शनिवार, 30 मई 2026

484. भारत का विभाजन - उत्तरदायी कौन?

राष्ट्रीय आन्दोलन

484. भारत का विभाजन - उत्तरदायी कौन?

प्रवेश

अगस्त, 1947 के पूर्व ही सरदार पटेल के प्रयासों से कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद के अलावे अन्य सभी रियासतें भारतीय संघ में सम्मिलित हो गईं। पंजाब और बंगाल का विभाजन हो गया। सिंध पाकिस्तान में मिल गया। सिलहट पाकिस्तान में चला गया। पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत भी पाकिस्तान को मिला। विभाजन की विभीषिका में हज़ारों जानें गईं और लाखों लोग बेघर हो गए। असंख्य स्त्रियों की इज़्ज़त लूटी गई। क्यों हुआ यह सब? क्या कांग्रेस के नेताओं को सत्ता का इंतज़ार असह्य हो रहा था? क्या ब्रिटिश साम्राज्य भारत छोड़ने के पहले अपना आख़िरी दांव खेल रहा था? गांधीजी अचानक इतने अशक्त क्यों हो गए थे?

लंबे संघर्ष के बाद भारत आज़ाद तो हो गया, लेकिन उसके साथ एक रक्त-रंजित विभाजन ने सारे देश के तान-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया। भारत छोड़ो आन्दोलन को बर्बर दमन द्वारा दबा दिया गया था, फिर भी स्वतंत्रता आई। और जब स्वाधीनता आई, तो वह स्वाधीनता नहीं निकली जिसके सपने भारत ने देखे थे। उसने हमारा अंग विच्छेद कर दिया था। हमारा ख़ून बहाया था। भाई का भाई के हाथ रक्त-रंजित संघर्ष हुआ था। विभाजन सदियों पुराने हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य का दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम था। भारत के विभाजन के लिए सामान्यतः अंग्रेज़ी सरकार, गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और मुहम्मद अली जिन्ना को दोषी ठहराया जाता है। किंतु यह भी सत्य है कि भारत की एकता बनाए रखने के लिए यथासंभव प्रयास किए गए। वे विफल हो गए। इसके लिए किसी एक पक्ष या किसी एक व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। भारत का विभाजन एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम था। इसके लिए न तो अंग्रेज़ी राज, न जिन्ना, न कांग्रेस, और न ही गांधी, नेहरू, पटेल या सांप्रदायिकता की भावना अकेले उत्तरदायी थी। इस सभी ने चाहे-अनचाहे विभाजन की प्रक्रिया में सहयोग दिया। जिन्ना की नए राष्ट्र की लालसा और नेहरू पटेल द्वारा भारत को शीघ्र अंग्रेज़ी राज से मुक्त कराने की प्रबल उत्कंठा ने अंततः 14-15 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान और भारत का निर्माण कर दिया। भारत दो हिस्सों में बंट गया।

'फूट डालो और राज करो' की नीति

क्या विभाजन के बीज अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' नीति में निहित है? 1857 की क्रान्ति में हिन्दू-मुस्लिम साथ मिलकर ड़े थे। अँग्रेज़ और खासकर लॉर्ड डफरियह समझ गया था कि हिन्दू-मुस्लिम एकता साम्राज्य के लिए खतरा है 1885 में कांग्रेस की स्थापना हुई थी उसके बाद के तीन वषों बाद लॉर्ड डफरिन ने कांग्रेस की सदस्य संख्या का अध्ययन किया था उसने पाया कि कांग्रेस में हिन्दुओं की संख्या मुसलमानों से अधिहै। इसका आधार लेकर भारत में हिन्दू और मुस्लिम द्विराष्ट्रवाद के सिद्धान्त का पहला बीज डफरिन ने 1888 में बोया। इस प्रकार अंग्रेजों ने हिन्दू और मुसलमानों के बीच फूट डाना शुरू किया। तब हिन्दू और मुसलमानों में फूट डाकर अपने साम्राज्य की नींव पक्की करने की नीति अंग्रेजों ने अपनायी और लॉर्ड कर्ज़न ने 1905 में बंगा का विभाजन किया। फरवरी, 1905 में लॉर्ड कर्ज़न ने भारत मंत्री को विभाजन की योजना भेजी और इस बात को मंजूरी मिलने तक पूरी तरह से गुप्त रखी। मंजूरी मिलने पर 19 जुला, 1905 को उसकी घोषणा की गयी। 16 अक्तूबर, 1905 को इसे कार्यान्वित किया गया उस समय बंगाल की आबादी 8 करोड़ थी। उनमें से 4 करोड़ 30 ला बंगा और 2 करोड़ 10 लाबिहार तथा उड़ीसा के थे। राजकाज की सुविधा की दृष्टि से बंगा जैसे बड़े प्रान्त का विभाजन कर बंगाली-भाषियों का अलग प्रान्त बनाया जाता तो विरोध होता। पर लॉर्ड कर्ज़न ने राजकाज की सुविधा का झूठा कारण सामने रखकर बंगा का विभाजन इस तरह किया कि पूर्व बंगा के मुस्लिम-बहुल प्रदेश का एक प्रान्त बने और बचा हुआ हिस्सा भी हिन्दू बहुसंख्यक न हो पाये। स्पष्ट था कि हिन्दू-मुसलमानों में फूट डाकर राज करने की नीयत से यह विभाजन किया गया था। लेकिन उस समय ‘फूट डालो और राज करो' नीति कारगर हो पायी।  इस विभाजन का विरोध हिन्दू और मुसलमान दोनों ने मिलकर किया था। राजनीतिक विरोध के बाद 12 दिसम्बर, 1911 को बंगाल का पुनः एकीकरण कर दिया गया। हिन्दू-मुसलमानों की एकता बंगाल का विभाजन रोक सकी, यह देखकर अंग्रेजों ने सोचा कि साम्राज्य बचाये रखने के लिए दोनों में फूट डालने की नीति को तेज़ी से आगे बढ़ाना ज़रूरी है।

धर्म की राजनीति

एक तरफ अँग्रेज़ जहां हिन्दू-मुसलमानों के बीच फूट डालना शुरू किया था वहीं दूसरी तरफ हिन्दू और मुसलमान दोनों में धर्म की राजनीति की छोटी-मोटी धारा बहने लगी थी। पाकिस्तान के जनक समझे जानेवाले बैरिस्टर मुहम्मद अली जिन्ना 1940 तक अखंड हिन्दुस्तान का समर्थक था। शुरू में वह मुस्लिम लीग का सदस्य होने के लिए भी राजी नहीं था। उसका मानना था कि मुस्लिम लीग राजनैतिक दृष्टि से पिछड़ी हुई है। जिन्ना मुस्लिम जमात को भी राष्ट्रवाद की परिधि में ला रहा था। 1916 में लखनऊ में हुए मुस्लिम लीग के अधिवेशन में जिन्ना ने कहा था, “इस समय हम सबके एकजुट होने की एक प्रबल प्रक्रिया शुरू हुई है। अलग-अलग धर्म, वंश तथा जातियों से बना नया हिंदुस्तान अपने उज्ज्वल भविष्य की ओर चल पड़ा है। मुसलमानों को केवल अपने सामूहिक हित का और संकुचित स्वार्थ का विचार छोड़ देना चाहिए। 7 करोड़ मुसलमानों को निर्भय बनकर यह सिद्ध करना होगा कि काया, वाचा, कर्मणा से हम राष्ट्रीय एकता के निर्माण में शामिल हैं। उस समय मुस्लिम लीग का प्रतिनिधि कांग्रेस के अधिवेशन में और कांग्रेस का प्रतिनिधि मुस्लिम लीग के अधिवेशन में उपस्थित रहता था। 1917 के कांग्रेस-अधिवेशन में बैरिस्टर जिन्ना उपस्थित था। अपने भाषण में उसने कहा था, हिन्दू समाज बहुमत की शक्ति से विधानसभा में कोई कानून हम पर थोपेगा और जबरन हिन्दू सरकार की स्थापना करेगा, ऐसा समझना निरर्थक और निराधार है। हिन्दू श्रेष्ठत्व का नारा केवल एक हौवा है। आप लोगों के शत्रु आपका मन विचलित करने के लिए यह डर दिखा रहे हैं। आजादी के आन्दोलन में हिन्दू और मुस्लिम परस्पर सहयोग करें, यह लालसा इस तरह का हौवा खड़ा करने के पीछे है। इस देश पर हिन्दुओं का राज आप चाहते हों तो उसी भावना और उसी आवाज में मैं कहूँगा कि इस देश पर मुसलमानों का राज हो और ब्रिटिशों का तो बिलकुल न हो। सत्ता का हस्तांतरण होना ज़रूरी है। 1940 तक बैरिस्टर जिन्ना इसी तरह का दृष्टिकोण रखता था।

जिन्ना की महत्वाकांक्षा

1930 में इकबाल ने पाकिस्तान की कल्पना सामने रखी तब जिन्ना के मन में सन्देह था। इकबाल की पाकिस्तान की कल्पना धर्म की बुनियाद पर खड़ी थी। इसलाम और शरीअत की रक्षा के लिए इकबाल पाकिस्तान चाहता था।  1940 में मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में पाकिस्तान की माँग करने वाला प्रस्ताव मंजूर हुआ। ऐसा माना जाता है कि भारतीय जनता का नेतृत्व करने की जिन्ना की शुरू से ही आकांक्षा थी। लेकिन भारतीय स्वतंत्रता के आन्दोलन के क्षितिज पर गांधीजी के उदय के बाद इस आन्दोलन का नेतृत्व गांधी की ओर मुड़ गया। जिन्ना का मानना था कि आम लोगों की धार्मिक भावना जगाकर महात्मा गांधी ने अपना नेतृत्व प्रस्थापित किया है। जिन्ना की महत्वाकांक्षा थी कि सारे राष्ट्रीय आन्दोलन का नेता न बने तो कम-से-कम गांधीजी की ही श्रेणी का मुस्लिम समाज का नेता वह बने। इसलिए गांधीजी का उदय और उनके नेतृत्व को बढ़ावा मिलना उसे अखरता रहा। मुहम्मद अली जिन्ना ने गांधीजी को महात्मा कहना अस्वीकार कर दिया।

गांधीजी ???

अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करोनीति का प्रभाव जिस तरह मुस्लिम लीग के नेताओं पर पड़ा, उसी तरह हिंदुत्ववादियों पर भी पड़ा। कुछ लोग भारत के विभाजन के लिए महात्मा गांधी को जिम्मेदार मानते हैं ऐसे लोग गांधीजी की राजनीति को मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के रूप में सामने रखते हैं राजगोपालाचार्य का मानना था कि यदि कांग्रेस और लीग साथ आ जाएं, तो आज़ादी की लड़ाई में जीत जल्दी मिल जाएगी। इसके लिए उन्होंने एक फार्मूला तैयार किया था। यह देखने में तो मुसलमानों का यह दावा सिद्धांततया स्वीकार करता था कि वे एक अलग राष्ट्र हैं, मगर उनके एक पूरी तरह अलग राज्य की बात को स्वीकार नहीं करता था। गांधीजी ने राजाजी की योजना को मान्यता दी थी। गांधीजी द्वारा मान्य राजाजी की योजना को जिन्ना ने अस्वीकार कर दिया था अत: उन लोगों की बात, जो गांधीजी को विभाजन का जिम्मेदार मानते हैं, निराधार हो जाती है कि गांधीजी ने राजाजी की योजना को मान्यता दी, इसलिए विभाजन हुआ। विभाजन टाने के लिए गांधीजी ने वायसराय को एक 9 मुद्दोंवाली योजना प्रस्तुत की थी। वह भी जिन्ना को मंजूर न थी।

गांधीजी को विभाजन मंजूर न था  यह बात इन दो घटनाओं से सिद्ध हो जाती है विभाजन टाने के लिए गांधीजी ने जिन्ना के सामने कई विकल्प रखे। जो आदमी पूरे भारत का प्रधानमंत्री बनाने का विकल्प जिन्ना को दे रहा था, वह भारत से अलग कर पाकिस्तान बनाने की बात क्यों मानता? आप प्रधानमंत्री बनिए। पूरा मंत्रिमंडल मुस्लिम लीग का बनाइए। यह गांधीजी ने जिन्ना से कहा था यह बात वो मुस्लिमों को खुश करने के लिए नहीं कह थे, बल्कि र कीमत पर वे भारत की अखंड़ता कायम रखना चाते थे। राजाजी का प्रस्ताव इस बात का विरोध करता था कि भारत के विभाजन के बाद अंग्रेज सत्ता छोड़ेंगे। लेकिन जिन्ना को तुरन्त पाकिस्तान चाहिए था, आजादी के बाद नहीं भारत और पाकिस्तान दोनों को एक ही साथ आजादी मिले, ऐसा जिन्ना का आग्र था। गांधीजी ने स्पष्ट तौर पर कहा था, अंग्रेज विभाजन की योजना बनावें, विभाजन करें। वह विभाजन म पर बन्धनकारक रहेगा। ऐसा मैं अंग्रेजों से कभी नहींहूंगा।

गांधीजी ने कहा था, मुस्लिम लीग मुस्लिमों का बड़ा संगठन है। आप उसके नेता हैं, यह मुझे मंजूर है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि सभी मुसलमान पाकिस्तान चाते हैं। आप जिस हिस्से का पाकिस्तान बनाना चाते हैं वहाँ मतदान कराकर कितने लोग पाकिस्तान चाते हैं यह म तय करेंगे। इसके लिए भी जिन्ना राजी न हुससे यही स्पष्ट होता है कि गांधीजी को विभाजन मंजूर नहीं था। इन्हीं तथ्यों के आधार पर गांधीजी को कहा जाता है कि वे मुस्लिमों का तुष्टिकरण करते हैं। इसके समर्थन में वे कहते हैं कि गांधीजी तो जिन्ना को प्रधानमंत्री भी बनाना चाते थे। ऐसा नहीं है कि हिन्दू-मुस्लिम एकता की वकालत केवल गांधीजी ही किया करते थे स्वतंत्रता की लड़ाई के आरंभिक दिनों से ही इस बात पर जोर दिया जाता था लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने लखनऊ समझौते के समय दिए गए अपने भाषण में कहा था, में विदेशी शासन से ड़ना है। इस ड़ाई में सफलता प्राप्त करनी हो तो आपस के झगड़े किसी तरह निपटाने होंगे। जाति-धर्म के सब मतभेद मिटाकर में एक स्वर में माँग करनी होगी। ऐसा करते हुए मुस्लिमों को अधिक अधिकार मिले या अंग्रेज मुस्लिमों के हाथों या भारत के किसी भी जाति को सारा राज्य दे दें तब भी में दुविधा में न पड़ना चाहिए। भारत से ब्रिटिश सत्ता नष्ट हो और भारत आजाद हो, इस दृष्टि से मने यह समझौता (खनऊ समझौता) किया है  न्यायमूर्ति महादेव गोविन्द रानडे ने कहा था, हिन्दू-मुस्लिम एकता के बगैर इस विशाल देश की प्रगति असम्भव है, यह सीख में इतिहास से लेनी होगी। यह गांधीजी के राजनीतिक क्षेत्र में उदय होने के वर्षों पहले की बात है जाति-द्वेष का विष फैलाने का प्रयास आजादी के पहले से चला आ रहा था। उसकी परिणति विभाजन के रूप में हुई।

कांग्रेस ???

कांग्रेस के जिम्मे यह काम था कि वह विभिन्न वर्गों, समुदायों, समूहों और अंचलों को एक राष्ट्र के ढांचे में लाये। ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस इस राष्ट्र-निर्माण के काम को पूरा नहीं कर सकी। खासकर मुसलमानों  को राष्ट्र के साथ नहीं जोड़ सकी। दूसरी तरफ़ ब्रिटिश शासक हिटलर के ख़िलाफ़ तो युद्ध जीत गए लेकिन भारतीय मोरचे पर हार गए थे। भारत में राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव क्षेत्र काफी बड़ा हो चुका था। आज़ाद हिंद फौज के मुकदमों के कारण राष्ट्रीय चेतना का विस्तार आन्दोलन की मुख्यधारा के बाहर के लोगों तक हो चुका था। यहां तक कि सेना और नौसेना के ने भी ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ विद्रोह का तेवर दिखाया दिया था। इन सब से ब्रिटिश अधिकारियों का मनोबल गिरता जा रहा था। राष्ट्रीय आन्दोलन ने साम्राज्यवाद के असर का ख़ात्मा कर दिया था। औपनिवेशिक शासन का सामाजिक आधार सिमट रहा था। सरकार परस्त अधिकारी ब्रिटिश राज से बाहर निकल रहे थे। भारतीय सिविल सेवा में ब्रिटिश वर्चस्व समाप्त हो चुका था। सामूहिक अहिंसक कार्रवाइयों के द्वारा सत्ता का भय ख़त्म हो चुका था। कांग्रेस की सरकारों ने लोगों में आत्मविश्वास का संचार भी किया था। यह बात जब ब्रिटिश सत्ता को समझ में आ गई तो उन्होंने यह मान लिया कि अब सत्ता का हस्तांतरण तथा भारत की स्वतंत्रता का समय आ गया है। हां यह निर्णय ज़रूर उन्होंने लिया कि ब्रिटेन के साथ रिश्ता क्या होगा, इस बारे में समझौता कर सम्मानपूर्वक भारत छोड़ दिया। समझौते के लिए कांग्रेस भी उत्सुक थी। बड़े आन्दोलन की तैयारी का प्रदर्शन कर वह सरकार पर दबाव बनाए रखना चाहती थी। इधर सितम्बर 1946 के बाद से ब्रिटिश सरकार ने ‘अल्पमत को बहुमत की प्रगति रोकने की छूट नहीं देने’ की नीति अपना ली थी। लीग की इस मांग को परे कर दिया गया कि लीग की मंज़ूरी के बिना कोई भी समझौता नहीं होगा। ब्रिटिश सरकार ने भारत को आज़ादी देने का निर्णय कर लिया था और ब्रिटिश सरकार का हित इसी में था कि भारत अखंड रहे। लेकिन जिस जिन्ना को और उसके मुसलिम लीग को इतने वर्षों से संरक्षण दे कर खड़ा किया था, वह अखंड भारत कहां स्वीकार करने वाला था। वह पूरी ताकत के साथ विभाजन के लिए अड़ गया। कांग्रेस यह कहती रही कि अगर विभाजन होना भी है तो वह आज़ादी के बाद होना चाहिए।

मोहम्मद अली जिन्ना ???

वास्तव में पाकिस्तान के विषय में जिन्ना की कोई स्पष्ट कल्पना नहीं थी। जिन्ना से चर्चा करते हुए गांधीजी ने पाकिस्तान की कल्पना स्पष्ट करने के विषय में जिन्ना से कहा तब जिन्ना कोई स्पष्ट कल्पना सामने नहीं रख सका भौगोलिक दृष्टि से पाकिस्तान का स्वरूप क्या होगा, यह कभी स्पष्ट नहीं किया गया। 1940 में मुस्लिम लीग ने लाहौर के अधिवेशन में पाकिस्तान का प्रस्ताव पारिकिया। उसके बाद 16 अप्रै, 1941 को डॉ० राजेन्द्रप्रसाद ने जिन्ना को एक निवेदन भेजकर सुझाया कि, आपकी पाकिस्तान की कल्पना और योजना स्पष्ट करें ताकि कांग्रेस उस पर विचार कर सके तब जिन्ना ने जाहिर किया कि पहले सिद्धान्ततः पाकिस्तान को स्वीकृति दीजिए गांधीजी चाहते थे कि पहले अंग्रेज इस देश से चले जायँ। उनका मानना था कि अंग्रेजों के गये बगैर इस देश में शान्ति स्थापित नहीं होगी अंग्रेजों के चले जाने के बाद मारा निपटारा कर लेंगे विभाजन करना हो तो म करेंगे, अंग्रेज नहीं लेकिन, अन्तरिम सरकार के समय महात्त्वाकांक्षी जिन्ना का कांग्रेस से विश्वास उठ गया। 6 जुला, 1946 को कांग्रेस महासमिति के अधिवेशन में अन्तरि सरकार के विषय का कार्यकारिणी का प्रस्ताव मंजूर हुआ।

जिन्ना ने सीधी कार्रवाई घोषित कर दी। लीग अंतरिम सरकार में शामिल हो कर भी सरकार की गतिविधियों में अड़ंगे डालती रही। अन्तरिम सरकार में सरदार पटे ने लियाकत अली को अर्थ विभाग दिया था। लॉर्ड वेवे ने सुझाया था कि गृ-विभाग मुस्लिम लीग को दिया जाय और अर्थ विभाग कांग्रेस के पास रहे परन्तु शायद पटे उस समय अर्थ-विभाग का महत्त्व न समझ सके। गृ-विभाग उन्हें धिमहत्त्वपूर्ण गा। इसलिए उन्होंने लियाकत अली को अर्थ-विभाग सौंपा और स्वयं गृ- विभाग सँभाला परन्तु बाद में अर्थ-विभाग की मंजूरी लिये बिना एक पुलिस तक की नियुक्ति करना भी उनके लिए कठिन हो गया। अली ने ऐसी कर-प्रणाली तय की जिससे हिन्दू पूँजीपति अड़चन में पड़ते। जिन्ना को सिर्फ़ ताक़त चाहिए थी, वह भी सरकार को तोड़ने के लिए। उसका मानना था कि अगर पाकिस्तान चाहिए तो सरकार में हिस्सेदारी ज़रूरी है। लीग ने संविधान सभा में शामिल होने से इंकार कर दिया। नेहरू ने वायसराय से कहा कि लीग या तो कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार करे या सरकार से बाहर हो जाए। उधर एटली ने घोषणा कर दी कि जून 1948 तक ब्रिटिश सरकार भारत को आज़ाद कर देगी। माउंटबेटन ने यह पता लगाना शुरू कर दिया कि कांग्रेस और लीग किन बातों पर एक हो सकती है।

माउंटबेटन ने जो योजना तैयार की वह यह थी कि भारत को दोहरी डोमिनियन हैसियत प्रदान करना और 15 अगस्त 1947 तक सत्ता का हस्तांतरण। यह स्थिति लॉर्ड माउंटबेटन की उत्पन्न की हुई थी।  उस समय की परिस्थिति में सरकार को कामकाज करने देने का एकमात्र वैकल्पिक हल गांधीजी की योजना को स्वीकार करना था। परन्तु अंग्रेज़, लीग और कांग्रेस तीनों ने इसे नहीं माना। माउंटबेटन को लगा कि मौजूदा परिस्थिति में सबसे अच्छा काम वह यही कर सकता कि भारतीय दलों को किसे न किसी तरह सहमत करके ख़ुद को मिले हुए आदेश के अनुसार सत्ता को जल्दी हस्तांतरित कर दे। इसमें उसे सफलता भी मिली। कुछ लोग इसे माउंटबेटन की कूटनीति की विजय मानते हैं। लेकिन क्या यह उसके मिशन की भी जीत थी?

लॉर्ड माउन्टबेटन ???

3 जून, सन् 1948 तक भारत को आजादी देनी थी। परन्तु लॉर्ड माउन्ट बेटन ने भारत की आजादी और विभाजन की समसारिणी बना डाली पंजाब की डेढ करोड़ जनता के लिए 25 जार पुलिस की ज़रुरत थी। लॉर्ड माउंट बेटन ने केवल 18 हजार पुलिस तैनात की। भारत-पाकिस्तान की सीमा-निर्धारण का काम माऊँट बेटन ने रेडक्लिफ को सौंपा था जो पहले कभी भारत नहीं आया था भारत की भौगोलिक स्थिति की किसी तरह की जानकारी उसे नहीं थी ऐसे व्यक्ति को 40 दिनों में दो राष्ट्रों की सीमा निर्धारित करने के लिए कहा गया था। रेडक्लिफ ने ने ख़ुद कहा था कि दो राष्ट्रों की सीमा निर्धारण के लिए उसे दो वर्षों का समय चाहिए था। दूसरी गती यह की गयी कि सीमा सम्बन्धी निर्णय सत्ता स्तान्तरण के बाद घोषित किया गया। पंजाब की सीमाएँ निर्धारित करते ही अगर सीमाएँ जाहिर कर दी जातीं तो अंग्रेजी सेना के अधिकारियों की निगरानी में लोगों की अदला-बदली होती सीमावर्ती प्रदेशों में कानून और सुव्यवस्था स्थापिहोती। यह सावधानी नहीं रखी गयी, फलतः भयंकर नरसंहार हुआ।

विवेचना

ब्रिटिश सरकार अपने ही बनाए जाल में फंस गई थी। जिन्ना की बात को उसे मंज़ूर करना पड़ा। नेहरू और पटेल ने कांग्रेस कार्य समिति में 3 जून की योजना की वकालत की। सभा में प्रस्ताव पारित हो गया और कांग्रेस ने भी विभाजन मंज़ूर कर लिया। कांग्रेस ने गांधीजी की सलाह की उपेक्षा कर दी। गांधीजी के लिए यह असह्य था। नेहरू, पटेल और गांधीजी के सामने विभाजन स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। कांग्रेस मुस्लिम जनसमूह को राष्ट्रीय आन्दोलन में नहीं खींच सकी थी। मुस्लिम साम्प्रदायिकता को रोकने में वे सफल सिद्ध नहीं हुए थे। कलकत्ता, रावलपिंडी, नोआखाली और बिहार के साम्प्रदायिक दंगों के फूट पड़ने से स्थिति और भी हाथ से बाहर चली गई थी। कांग्रेस के नेताओं को लग रहा था कि सत्ता का हस्तांतरण हो जाए तो शायद इस पर काबू पाया जा सके। अन्तरिम सरकार के काल में अर्थमंत्री लियाकत अली द्वारा पेश किये गये बजट के कारण कांग्रेस के सामने दिक्कतें खड़ी हो गयी थीं। अंतरिम सरकार अपंग हो चुकी थी। सरदार पटेल ने माउंटबेटन से कह दिया कि मुझे विभाजन मंजूर है  बंगाल और पंजाब में तो ऐसा लग रहा था जैसे पाकिस्तान की सरकार काम कर रही हो। प्रांतीय सरकारों की निष्क्रियता और लीगी मंत्रियों की अड़ंगेबाज़ी से त्रस्त नेहरू को लगने लगा था कि सत्ता में बने रहने का औचित्य क्या है? यदि सत्ता का हस्तांतरण हो जाए तो शायद परिस्थितियों पर नियंत्रण आसान हो जाए। नेरूजी ने भी विभाजन को स्वीकृति दे दी। विभाजन की अनिवार्यता जानकर ही दोनों ने स्वीकृति दी थी। कांग्रेस ने अगर विभाजन की मंजूरी दी हो तो मेरे विरोध का विचार किये बगैर केवल कांग्रेस की बात रखने के लिविभाजन को मंजूरी देने के अलावा अन्य कोई चारा नहीं है, इस विवशता में गांधीजी ने विभाजन की मंजूरी दी। गांधीजी ने 28 वर्षों से कांग्रेस का नेतृत्व किया था। इन नेताओं को साथ लेकर ही गांधीजी ने आन्दोलन छेड़े थे उनके वे हीयोगी गांधीजी को अलग रखकर माउंटबेटन से मिरहे थे। विभाजन को मंजूरी दे रहे थे। गांधीजी अकेले पड़ गये थे। विभाजन-विरोधी आन्दोलन छेड़ने के लिए संगठन आवश्यक था। कांग्रेस विभाजन को मंजूरी दे चुकी थी। अत: नये सिरे से नया संगठन खड़ा करना होता। अब तक के साथियों के विरोध में यह संगठन खड़ा होता। उसके लिए कांग्रेस में ही फूट डालकर वहीं से लोगों को इस नये संगठन में लाना पड़ता। गांधीजी कांग्रेस में फूट डालने की भूमिका स्वीकार नहीं कर सकते थे। विभाजन ही सही, पर आजादी तो मिरही है, इस बात से जनता में उत्सा था। ऐसी हालत में गांधीजी अगर विभाजन के विरोध में आन्दोलन छेड़ते भी तो जनता स्वाधीनता आन्दोलन की तरह उसमें शामि नहीं होती। गांधीजी ने कहा था, मुझे नहीं लगता कि भारत के विभाजन से मेरे जितना किसी का मन दुखी हुआ होगा। लेकि मैं आन्दोलन का आश्वासन नहीं दे सकता। विभाजन अनुचिहै, यह मेरा मत है। मैं विभाजन के पाप का भागी नहीं होना चाता। परन्तु कांग्रेस ने विभाजन को स्वीकृति दी है, अत: मैं विवशता से स्वीकृति दे रहा हूँ। कांग्रेस के विरोध में मैं आन्दोलन नहीं कर सकता। किसी भी हालत मे कांग्रेस-विरोधी आन्दोलन का समर्थन नहीं किया जा सकता। विभाजन की योजना में कांग्रेस ने खुद को बाँध लिया है, तब मैं आन्दोलन कैसे करूँ?”

दो डोमिनियन राज्यों की योजना स्वीकार कर ली गई। इससे एक फायदा तो यह निश्चय ही हुआ था कि विखंडीकरण पर अंकुश लगा और रियायतों को इस या उस देश में शामिल होना पड़ा। प्रांतों का समूहीकरण किया जाने वाला प्रस्ताव भी कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया। अधिकारिक तौर पर विभाजन की बात भी कांग्रेस ने मान ली। उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत को पाकिस्तान का अंग मान लिया गया। घटनाएं तेज़ी से घटित हो रही थीं। अंग्रेज़ों ने जो दो ब्रह्मास्त्र अंत तक अपने हाथ में रखा हुआ था, उसका उन्होंने बहुत ही सफलता से उपयोग किया और भारतीय नेताओं को शीघ्र सत्ता हस्तांतरण के लिए एकता का बलिदान भी क़ुबूल हुआ। एक अस्त्र था सुरक्षित अधिकारों और नौकरशाहों पर नियंत्रण का और दूसरा अस्त्र था देशी राज्यों के संबंध में उनकी सार्वभौम सत्ता। कांग्रेसियों ने अंतिम उपाय के रूप में विभाजन को स्वीकार किया। उस समय वे ऐसी हालत में पहुंच गए थे कि उसे स्वीकार न करते, तो सब कुछ उनके हाथ से निकल जाता।

कुछ लोग इस विवाद को तूल देते हैं कि यदि 1937-39 के दौरान जिन्ना के साथ समझौता कर लिया जाता और 1937 में युक्तप्रांत में कांग्रेस और लीग का मंत्रिमंडल बन जाता, तो सांप्रदायिकता की समस्या ख़त्म हो जाती। ऐसे लोगों का मानना है कि जिन्ना की कुंठित राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने ही उसे अलगाववाद की ओर मोड़ दिया। लेकिन हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि कुंठित किए जाने के पहले ही जिन्ना संप्रदायवादी हो चुका था। 1937 से 39 तक कांग्रेस के नेताओं ने उससे बातचीत और समझौता करने की बहुत कोशिश की। लेकिन जिन्ना के पास ऐसी कोई मांग ही नहीं थी जिसपर तर्कपूर्ण विचार किया जा सके। जिन्ना ने ऐसा कोई प्रस्ताव भी नहीं रखा कि कांग्रेस उसकी कौन-कौन सी बात मान ले, ताकि वह कांग्रेस के साम्राज्यवादी विरोध के संघर्ष में शामिल हो जाए। वह तो सिर्फ़ यह कहता रहा कि कांग्रेस अपना धर्मनिरपेक्ष वादी चरित्र छोड़ दे और ख़ुद को हिंदू संगठन घोषित कर दे और लीग को मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि मान ले। इस शर्त को स्वीकार करना कांग्रेस के लिए असंभव था। राजेन्द्र प्रसाद के शब्दों में कांग्रेस द्वारा इसे मान लेना कांग्रेस के लिए अपने अतीत को अस्वीकार करने और अपने भविष्य के साथ विश्वासघात करने के बराबर होता। दरअसल जिन्ना ऐसे शर्त रख रहा था जो सांप्रदायिक राजनीति से परिचालित हो रहे थे, जैसे पाकिस्तान की मांग। सांप्रदायिक राजनीति का परित्याग उसे मंज़ूर नहीं था।

ब्रिटिश सत्ता भारत में न ख़ुद शासन करती थी, न दूसरों को करने देती थी। मुसलिम लीग के नामजद प्रतिनिधियों के अन्तरिम सरकार में बने रहने के सवाल का कभी ईमानदारी से सामना नहीं किया गया। लीग को मंत्रिमंडल में शामिल करने के पहले ही जिन्ना मुसलमानों को ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस से अलग तीसरा पक्ष घोषित कर चुका था। लीग को सरकार में शामिल करने का मतलब होता कि कांग्रेस सभी भारतीयों की ओर से बोलने का अधिकार खो देती। यह तो राष्ट्रवादी मुसलमानों के साथ विश्वासघात होता। उसपर से लीग युक्तप्रांत विधानसभा के उपचुनाव में  ‘इसलाम ख़तरे में है’ का नारा लगा चुकी थी। जिन्ना ने ख़ुद अल्लाह और क़ुरान के नाम पर वोट देने की अपील की थी। सिर्फ़ दो सीट उसे एक प्रांतीय मंत्रिमंडल में नहीं मिली थी, और वह सांप्रदायिक घृणा फैला रहा था। ऐसे नेता को कब तक संतुष्ट रखा जा सकता था। सांप्रदायिक विचारधारा को कभी संतुष्ट नहीं किया जा सकता। इसका मुक़ाबला किया जाना चाहिए था, जो नहीं किया जा सका। 1942 से 1946 तक इस उम्मीद में कि उसके बेहतर लोग साथ आ जाएं, मुसलिम लीग को संतुष्ट करने की कोशिश की गई। लेकिन हुआ उलटा। इस दौरान सांप्रदायिकता से राष्ट्रवादी हिन्दू और मुसलमान दोनों संघर्ष कर रहे थे। नरमपंथी संप्रदायवादी कट्टर और घृणा वादी साम्प्रदायियों का विरोध नहीं कर सके।

कांग्रेस ने विभाजन स्वीकार करके ग़लती की ??

कुछ लोग कहते हैं कि कांग्रेस ने विभाजन स्वीकार करके ग़लती की। सांप्रदायिकता के मामले में यह उसकी असफलता थी। लेकिन उस वक़्त शायद इसके अलावा कोई विकल्प था भी नहीं। उस समय तक सांप्रदायिकता ने काफी दूरी तय कर ली थी। लंदन की रॉयल एम्पायर सोसायटी के भाषण में लॉर्ड इस्में ने स्वीकार किया कि भारत आने के पहले उसका यह ख़्याल था कि अंग्रेज़ों के भारत छोड़ने की क्रिया पूरी करने के लिए जून 1948 की अन्तिम तिथि ‘अत्यधिक जल्दी’ रख दी गई है, परन्तु भारत पहुंचने पर उसका यह विचार होने लगा कि वह तारीख़ ‘अत्यधिक विलम्बशाली’ है। दिल्ली और प्रांतों की राजधानियों में साम्प्रदायिक कटुता इतनी अधिक तीव्र हो गई थी जिसकी वह कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था। अगर विभाजन स्वीकार न किया जाता तो शायद देश गृहयुद्ध में चला जाता। ऐसी परिस्थिति में पुलिस और सेना की सहायता लेनी होती, और उन पर उस समय विदेशी शासकों का नियंत्रण था। इसलिए विभाजन को रोकने का उस समय कोई तात्कालिक समाधान उपलब्ध था भी नहीं। सबसे बड़ी बात यह है कि सांप्रदायिकता का कोई तात्कालिक समाधान होता ही नहीं। अनेक दशकों तक समाधान की दिशा में काम करना होता है। राष्ट्रीय आंदोलन ने इस दिशा में काम नहीं किया। उन्हें राष्ट्रवाद की सामाजिक-आर्थिक जड़ों में जाना चाहिए थी। सभी तरह की सांप्रदायिकता के विरुद्ध और उसके वैचारिक आधार पर विचारधारात्मक-राजनीतिक संघर्ष चलाना चाहिए था। कांग्रेस ने सांप्रदायिक नेताओं से बातचीत पर कुछ ज़्यादा ही भरोसा किया। सांप्रदायिकता का मुक़ाबला करने के लिए विचारधारात्मक और सांस्कृतिक स्तरों पर कोई दीर्घकालिक रणनीति विकसित नहीं हो पाई। ‘भारत के बँटवारे के गुनहगार’ में डॉ. राममनोहर लोहिया कहते हैं, कांग्रेस सरकार के उन गुनाहों में से एक जिसे कभी माफ़ नहीं किया जा सकता, वह है इन बिछड़े हुए दिलों को एक साथ लाने में उसकी नाकामी—असल में, इस काम को करने की उसकी अनिच्छा।

उपसंहार

ख़ैर, स्थिति ऐसी हो गई थी कि जिसमें दोनों पक्ष ऐसी योजना मानने के लिए तैयार हो गए, जिसे वे नापसंद करते थे, जिन्ना को ‘कीड़ों का खाया हुआ, विकलांग पाकिस्तान’ मिला, तो कांग्रेस को विभाजित भारत। फिर भी दोनों ही पक्ष इसका प्रतिकार करने की स्थिति में नहीं थे। भारत का विभाजन उन लोगों की अनुमति, सहमति से हुआ, जिन्होंने यह कहकर विभाजन की निन्दा की थी कि यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद के हित में भारत को बंटा हुआ और कमज़ोर रखने की एक चाल है।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

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