रविवार, 4 दिसंबर 2011
शनिवार, 3 दिसंबर 2011
फ़ुरसत में ... एक दोपहरी साहित्य अकादेमी के प्रांगण में ..!
फ़ुरसत में ...
एक दोपहरी साहित्य अकादेमी के प्रांगण में ..!
दिल्ली दौरे पर था। इसी सप्ताह। अपना काम निबट चुका था। जब काम दोपहर के भोजनावकाश के पूर्व निपट जाता है, तो मैं फ़ुरसत में होता हूं। वापसी की फ़्लाइट होती है शाम के पांच बजे। सो अपने पास दो-तीन घंटे फ़ुरसतियाने के होते हैं। अमूमन मैं उसी सड़क पर आगे बढ़ जाता हूं। उस कोपरनिकस मार्ग के अंतिम छोर पर स्थित है साहित्य अकादेमी। पहले तले पर के इसके ‘बुक शॉप’ में पुस्तकें देखते, काम की पुस्तकें चुनते एक-डेढ़ घंटे तो गुज़र ही जाते हैं। यह मेरा नियम-सा बन चुका है।
इसी क्रम में इस बार भी वहीं था कि अचानक ख़्याल आया क्यों न आसपास के ब्लॉगर मित्रों से मिलकर उनका कुछ हाल-चाल जाना जाए। अरुण को फोन किया। वह तो मानों तैयार ही बैठा था, उसने तुरत हामी भर दी। राधारमण जी को जैसे मेरे ही फोन का इंतज़ार हो, बोले आप को ही याद कर रहा था, बोलिए कहां मिलना है? मैंने कहा एक मिनट में कॉल बैक करता हूं। अब बारी थी सलिल भाई की। उनको जब फोन लगाया, तो उन्होंने पूछा, ‘कहां हो?’ मेरे यह बताने पर कि मैं तो साहित्य अकादेमी में हूं, उन्होंने कहा, दो मिनट में पहुंचता हूं। जब तक मैं ‘बुक शॉप’ में अपनी चुनी पुस्तकें उठाता, बिल आदि का भुगतान करता, सलिल भाई अपनी चिर-परिचित मुस्कुराहट के साथ हाज़िर थे। मैं तो चौंक ही गया। मेरे मुंह से अनायास निकला, यहीं थे क्या? वे हंसने लगे।
कंधे पर टंगे स्वेटर की बाजुओं को उन्होंने छाती पर बांधा और बोले चलिए नीचे चलते हैं, वहीं लॉन की घास पर बैठकर बातें करेंगे। नीचे उतर कर हम लॉन की तरफ़ बढ़ ही रहे थे कि अरुण भी पहुंच गया। पांच मिनट के भीतर राधारमण जी भी आ गए। हम सब साहित्य अकादमी के गार्डेन की लॉन की घास पर बैठकर दिल्ली की गुनगुनी धूप का डेढ़-दो घंटे तक मज़ा लेते रहे। सच मानिए, इन एक सौ बीस मिनट में न हमने ब्लॉग की चर्चा की, न ब्लॉगिंग की और न किसी ब्लॉगर की ही! यह पहली बार हो रहा था। इसके पहले भी जहां ये चार यार मिले ब्लॉग का बुख़ार सिर चढ़ कर बोला। उन बैठकियों के दौरान शायद ही कोई क्षण ऐसा गुज़रा हो जब हमने ब्लॉग जगत के इतर कोई बात की हो!!
जब हम उस दिन बात कर रहे थे, तो सिर्फ़ बात कर रहे थे। मुझे उस मुलाक़ात में कुछ खास अलग या विशेष हुआ हो, नज़र नहीं आया। पर जब आज फ़ुरसत में ... उस दिन को याद करने बैठा हूं, ... तो लगता है कहीं-न-कहीं हम सब इस आभासी दुनिया की चमक-दमक और उपयोगिता से ऊब-से ही गए हैं। सलिल भाई ने तो यहां तक कहा कि पहले तो सप्ताह में दो पोस्ट लगाने की धुन सवार रहती थी, अब महीने में भी दो हो जाए, तो बहुत है। अरुण का भी यही हाल है – कहता है बहुत सुस्ती-सी छा गई है। पोस्ट लगाने का मन ही नहीं करता। राधारमण जी तो ‘ऐज़ यूज़ुअल’ हाल-चाल और स्वास्थ्य के प्रति ही संवेदनशील दिखे।
ऐसा भी उस दिन नहीं हुआ कि हमने देश-दुनिया के प्रति अपनी-अपनी चिंता जताई हो। या देश की ही किसी समस्या पर विमर्श कर डाला हो। साहित्य अकादेमी के प्रांगण में बैठकर हमने साहित्य के ही गिरते-उठते स्तर पर चर्चा कर डाली हो .. न, ऐसा भी न हुआ। शायद समस्याओं के प्रति हमारी संवेदनशीलता में ही कमी आ गई हो। उनकी तो वो जानें, मुझे तो यही लगता है, जब इतने बड़े और विद्वान लोग हैं ही इस पर सोचने-विचारने के लिए, तो हम सोच कर ही कौन-सा तीर मार लेंगे।
हमने इन लमहों में आपस के दुख-सुख बांटे। हाल-चाल – सुने -- गुने। सलिल भाई का प्रोमोशन आ गया है। हम सब ख़ुश हुए। बधाई दी। मिठाई खाने-खिलाने का अनुरोध रखा। दूसरे ही पल यह जानकर कि इस पदोन्नति से सलिल भाई को कोई अर्थिक लाभ नहीं होने वाला है – तुरत ही हमने मिठाई खाने-खिलाने वाला अनुरोध वापस ले लिया और यह जानकर कि इसके (पदोन्नति के) कारण उनके ऊपर तबादले की तलवार भी लटकी हुई है – हमारा मिठाई खाने-खिलाने वाला अनुरोध सहानुभूति और संवेदना में बदल चुका था। ख़ासकर तब, जब बिटिया दसवीं की परीक्षा की तैयारी कर रही हो, और पिता का तबादला हो जाए, बड़ा ही खतरनाक मामला हो जाता है।
राधारमण जी की पदोन्नति अभी तक नहीं आई है, और सरकारी रफ़्तार तो फाइलों की रफ़्तार पर निर्भर करती है – जो अपनी ही रफ़्तार से चलती है। जो फाइल जितनी वजनी होती है, उसकी गति उतनी ही तेज़ होती है। जो फाइल रूखी-सूखी, दीन-हीन होती है, वह गति से भी सुस्त और धीमी हो जाती है। कभी-कभी तो वह अंधकार के गर्त में पड़ी धूल-मिट्टी फांकती रहती है। हां, उनकी (राधारमण जी की) पदोन्नति तो नहीं हुई, पर तबादला ज़रूर हो गया है। अब वे योजना आयोग की कुर्सी को शोभायमान करते हुए देश की ग़रीबी की रेखा को नए ढंग से परिभाषित करने में लगे हुए हैं।
हमने उनकी योजना आयोग की पदस्थापना पर ख़ुश होकर बधाई देने का अपना दायित्व निर्वाह किया ही था कि हमारे सामने उनकी समस्या सुरसा की तरह मुंह बाये खड़ी हो गई। अब तक राधारमण जी अपने पहले के विभाग के कोटे के सरकारी मकान में थे। वहां से तबादला हो गया, तो उस विभाग ने मकान ख़ाली करने का नोटिस दे दिया था। ... और इसी सप्ताह यानी आज के दिन वह अवधि पूरी हो रही है। कोई अनुशासनिक/प्रशासनिक कार्रवाई न हो इसलिए वे नए मकान की चिंता में घुले जा रहे थे। मकान उचित दर, उचित स्थल और दूरी पर हो, जहां से बाल-बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो, मिल नहीं रहा था। मिठाई खाने-खिलाने का आग्रह छोड़ अरुण अपना फोन खड़काने लगता है – और अपने इष्ट-मित्रों से बात कर राधारमण जी को समस्या के यथाशीघ्र निदान का आश्वासन देता है।
अरुण की न तो पदोन्नति हुई है, और न ही तबादला। फिर भी वह किसी न किसी उधेड़-बुन में ही था। पदोन्नति आ जाए, तो वाह-वाह, न आए तो भी – वाली उसकी मुद्रा थी। हरदम कुछ-न-कुछ नया करने की उसकी धुन उस पर सवार रहती ही है। इस बार वह विश्व पुस्तक मेले में स्टॉल बुक करवा चुका है और बड़े उत्साह के साथ पुस्तक प्रकाशन के काम में जुटा हुआ है। अरुण से बहुत देर तक और विस्तार में हम पुस्तक प्रकाशन और छपाई के बारे में ज्ञान प्राप्त करते रहे।
इसी बीच अरुण के चिहुंकने की आवाज़ ने हमारी बातों का सिलसिला तोड़ा। हम कुछ पूछते उसके पहले ही वह खड़ा हो चुका था। जब वस्तुस्थिति का जायज़ा लिया तो मलूम हुआ कि लॉन की घास को पानी पटाने के लिए माली ने कहीं पानी का नल खोल कर रख छोड़ा था। पानी सरकते-सरकते अरुण तक पहुंच चुका था। इस आकस्मिक व्यवधान ने हमें तत्काल वहां से उठने को विवश किया। हमने सभा विसर्जित की और अगली बैठकी का एक-दूसरे को आश्वासन देते हुए अपने-अपने ठिकाने का रुख किया।
एयर पोर्ट के रास्ते में यह सोच रहा था, जाते ही इस बार की मुलाक़ात पर फ़ुरसत में लिखूंगा और यह शे’र मन में चल रहा था,
न जाने ये लम्हें कल हो ना हो।
हों भी ये लम्हें, तो क्या मालूम
शामिल उन पलों में हम हो ना हो।
