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शनिवार, 4 जनवरी 2014

फ़ुरसत में … 116 : जरासंध वध

फ़ुरसत में … 116

जरासंध वध

406896_2515618585360_1884583692_nमनोज कुमार

पिछले दिनों हम राजगीर गए थे। कई जगहों के दर्शन हुए। राजगीर के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से एक है जरासंध का अखाड़ा है। इसे जरासंध की रणभूमि भी कहा जाता है। यह महाभारत काल में बनाई गई जगह है। यहां पर भीमसेन और जरासंघ के बीच कई दिनों तक मल्ल्युद्ध हुआ था। कभी इस रणभूमि की मिट्टी महीन और सफ़ेद रंग की थी। कुश्ती के शौकीन लोग यहां से भारी मात्रा में मिट्टी ले जाने लगे। अब यहां उस तरह की मिट्टी नहीं दिखती। पत्थरों पर दो समानान्तर रेखाओं के निशान स्पष्ट दिखाई देते हैं। इसके बारे में लोगों का कहना है कि वे भगवान श्री कृष्ण के रथ के पहियों के निशान हैं। इस जगह ने मुझे जरासंध के बारे में थोड़ा विस्तार से जानने के लिए प्रेरित किया। सोचा आज फ़ुरसत में आपसे शेयर कर ही लूं।

प्राचीन समय से बौद्ध, जैन, हिन्दू और मुस्लिम तीर्थ-स्थल राजगीर पांच पहाड़ियों, वैराभगिरी, विपुलाचल, रत्नगिरी, उदयगिरी और स्वर्णगिरी से घिरी एक हरी भरी घाटी में स्थित है। बिहार की राजधानी पटनासे लगभग 100 कि.मी. की दूरी पर स्थित इस नगरी में पत्थरों को काटकर बनाई गई अनेक गुफ़ाएं हैं जो प्राचीन काल के जड़वादी चार्वाक दार्शनिकों से लेकर अनेक दार्शनिकों की आवास स्थली रही हैं। प्राचीन काल में यह मगध साम्राज्य की राजधानी रही है। प्राचीन काल में इसे कई नामों से जाना जाता था। “रामायण” में इसका नाम “वसुमती” बताया गया है। इसका संबंध पौराणिक राजा वसु से है जो ब्रह्मा के पुत्र कहलाये जाते हैं।

रामायण के अनुसार ब्रह्मा के चौथे पुत्र वसु ने “गिरिव्रज” नगर की स्थापना की। बाद में कुरुक्षेत्र के युद्ध के पहले वृहद्रथ ने इस पर अपना क़ब्ज़ा जमा लिया। वृहद्रथ काफ़ी वीर और बली था। उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। काशिराज की जुड़वा बेटियों से उसका विवाह हुआ था। उसने अपनी दोनों पत्नियों को वचन दे रखा था कि वह दोनों में से किसी के साथ पक्षपात नहीं करेगा। यानी दोनों को बराबरी का दर्ज़ा देगा।

बृहद्ररथ को कोई संतान नहीं हुई। वृद्धावस्था आ चली थी। वह काफ़ी निराश हो चला था। सांसारिक जीवन में उसे कोई रुचि नहीं रह गई थी। उसने अपना राजपाट अपने मंत्रियों के हवाले कर दिया। अपनी पत्नियों के साथ वह वन में चला गया और एक आश्रम में रह कर तपस्या करने लगा। एक दिन उसके आश्रम में चण्डकौशिक मुनि पधारे। वे महर्षि गौतम के वंशज थे। उनका वृहद्रथ ने काफ़ी स्वागत-सत्कार किया। अपनी आवभगत से प्रसन्न होकर मुनि ने राजा को वर मांगने को कहा। राजा ने कहा, “मैं बहुत ही अभागा इंसान हूं। जब पुत्र ही नहीं हुआ तो और क्या आपसे मांगूं?”

यह सुन मुनि को राजा पर दया आई। उन्होंने राजा की समस्या के हल के लिए आम के एक वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान लगाया। थोड़ी देर में उनकी गोद में एक पका हुआ आम गिरा। मुनि ने उसे राजा को दिया और कहा कि इसे अपनी पत्नियों को खिला दे। दोनों पत्नियों में से किसी के प्रति पक्षपात न करने का वचन दे चुके राजा ने उसके दो टुकड़े कर दोनों रानियों को खिला दिया। रानियां गर्भवती हुईं। राजा के ख़ुशी का ठिकाना न रहा। रानियां हर्षित हुईं। लेकिन जब उनके बच्चे पैदा हुए तो दोनों को घोर निराशा हुई। उनके बच्चे का शरीर आधा था। यानी एक के केवल एक हाथ, एक आंख, एक पैर,आदि। उसे देख कर ही घृणा होती थी। यह तो मांसका पिंड था, जिसमें जान थी। उस पिंड को उन्होंने दाइयों के हवाले किया और कहा कि इसे फेंक दिया जाय। दाइयों ने उसे कूड़े के ढ़ेर पर फेंक दिया।

कुछ देर के बाद उधर से एक जरा नामक राक्षसी गुज़र रही थी। वह इंसानों के मांस खाती थी। उसने कूड़े के ढ़ेर पर जब मांस के टुकड़े को देखा तो फूली न समाई। खाने के लिए उसने ज्यों ही मांस के दोनों पिंडों को उठाया तो वे आपस में जुड़ गए और एक सुन्दर बचा बन गया। यह तो चमत्कार हो गया। सुंदर दिखने वाले उस बच्चे पर उसका मन मोहित हो गया। उसने उसे मारना ठीक नहीं समझा। जरा राक्षसी ने एक सुन्दर युवती का वेश धारण किया और राजा बृहद्रथ के पास पहुंची। राजा को उस बच्चे को सौंपती हुई बोली कि यह आपका बच्चा है। राजा को ख़ुशी की सीमा नहीं रही। वह अपनी पत्नियों और बच्चे के साथ मगध वापस लौट आया और ख़ुशी-ख़ुशी राजकाज करने लगा।

मुनि चण्डकौशिक के वरदान के कारण बच्चा काफ़ी बलशाली हुआ लेकिन उसका शरीर चूंकि दो टुकड़ों के मिलने से बना था, इसलिए कभी भी अलग हो सकता था। वही बच्चा जरासंध के नाम से मशहूर हुआ। वह अपनी शक्ति के लिए प्रसिद्ध था। उसके जैसा बलशाली उन दिनों दूसरा कोई नहीं था। अथाह बल के कारण उसमें मद और गुरूर आना स्वाभाविक ही था। उसने आस-पास के कई राजाओं को पराजित कर अपने अधीनस्थ बना लिया था। जरासंध ने कृष्ण के मामा और मथुरा के राजा और महाराज उग्रसेन के लड़के कंस के साथ वैवाहिक संबंध क़ायम किया था। उससे जरासंध ने अपनी दोनों बेटियों अस्ति और प्राप्ति की शादी की थी। समय के साथ कंस को श्री कृष्ण ने उसके पापों की सज़ा देते हुए वध कर डाला। उसकी मृत्यु के बाद कंस की दोनों विधवा पत्नी, अस्ति और प्राप्ति अपने पिता जरासंध के घर पहुंची। दोनों रानियों ने कंस की मृत्यु और उसके बाद के हाल का विवरण अपने पिता को सुनाया। यह सब सुनकर मगधराज जरासंध शोकाकुल हो गया। उसने पृथ्वी को यदुवंशियों से रहित करने का निश्चय किया। उसने अपनी सेना के साथ मथुरा पर आक्रमण करने की योजना बनानी शुरू कर दी। उसने अपनी तेरह अक्षौहिणी सेना के साथ यदु राजाओं की राजधानी मथुरा पर आक्रमण कर दिया। जरासंध की विशाल सेना को देख मथुरावासी भय से व्याकुल हो गए। श्रीकृष्ण की सेना छोटी-सी थी। फिर भी श्रीकृष्ण और बलराम उसके समक्ष डट गए। दोनों पक्षों में युद्ध शुरू हुआ। जरासंध के सभी सैनिकों का बध हो गया। श्रीकृष्ण ने जरासंध को मुक्त कर दिया। अपमानित होकर जरासंध लौट आया और फिर से श्रीकृष्ण से युद्ध करने के लिए शक्ति एकत्र करने लगा। जरासंध ने मथुरा पर सत्रह बार आक्रमण किया, हर बार उसकी हार हुई। हर बार उसे अपमानित होना पड़ता, हर बार उसे बंदी बनाया जात और छोड़ दिया जाता।

कुछ समय बाद जरासंध ने तेईस अक्षौहिणी सेना लेकर मथुरा पर फिर से आक्रमण कर दिया। श्रीकृष्ण इस अठारहवें आक्रमण से मथुरा की रक्षा करना चाहते थे। बार-बार के आक्रमण से मथुरावासी वैसे ही काफ़ी परेशान थे। सैनिकों के और अधिक बध को रोकने के लिए श्रीकृष्ण ने युद्ध किए बिना ही रणक्षेत्र छोड कर चल दिए। दरअसल जरासंध की विशाल सेना से वे तनिक भी भयभीत नहीं थे, वे तो एक साधारण मानव होने का अभिनय कर रहे थे। बिना कोई शस्त्र लिए वे रणक्षेत्र से पैदल चले गए। इसी लिए उन्हें रणछोड़ भी कहा जाता है। जरासंध ने सोचा कि श्रीकृष्ण और बलराम उसकी सैन्य शक्ति से भयभीत हो गए हैं। लेकिन श्रीकृष्ण की अनेक लीलाओं में से यह भी एक लीला थी।

पैदल चलते-चलते श्रीकॄष्ण और बलराम बहुत दूर चले आए। अपनी थकान को दूर करने एवं विश्राम हेतु वे एक काफ़ी ऊंचे पर्वत पर चढ़ गए। इस पर्वत पर लगातार वर्षा होती रहती थी, इसी लिए इस पर्वत को प्रवर्षण कहा जाता था। जरासंध जो उनका पीछा कर था ने सोचा कि दोनों भाई उससे डर कर पर्वत शिखर पर छिप गए हैं। उसने दोनों भाईयों को ढूंढ़ने की काफ़ी कोशिश की,किंतु उसे सफलता हाथ नहीं लगी। उसने शिखर के चारों ओर तेल डाल कर आग लगा दी। जब आग चारों ओर तेज़ी से फैलने लगी रो दोनों भाई पर्वत से काफ़ी दूर नीचे धरती पर कूद गए। वे जरासंध की आंखों से ओझल होकर सुरक्षित काफ़ी दूर निकल गए। जरासंध ने सोचा कि दोनों भाई जलकर भस्म हो गए। वह अपनी राजधानी मगध लौट आया। इधर श्री कृष्ण को मथुरा छोड़कर दूर द्वारका में जाकर रहना पड़ा।

उन दिनों इन्द्रप्रस्थ में पांडव राज कर रहे थे। उनका राज-काज अपनी न्यायप्रियता के मशहूर था। युधिष्ठिर के भाईयों की इच्छा हुई कि राजसूय यज्ञ कर सम्राट का पद धारण किया जाए। सलाह-मशवरा के लिए श्री कृष्ण को संदेश भेजा गया। संदेश पाकर श्री कृष्ण द्वारका से इन्द्रप्रस्थ पहुंचे। युधिष्ठिर को भरोसा था कि श्री कृष्ण सही सलाह देंगे। श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर और उनके भाईयों को बताया कि मगध के राजा जरासंध ने सभी राजाओं को जीतकर उन्हें उन्हें अपने वश में कर रखा है। चारो तरफ़ उसने अपनी धाक जमा रखी है। यहां तक कि शिशुपाल जैसे पराक्रमी राजा ने भी उसकी अधीनता स्वीकार कर ली है। अतः बिना जरासंध को रास्ते से हटाए सम्राट पद पाना दूर की बात है। आज तक जरासंध किसी से नहीं हारा है। उसके जीते-जी तो राजसूय यज्ञ सफल हो ही नहीं सकता। इसलिए उसको रास्ते से हटाना होगा, उसका वध करना होगा। साथ ही श्रीकृष्ण ने उन्हें आगाह किया कि राजा जरासंध कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है। उसकी शारीरिक शक्ति दस हज़ार हाथियों की शक्ति के समान है। अगर कोई व्यक्ति है जो इसे हर सकता है तो वह भीमसेन है, क्योंकि वह भी दस हज़ार हाथियों की शक्ति रखते हैं। हां, उसे सैन्य बल से हराना कठिन होगा, इसलिए हमें चालाकी से काम लेना होगा।

इधर युधिष्ठिर ठहरे न्याय-प्रिय और शान्तिप्रिय राजा। श्रीकृष्ण की बातें सुनकर युधिष्ठिर ने सम्राट बनने का विचार त्याग दिया। उनका मानना था कि जो पद मिल ही नहीं सकता उसके बारे में सोचना ही बेकार है। जब स्वयं श्रीकृष्ण ही उसके भय से मथुरा छोड़कर चले गए तो उस पराक्रमी के सामने उनकी ख़ुद की क्या हस्ती है। इतना विनम्र बनना और नरम रुख अख्तियार करना भीम को नहीं भाया। उसने कहा कि हमें प्रयास तो अवश्य ही करना चाहिए। हमें हाथ-पर-हाथ रखकर नहीं बैठना चाहिए। यह तो कायरों का गुण है। हमें कोई न कोई युक्ति निकालनी ही होगी। हमारे साथ श्री कृष्ण की नीति कुशलता है, मेरा बल है और अर्जुन का शौर्य है। यह सब मिल जाए तो मुझे पूरा भरोसा है कि हम जरासंध की शक्ति पर क़ाबू पा सकते हैं। अर्जुन ने भी भीम का समर्थन किया और कहा कि जिस काम को हम कर सकते हैं उसे हमें ज़रूर करना चाहिए। अंत में निश्चय हुआ कि जरासंध का वध करना उनका कर्तव्य है। किन्तु श्री कृष्ण ने उन्हें आगाह किया कि उसपर हमला करना बेकार है, उसे तो मल्ल युद्ध में ही हराया जा सकता है। राजा जरासंध ब्राह्मणों के प्रति समर्पित है और उनका अत्यन्त आदर करता है। वह ब्राह्मणों का कोई निवेदन अस्वीकार नहीं कर सकता। इसलिए हमे ब्राह्मण के वेश में जरासंध के पास जाकर भिक्षा मांगनी चाहिए। और फिर भीमसेन को उसके साथ युद्ध में लगना चाहिए।

भीम, अर्जुन और श्रीकृष्ण ने एक साथ वेश बदल कर ब्राह्मण का रूप धारण किया। जब वे राजगृह में प्रवेश किए, तो उन्होंने ब्राह्मणों का वेश धारण किया हुआ था। उनके हाथ में कुश था। निःशस्त्र और वल्कल धारण किए अतिथि को ब्राह्मण समझ जरासंध ने उनका आदर के साथ स्वागत-सत्कार किया। जरासंध के स्वागत-सत्कार के जवाब में सिर्फ़ श्री कृष्ण ही बोले, भीम और अर्जुन चुप रहे। श्री कृष्ण ने बताया कि उनका मौन व्रत है जो आधी रात के बाद ही खुलेगा। जरासंध ने तीनों अतिथियों को यज्ञशाला में ठहराया और वापस अपने कहल में चला गया। जब आधी रात हुई तो वह अतिथियों से मिलने गया, तो वहां उसे यह देख कर ताज़्ज़ुब हुआ कि उनकी पीठ पर ऐसे चिन्ह हैं जो धनुष की डोरी से पड़ते हैं। धनुष उठाने की वजह से उनके कन्धों पर दबाव के निशान थे। उनके शरीर सुडौल थे। उसने दृढ़तापूर्वक निष्कर्ष निकाला कि ये तो ब्राह्मण नहीं है। उसने कहा तुम लोग तो ब्राह्मण नहीं दिखते, सच बताओ, कौन हो तुम लोग? इस पर सच बताते हुए उन लोगों ने कहा कि हम तुमसे द्वन्द्व युद्ध करने आए हैं। उन्होंने अपना परिचय भी दिया।

उन दिनों यह प्रथा थी कि किसी क्षत्रिय को कोई द्वन्द्व युद्ध के लिए चुनती देता तो उसए उसकी चुनौती स्वीकार करनी पड़ती थी। जरासंध ने उनका प्रस्ताव स्वीकार करते हुए कहा, “मूर्खों! यदि तुम मुझसे लड़ना चाहते हो तो मैं तुम्हारा निवेदन स्वीकार करता हूं। किंतु अर्जुन तो बच्चा है, इसलिये उससे लड़ने का सवाल ही नहीं है। और मैं जानता हूं कि तुम कायर हो। तुम मुझसे लड़ते समय घबड़ा जाते हो। मेरे डर से तुम मथुरा छोड़कर भाग गए। इसलिए मैं तुमसे युद्ध करने से इंकार करता हूं। जहां तक भीमसेन का प्रश्न है, तो मैं सोचता हूं कि मुझसे लड़ने के लिए वह उपयुक्त प्रतिस्पर्धी है।

अखाड़े में भीम और जरासंध के बीच कुश्ती शुरु हुआ। उनको देखकर ऐसा लगता था कि दो हाथी युद्ध कर रहे हैं। तेरह दिन तक लगातार दोनों में मल्ल युद्ध होता रहा। दुर्भाग्य से वे आपस में किसी को भी पराजित नहीं कर सके, क्योंकि दोनों इस कला में निपुण थे। चौदहवें दिन जरासंध थोड़ी देर के लिए अपनी थकान मिटाने के लिए रुका। यह देख श्री कृष्ण ने भीम को इशारे से समझाया। भीमसेन ने जरासंघ को उठाकर ज़ोर से चारो ओर घुमाया और ज़मीन पर पटक कर उसके दोनों पैर पकड़ कर बीच से चीर डाला। जरासंध को मरा हुआ समझ कर भीम अपनी जीत का उल्लास मना ही रहा था कि उसके चिरे हुए टुकड़े आपस में जुट गए और वह खड़ा होकर फिर से लड़ने लगा।जरासंध_वध

अब समस्या थी कि जरासंध को कैसे हराया जाए? श्री कृष्ण ने भीम को फिर इशारे में समझाया। उन्होंने एक तिनका उठाया। उसे बीच से चीरा। उन्होंने दायें हाथ के टुकड़े को बाईं ओर और बाएं हाथ के टुकड़े को दाईं ओर फेंक दिया। अब बात भीम को समझ में आ गई। उसने दुबारा जरासंध के शरीर को चीर डाला और दोनों हिस्सों को एक दूसरे के विपरीत दिशाओं में फेंक दिया। अब टुकड़े आपस में नहीं जुड़ सके। इस प्रकार उसने जरासंध को हराया और उसे मार डाला। बंदीगृह के सभी राजाओं को कैद से आज़ाद कर दिया गया। जरासंध के बेटे सहदेव को मगध की राजगद्दी पर बिठाकर वे इन्द्रप्रस्थ लौट आए।

समाप्त

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

फुरसत में… 114 नालंदा के खंडहरों की सैर

फुरसत में… 114

नालंदा के खंडहरों की सैर19102011(002)

मनोज कुमार

साल जाते-जाते बड़े  भाई ने दो आदेश किया।  एक कि इस ब्लॉग पर गतिविधि पुनः ज़ारी किया जाए। सो हाज़िर हूं … दूसरे ..

मेरे लिए नालंदा की यात्रा वैसे तो हमेशा विशेष ही होती है, इस बार तो और भी खास हो गई, जब इस बाबत Facebook पर Status Update लगाया तो बड़े भाई (सलिल वर्मा) का आदेश हुआ,

“सलिल वर्मा Please take a full snap of ruins of Nalanda University and send me as New Year Greetings!!”

कई बार यात्रा कर चुके नालंदा को इस आदेश के तहत देखने की कोशिश, इस बार हमारी मजबूरी बन गई, नालंदा, जहां प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग  7वीं शताब्दि में आया था। उसके अनुसार उस जमाने में यहां के लोग एक तालाब में “नालंदा” नामक नाग का निवास होना बताते थे। यही कारण है कि इस नगर का नाम नालंदा पड़ा।

19102011(022)भगवान बुद्ध के पुत्र सारिपुत्र का जन्म नालंदा के पास “नालक” गांव में हुआ था। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में उन्होंने इसी गांव में आकर अपनी मां को धर्मोपदेश दिया और निर्वाण प्राप्त किया। फलस्वरूप वह बौद्ध श्रद्धालुओं और उपासकों के लिए प्रमुख तीर्थ-स्थल हो गया। भगवान बुद्ध के बाद सबसे अधिक पूजा सारिपुत्र की ही होती है। इस महापुरुष का जन्म और निर्वाण एक ही स्थान पर होना श्रद्धा का विषय बना रहा। उनकी याद में इस जगह पर एक चैत्य का निर्माण हुआ। इस चैत्य के नज़दीक जो भिक्षु विहार बने वे बाद में अध्ययन के केन्द्र हो गए। देश के दूर-दराज के भागों से विद्यार्थी यहां आकर शिक्षा ग्रहण करते थे। पाल राजाओं ने नालंदा के निर्माण में महत्वपूर्ण निभाई।

पालि ग्रंथों में नालंदा शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए कहा गया है, “न अलं ददाती ति नालंदा” अर्थात्‌ वह जो प्रचुर दे सके। विडम्बना यह कि तुर्क आक्रमणकारी बख़्तियार ख़लजी ने अपने लूटपाट के अभियान के तहत सन 1199 में प्रचुर देने वाले नालंदा के इस विश्वविद्यालय में आग लगा दी। शिक्षा का यह महान केन्द्र जलकर खाक हो गया। आज तो सिर्फ़ वहां खंडहर बचे हैं और इन्हीं खंडहरों की तस्वीर अपने कैमरे में क़ैद कर लाने का मुझे आदेश मिला।

12022011(007)कैमरे की आंख से देखिए, इन भग्नावशेषों की दीवालों की 6 से 12 फीट की मोटाई यह साबित करती है कि विहारों की ऊंचाई काफ़ी रही होगी। साथ ही भवन भी विशाल रहे होंगे। ऊंचे भवनों तक पहुंचने के लिए चौड़ी और पक्की सीढियों के अवशेष आज भी विद्यमान है। ह्वेनसांग और बाद के दिनों में आए चीनी यात्री इत्सिंग के अनुसार यहाँ 8 भव्य विहार थे। इन महाविहारों से लगे हुए चैत्य और स्तूपों का निर्माण हुआ था। हीनयान और महायान के लिए 108 मंदिरों का निर्माण हुआ। पूरा विद्यालय एक ऊंचे प्राचीर से घिरा था।

ह्वेनसांग ने ज़िक्र किया है कि इसमें प्रवेश करने के लिए एक विशाल दरवाज़ा था। उसके बाहर खड़े द्वारपाल भी काफ़ी विद्वान होते थे। जो विद्यार्थी यहां प्रवेश पाना चाहते थे, उनकी परीक्षा ये द्वारपाल लिया करते थे, और योग्य उम्मीदवारों को ही चुना जाता था। 10 में से सिर्फ़ एक या दो विद्यार्थी ही विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वार के भीतर जा पाते थे!

19102011(012)विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। आस-पास के क़रीब 100 गांवों द्वारा इसके खर्च की व्यवस्था की जाती थी। इत्सिंग ने तो 200 गांवों की बात कही है। इस विश्वविद्यालय में उन दिनों 10,000 विद्यार्थी 1500 आचार्यगण से शिक्षा ग्रहण करते थे। अर्थात प्रत्येक सात विद्यार्थी पर औसतन एक शिक्षक!

बौद्ध धर्म, दर्शन, कला, इतिहास, आदि के साथ आयुर्वेद, विज्ञान, कला, वेद, हेतु विद्या (Logic) शब्द विद्या (Philology) चिकित्सा विद्या, ज्योतिष, अथर्ववेद तथा सांख्य, दण्डनीति, पाणीनीय संस्कृत व्याकरण की शिक्षा की व्यवस्था थी।

12022011(003)नालंदा जाएं और राजगीर की चर्चा न हो ऐसा कैसे हो सकता है? प्राचीन समय से बौद्ध, जैन, हिन्दू और मुस्लिम तीर्थ-स्थल राजगीर पांच पहाड़ियों, वैराभगिरी, विपुलाचल, रत्नगिरी, उदयगिरी और स्वर्णगिरी से घिरी एक हरी भरी घाटी में स्थित है। इस नगरी में पत्थरों को काटकर बनाई गई अनेक गुफ़ाएं हैं जो प्राचीन काल के जड़वादी चार्वाक दार्शनिकों से लेकर अनेक दार्शनिकों की आवास स्थली रही हैं। प्राचीन काल में यह मगध साम्राज्य की राजधानी रही है। ऐसा माना जाता है कि पौराणिक राजा वसु, जो ब्रह्मा के पुत्र कहलाये जाते हैं, ही इस नगर के प्रतिष्ठाता थे।

18102011(013)राजगीर के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से एक है जरासंध का अखाड़ा है। इसे जरासंध की रणभूमि भी कहा जाता है। यह महाभारत काल में बनाई गई जगह है। यहां पर भीमसेन और जरासंघ के बीच कई दिनों तक मल्ल्युद्ध हुआ था। कभी इस रणभूमि की मिट्टी महीन और सफ़ेद रंग की थी। कुश्ती के शौकीन लोग यहां से भारी मात्रा में मिट्टी ले जाने लगे। अब यहां उस तरह की मिट्टी नहीं दिखती। पत्थरों पर दो समानान्तर रेखाओं के निशान स्पष्ट दिखाई देते हैं। इसके बारे में लोगों का कहना है कि वे भगवान श्री कृष्ण के रथ के पहियों के निशान हैं।

राजगीर सिर्फ़ बुद्ध एवं उनके जीवन से संबंधित अनेक घटनाओं के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, यह स्थल जैन धर्मावलम्बियों के लिए भी समान रूप से प्रसिद्ध है। अन्तिम जीन महावीर ने अपने 32 वर्ष के सन्यासी जीवन का 14 वर्ष राजगीर और उसके आसपास ही बिताया था। जैनों ने भी बिम्बिसार और अजातशत्रु को अपने धर्म के समर्थक के रूप में दावा किया है। राजगीर में ही 20 वें तीर्थंकर मुनि सुव्रत नाथ का जन्म हुआ था। महावीर के 11 प्रमुख शिष्य/गण्धर की मृत्यु राजगीर के एक पहाड़ के शिखर पर हुई।

रज्जूपथ से राजगीर के विश्वशांति स्तूप की यात्रा भी काफ़ी रोमांचकारी होता है। थोड़ा भय, थोड़ा कुतूहल मिश्रित आनंद देते हैं।

ध्यान में लगे लोगों को तो नालंदा के खंडहरों के प्रांगण में भी देखा था, लेकिन विश्वशांति स्तूप में कुछ अलग ही अनुभूति हुई और हम भी ध्यान में जाने की सोची। … और देखा एक वृक्ष जिसे देख कर लगा कि निर्वण किसे कहते हैं? लेकिन इनको देख कर लगा कि ये किस ओर ध्यानस्थ हैं?12022011(002)

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शनिवार, 5 नवंबर 2011

फुरसत में… राजगीर के दर्शनीय स्थल की सैर-3

फुरसत में…

राजगीर के दर्शनीय स्थल की सैर-3

IMG_0151मनोज कुमार

IMG_1710राजगीर की सैर के इस समापन अंक में हम सबसे पहले आपको यह बताते चलें कि राजगीर जाने के लिए निकटतम हवाई अड्डा पटना है। यहां से टैक्सी या बसों से आप राजगीर जा सकते हैं। इसके अलावा पटना और बख़्तियार पुर से स्थानीय रेल गाड़ियों से भी आ सकते हैं। अक्तूबर से मार्च तक मौसम काफ़ी अच्छा रहता है, ऐसे में घूमने का आनन्द काफ़ी बढ़ जाएगा। यहां पर अच्छे-अच्छे होटल भी हैं, जहां आप आराम से ठहर सकते हैं। पटना से इस जगह की दूरी 60 कि.मी. के आसपास है।

राजगीर सिर्फ़ बुद्ध एवं उनके जीवन से संबंधित अनेक घटनाओं के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, यह स्थल जैन धर्मावलम्बियों के लिए भी समान रूप से प्रसिद्ध है। अन्तिम जीन महावीर ने अपने 32 वर्ष के सन्यासी जीवन का 14 वर्ष राजगीर और उसके आसपास ही बिताया था। जैनों ने भी बिम्बिसार और अजातशत्रु को अपने धर्म के समर्थक के रूप में दावा किया है। राजगीर में ही 20 वें तीर्थंकर मुनि सुव्रत नाथ का जन्म हुआ था। महावीर के 11 प्रमुख शिष्य/गण्धर की मृत्यु राजगीर के किसी न किसी पहाड़ के शिखर पर हुई।

जैन मन्दिरIMG_1724

राजगीर के चारो तरफ़ पहाड़ों पर 26 जैन मन्दिर हैं। हालाकि इन मन्दिरों तक पहुंचना बहुत मुश्किल है लेकिन यदि आप ट्रेकिंग के शौकीन हैं तो आपको इनका रास्ता आकर्षित कर सकता है।

समोशरण मंदिर

यहां के विपुलाचल नामक पहाड़ी पर ही महावीर ने अपना पहला उपदेश दिया था। इसी की याद में समोशरण मंदिर बनाया गया था। यह मंदिर 72 फ़ीट ऊंचा है।

विरायतन

यह एक जैन आश्रम है। यहां निवास स्थान और म्यूज़ियम है। इसे बौद्ध धर्म और जैन धर्म का संगम स्थल माना जाता है।

वेणुवन

यह बांस का जंगल था। यह एक राजकीय उद्यान था जिसका निर्माण भक्तगणों को आसानी से भगवान बुद्ध के दर्शन हो सके, इस उद्देश्य से किया गया था। बौद्ध धर्म की यह पहली सम्पत्ति थी। यह काफ़ी शान्त जगह थी। ध्यान लगाने के लिए बहुत ही उत्तम जगह थी। भगवान बुद्ध के प्रियस्थलों में से एक थी यह जगह।

करंडा तालाब

यह एक विशाल तालाब है। ऐसा माना जाता है कि भगवान बुद्ध इसमें नहाते थे।

उष्ण झरनें

राजगीर उष्ण झरणों के लिए भी काफ़ी प्रसिद्ध है। महाभारत में इन्हें तापदा कहा गया है। यहां अनेक झरने हैं जिनमें सबसे अधिक गरम पानी ब्रह्मकुण्डी है जहां का पानी 450C का होता है। गुरु नानक देव जी ने अपने इस जगह की यात्रा के दौरान किसी एक झरने में स्नान किया था। कहा जाता है कि इसमें स्नान करने से कई बीमारियां दूर हो जाती हैं।

पिपली गुफा

वैभर पहाड़ की ढाल पर यह गुफा स्थित है। कभी-कभी मध्यान्ह भोजन के बाद भगवान बुद्ध इस गुफा में ध्यानमग्न होते थे।

मनियार मठ18102011(016)

यह राजगीर के देवता मणि नाग का मन्दिर है। यहां सर्प पूजन किया जाता था। मगध के लोग नाग को उदार देवता मानते थे जिन्हें पूजा आदि द्वारा सन्तुष्ट करने पर वर्षा प्राप्त करते थे।

सोनभंडार गुफाएं18102011(002)

वैभर पहाड़ की खुदाई से निकली इन गुफाओं का निर्माण जैन संन्यासी वैरदेव ने किया था। ऐसा माना जाता है कि यहां अभी तक सोने से भरा खजाना छिपा है। ऐसा कहा जाता है कि यहां पर खुदे शिलालेखों के संकेतों को जो समझ पाएगा वह सोने के खजाने के दरवाजे को खोल सकेगा।18102011(006)

आसपास के अन्य दर्शनीय स्थल

राजगीर के आसपास अन्य दर्शनीय स्थल भी हैं। जिनमें प्रमुख हैं –

बड़ागांव - सूरज भगवान के मंदिर के लिए प्रसिद्ध स्थल।

कुण्डलपुर – माना जाता है कि भगवान महावीर का जन्म यहीं हुआ था।

बोध गया – यहां गौतम को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। महाबोधि के लिए प्रसिद्ध।

बिहारशरीफ़ – सन्त मखदुम शाह शरीफ़ उद दीन का मज़ार।

नालंदा – प्राचीन विश्वविद्यालय के अवशेष।

पावापुरी – प्रसिद्ध जैन तीर्थस्थल। भगवान महावीर का महापरिनिर्वाण यहीं हुआ था।

राजगीर के मेले व उत्सव

मलमास - हर तीसरे साल लगता है। मकर संक्रान्ति – काफी बड़ा मेला लगता है। राजगीर नृत्योत्सव – अक्तूबर -24 से 26 तक क्लासिकल नृत्य का आयोजन।

समाप्त

शनिवार, 29 अक्टूबर 2011

फुरसत में… राजगीर के दर्शनीय स्थल की सैर-2

फुरसत में…

राजगीर के दर्शनीय स्थल की सैर-2

मनोज कुमार

पिछले अंक में हमने देखा कि ई.पू. छठी शताब्दी के पहले मगध में बार्हद्रथ के वंश का शासन था। इसकी राजधानी राजगृह या गिरिव्रज में थी। राजगृह यानी राजा का घर या निवास स्थान। चारों तरफ़ पाहाड़ियों से घिरे होने के कारण इसका नाम “गिरिव्रज” पड़ा।

“गृध्रकूट”

राजगृह बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केन्द्र है। राजकुमार सिद्धार्थ (बुद्ध) संसार त्यागने के बाद मोक्ष प्राप्त करने की अभिलाषा से इस नगर में आए थे। अपने धर्म के प्रचार के लिए लम्बे समय तक यहां ठहरे। बुद्ध के लिए इस नगर का सबसे प्रिय स्थल “गृध्रकूट” अथवा गीद्ध का शिखर रहा। गृध्रकूट पहाड़ या गीद्ध शिखर नगर के बाहर एक छोटा सा पहाड़ है। गीद्ध के चोंच जैसी अजीब आकृति ही शायद इसके इस प्रकार के नाम का कारण है। इस जगह बुद्धत्व प्राप्ति के 16 साल बाद गौतम बुद्ध ने यहां पर 5000 बौद्ध संन्यासियों, जनसाधारण और बोधिसत्व की सभा में दूसरे धर्मचक्र प्रवर्तन का सिद्धान्त लिया। गृध्रकूट पर ही उन्होंने पद्मसूत्र को प्रस्तुत किया जिसमें सभी प्राणियों को मोक्ष प्रदान करने का वादा किया  गया है। इस सूत्र में भगवान बुद्ध की करुणापरायणता की साफ झलक मिलती है जो आम लोगों के पार्थिव तकलीफ़ों को लेकर परेशान थे। जो भी बुद्ध के सामने अपना हाथ जोड़े या मुंह से “नमो बुद्ध’ का सिर्फ़ उच्चारण मात्र करता उन सबके लिए बुद्धत्व प्राप्ति की बात बताई गई है।

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IMG_1743भगवान बुद्ध ने गृध्र कूट से ही ‘प्रज्ञा पारमिता’ सूत्र अथवा सही ज्ञान के सूत्र का भी उपदेश दिया था। इन उपदेश संग्रह को प्रदान करने में भगवान बुद्ध को 12 साल लगे और उन्होंने ख़ुद आनन्द से कहा कि इसमें उनके सारे उपदेशों का सारांश निहित है। फा-हियेन ने इस जगह एक गुफा का ज़िक्र किया है। व्हेन सांग ने इसके नीचे एक हॉल का ज़िक्र किया है जहां पर भगवान बुद्ध बैठए और उपदेश दिया करते थे। अब भी यहां शान्ति का वातावरण है।

बिम्बिसार सड़कIMG_1728

ह्वेन सांग के अनुसार जब बिम्बिसार भगवान बुद्ध से मिलने गृध्रकूट के पहाड़ पर जाने लगा तब उसने अपने साथ बहुत से लोगों को भी ले लिया जिन्होंने घाटी को बराबर बनाया और खड़ी चट्टानों के बीच पुल बनाया और पहाड़ी पर चढ़ने के लिए दस कदम चौड़ी और पांच लम्बी सीढ़ी का निर्माण किया।

वृहद्रथ का पुत्र जरासंध शक्तिशाली शासक था। जरासंध के बाद भी इस वंश के शासक राजगृह पर शासन करते रहे। ई.पू. छठी शताब्दी में मगध में हर्यक कुल का शासन था। भगवान बुद्ध के समय इसी वंश का शासक बिम्बिसार मगध में राज कर रहा था। वह सोलह महाजनपद का काल था। उस समय के चार महान शक्तिशाली राजाओं में से एक बिम्बिसार भी था। अन्य तीन थे कोसल के प्रसेनजीत, वत्स के उदयन और अवन्ति के प्रद्योत। बिम्बिसार का वंश उतना ऊंचा नहीं था। बिम्बिसार एक सामान्य सामंत भट्टिय का पुत्र था। लेकिन अपने पौरुष और राज्य के विस्तार में वह बाक़ी तीनों के बराबर था। वह एक कुशल राजनीतिज्ञ था। अपने राजनीतिक कौशल से उसने मगध की विजययात्रा अनेकों राज्यों पर स्थापित की और सुदृढ़ मगध साम्राज्य की नींव डाली। अपनी शक्ति को सुदृढ़ करने के लिए उसने उस समय के राज्यों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए। उसने कोशल की राजकुमारी कोशल देवी जो महाकोशल की बेटी और प्रसेनजीत की बहन थी, से विवाह किया। इसके फलस्वरूप उसे दहेज में काशी मिली। इस प्रकार कोशल और मगध में मित्रता हो गई।

बिम्बिसार ने उसके बाद अपनी नज़र वैशाली पर डाली। वैशाली के लिच्छवि राजा चेटक की पुत्री चेलना के साथ विवाह करके उसने लिच्छवियों की मित्रता प्राप्त कर ली। इसके अलावे उसने मद्र की राजकुमारी क्षेमा के साथ भी विवाह किया। इस प्रकार मगध का प्रभाव क्षेत्र और भी विस्तृत हो गया। वैवाहिक संबंधों की नींव पर बिम्बिसार ने मगध के प्रसार की अट्टालिका खड़ी की। अंग आदि को जीत कर अपने राज्य में मिलाया। वह भगवान बुद्ध का समर्थक बना।

ऐसा अनुमान किया जाता है कि बिम्बिसार अपने पुत्र दर्शक की सहायता से शासन करता था। उसके समय जीवक नामक प्रसिद्ध वैद्य और महागोविन्द नामक प्रसिद्ध वास्तुकार भी हुए। महागोविन्द ने ही राजगृह का निर्माण किया था। उसका शासन काल ई.पू. 544 से ई.पू. 491 तक था।

बिम्बिसार कारागारIMG_1788

ऐसा विश्वास चला आ रहा है कि बिम्बिसार के पुत्र अजातशत्रु ने उसे बन्दी बना लिया और उसकी हत्या कर बलपूर्वक सिंहासन पर अधिकार कर लिया। अजातशत्रु ने बिम्बिसार को जहां बन्दी बनाकर रखा उस जगह को बिम्बिसार का कारागार कहा जाता है। यह लगभग 60 कि.मी. का एक क्षेत्र है जिसके चारो तरफ़ 2 मी. चौड़ी दीवार है। इसके कोने पर वृत्ताकार बुर्ज बने हैं। बिम्बिसार ने ख़ुद अपने बन्दी जीवन के लिए इस जगह को चुना था क्योंकि इस जगह से वह गृध्रकूट पर्वत की चोटी पर अपने शैलावास पर चढ़ते हुए भगवान बुद्ध के दर्शन कर पाता। खुदाई से निकले इसके फ़र्श पर लगे लोहे के कड़े से इसके कारागार के अवशेष होने का प्रमाण मिलता है।

अजातशत्रु का अन्य नाम कुणिक भी था। पहले वह अंग की राजधानी चंपा में शासक नियुक्त हुआ और वहीं उसने शासन की कुशलता प्राप्त की। जनश्रुति के अनुसार भगवान बुद्ध के चचेरे भाई देवदत्त के उकसाने पर ही उसने पिता के विरुद्ध विद्रोह किया था। बौद्ध साहित्य में उसे कोशल देवी का और जैन साहित्य में उसे चेलना का पुत्र कहा गया है। अजातशत्रु के समय ही कोशल और मगध में संघर्ष शुरु हुआ। यह काफ़ी दिनों तक चला। इसमें कभी मगध तो कभी कोसल की विजय होती रही। बाद में कोसल के राजा प्रसेनजीत ने संधि कर ली और अपनी कन्या वजिरा का विवाह अजातशत्रु के साथ कर दिया। अंग, काशी, वैशाली आदि प्रदेशों को जीत कर उसने शक्तिशाली साम्राज्य खड़ा किया।

नया राजगृह – किलाबन्दीIMG_1768

बाद में अजातशत्रु ने भी भगवान बुद्ध की शरण ली और बौद्ध धर्म को अपना लिया। पांचवीं सदी में भारत की यात्रा करने वाले चीनी यात्री फा-हियेन के अनुसार पहाड़ियों के बाहरी हिस्से में नया राजगृह नगर का निर्माण अजातशत्रु ने ही किया था। ह्वेन सांग ने भी इसका समर्थन किया है। पाली भाषा में लिखी पुस्तकों में कहा गया है कि उसने नए सिरे से राजगृह की किलाबन्दी की क्योंकि उसे अवन्ति के राजा प्रद्योत द्वारा आक्रमण की आशंका थी। बुद्धघोष ने कहा है कि नगर भीतरी और बाहरी दो हिस्सों में बंटा था। नगर के चारो तरफ़ 32 बड़े द्वार और 64 छोटे द्वार थे।

सप्तपर्णी गुफा IMG_1754

भगवान बुद्ध की मृत्यु के बाद अजातशत्रु उनके भस्म में से अपने हिस्से का भाग लाकर उस पर उसने राजगृह में एक स्तूप खड़ा किया।  पुरातत्व विभाग के अनुसार अजातशत्रु द्वारा बनाया गया स्तूप का पता नहीं लगा। कुछ समय के बाद जब अग्रणी बौद्ध भिक्षुओं ने बुद्ध के उपदेशों की शिक्षा देने के उद्देश्य से एक मंडली बनाने के लिए एक सभा बुलाई तब अजातशत्रु ने इस मकसद के लिए सप्तपर्णी गुफा के सामने बने एक खास हॉल में उन लोगों के ठहरने का प्रबंध किया। उसका शासन काल ई.पू. 491 से ई.पू. 459 तक था।

अजातशत्रु के बाद दर्शक मगध का राजा हुआ। पर जैन और बौद्ध साहित्य के अनुसार उदायिन राजा हुआ था। उदायिन ने पाटलिपुत्र नगर बसा कर राजगृह से अपनी राजधानी बदल ली। उसने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र स्थापित की। संभवतः वहां से बहने वाली गंगा नदी द्वारा संचार व्यवस्था की सुविधा को ध्यान में रखकर उसने राजधानी बदली होगी।

नागदशक को मगध की गद्दी से हटा कर शिशुनाग मगध का राजा बना। उसने राजगृह को एक बार फिर से मगध की राजधानी बनाया। यहीं से राजगृह की अवनति शुरु हुई। कालाशोक या काकवर्ण ने पुनः पटलिपुत्र को मगध की राजधानी बना डाला। परन्तु अशोक के द्वारा इस स्थान पर एक स्तूप और एक स्तम्भ का निर्माण इस बात को सिद्ध करता है कि ईसा पूर्व तीसरी सदी में भी इस स्थान का महत्व बिल्कुल खत्म नहीं हुआ था।

क्रमशः (अभी राजगृह के दर्शनीय स्थल की जानकारी बाक़ी है ...)

शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

फुरसत में… राजगीर के दर्शनीय स्थलों की सैर

फुरसत में…

राजगीर के दर्शनीय स्थलों की सैर

IMG_0168मनोज कुमार

प्राचीन समय से बौद्ध, जैन, हिन्दू और मुस्लिम तीर्थ-स्थल राजगीर पांच पहाड़ियों, वैराभगिरी, विपुलाचल, रत्नगिरी, उदयगिरी और स्वर्णगिरी से घिरी एक हरी भरी घाटी में स्थित है। बिहार की राजधानी पटना से लगभग 100 कि.मी. की दूरी पर स्थित इस नगरी में पत्थरों को काटकर बनाई गई अनेक गुफ़ाएं हैं जो प्राचीन काल के जड़वादी चार्वाक दार्शनिकों से लेकर अनेक दार्शनिकों की आवास स्थली रही हैं।

मगध साम्राज्य की राजधानी

प्राचीन काल में यह मगध साम्राज्य की राजधानी रही है। प्राचीन काल में इसे कई नामों से जाना जाता था। “रामायण” में इसका नाम “वसुमती” बताया गया है। इसका संबंध पौराणिक राजा वसु से है जो ब्रह्मा के पुत्र कहलाये जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि वे ही इस नगर के प्रतिष्ठाता थे। महाभारत और पुराणों में इसे “बारहद्रथपुर” कहा गया है। इस नाम से वृहद्रथ की याद आती है। वे जरासंध के पूर्वज थे। इसे “गिरिव्रज” भी कहा जाता क्यों कि यह चारों तरफ़ से पहाड़ियों से घिरा है। सातवीं सदी के उत्तरार्द्ध में भारत आए प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन सांग के द्वारा लिखी गई बौद्ध पुस्तकों में इसे “कुशाग्रपुर” कहा गया है। ह्वेन सांग के अनुसार यह अच्छी किस्म की घासों का नगर था। इन्हीं खुश्बूदार घासों के उगने के कारण इसका नाम कुशाग्रपुर पड़ा। किन्तु दूसरा कारण भी हो सकता है। वृहद्रथ के बाद यहां के राजा कुशाग्र हुए और उनके ही नाम पर इस जगह का नाम कुशाग्रपुर पढ़ा हो। किन्तु इसका नाम “राजगृह” यानी राजाओं का घर ज़्यादा सही प्रतीत होता है। यह सदियों तक मगध की राजधानी रही।

जरासंध का अखाड़ा18102011(013)

राजगीर के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से एक है जरासंध का अखाड़ा है। इसे जरासंध की रणभूमि भी कहा जाता है। यह महाभारत काल में बनाई गई जगह है। यहां पर भीमसेन और जरासंध के बीच कई दिनों तक मल्ल्युद्ध हुआ था। कभी इस रणभूमि की मिट्टी महीन और सफ़ेद रंग की थी। कुश्ती के शौकीन लोग यहां से भारी मात्रा में मिट्टी ले जाने लगे। अब यहां उस तरह की मिट्टी नहीं दिखती। पत्थरों पर दो समानान्तर रेखाओं के निशान स्पष्ट दिखाई देते हैं। इसके बारे में लोगों का कहना है कि वे भगवान श्री कृष्ण के रथ के पहियों के निशान हैं।

18102011(009)रामायण के अनुसार ब्रह्मा के चौथे पुत्र वसु ने “गिरिव्रज” नगर की स्थापना की। बाद में कुरुक्षेत्र के युद्ध के पहले वृहद्रथ ने इस पर अपना क़ब्ज़ा जमा लिया। वृहद्रथ अपनी शूरता के लिए मशहूर था। उसने काशिराज की जुड़वा बेटियों से विवाह किया था। शादी के बहुत दिनों बाद तक उसके कोई संतान नहीं हुई। वृद्धावस्था आने पर वह अपना राजपाट अपने मंत्रियों के हवाले कर अपनी पत्नियों के साथ वन में तपस्या करने चला गया। एक दिन उसके आश्रम में महर्षि गौतम के वंशज चण्डकौशिक मुनि पधारे। उनका वृहद्रथ ने काफ़ी स्वागत-सत्कार किया। उससे प्रसन्न होकर मुनि ने राजा को वर मांगने को कहा। रजा ने कहा मैं बहुत ही अभागा इंसान हूं। जब पुत्र ही नहीं हुआ तो और क्या आपसे मांगूं?

18102011(010)यह सुन मुनि का दिल पसीजा और उन्होंने एक वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान लगाया। उनकी गोद में एक पका हुआ आम गिरा। मुनि ने उसे राजा को दिया और कहा कि इसे अपनी पत्नियों को खिला दे। राजा ने उसके दो टुकड़े कर दोनों रानियों को खिला दिया। रानी गर्भवती हुईं। जब उनके बच्चे पैदा हुए तो दोनों को घोर निराशा हुई। उनके बच्चे का शरीर आधा था। यानी एक के केवल एक हाथ, एक आंख, एक पैर,आदि। उसे देख कर ही घृणा होती थी। मांस के इस मनहूस पिंड को उन्होंने दाइयों के हवाले किया और कहा कि इसे फेंक दिया जाय। दाइयों ने उसे कूड़े के ढ़ेर पर फेंक दिया। कुछ देर के बाद उधर से एक राक्षसी गुज़र रही थी। उसने मांस के टुकड़े को देखा तो फूली न समाई। खाने के लिए उसने ज्यों ही मांस के दोनों पिंडों को उठाया तो वे आपस में जुड़ गए और एक सुन्दर बच्चा बन गया। राक्षसी ने एक सुन्दर युवती का वेश धारण किया और बच्चे को ले जाकर राजा को सौंपती हुई बोली कि यह आपका बच्चा है। राजा के ख़ुशी की सीमा नहीं रही। वह अपनी पत्नियों और बच्चे के साथ मगध वापस लौट आया और राजकाज करने लगा।

मुनि चण्डकौशिक के वरदान के कारण बच्चा काफ़ी बलशाली हुआ किन्तु उसका शरीर चूंकि दो टुकड़ों के मिलने से बना था, इसलिए कभी भी अलग हो सकता था। वही बच्चा जरासंध के नाम से मशहूर हुआ। वह अपनी शक्ति के लिए प्रसिद्ध था। जरासंध ने कृष्ण के मामा और मथुरा के राजा कंस के साथ वैवाहिक संबंध क़ायम किया। महाराज उग्रसेन के लड़के कंस ने जरासंध की बेटी से शादी कर लिया था। कंस को श्री कृष्ण ने उसके पापों की सज़ा देते हुए वध कर डाला। श्री कृष्ण और उनके साथियों ने जरासंध के विरुद्ध भी युद्ध किया। तीन वर्षों तक लड़ाई हुई किन्तु अंत में उनकी हार हुई और मथुरा छोड़कर दूर द्वारका में जाकर रहना पड़ा।

उन दिनों इन्द्रप्रस्थ में पांडव न्यायपूर्वक राज कर रहे थे। युधिष्ठिर के भाइयों की इच्छा हुई कि राजसूय यज्ञ कर सम्राट का पद धारण किया जाए। सलाह-मशवरा के लिए श्री कृष्ण को संदेश भेजा गया। संदेश पाकर श्री कृष्ण द्वारका से इन्द्रप्रस्थ पहुंचे। युधिष्ठिर को भरोसा था कि श्री कृष्ण सही सलाह देंगे। उन्होंने बताया कि मगध के राजा जरासंध ने सभी राजाओं को जीतकर उन्हें  अपने वश में कर रखा है। यहां तक कि शिशुपाल जैसे पराक्रमी राजा ने भी उसकी अधीनता स्वीकार कर ली है। अतः बिना जरासंध को हराए सम्राट पद पाना दूर की बात है।

यह सब सुन शान्तिप्रिय युधिष्ठिर ने साम्राज्याधीश बनने का विचार त्याग दिया। यह भीमसेन को नहीं भाया। उसने कहा कि श्री कृष्ण की नीति कुशलता, उसका खुद का बल और अर्जुन का शौर्य मिल जाए तो वे जरासंध की शक्ति पर क़ाबू पा सकते हैं। अर्जुन ने भी भीम का समर्थन किया और कहा कि जिस काम को हम कर सकते हैं उसे हमें ज़रूर करना चाहिए। अंत में निश्चय हुआ कि जरासंध का वध करना उनका कर्तव्य है। किन्तु श्री कृष्ण ने उन्हें आगाह किया कि उसपर हमला करना बेकार है, उसे तो मल्ल युद्ध में ही हराया जा सकता है।

भीम, अर्जुन और श्रीकृष्ण एक साथ वेश बदल कर राजगृह में प्रवेश किए। निःशस्त्र और वल्कल धारण किए अतिथि को कुलीन समझ जरासंध ने उनका आदर के साथ स्वागत-सत्कार किया। जवाब में सिर्फ़ श्री कृष्ण ही बोले, भीम और अर्जुन चुप रहे। श्री कृष्ण ने बताया कि उनका मौन व्रत है जो आधी रात के बाद ही खुलेगा। जरासंध ने तीनों अतिथियों को यज्ञशाला में ठहराया और जब आधी रात हुई तो अतिथियों से मिलने गया। परन्तु वहां उसे यह देख कर ताज़्ज़ुब हुआ कि उनकी पीठ पर ऐसे चिन्ह हैं जो धनुष की डोरी से पड़ते हैं। ये तो ब्राह्मण नहीं है। उसने कहा तुम लोग तो ब्राह्मण नहीं दिखते, सच बताओ, कौन हो तुम लोग? इस पर सच बताते हुए उन लोगों ने कहा कि हम तुमसे द्वन्द्व युद्ध करने आए हैं। उन्होंने अपना परिचय भी दिया। जरासंध ने उनका प्रस्ताव स्वीकार करते हुए कहा कि कृष्ण तो ग्वाले हैं, और अर्जुन बच्चा है इसलिए उन दोनों से लड़ने का सवाल नहीं है। वह भीम से लड़ने के लिए तैयार हो गया।

18102011(012)अखाड़े में भीम और जरासंध के बीच कुश्ती शुरु हुआ। तेरह दिन तक लगातार दोनों में मल्ल युद्ध होता रहा। चौदहवें दिन जरासंध थोड़ी देर के लिए अपनी थकान मिटाने के लिए रुका। यह देख श्री कृष्ण ने भीम को इशारे से समझाया। भीमसेन ने जरासंघ को उठाकर ज़ोर से चारो ओर घुमाया और ज़मीन पर पटक कर उसके दोनों पैर पकड़ कर बीच से चीर डाला। जरासंध को मरा हुआ समझ कर भीम अपनी जीत का उल्लास मना ही रहा था कि उसके चिरे हुए टुकड़े आपस में जुट गए और वह खड़ा होकर फिर से लड़ने लगा।

अब समस्या थी कि जरासंध को कैसे हराया जाए? श्री कृष्ण ने भीम को फिर इशारे में समझाया। उन्होंने एक तिनका उठाया। उसे बीच से चीरा। उन्होंने दायें हाथ के टुकड़े को बाईं ओर और बाएं हाथ के टुकड़े को दाईं ओर फेंक दिया। अब बात भीम की समझ में आ गई। उसने दुबारा जरासंध के शरीर को चीर डाला और दोनों हिस्सों को एक दूसरे की विपरीत दिशा में फेंक दिया। अब टुकड़े आपस में नहीं जुड़ सके। इस प्रकार उसने जरासंध को हराया और उसे मार डाला। बंदीगृह के सभी राजाओं को कैद से आज़ाद कर दिया गया। जरासंध के बेटे सहदेव को मगध की राजगद्दी पर बिठाकर वे इन्द्रप्रस्थ लौट आए।

क्रमशः (अभी राजगृह के दर्शनीय स्थल की जानकारी बाक़ी है ...)