक सुन्दर बचा बन गया। यह तो चमत्कार हो गया। सुंदर दिखने वाले उस बच्चे पर उसका मन मोहित हो गया। उसने उसे मारना ठीक नहीं समझा। जरा राक्षसी ने एक सुन्दर युवती का वेश धारण किया और राजा बृहद्रथ के पास पहुंची। राजा को उस बच्चे को सौंपती हुई बोली कि यह आपका बच्चा है। राजा को ख़ुशी की सीमा नहीं रही। वह अपनी पत्नियों और बच्चे के साथ मगध वापस लौट आया और ख़ुशी-ख़ुशी राजकाज करने लगा।
मुनि चण्डकौशिक के वरदान के कारण बच्चा काफ़ी बलशाली हुआ लेकिन उसका शरीर चूंकि दो टुकड़ों के मिलने से बना था, इसलिए कभी भी अलग हो सकता था। वही बच्चा जरासंध के नाम से मशहूर हुआ। वह अपनी शक्ति के लिए प्रसिद्ध था। उसके जैसा बलशाली उन दिनों दूसरा कोई नहीं था। अथाह बल के कारण उसमें मद और गुरूर आना स्वाभाविक ही था। उसने आस-पास के कई राजाओं को पराजित कर अपने अधीनस्थ बना लिया था। जरासंध ने कृष्ण के मामा और मथुरा के राजा और महाराज उग्रसेन के लड़के कंस के साथ वैवाहिक संबंध क़ायम किया था। उससे जरासंध ने अपनी दोनों बेटियों अस्ति और प्राप्ति की शादी की थी। समय के साथ कंस को श्री कृष्ण ने उसके पापों की सज़ा देते हुए वध कर डाला। उसकी मृत्यु के बाद कंस की दोनों विधवा पत्नी, अस्ति और प्राप्ति अपने पिता जरासंध के घर पहुंची। दोनों रानियों ने कंस की मृत्यु और उसके बाद के हाल का विवरण अपने पिता को सुनाया। यह सब सुनकर मगधराज जरासंध शोकाकुल हो गया। उसने पृथ्वी को यदुवंशियों से रहित करने का निश्चय किया। उसने अपनी सेना के साथ मथुरा पर आक्रमण करने की योजना बनानी शुरू कर दी। उसने अपनी तेरह अक्षौहिणी सेना के साथ यदु राजाओं की राजधानी मथुरा पर आक्रमण कर दिया। जरासंध की विशाल सेना को देख मथुरावासी भय से व्याकुल हो गए। श्रीकृष्ण की सेना छोटी-सी थी। फिर भी श्रीकृष्ण और बलराम उसके समक्ष डट गए। दोनों पक्षों में युद्ध शुरू हुआ। जरासंध के सभी सैनिकों का बध हो गया। श्रीकृष्ण ने जरासंध को मुक्त कर दिया। अपमानित होकर जरासंध लौट आया और फिर से श्रीकृष्ण से युद्ध करने के लिए शक्ति एकत्र करने लगा। जरासंध ने मथुरा पर सत्रह बार आक्रमण किया, हर बार उसकी हार हुई। हर बार उसे अपमानित होना पड़ता, हर बार उसे बंदी बनाया जात और छोड़ दिया जाता।
कुछ समय बाद जरासंध ने तेईस अक्षौहिणी सेना लेकर मथुरा पर फिर से आक्रमण कर दिया। श्रीकृष्ण इस अठारहवें आक्रमण से मथुरा की रक्षा करना चाहते थे। बार-बार के आक्रमण से मथुरावासी वैसे ही काफ़ी परेशान थे। सैनिकों के और अधिक बध को रोकने के लिए श्रीकृष्ण ने युद्ध किए बिना ही रणक्षेत्र छोड कर चल दिए। दरअसल जरासंध की विशाल सेना से वे तनिक भी भयभीत नहीं थे, वे तो एक साधारण मानव होने का अभिनय कर रहे थे। बिना कोई शस्त्र लिए वे रणक्षेत्र से पैदल चले गए। इसी लिए उन्हें रणछोड़ भी कहा जाता है। जरासंध ने सोचा कि श्रीकृष्ण और बलराम उसकी सैन्य शक्ति से भयभीत हो गए हैं। लेकिन श्रीकृष्ण की अनेक लीलाओं में से यह भी एक लीला थी।
पैदल चलते-चलते श्रीकॄष्ण और बलराम बहुत दूर चले आए। अपनी थकान को दूर करने एवं विश्राम हेतु वे एक काफ़ी ऊंचे पर्वत पर चढ़ गए। इस पर्वत पर लगातार वर्षा होती रहती थी, इसी लिए इस पर्वत को प्रवर्षण कहा जाता था। जरासंध जो उनका पीछा कर था ने सोचा कि दोनों भाई उससे डर कर पर्वत शिखर पर छिप गए हैं। उसने दोनों भाईयों को ढूंढ़ने की काफ़ी कोशिश की,किंतु उसे सफलता हाथ नहीं लगी। उसने शिखर के चारों ओर तेल डाल कर आग लगा दी। जब आग चारों ओर तेज़ी से फैलने लगी रो दोनों भाई पर्वत से काफ़ी दूर नीचे धरती पर कूद गए। वे जरासंध की आंखों से ओझल होकर सुरक्षित काफ़ी दूर निकल गए। जरासंध ने सोचा कि दोनों भाई जलकर भस्म हो गए। वह अपनी राजधानी मगध लौट आया। इधर श्री कृष्ण को मथुरा छोड़कर दूर द्वारका में जाकर रहना पड़ा।
उन दिनों इन्द्रप्रस्थ में पांडव राज कर रहे थे। उनका राज-काज अपनी न्यायप्रियता के मशहूर था। युधिष्ठिर के भाईयों की इच्छा हुई कि राजसूय यज्ञ कर सम्राट का पद धारण किया जाए। सलाह-मशवरा के लिए श्री कृष्ण को संदेश भेजा गया। संदेश पाकर श्री कृष्ण द्वारका से इन्द्रप्रस्थ पहुंचे। युधिष्ठिर को भरोसा था कि श्री कृष्ण सही सलाह देंगे। श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर और उनके भाईयों को बताया कि मगध के राजा जरासंध ने सभी राजाओं को जीतकर उन्हें उन्हें अपने वश में कर रखा है। चारो तरफ़ उसने अपनी धाक जमा रखी है। यहां तक कि शिशुपाल जैसे पराक्रमी राजा ने भी उसकी अधीनता स्वीकार कर ली है। अतः बिना जरासंध को रास्ते से हटाए सम्राट पद पाना दूर की बात है। आज तक जरासंध किसी से नहीं हारा है। उसके जीते-जी तो राजसूय यज्ञ सफल हो ही नहीं सकता। इसलिए उसको रास्ते से हटाना होगा, उसका वध करना होगा। साथ ही श्रीकृष्ण ने उन्हें आगाह किया कि राजा जरासंध कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है। उसकी शारीरिक शक्ति दस हज़ार हाथियों की शक्ति के समान है। अगर कोई व्यक्ति है जो इसे हर सकता है तो वह भीमसेन है, क्योंकि वह भी दस हज़ार हाथियों की शक्ति रखते हैं। हां, उसे सैन्य बल से हराना कठिन होगा, इसलिए हमें चालाकी से काम लेना होगा।
इधर युधिष्ठिर ठहरे न्याय-प्रिय और शान्तिप्रिय राजा। श्रीकृष्ण की बातें सुनकर युधिष्ठिर ने सम्राट बनने का विचार त्याग दिया। उनका मानना था कि जो पद मिल ही नहीं सकता उसके बारे में सोचना ही बेकार है। जब स्वयं श्रीकृष्ण ही उसके भय से मथुरा छोड़कर चले गए तो उस पराक्रमी के सामने उनकी ख़ुद की क्या हस्ती है। इतना विनम्र बनना और नरम रुख अख्तियार करना भीम को नहीं भाया। उसने कहा कि हमें प्रयास तो अवश्य ही करना चाहिए। हमें हाथ-पर-हाथ रखकर नहीं बैठना चाहिए। यह तो कायरों का गुण है। हमें कोई न कोई युक्ति निकालनी ही होगी। हमारे साथ श्री कृष्ण की नीति कुशलता है, मेरा बल है और अर्जुन का शौर्य है। यह सब मिल जाए तो मुझे पूरा भरोसा है कि हम जरासंध की शक्ति पर क़ाबू पा सकते हैं। अर्जुन ने भी भीम का समर्थन किया और कहा कि जिस काम को हम कर सकते हैं उसे हमें ज़रूर करना चाहिए। अंत में निश्चय हुआ कि जरासंध का वध करना उनका कर्तव्य है। किन्तु श्री कृष्ण ने उन्हें आगाह किया कि उसपर हमला करना बेकार है, उसे तो मल्ल युद्ध में ही हराया जा सकता है। राजा जरासंध ब्राह्मणों के प्रति समर्पित है और उनका अत्यन्त आदर करता है। वह ब्राह्मणों का कोई निवेदन अस्वीकार नहीं कर सकता। इसलिए हमे ब्राह्मण के वेश में जरासंध के पास जाकर भिक्षा मांगनी चाहिए। और फिर भीमसेन को उसके साथ युद्ध में लगना चाहिए।
भीम, अर्जुन और श्रीकृष्ण ने एक साथ वेश बदल कर ब्राह्मण का रूप धारण किया। जब वे राजगृह में प्रवेश किए, तो उन्होंने ब्राह्मणों का वेश धारण किया हुआ था। उनके हाथ में कुश था। निःशस्त्र और वल्कल धारण किए अतिथि को ब्राह्मण समझ जरासंध ने उनका आदर के साथ स्वागत-सत्कार किया। जरासंध के स्वागत-सत्कार के जवाब में सिर्फ़ श्री कृष्ण ही बोले, भीम और अर्जुन चुप रहे। श्री कृष्ण ने बताया कि उनका मौन व्रत है जो आधी रात के बाद ही खुलेगा। जरासंध ने तीनों अतिथियों को यज्ञशाला में ठहराया और वापस अपने कहल में चला गया। जब आधी रात हुई तो वह अतिथियों से मिलने गया, तो वहां उसे यह देख कर ताज़्ज़ुब हुआ कि उनकी पीठ पर ऐसे चिन्ह हैं जो धनुष की डोरी से पड़ते हैं। धनुष उठाने की वजह से उनके कन्धों पर दबाव के निशान थे। उनके शरीर सुडौल थे। उसने दृढ़तापूर्वक निष्कर्ष निकाला कि ये तो ब्राह्मण नहीं है। उसने कहा तुम लोग तो ब्राह्मण नहीं दिखते, सच बताओ, कौन हो तुम लोग? इस पर सच बताते हुए उन लोगों ने कहा कि हम तुमसे द्वन्द्व युद्ध करने आए हैं। उन्होंने अपना परिचय भी दिया।
उन दिनों यह प्रथा थी कि किसी क्षत्रिय को कोई द्वन्द्व युद्ध के लिए चुनती देता तो उसए उसकी चुनौती स्वीकार करनी पड़ती थी। जरासंध ने उनका प्रस्ताव स्वीकार करते हुए कहा, “मूर्खों! यदि तुम मुझसे लड़ना चाहते हो तो मैं तुम्हारा निवेदन स्वीकार करता हूं। किंतु अर्जुन तो बच्चा है, इसलिये उससे लड़ने का सवाल ही नहीं है। और मैं जानता हूं कि तुम कायर हो। तुम मुझसे लड़ते समय घबड़ा जाते हो। मेरे डर से तुम मथुरा छोड़कर भाग गए। इसलिए मैं तुमसे युद्ध करने से इंकार करता हूं। जहां तक भीमसेन का प्रश्न है, तो मैं सोचता हूं कि मुझसे लड़ने के लिए वह उपयुक्त प्रतिस्पर्धी है।
अखाड़े में भीम और जरासंध के बीच कुश्ती शुरु हुआ। उनको देखकर ऐसा लगता था कि दो हाथी युद्ध कर रहे हैं। तेरह दिन तक लगातार दोनों में मल्ल युद्ध होता रहा। दुर्भाग्य से वे आपस में किसी को भी पराजित नहीं कर सके, क्योंकि दोनों इस कला में निपुण थे। चौदहवें दिन जरासंध थोड़ी देर के लिए अपनी थकान मिटाने के लिए रुका। यह देख श्री कृष्ण ने भीम को इशारे से समझाया। भीमसेन ने जरासंघ को उठाकर ज़ोर से चारो ओर घुमाया और ज़मीन पर पटक कर उसके दोनों पैर पकड़ कर बीच से चीर डाला। जरासंध को मरा हुआ समझ कर भीम अपनी जीत का उल्लास मना ही रहा था कि उसके चिरे हुए टुकड़े आपस में जुट गए और वह खड़ा होकर फिर से लड़ने लगा।
अब समस्या थी कि जरासंध को कैसे हराया जाए? श्री कृष्ण ने भीम को फिर इशारे में समझाया। उन्होंने एक तिनका उठाया। उसे बीच से चीरा। उन्होंने दायें हाथ के टुकड़े को बाईं ओर और बाएं हाथ के टुकड़े को दाईं ओर फेंक दिया। अब बात भीम को समझ में आ गई। उसने दुबारा जरासंध के शरीर को चीर डाला और दोनों हिस्सों को एक दूसरे के विपरीत दिशाओं में फेंक दिया। अब टुकड़े आपस में नहीं जुड़ सके। इस प्रकार उसने जरासंध को हराया और उसे मार डाला। बंदीगृह के सभी राजाओं को कैद से आज़ाद कर दिया गया। जरासंध के बेटे सहदेव को मगध की राजगद्दी पर बिठाकर वे इन्द्रप्रस्थ लौट आए।
समाप्त
