शनिवार, 22 नवंबर 2014

फ़ुरसत में ... 121 निराशा ही निराशा

फ़ुरसत में ... 121

निराशा ही निराशा

मनोज कुमार

कभी-कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है कि मैं निराशावादी होता जा रहा हूं। मुझे पता है कि निराशा बड़ी ख़तरनाक़ चीज़ है। फिर भी, मैं समाज, देश, परिवार के लिए कतई ख़तरनाक़ नहीं हूं। यह बात मुझे संतोष प्रदान करती है। जो आशावादी होते हैं, वे भी तो कभी-कभार ख़तरनाक़ मंसूबे पाल लेते हैं। दरसल उनकी महात्वाकांक्षा विशाल होती है। नेपोलियन, हिटलर, मुसोलिनी आदि भी तो, आशावादी रहे होंगे। उनकी महात्वाकांक्षा ने क्या गुल खिलाया, यह किसी से छिपा है क्या? हां, मेरी निराशा, राष्ट्रीय या मानवीय मूल्यों में कुछ योगदान करने से मुझे वंचित किए दे रही है। जो भी हो मेरी विचारधारा तो ख़तरनाक़ होने से रही। ख़तरनाक़ होने के लिए साहसी होना ज़रूरी है और मेरी निराशा मुझे कुछ करने का साहस ही नहीं प्रदान करती।

यह कोई आज का रोग नहीं है। इसके लक्षण तो शायद शैशवकाल से ही मुझमें रहे होंगे। प्राथमिक कक्षाओं में किसी असाधारण क्षमता रहित मेरा प्रदर्शन घर-समाज के लोगों को यह चिंता करने पर विवश किया करता था कि ‘यह लड़का कैसा होता जा रहा है? हमारे ज़माने में तो ऐसा नहीं था।’ न जाने क्यूँ मैं किसी भी विषय पर अपना स्पष्ट मत नहीं रख पाता जो प्राय: मेरी कमज़ोरी मान ली जाती थी। दूसरी ओर जो बहस करता, वह उसकी विशेषता होती थी। मैं पिता, माता, गुरु, श्रेष्ठ की बातों को मानने में, जिसे लोग आमतौर पर हां-में-हां मिलाने की संज्ञा देते, विश्वास रखता था। समय के साथ यह मेरे व्यक्तित्व का निगेटिव फीचर बन गया। ... और आलोचक की निगाहों में मैं दब्बू! मेरा यही दब्बूपना मेरी निराशा का कारण बनता गया।

जो बहस करता, किसी की बात नहीं मानता, अपनी मनवाता, - वह एक्स्ट्रोवर्ट कहलाता और समाज में उसकी पूछ होती। मैं तो किसी बात पर प्रतिवाद करता ही नहीं। मुझे हर पल यही लगता कि मेरी जानकारी ही क्या है, जो मैं इस विषय पर कुछ बोलूं? मैं अख़बार पढ़ता नहीं था, घर में आता ही नहीं था। रेडियो सुनता था, पर फ़िल्मी गीत भर। विविध भारती का पंचरंगी प्रोग्राम मेरा फेवरिट था। अब उससे मेरा सामान्य ज्ञान तो बढ़ने से रहा। विशेष जयमाला फ़ौजी भाइयों के लिए होता था। उसे सुनते हुए हमेशा यह बोध होता कि देश की रक्षा के लिए सब कुछ त्याग देना ही सर्वोत्कृष्ट है। आज के छोटे-छोटे बच्चों को देखता हूं – वे अखबार पढ़ते हैं (अंग्रेज़ी के) टीवी देखते हैं – इंगलिश चैनल भी, रेडियो तो सुनते ही नहीं हैं, वह आउट ऑफ फैशन है, सुनते भी हों तो रेडियो मिर्ची। वीडियो गेम्स खेलते हैं, मोबाइल पर न जाने क्या-क्या करते रहते हैं, नेट और लैपटॉप उनकी आवश्यक आवश्यकताओं में शुमार हैं। यह सब देख कर मुझे लगता है कि मैंने अपना बचपन तो ढंग से जिया ही नहीं। मिट्टी में कबड्डी खेलना, डोलपात, गुल्ली-डंडा खेलना, .. यह जीना भी कोई जीना था लल्लू!! इन सब को याद करते ही मेरी निराशा और बढ़ जाती है। आज के बच्चे कौन बेटर पीएम होगा, जो ओबामा को सटीक (मुंह तोड़) जवाब देगा – पर बहस कर लेते हैं। मैंने तो मुखिया और सरपंच पर भी अपना मत कभी नहीं रखा। कितनी निराशाजनक स्थिति रही है मेरी।

घर का वातावरण भी वैसा ही था कि मेरी निराशा की लताएं पुष्पित-पल्लवित होती रहें। खेलने तक पर पाबंदी थी। ‘पढ़ो नहीं तो जीवन भर खेलते रह जाओगे’ का मंत्र हर वक़्त पढ़ाया जाता। यह बताया जाता कि चरित्र-निर्माण हमारी सबसे बड़ी पूंजी है। इन सब मंत्रों के चक्कर में हमने उसे ही अपना जीवन-लक्ष्य बना लिया। हालाँकि पढ़-लिखकर भी बस और बस पैसा कमाना कभी उद्देश्य ही नहीं रहा। आज के बच्चों का लक्ष्य बहुत स्पष्ट है – ऊंचा वेतन, ऐश-ओ-आराम का सामान, रुतबा, स्टेटस ... न जाने क्या-क्या! सूचना और जानकारी के इतने माध्यम उनकी मुट्ठी में हैं कि वे हर क़दम पर हमसे दो क़दम आगे हैं। आदर्श, सिद्धांत, नैतिकता गए ज़माने की बात हो गई है जबकि उनसे चिपक कर घोर निराशा में डूब गया हूं मैं।

निराशा के कारण अंधकार और असुरक्षा की भावना मुझमें कूट-कूट कर भर गई है। कई बार तो देखता हूं, जितना मैं कमाते हुए ख़र्च करता हूं, उससे ज़्यादा यह पीढ़ी बेरोज़गारी में फूँक देती है। वे क्रांति की, परिवर्तन की और अधुनिकीकरण की पहल ही नहीं करते, उसमें विश्वास भी रखते हैं। यह देख मुझे आजकल सिद्धांतों की व्यर्थता दिखने लगी है। स्वच्छ प्रशासन मांगने से मुझे डर लगता है। आजकल मैं आदर्शवादी के साथ-साथ त्यागवादी भी बन गया हूं। पर, आजतक मैं निराशा का त्याग नहीं कर पाया हूं।

मेरी निराशाओं ने मुझमें ढेर सारी कुंठाएं भर दी हैं। .. और इन कुंठाओं के सहारे मैं अपना जीवन जी रहा हूं। कुंठा सहित जीवन जीना भी एक कला है। लगता है इस कला में मैं पारंगत हो गया हूं। देश की महंगाई बढ़ती है – मैं निराश हो जाता हूं। अब कुछ नहीं होगा। हालात सुधर ही नहीं सकते। स्वच्छता अभियान से कुछ नहीं होगा। सब दिखावा है। गंदगी यूं ही फलती-फूलती रहेगी, बिखरी पड़ी रहेगी। मैं हाथ-पे-हाथ धरे बैठे हुए अपनी निराशा में जीता रहता हूं।

मॉल कल्चर के युग में भी मैं बीते युग को जी रहा हूं। इस कल्चर का अपना एक अलग आकर्षण है वहीं गांव की संस्कृति की भी अलग महँक है। संक्रमण का एक काल है यह। मैं बदलती परिस्थिति को सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पा रहा। त्याग तो कई किए पर इस निराशा का त्याग नहीं कर पा रहा। यह उस पूरी पीढ़ी की निराशा है या सिर्फ़ मेरी, कह नहीं सकता। कहने सुनने को बचा भी क्या है? आजकल तो बस मुकेश का यह गीत मैं अकसर गुनगुनाता रहता हूं,

तुम्हें ज़िन्दगी के उजाले मुबारक़

अंधेरे हमें आज रास आ गये हैं।

नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी में फ़र्क़ तो है। पर इस फ़र्क़ का किसी को कोई मलाल नहीं। हमारी ज़िन्दगी तो सिर्फ़ पछताने में बीत गई। उस पछतावे से उपजी निराशा को सीने से लगाए मैं यह शे’र दुहराता रहता हूं,

अब ये भी नहीं ठीक के हर दर्द मिटा दें,

कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं।

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गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

गांधी जयंती और स्वच्छता अभियान

गांधी जयंती और स्वच्छता अभियान 

1886

गांधी जी तब सत्ताइस वर्ष के थे। उन्हें पता लगा कि बम्बई (मुंबई) में ब्यूबोनिक प्लेग की महामारी फूट पड़ी। चारों तरफ़ घबराहट फैल गई। पूरे पश्चिम भारत में आतंक छा गया। जब बम्बई में प्लेग फैला तो राजकोट में भी खलबली मच गई। यह आवश्यक हो गया कि राजकोट में निवारक उपाय किए जाएं। गांधी जी ने हर बार की तरह इस बार भी सरकार को आरोग्य विभाग में अपनी सेवाएं अर्पित करने की इच्छा, पत्र द्वारा जता दीं। सार्वजनिक सेवा गांधी जी की राजनीति का मुख्य अंग थी। वे जनसेवा और देवाराधना में कोई व्यवधान न देखते थे। उनकी ईश्वरभक्ति जनता जनार्दन की सेवा थी।

उन्हें सनिटरी विजिटर्स कमिटी का सदस्य बना दिया गया। वे सार्वजनिक सेवा कार्य में जुट गए। सफ़ाई की सुचारु व्यवस्था में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। राजकोट नगर की आरोग्य रक्षा के लिए उन्होंने घर-घर और घर-बाहर की सफ़ाई का कार्यक्रम अपनाया। यह उन्हें काफ़ी रुचिकर काम लगा। गांधी जी ने शौचालय की सफ़ाई पर ज़ोर दियाउन्होंने कहा कि यही वह जगह जो इस बीमारी के फैलने का घर है।

शौचालयों का निरीक्षण

कमेटी ने निश्चय किया कि गली-गली जाकर शौचालयों का निरीक्षण किया जाए। पहली बार उन्हें भारतीय घरों में शौचालयों और सफ़ाई व्यवस्था को देखने का मौक़ा मिला था। अपने दौरों में उन्हें पता चला कि समृद्ध लोगों के घर, अत्यंत ग़रीब लोगों और विशेषकर अछूतों के घरों की तुलना में, कम साफ़ थे। उन दिनों अछूत माने जाने वाले लोगों को पहली बार उन्होंने उनके घरों में देखा। ग़रीब लोगों ने अपने शौचालय का निरीक्षण करने देने में बिल्कुल आनाकानी नहीं की। कुछ धनाढ़्य लोगों के शौचालयों और मूत्रालयों के बारे में उन्होंने लिखा है कि उच्चतम वर्ण के हिन्दू, ऐसी स्थायी सड़ांध में रह, खा और सो सकते होंगे, ऐसा सोचा न था। कई लोगों ने तो घरों का मुआयना करने की इज़ाज़त तक न दी। उनके शौचालय अधिक गन्दे थे, उनमें अंधेरा था, कुड्डी पर कीड़े बिलबिलाते थे। जीते-जी रोज़ नरक में प्रवेश करने जैसी स्थिति थी।

भारतीय समाज के अपने सुधार कार्य में उन्हें भविष्य में भी कई बड़े लोगों के कम सहयोग और अधिक प्रतिरोध का अनुभव होना था। बाद के दिनों में जब उन्होंने सुधार कार्यक्रमों को हाथ में लिया तो अपने सहकर्मियों से मल-मूत्र की टंकियों को साफ़ करने को कहते। उनका मानना था कि यह जातिप्रथा की जकड़न से हमे आज़ाद करेगा। उनका यह भी मानना था कि कोई काम खराब नहीं होता।

भंगी की बस्ती में

कमेटी भंगी की बस्ती में भी गई। गांधी जी के साथ सिर्फ़ एक सदस्य गया, अन्य कोई गण्यमान्य व्यक्ति नहीं गया। अन्य सदस्यों को लगा कि वहां जाना अनर्थक है। पर गांधी जी को भंगियों की बस्ती देखकर सानन्द आश्चर्य हुआ। भंगी लोगों को भी गांधी जी को वहां देख कर अचम्भा हुआ। जब गांधी जी ने शौचालय देखने की इच्छा ज़ाहिर की तो उनमें से एक ने कहा, “हमारे यहां शौचालय कैसे? हमारे शौचालय तो जंगल में हैं। शौचालय तो आप बड़े आदमियों के यहां होते हैं।”

गांधी जी ने पूछा, “तो क्या आप अपने घर हमें देखने देंगे?”

“आइए न भाई साहब! जहां भी आपकी इच्छा हो, जाइये। ये ही हमारे घर हैं।”

जब वे अन्दर गए और घर तथा आंगन की सफ़ाई देखा तो ख़ुश हो गए। घर के अन्दर सब लिपा-पुता देखा। आंगन झाड़ा-बुहारा था। बरतन चमचमा रहे थे। गांधी जी को उस बस्ती में बीमारी फैलने का डर नहीं दिखाई दिया।

वैष्णव मंदिर में

वे उस वैष्णव मंदिर भी गए, जहां उनकी मां पुतली बाई देव-दर्शन के लिए नित्य-नियम से जाती थीं। वहां गए बिना मां अन्न ग्रहण नहीं करती थीं। मंदिर के पुजारी ने उनका स्वागत किया। मंदिर के अहाते का कोना-कोना उन्होंने देखा। उन्हें देख कर दुख हुआ कि एक कोने में जूठी पत्तलों के ढ़ेर थे। वह भाग कौऔं और चीलों का अड्डा बन गया था। देव भूमि के आंचल में ही कूड़ाघर बन गया था। इस तरह के पवित्र स्थल पर तो आरोग्य के नियमों का अधिक से अधिक पालान होने की आशा रखी जाती है। गांधी जी को यह देखकर दुख हुआ कि जिस देश की सदियों से प्रथा रही हो अपना अंदर-बाहर को स्वच्छ रखने की वहां के लोग इस विषय में इतने असावधान और उदासीन हो गए हैं।

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शौचालय एवं मूत्रालय की सफाई

1901

जब गांधी जी दक्षिण अफ़्रीका से भारत पहुंचे, उसी समय देश की राजधानी कलकत्ते में उस साल (1901, दिसम्बर) दिनशॉ एदलजी वाच्छा की अध्यक्षता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस महासभा का 17वां वार्षिक अधिवेशन हो रहा था। गांधी जी को लगा कि चूंकि कलकत्ते में सारे दिग्गजों का जमावड़ा होगा इसलिए शायद वहां भारत की नब्ज़ पकड़ में आ जाए। इसी सोच के साथ गांधी जी ने उस अधिवेशन में जाना तय किया। वहां आए प्रतिनिधि भी कुछ कम नहीं थे। उन्हें भी तो इतने ही दिन मिलते थे कुछ सीखने को। कांग्रेस के कामकाज के ढ़ंग ने गांधीजी को प्रभावित नहीं किया। उन्हें प्रतिनिधियों के बीच एकता की कमी का एहसास हुआ। वे अंग्रेजी में वार्तालाप कर रहे थे। उनके हावभाव एवं बातचीत में पाश्‍चात्य शैली टपक रही थी। वे अपने हाथ से कोई काम नहीं करते। सब बातों में उनके हुक्म निकलते, “स्वयंसेवक यह लाओ; स्वयं सेवक वह लाओ”। ऊपर से डेलिगेट की छुआछूत और खानपान की लंबी-चौड़ी व्यवस्था, दकियानुसी रंग-ढंग देख कर गांधी जी को बड़ा आश्चर्य हुआ, साथ ही दुख भी। छुआ-छूत को मानने वाले वहां बहुत से लोग उपस्थित थे। द्राविड़ी रसोई बिल्कुल अलग थी। उन प्रतिनिधियों को तो ‘दृष्टिदोष’ भी लगता था। उनके लिए कॉलेज के अहाते में चटाइयों का रसोईघर बनाया गया था। उसमें धुआं इतना रहता था कि आदमी का दम घुट जाए। खाना-पीना सब उसी के अन्दर। वह रसोईघर क्या था, एक तिजोरी थी। वह कहीं से भी खुला न था।

यह सब गांधी जी को चिंता में डाल रहा था। कांग्रेस में आनेवाले प्रतिनिधि जब इतनी छुआछूत मानते थे, तो उन्हें भेजने वाले लोग कितनी रखते होंगे? ऊपर से गंदगी की हद नहीं थी। कैम्प की अनिवार्य ज़रूरतों, जैसे साफ-सफाई आदि की तरफ किसी का जरा भी ध्यान नहीं था। शौचालय जाम था और चारों तरफ़ मल और पानी ही पानी फैल रहा था। शौचालयों की संख्य़ा ज़रूरत से कम थी। दुर्गन्ध चारों तरफ़ फैल रही थी। एक स्वयंसेवक को गांधी जी ने गन्दगी दिखाई। उसने कहा यह काम तो भंगी का काम है। गांधीजी उन्हें सबक सिखाना चाहते थे। उनसे गंदगी और बदबू सहन नहीं हुई। बहुत परिश्रम से उन्होंने एक झाड़ू खोज निकाला। चुपचाप उन्होंने शौचालय एवं मूत्रालय की सफाई शुरु कर दी। पर यह साफ़-सफ़ाई तो उनकी अपनी सुविधा के लिए हुई थी। भीड़ इतनी अधिक थी और शौचालय इतने कम कि हर बार के उपयोग के बाद उनकी सफ़ाई होनी ज़रूरी थी। वह काम गांधी जी अकेले तो कर नहीं पाते। यदि उनका वश चलता तो शौचालयों की सफ़ाई वे स्वयं ही करते, लेकिन उन्हें उसी शौचालय की सफ़ाई पर ही संतोष करना पड़ा, जिसे वे स्वयं इस्तेमाल कर रहे थे। गांधी जी ने अपने लिए तो वह काम कर लिया और उन्होंने यह पाया कि वहां आए लोगों को वह गन्दगी ज़्यादा अखरती भी नहीं थी।

लोगों की सफ़ाई का स्तर इतना गिरा हुआ था कि कि प्रतिनिधिगण रात में कमरे के बाहर सामने वाले बरामदे में ही टट्टी-पेशाब कर देते थे। उठने-बैठने, चलने-फिरने की जगह पर ऐसी गंदगी और बदबू थी की वहां रहना असह्य था। सवेरे गांधी जी ने स्वयंसेवकों को मैला दिखाया, पर कोई उसे साफ़ करने को तैयार न था। गंधी जी उसे साफ़ करने लगे।

लोगों ने उनसे पूछा, आप क्यों अछूतों का काम कर रहें हैं?”

गांधीजी का जवाब था क्योंकि सवर्ण लोगों ने इस जगह को अछूत बना दिया है

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